... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

खुशनसीब

 

वह पहली बार मेरे घर आया था. दुबला-पतला, स्याह रंग, धंसी हुई आँखें, उसके सिर पर बहुत तेल लगा था जिसके कारण वह पिचका हुआ-सा लग रहा था. कमरे के बाहर ही उसने अपनी पुरानी और टूटी-सी जूतियाँ उतार दीं और दोनों हाथ जोड़कर वह अंदर आ गया. मेरा बेटा रोहित स्कूल गया हुआ था और पति भी इस समय घर पर नहीं थे. मैंने उसके चेहरे की ओर हैरानी से देखा. मेरे देखने का यही तात्पर्य था, कि तुम यहाँ किस काम से आए हो? वह मेरी नजरों का अर्थ शायद जान गया था. मैंने उसे बैठने के लिए कहना चाहा पर मेरा अहम आड़े आ गया. मैं उसे बैठने के लिए भी न कह सकी. वह खड़ा रहा. मैंने दुबारा उसके चेहरे की ओर देखा. वह अब भी हाथ जोड़े खड़ा रहा था. हारकर मैंने ही उससे पूछा, भाई क्या काम है ... तुम कुछ कह भी नहीं रहे?

मेरी बात से उसे हौसला मिला. वह दो कदम और आगे आ गया और बोला, मैं आपका पड़ोसी हूँ ... आपसे मदद माँगने आया हूँ.

मदद? और मुझसे? मैं स्वयं लाचार, तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूँ? मैंने कहा.

मुझे पाँच सौ रुपए की जरूरत है. उसने मुँह लटकाए हुए धीरे-से कहा.

देखो, मेरे पास इस समय तुम्हें देने के लिए रुपए नहीं हैं. रोहित के पापा शाम को आ जाएँगे तो ले जाना. मैंने बात टालनी चाही.

तभी रोहित के दोस्त ने अचानक प्रवेश किया तो मैंने हैरानी से पूछा, तुम आज स्कूल नहीं गए? क्यों?

उसने मेरी ओर देखा फिर उस व्यक्ति की ओर पहचानी हुई नजरों से देखने लगा.

मैंने नरेश से पूछा, क्या तुम इन्हें जानते हो?

नरेश दौड़कर मेरे बिस्तर पर आ बैठा और मेरे घुटनों पर सिर टिका कर रोने लगा. मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर पूछा, क्‍या हुआ? तुम रो क्‍यों रहे हो? इस बार वह मुझे नहीं उस व्यक्ति को देखकर बोला, ये मेरे पापा हैं.

तुम्हारे पापा! मैं हैरान हो गई. मैंने इन्हें पहले कभी नहीं देखा था न इसलिए. मैंने अपनी बात खत्म की और नरेश के पिता को बैठने के लिए कहा. वह सहमा हुआ सा बैठ गया. तब मैंने अपने नौकर को चाय लाने के लिए कहा.

मैं खुद ही चाय बना देती पर मजबूर हूँ. पिछले कई महीनों से मैं इस बिस्तर से उठ भी नहीं सकती. मैंने अपनी बात धीरे-से कह दी. पता नहीं उसने मेरी बात सुनी या नहीं, पर मैंने तो मानो अपने सिर से बोझ उतार दिया.

वह बेचैन-सा लग रहा था. आखिर मैंने ही उससे पूछा, तुम्हें किसलिए रुपए चाहिए?

वह कुछ पल सोचता रहा, शायद यही कि बात कैसे शुरू करें. फिर उसने गंभीरता से कहना शुरू किया, मेरी पत्नी को टी.बी. है. उसका इलाज चल रहा है. यूँ तो वह सरकारी अस्पताल में है पर अच्छी दवाएँ तथा खुराक भी तो जरूरी है, अगर आप मेरी मदद कर दें तो... वह गिड़गिड़ाने लगा.

मैंने पूछा, तुम्हारी पत्नी की बीमारी कौन सी स्टेज में है? क्या वह ठीक हो जाएगी?

डाक्टर तो भरोसा नहीं देते, पर मुझे विश्वास है कि वह जरूर ठीक हो जाएगी. उसने आशा से कहा. उसका चेहरा चमकने लगा था.

पर सुना है टी.बी. तो जानलेवा बीमारी है ... फिर भी तुम पैसा बेकार क्यों कर रहे हो? मैंने उसके दिल को टटोलना चाहा.

आप पैसों की बात कर रही हैं, मैंने तो घर की सारी कीमती चीजें बेच दी है. नरेश की माँ चंगी हो जाए तो...! उसने एक गहरी सांस छोड़ी.

इसी बीच नौकर चाय लेकर आ गया था. उसने चाय कप में डालकर एक प्‍याली चाय उसकी ओर बढ़ा दिया.

वह चुपचाप चाय पीता रहा. बीच-बीच में वह बड़ा अशांत सा दिखने लगा.

मैंने पूछा, कितने दिन बाद नरेश की माँ की छुट्टी होगी?

कुछ ठीक से नहीं कह सकता... एक महीना और लग सकता है. उसने कहा.

बच्चों का ध्यान कौन रखता है? मैंने जिज्ञासावश पूछा.

मैं जो हूँ. सुबह अपने तीन बच्चों को नहलाकर नाश्ता करवा देता हूँ और दस बजे नरेश की माँ को मिलने चला जाता हूँ. दोपहर को आकर खाना पकाता हूँ और फिर शाम को अस्पताल चला जाता हूँ... रात को कभी-कभार हल्का-फुल्का खाकर सो जाता हूँ. उसने अपनी दिनचर्या मुझे बता दी.

तुम इतनी बार अस्पताल जाते हो तुम्‍हारा खर्च तो काफी हो जाता होगा, तुम्‍हारी आमदनी का जरिया क्‍या है? मैंने सबसे जरूरी सवाल अब पूछा.

जी मैं स्कूटर चलाता हूँ. उसने जवाब दिया.

क्‍या पाँच सौ रुपए तुम्‍हें अभी चाहिए? या शाम तक ले जाना. मैं तो उठकर दे नहीं सकती. अगर पचास या सौ रुपए चाहिए तो अभी लेते जाओ. मैंने तकिये के नीचे से टटोलकर उसे रुपए देते हुए कहा.

वह चुपचाप सौ रुपए लेकर चला गया. पीछे-पीछे नरेश भी चला गया. मैं सोचने लगी अपनी पत्नी से कितना स्नेह है इस पुरुष को ... वह उसको जीवित रखने के लिए अपनी हर चीज को दांव पर लगा रहा है, यहाँ तक अपने मान-सम्‍मान को भी.

भला कोई अपनी औरत के इलाज के लिए भी उधार माँगता है, गिड़गिड़ाता है. वह चला गया था, पर उसकी बातें मेरे अंतर्मन में घूमती रहीं और मेरा अंतर्मन अपने आप जवाब देता रहा.

जब कोई अस्पताल में होता है न... तो उसका ध्यान दरवाजे पर ही टिका रहता है... कब कोई अपना दिखे.

यहाँ घर में भी अपनों के चेहरे देखने के लिए मन तरसता रहता है.

इतने सारे बेगानों के बीच अकेले रहना कितना मुश्किल होता है. मेरा तो जी चाहता है कि मैं भी नरेश की माँ के पास ही रहूँ और क्‍या करूँ ... बच्चे हैं और फिर अगर मैं स्कूटर नहीं चलाऊँगा तो घर कैसे चलेगा.

काश मेरे साथ भी कोई इस तरह अपनापन करने वाला होता.

पति-पत्नी से बढ़कर भी कोई रिश्ता होता है... आप तो समझती होंगी... अगर पति अपनी पत्नी के दु:ख में काम न आए तो पत्नी जीएगी कैसे?

जीना ही पड़ता है. आजकल तो लोगों ने पति-पत्नी के रिश्ते को भी बिकाऊ बना लिया है. कहाँ चली गई है इस रिश्ते की सारी मिठास?

नरेश की माँ अपने परिवार को छोड़ मेरे साथ शहर में आई है. यहाँ सिर्फ मैं ही तो हूँ उसका. अगर मैं भी उसका इलाज न कराऊँ तो मुझे धिक्‍कार है.

मैं सोचती रही कितनी ऊँची बातें कर रहा था वह, जिसे मैं नीचा समझ रही थी.

अब मैं राहत महसूस कर रही थी कि मैंने उसे सौ रुपए दे दिए हैं.

अगले दिन वह आया तो उसके चेहरे पर कल जैसी उदासी नहीं थी. उसकी आँखों में चमक थी आज. आते ही उसने मेरे पैर छुए और कहा, बहनजी, नरेश की माँ को जल्दी ही छुट्टी हो जाएगी. बड़े डॉक्‍टर ने बता दिया है कि वह बिल्कुल ठीक हो गई है.

मैंने उसे बधाई दी और बैठने के लिए कहा. मैंने उसे पाँच सौ रुपए देने चाहे पर उसने मना कर दिया. मैंने ज़ोर नहीं दिया. वह उठकर चला गया.

कोई पंद्रह दिन के बाद वह फिर मेरे घर आया था. इस बार वह अकेला नहीं था, उसके साथ एक बेहद काली, पतली और बेढंग से कपड़े पहने एक औरत भी थी. उसने आते ही कहा, बहनजी नरेश की माँ आपको शुक्रिया बोलने आई है.

अच्छा! अच्छा तो यह तुम्‍हारी पत्नी है? बैठो. मैंने कहा. उसकी पत्नी बैठ गई. मैंने उससे बात की, तुम्‍हारे पति तुम्‍हें बहुत चाहते हैं, तुम भी इनका ध्यान रखना.

वह शायद मेरे बारे में सब जानती थी. उसने कहा, पति चाहे औरत का ध्यान रखें या न रखें, पत्नी को तो पति के साथ ही जीवन गुजारना होता है. मुझे लगा वह मुझपर व्यंग्य कस रही है. मैंने बात को टालना चाहा पर वह कहती गई, मैं तो खुशकिस्मत हूँ कि मुझे ऐसा पति मिला वरना आजकल के पति....

मुझे लग रहा था कि मैं अनावृत्‍त होती जा रही हूँ. मैंने उससे पूछा, चाय पीओगी बहन?

तभी वह बोल उठा, इसे चाय मना है. कुछ देर बैठकर दोनों चले गए, यह कहकर कि बच्चों के आने का समय हो गया है.

उसके चले जाने पर मैं उसे खुशकिस्मत मानने से स्वयं को रोक न सकी. मैं अपने आपको उसके सामने हीन समझ रही थी.

 

रात को रोहित के पापा घर लौटे तो मैंने उन्हें पाँच सौ रुपए लौटाते हुए नरेश की माँ तथा पिता की सारी कहानी ज्यों-की-त्यों सुना दी. वह कुछ नहीं बोले, पहले तो बात-बेबात भड़क उठते थे परंतु पिछले कुछ दिनों से वह पूरी तरह मेरे प्रति लापरवाह हो गए थे जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं. जैसे मैं इस घर में एक फालतू और बेजान चीज हूँ. मुझे याद आ रही है धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी जिसका पति नेत्रहीन था तो उसने भी सारी उम्र अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर बिता दी थी. इतिहास में कभी पुरुष ने किया है ऐसा त्याग? क्‍या बीमार और लाचार औरत के कोई मायने नहीं?

एक सप्‍ताह के बाद ही हम लोग वह शहर और घर छोड़कर गाँव आ गए थे. जानते हैं क्‍यों? क्‍योंकि वहाँ एक शरीफ इन्सान रहता था जो अपनी बदसूरत और बीमार पत्नी को जी-जान से चाहता था और मेरे पति को वह माहौल कतई पसंद नहीं था.

आज भी मुझे वह खुशकिस्मत औरत भूले नहीं भूलती वरना इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी मैं उसे क्‍यों याद करती?

 

दिल्ली की श्रीमति सविता चड्ढा उर्दू की नामी पत्रकार हैं. इनके अनेकों कहानी, काव्य और यात्रा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, कहानियाँ विभिन्न भाषाओं में अनुवाद की जा चुकी हैं. तीन टेलीफ़िल्में इनकी कहानियों पर आधारित हैं, और कईआकाशवाणी में भी प्रसारित की जा चुकी हैं. इसके अलावा इनके दो उपन्यास और पत्रकारिता विषयक अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. 1987 में हिंदी अकादमी, दिल्‍ली से साहित्यिक कृति सम्‍मान, मैसूर हिंदी प्रचार प्ररिषद से हिंदी सेवा सम्‍मान, आथर्स गिल्‍ड आफ इंडिया से साहित्यिक सम्‍मान, महादेवी वर्मा सम्‍मान, कलम का सिपाही, आराधकश्री, साहित्‍यश्री, साहित्‍य शिखर सम्‍मान और वुमैन केसरी के अलावा देश की प्रतिष्ठित कई संस्‍थाओं ने इनको साहित्‍यकार के रूप में सम्‍मानित किया है ।

लेखक से सम्पर्क के लिये ई-मेल - savitawriter@gmail.com

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