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"अधूरी तस्वीरें"

 

 

जब तक तस्वीरें अधूरी रहती हैं, उनमें मास्टरपीस बनने का दम रहता है. ई-कल्पना की शुरुआत हम ऐसी ही अधूरी तस्वीरों से कर रहे हैं.

 

नौजवान जीवन, जिसने अनुभवों का पूरा विस्तार नहीं देख पाया है, एक अधूरी तस्वीर ही है. समाज, परिवार या खुद की आकांक्षाओं पर खरे न उतरने पर कुंठाग्रस्त नवयुवक अकसर आवेगशील कदम उठा लेता है. मंकी मैन में दिव्य प्रकाश दुबे ने बड़ी सहजता से इस बात का विवरण किया है.

 

लेकिन समाज कोई अटल संस्था हो, ऐसा भी नहीं है. समय के साथ बदलता है. हम खुद समय के साथ बदलते हैं. अकसर अपनी अपेक्षा के प्रतिकूल जब परिवारजनों या समाज की प्रतिक्रिया पाते हैं, तो अचम्भित हो जाते हैं. विमल पांडेय के चश्मे में उसी अचम्भे का खूबसूरत वर्णन है.

 

ख़ालाजान की आखिर कब तक? में औरत के सूनेपन का जो एहसास है, वो सिर्फ़ एक भारतीय औरत का एहसास हो, सही नहीं है. मैंने कई देशों की, विभिन्न तबकों की औरतों में वही रोषपूर्ण सवाल कई बार उठते देखा है. जब जब औरत खुद को केवल एक संगिनी मानती है, आदमी की तरह खुद एक व्यक्ति-विशेष है, इस बात का सामना नहीं करती है, इस सवाल से जूझती रहती है, खुद को अधूरा महसूस करती है.

 

इस कहानी का शीर्षक क्योंकि एक कराह भर नहीं, बल्कि एक सवाल है - आखिर कब तक? - मैं जवाब देने की जुर्रत करूँगी … खालाजान, आपका ये हाल तब तक बना रहेगा जब तक आप इसे बनाया रखना चाहेंगी.

 

अंत में, दुनिया में अनगिनत खूबसूरत रास्ते हैं. रास्ते में कठिनाईयाँ होती हैं, सुंदर उपवन भी होते हैं. हर रास्ता एक कहानी सामने लाने की सम्भावना रखता है. तो राह पकड़िये, कहानियाँ लिखिये.

 

मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

 

 

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