... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

सच और सपनों के बीच

 

मचलते बादल और कुचलते अरमानों से तबाही का जो मंज़र खड़ा हुआ उसे बयाँ नहीं किया जा सकता. क्योंकि तबाही को बयान करने में मन भी तबाह हो जाता है. और हम खाए-पीए, अघाए लोग मन में ख्वाहिशों का समन्दर तो समेट सकते हैं मगर तंज का एक कतरा भी हलक को छील देता है और आखें छलछला जाती हैं.

तीन दिन की लगातार मूसलाधार बारिश से पूरी चाल बदबूदार दुर्गंध से बजबजा रही थी. मच्छर, मेंढक, साँप और पिस्सुओं ने जीना दूभर कर दिया था. खाते समय मेंढक थाली में छलांग लगा देते. खाना और खाने का मन खराब हो जाता.

महानगर की यातायात ठप्प हो गई थी. बहुत से जीव-जंतु नालों में मर कर उतरा रहे थे. दहिसर और पोयसर, जो अब नदी कम नाला अधिक लगतीं थीं, उन में लाशें तैर रही थीं. लाश फँस जाने से इलाके के सीवर जाम हो गए थे. सी-बीच पर कहीं भी मानुष शरीर  दिख जाता.

स्कूल कालेजों में आकस्मिक चिकित्सालय खोले गए. फिर भी पाँच-छ: सौ लोग प्रतिदिन काल के गाल का ग्रास बन जाते. शहर में लोग कम होते जा रहे थे और श्मशानों और कब्रिस्तानों में लोग बढ़ते जा रहे थे, लेकिन दोनों की अपनी सीमाएँ थीं . दूसरी दिक्कत यह भी कि इतनी कच्ची लाशें पानी में बहा भी नहीं सकते. वैसे भी शहर के नदी-नाले कब के पाटे जा चुके थे. अब तो उनके चिन्ह तक मिट-मिटा गए थे. आज जहाँ वसई का यह सिटिजन विलेज बसाया गया है, वहाँ दस साल पहले समुद्र की लहरें लहराती थीं.

महानगर में लहराती मौत की फसलों की जरूरतों को पूरा करना भारी होता जा रहा था. तभी महानगर पालिका को समुद्र की याद आई. महापौर ने कहा - समुद्र कब काम आएगा? और समुद्र काम में लाया गया. लाशें पत्थर बाँध कर डाली जाने लगीं. हाँ, लाशों में  हिंदू-मुसलमान का भेद नहीं किया गया. कहते हैं उस साल मछलियों की पैदावार रेकार्ड स्तर पर हुई. जिसे याद करके मछली और मांस के सौदागरों की आँखें आज भी चमक जाती हैं और हसरत के शोले भभक उठते हैं.

हाँलाकि, खुद सुदक्षणा के घर में कम घमासान नहीं था - बहन की डिलेवरी थी, पिता अस्पताल में, भाई दूबई और माँ किसी तरह चुल्हा-चौका कर घर का पेट चला रही थी - बारिश ने चूल्हे को और परिस्थिति ने जीवन को ठंडा कर दिया था. सुदक्षणा के चले जाने पर दो दिन तक माँ ने नदी-नाले से मिली लाशों का मुआयना किया. जगह-जगह भटकती रही. और लगभग यह मान लिया कि कहीं बह-बाह गई शायद, पर साथ में यह भी कि, जब कहीं भेजी ही नहीं गई, तो गई कहाँ और क्यों? सवाल समुद्र में गोते लगाते लाशों की तरह गोते तो जरूर लगाते पर उत्तर नहीं दे पाते.

अब यहाँ माँ का नाम बता ही दिया जाए. क्योंकि बार-बार वह कहानी में आएगी ही. आखिर कहानी है भी उसी की. तो बार-बार माँ कहना ठीक नहीं लगेगा. अब इतना तो मेरे वश में है ही कि उसे सर्वनाम से संज्ञा में बदल ही दिया जाए. वैसे इस तरह के लोगों और महिलाओं की पूरी ज़िंदगी सर्वनाम में ही बीत जाती है. वैसे भी जब कहानी की मुख्य पात्रा अर्थात कहानी की नायिका के नाम में कोई पर्दा नहीं तो चरित्र पात्र के नाम में कैसा पर्दा? लेकिन मुझे पूरी तरह नहीं पता कि कहानी की नायिका या नायक कौन है? क्योंकि कभी-कभी चरित्र पात्र इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि मुख्य नायक या नायिका नेपथ्य में चले जाते हैं.

माँ का नाम मनकी निकम था, जो पैंतीस साल पहले अकोला से अकेले भाग आई थी. उसकी भी अपनी एक कहानी है परंतु वह बाद में कहीं सुयोग देखकर. और सुयोग नहीं बना तो नहीं भी.

मनकी निकम साल भर से कई बे-उत्तर सवालों से घिरी थी. लोग कहते भी - नाम भले मनकी है, पर तेरे मन का होता कब है? सही भी है मन और तन से सुंदर मनकी को बिना कुसूर घर छोड़ना पड़ा था, जबकि उसका मन भागने का कभी नहीं रहा. पति के बीमार होकर खाट पकड़ लेने पर जब उसे अस्पताल में डालना पड़ा तो उसने खुद से कहा भी था - बरसात सिर्फ़ पानी की नही होती, गरीबी, लाचारी और मजबूरी की भी होती है. और इसे मेहनत करके टाला नहीं जा सकता. क्योंकि ऊपर बैठा भला मानुष तय करता है इसे. बादल के बरसात दिख जाते हैं. और समन्दर के कोख में समा जाते हैं. टनमन काका कहते थे कि समन्दर में आग का कुंड होता है, जो मोठा प्रमाणात पानी (जरूरत से ज्यादा पानी) को जला देता था. पर सवालों और दुखों का जो जलजला ह्रदय में उमड़-घुमड़ रहा है उसे कौन अग्नि-कुंड जलाए? देवा, यह कैसा जीवन है जिसमें प्यार ही मजार बना बैठा है? यहीं मनकी ग़लत भी थी, ज़फ़ा करने वाले उस नीली छत्रधारी से वफ़ा की उम्मीद कर रही थी. यह कैसी उम्मीद थी और उम्मीद थी भी तो क्यों? मनकी सवाल और ज़िंदगी से घिरी थी. सवाल अगर ज़िंदगी से भरे होते तो दिक्कत नहीं होती. परंतु यहां तो ज़िंदगी ही सवालों से घिरी हुई थी.

सुदक्षणा को जैसे-तैसे करके बारहवीं करा दिया था. आगे जिन मैडम जी के यहाँ काम करती थी वे बी.ए. में नाम लिखाने और आगे पढ़ाने को तैयार थीं. वे कहतीं - सुदक्षणा मेरे घर में ऐसे लगती है, जैसे दूध में पानी! लगती ही नहीं कि किसी झुग्गी या चाल की पैदाईश है.

उन्होंने कुछ कपड़े दिला दिए थे. उसने कपड़े ऐसे ले लिए, मानों अमेरीका जाने का वीज़ा हों. मैडम के यहाँ काम करते हुए, पढ़ाई-लिखाई नहीं सीखी. फ़ैशन करना सीख गई. मैडम खुद भी नफ़ासत–नज़ाकत पसंद थीं. उनके चाहने वाले भी कुछ कम नहीं थे. उनका साफ मानना था – अगर किसी ने नोटिस नहीं लिया तो कोई बात नहीं. पर कुछ ऐसा करो कि हंगामा बरप जाए. शुरू में अटपटा लगे तो लगे, बाद में सब ईज़ी हो जाता है.

सुदक्षणा की ठोढ़ी ऊपर करते हुए – नाऊ बी कूल एंड ट्राइ टू सेलेब्रेट योरसेल्फ. इस कुदरती नियामत को गवाना नही, भंजाना सीखो.

मनकी ने उसे कितना समझाया कि सपनों की अपनी बिरादरी होती है. गरीबों के सपने भी गरीब होने चाहिए. लेकिन वो उसकी सुनती कब थी. कहा करती थी - अम्मा सपनों और मनसूबों पर अमीर-गरीब की निगहबानी मत करो. माँ तुम्हारा भी जवाब नहीं. तुम सामने बिखरे इन बजबजाते घरों और उनमें रहने वाले सड़े कीड़ों से जीते लोगों को देखो. क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस नरकलोक से निकलना चाहिए? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम इस लोक में रहते-रहते इसे इंजाय करने लगी हो? आखें खोलो और देखो कि लोग दो पैसे के लिए एड़ी घिसते-घिसते मर जाते हैं. तुम अपना नहीं तो हमारा ख्याल करो. खोली से लेकर कोख तक में बच्चे ठूसे रहते हैं. बच्चे पैदा होते हैं और मरते हैं. फिर पैदा होते हैं, फिर मरते हैं. खोली और कोख में फ़र्क ही नही रह गया है.

पास में ही पूजा ताई बैठी अपने तीन साल की बेटी के मुँह में स्तन डाली थी. बेटी सुड़क-सुड़क कर दूध खींच रही थी. और दूसरे स्तन से उसकी नन्हीं उंगलियां खेल रही थीं. उससे दूध टपक रहा था. सुदक्षणा की निगाहें पूजा ताई की दहकती आखों से मिलीं. एक पल के लिए ठहरीं और तुरंत ही सहज हो गईं. वह मोबाइल से खेलने लगी. पूजा ताई बेटी के मुंह में दूसरा स्तन ठूंसते हुए बोलीं - का बोले तुमी, खोली आंते कोण चा फरक नाही आते (तुमने क्या कहा, खोली और कोख में कोई अंतर नहीं है)? सपने देखो. पूरा करो. कौन रोकेगा? पर कोख और खोली में फर्क करना भी सीखो. खोली इंसान बनाता है. कोख भगवान की देन है. खोली किराए पर दी जाती है. कोख किराए पर नहीं दी जाती. संतान भी किराए पर पैदा नहीं किए जाते. कहीं किए भी जाते होगें तो ऐसे ठिकेदारी से दुनिया नहीं चलती. बेटा, याद रखना - आकाश में उड़ती पतंग तभी तक धरती की है, जब तक धरती पर उसकी डोर थामने वाले कोई है. उड़ो, खूब उड़ो. पर बिन डोर की पतंग की तरह नहीं.

थोड़ा ठहर कर बोली - बेटी, ऐसी सोच बदनामी और गुमनामी दोनों साथ ले आता है. याद रखना, यह बस्ती जैसी भी हो पर यहां, हर माँ के छाती में दूध होता है. हमारे बच्चे हमारे दूध पर पलते हैं. भले ही हम कीड़े-मकोड़े माफिक जीते हैं पर हमारा जीना-मरना, रोना हंसना साथ होता है. क्योंकि फिर भी यह चाल इंसानों के बसने से बसी है.

इतने पर भी न सुधरी वह. जो सोचा वही किया, पर क्यों किया? अपनी पालीपोसी बेटी इतना खुदगर्ज कैसे हो गई कि अपनों को ही तज कर परा गई? माना कि बाप अस्पताल में है और देर-सबेर लौटेगा ही. ऐसे में मरने-मारने पर क्यों तुल गई यह मुलगी. हांलाकि उसे लगता था कि वह मरी नहीं होगी. होगी कहीं. पर यह माँ की ममता भी हो सकती है. और बड़े सवालों और समस्याओं के सामने इसकी क्या बिसात? आँख भर आकाश को पूरा आकाश नहीं मान लेना चाहिए. क्योंकि आकाश आकाश है और आँगन, आँगन.

दो दिन बाद चाल वालों को दो खबरें एक साथ प्राप्त हुईं. पहली यह कि सुदक्षणा के पिता नहीं रहे. और दूसरी कि सुदक्षणा मरी नहीं है. है कहीं.

इस तरह मनकी के घर में तीन बातें एक साथ हुईं - पति की मृत्यु, बड़ी बेटी का प्रसव और छोटी बेटी एक हफ्ते से लापता. मतलब पति के पीछे रोने वाला सगा कोई नही. वैसे चाल वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. वे हँसने में ही रोने की रस्म भी पूरा कर लेते. उनकी ज़िंदगी का एक दस्तूर था, जिसे जैसे-तैसे काट लेने को वे जीना कहते थे.

मनकी ने पति का शरीर कुछ पड़ोसियों के साथ चाल पर भेज दिया और खुद यशोदा अस्पताल चली गई, नाती का मुँह देखने. जच्चा-बच्चा को घर नही लाया गया. उन्हें सीधे अस्पताल से पति के मामा के घर छोड़ दिया और खुद सियापा करने कमरे पर आ गई. दो-तीन घंटा, जब तक पति की मिट्टी घर पर रही जैसे-तैसे करके रो-धो ली, जिसमें पड़ोसी औरतों ने पूरा साथ दिया. शाम के सात बजते -बजते अर्थी सज गई. पर सवाल था कि सजी अर्थी जाए तो जाए कहाँ. समुद्र में डालने के लिए भी अर्ज़ी डालनी पड़ती थी. मनकी का तो कलेजा मुँह को आ गया - अब क्या होगा? क्या होगा इस बिना अर्ज़ी के मौत का? मन ही मन उसने पति को कोसा भी. दो-चार दिन मरना टाल देता तो क्या बिगड़ जाता. हर काम में जल्दी करता रहा पूरी उम्र.

पर फिर सोच को संशोधित किया - अरे! पूरी उमिर कहां जिया बेचारा ...

सोच पर लगाम लग गई. पांडुरंग मामा ने बताया कि नगरपालिका ने कह दिया है कि समुद्र में लाश डालने के लिए परवानगी की ज़रूरत नहीं. बस मौके पर उपस्थित पुलिस को मृतक का नाम बता देना ज़रूरी है ताकि पता चल सके कि मरने वाला खुद से मरा है या बाढ़ से ताकि सरकार को राहत पैकेज और प्राकृतिक आपदा की मुआवजा वाली लिस्ट बनाने में सहूलियत हो. लोगों के चहरे का तनाव ढीला हो गया - चलो लाश को हवाले करने का रास्ता साफ़ हुआ.

मनकी एक आख़िरी बार दहाड़ मार कर रोई और पति चार कंधो पर सवार समुद्र की ओर चल पड़ा … राम नाम सत्त है … राम नाम ...

रात के नौ बजते-बजते मुहल्ले की औरतें अपनी-अपनी खोली में चली गईं. सब की ज़िंदगी थी. सब की मुश्किलें थीं. सोना तो उन मुश्किलों को कुछ समय तक टालने की कोशिश भर थी. अर्थात ज़िंदगी के वे पल जब दुनिया और दुनिया की जलालतों से कुछ घंटों की राहत मिल जाती है. हांलाकि लोगों की शिकायत थी कि नींद, खालिस शुद्ध नींद हो, उसमें सपनों की पैठ ना हो. सपनों के आमद से ज़िंदगी की ज़िल्लत की दखल हो जाती है, जिससे नींद की लज़्ज़त में खलल आ जाता है. आँखें मवाद और पीप से भर जाती हैं. सोने का स्वाद ही बिगड़ जाता है. इसलिए चाल के लोगों की कोशिश होती कि बिल्कुल मिनरल वाटर की तरह झक्क सफेद सी नींद आए.

रेल की पटरी से सटी इस चाल की अजीब चाल थी. रात भर दहाड़ मारते रेल आती-जाती रहतीं और पटरियाँ हिल-हिल जातीं और लोग खा-पीकर सोते रहते. आज रात मनकी के मन की रेल रिवर्स गियर में चल रही थी. आज के पहले वह ज़िंदगी के हालिया सवालों में इतनी व्यस्त थी कि मुड़कर ठीक से देख ही नहीं पाई कि उस ने कितना और कैसा जिया है. कि वो अब तक ज़िंदगी का कितना हिस्सा तय कर चुकी है. सोचने पर उसे अपनी ही ज़िंदगी इतिहास लगने लगी. ऐसा इतिहास, जिसे ना कोई जानता था, ना ही जानना चाहता था. उसे पहली बार लगा कि उसका पूरा जीना इतिहास के बाहर का जीना है. उसने चाँद बीवी और गौहरबानू का इतिहास पढ़ा हुआ था. वह न चाँद बीवी थी ना ही गौहरबानू.

उसने इतिहास में फँसे मन को धक्का दिया. मन फिसलकर अतीत पर बैठ गया. उस अतीत में जिसका बड़ा हिस्सा उसके साथ हुए फरेब ने घेर रखा है.

सोचने के क्रम में उसे लगा कि एक ही किरदार को अलग-अलग औरतें अलग–अलग या एक ही समय में अलग-अलग ढंग से जीती आ रही हैं. प्रेम करने की उम्र में जिससे प्रेम किया उसी ने अपवित्र किया. जिसे चाहा उस ही ने धोखा दिया. हमेशा मन की करने और सोचने वाली शरीर के हाथों हार गई.

***

वो तो शिवनेरी में शिवरात्रि का मेला घूमने गई थी उसके साथ, रतन के साथ. शिव और पार्वती को देखकर मनकी ने खुद को पार्वती और उसे शिव समझ लिया. पार्वती भी तो उसकी तरह पर्वत कन्या थी. पवित्र भाव से शिव को पाया था. और शायद उसने मनकी के मन को पढ़ लिया था. जब उसने मनकी को दो जोड़ी कंगन दिलाया तो लगा जैसे पूरी पृथ्वी लाकर उसकी अंजलि में धर दी गई. उधर शिवजी की बरात निकल रही थी. और ऐन शिव -पार्वती के वरमाला के समय उसने कलाइयों को कंगन से सजा दिया. वे दोनों शिव और पार्वती हो गए. अंदर का बर्फ दरकने लगा. उस झूना (पुरानी) पहाड़ी पर जाकर एक समतल चट्टान पर एक दूसरे में खो गए. कोई मानुष तो नहीं पर चाँद–तारों से भरी-पूरी रात की गवाही में मनकी धीरे-धीरे झरने से नदी बनती चली गई. नीचे शिव मंदिर में शिव बारात की खुशी थी. पार्वती की सहेलियां द्वारपूजा का गीत गा रही थीं - बहियां गहला हियरा में रखिहा ...

अंदर सोत फूट पड़ा. जो रेत को हरा-भरा कर गया. रात ऐसे गुज़र गई जैसे कोई सपना. नए जीवन की कोंपल फूटने लगा. धीरे-धीरे वो जान गई कि अब वह अकेली नहीं. घर वालों के पता चलने के पहले रतन को पता चल गया.

वह त्यौरी चढ़ाकर बोला - नदी-नाले देर-सबेर कूदती-फाँदती हो छोरों के साथ. उन्हीं का किया-धरा होगा. मुझ निर्दोष के मथ्थे दूसरे का कलंक मत डालो.

मनकी ने कहा भी था - तुम हिसाब लगा लो दिनों का. एक महीना ग्यारह दिन हुए हैं मेला बीते हुए. मेरा गरभ भी उतने दिन का ही है.

उसने गुर्राते हुए कहा था - चलो मान भी लें कि दिनों का हिसाब हो गया. पर मनकी रानी घंटों, मिनटों, सेकेडों का हिसाब कौन देगा?

थोड़ा ठहर कर बोला - तुम लुगाई जात घर और भरोसे लायक कब रही हो. हो सकता हो उस रात फारिग होने के बाद मेरी आँख लग गई हो और तुम किसी और के साथ करामात कर गई हो. आखिर इतनी चंचल न होती तो माँ-बाप का भरोसा तोड़कर मेरे साथ थोड़े ही आती. मुझे तिरियचरित्तर मत पढ़ाओ.

बात आगे बढ़ जाने पर पंचायत बुलाई गई तो साफ मुकर गया - नहीं यह कोख मेरे से नहीं है. मैंने तो इसे छूआ तक नहीं. उस रात मैं शिव बरात में शिवमंगली गा रहा था. पंचों को विश्वास ना हो तो बिश्राम काले से पूछ लें.

बिश्राम काले सब जानता था. उसने कई बार हाथ मारना चाहा था और हर बार मनकी बच निकली थी. पर उस दिन नहीं बच पाई उसकी गवाही से.

पंचाइत भगवान सरीखा होवत हैं. कोई भगवान से झूठ बोलकर नाही सकत है. वह सर्वनामी, सर्वव्यापी, सर्वज्ञानी है. मैं झूठ नहीं बोलूंगा. नरक नहीं जाना है.

फिर बिश्राम हाथ जोड़ते हुए कहने लगा - पंचों, जो कहूंगा, सच कहूंगा. उस दिन शिव बारात के समय मैं और रतन शिवमंगली गा रहे थे. मेरे हाथ में खझड़ी थी. रतन ढोल बजा रहा था. तभी मेरी निगाह शिवनेरी पर पड़ी. टहटहाते अंजोरिया में मनकी किसी पुरुष की बाँह थामे पहाडी की ओर बढ़ रही रही थी. मेरी नजर पानी-पानी हो गई.

गवाही मान ली गई और मनकी गलत ठहरा दी गई. सरपंच ने कहा - औरत खोह होती है. जिसमें न जाने कितने रहस्य समाए होते हैं. मरद बेचारा उन रहस्यों को नहीं जान पाता. और छला जाता है. मगर पंचायत के आगे दूध का दूध और पानी का पानी निथर कर अलग हो जाता है. पंच परेश्वरह होता है. उसे बरगलाया नहीं जा सकता. पंचायत का फैसला देव फैसला समझना चाहिए. इसलिए जिस समाज में पंचायत को देव समझा जाता है. वह समाज अपनी नैतिकता नहीं खोता.

सरपंच देवधर देशपांडे गँजुआ गए गले को खंखार कर साफ करते आगे बोले - देव झूठ ना बुलावें. सही राह सुझावें. मनकी पूरी रात मेले में रूकी. क्यों?

समवेत स्वर – शिव बारात में भागी होने के लिए.

भागी बनी?

फिर सामोहिक स्वर – नहीं.

तो किसका भागी बनी?

फिर वही आवाज- कुकर्म की.

सरपंच ने कहा - देव झूठ न बोलावें. राह सूझावें. साधारण जनों के स्वर से साक्षात महादेव ने स्वर दिया. ऊपर वाला सब जानता है. उसकी कृपा अपार. मनकी मेले में गई भक्ति के लिए पर लीन हो गई भोग में. शिवनेरी का पर्वत, जिसे शिव की महिमा से शिवनेरी का नाम मिला है, उस पर्वत पर किसी पर पुरुष के साथ कुकर्म किया. उमिर के उठान पर ही कई पाप कर डाले. आकाश भगवान शिव और धरती के भगवान माता-पिता के विश्वास के साथ छल किया, अघात किया. जो शरीर पति की अमानत है, उसे संभाल नहीं पाई. तन को गंदा कर दिया. होने वाले पति को धोखा दिया. यौवन की बहाव में धर्म भूल गई. पंचों पति भी परमेश्वर होता है. इसने उसके साथ भी छल किया. कामवेग में विवेक नहीं संभाल पाई. ऐसी औरत गृहस्थी, परिवार और समाज क्या संभालेगी. परंतु पंचों पंचायत भी परमेश्वर होता है. और एक परमेश्वर दूसरे परमेश्वर के साथ अन्याय नहीं होने देगा.पूरी बात सुनकर पंचायत को साफ हो गया कि मनकी झूठी है. वह दूसरे का पाप बेचारे रतन पर थोपना चाहती है. जबकि उस समय रतन शिवमंगली गा रहा था और भगवत भजन करता हुआ आदमी और आदमी का मन भक्त हो जाता है. उसमें देव आत्मा बास करती है. ऐसे में वह कोई संसारी काम नही कर सकता. इस अवस्था में भगवत भजन में लीन मानुष पर ऐसा तोहमत लगाना, साक्षात भगवान पर कलंक लगाना है. पर पंचपरमेश्वर के रहते ऐसा नहीं हो सकता.

भरी पट्टी के सामने रतन निर्दोष घोषित किया गया. और मनकी को कुजाता ठहरा दिया गया. मनकी का पिता, अद्धू या तो पंच परमेश्वर का दंड दे – बारह हजार रुपया पंचायत में जमा कराए - या बारह बरस तक सपरिवार जात से बाहर रहे या बारह दिन तक मनकी को देव मंदिर कोख शुद्धी के लिए भेज दे.

मनकी का विश्वास, उसका प्रेम हार गया था. वो बदचलन साबित कर दी गई थी. माँ-बाप उस रात खूब लड़े थे.

माँ ने कहा था - अरे करमजली यह सब करने के पहले मर क्यों नही गई तू. सात पूस्तों को नाश किया. मेरे बच्चों का भविष्य बिगाड़ दिया. अरे! जरा भी लाज–शरम है तो डूब मर किसी नदी -नाले में.

हमेशा मनकी का पक्ष लेने वाले बापू ने पहली बार उस पर उस रात हाथ उठाया था.

वो उस ही रात भाग गई थी. बिना जान–पहचान और बिना भरोसे-विश्वास के बंबई आ गई. एक हफ्ते तक भूखी प्यासी रहने के बाद आठवें दिन एक पुलिस वाले नें एक बड़ा-पाव दिया और बदले में पूरी रात एक बार फिर लूटी ली गई. हांलाकि अब लूटने का ना भय रह गया था नाहि बचने की कोई कोशिश.

उसी सुबह प्रभु मिला था. हालचाल पूछा और हाथ गह कर अपने घर ले आया और आई से बोला - आई तेरे लिए बहू ले आया.

और तभी से मनकी उस घर की बहू बन गई थी.

***

प्रभु, उसका पति, सच में प्रभु था. गुस्सा करता था तो इस लिए कि मनकी अपना ख्याल ठीक नहीं रखती. ठीक से खाती-पीती नहीं. वो जो कमाता सीधे हाथ पर रख कर कहता - कुछ नीक-नीमन बना दे बच्चों के लिए.

अपने लिए निज हाथ से कुछ न लाया. कुछ भी खाया तो, मनकी का बनाया हुआ. कुछ अच्छा पहना तो, मनकी या बेटी का ही लाया हुआ. चाल और झुग्गी झोपड़ी में ऐसा संस्कार कहां से सीखा होगा वह.

मनकी तो कह भी देती- तू यहाँ का नहीं लगता. कहीं से भाग के आया होगा.

उसकी मर्म भेदी बात पर भी हंस देता जैसे समझा ही नही कुछ. पर अब लगता है सब समझता था. काश कभी कुछ लौट कर उल्टा सीधा कहा होता तो मनकी को अब इतनी कचोट न होती. अपने गया सो गया. साथ में कलेजा काट गया. उसने उस लड़की को अपना नाम दिया, जिसे दुनिया ने नाजायज़ माना. जब तक रहा, पूरा साथ दिया. और आज वह आस भी छीन ली गई. बेचारे को यह भी नहीं पता कि उसकी बेटी भाग गई है. कैसा जीवन मिला उसे? जिसे जीवन-साथी बनाया वह पहले से ही लूट-पीट ली गई थी और दूसरे का जूठा कोख लेकर उसकी देहरी में पैर धरी थी. न जाने कितने सवालों का बोझ छाती पर धरे समुद्र की अथाह गहराई में सोया होगा वो?

का रे! देवा अभी जिंदगी का कितना पन्ना बाकी रह गया है? सारे सरग-नरक यहीं देखना बदा है. क्या-क्या देखना होगा अभी. जरा अपना पत्तर खोल बांच देते तो बड़ा उपकार होता. सोचते-सोचते आखें बंद हो गईं और धीरे-धीरे दोनों कोरें भींग गईं. मन शांत हो गया था. रात अभी बीती नही थी. दरअसल भद्दे अतीत की व्याख्या भी भद्दी ही होती है. कभी-कभी यूँ भी होता है कि दिन तो खत्म हो जाता है पर बीते दिनों की बातें खत्म नहीं होतीं भले ही ज़िंदगी क्यों ना खत्म हो जाए.

 

सुबह हो गई. कोई बदलाव नहीं. उसे बहुत ठेस लगी. उसकी दुनिया उजड़ गई थी और दुनिया थी कि सलीके से चली जा रही थी.

सामने पूरा का पूरा दिन पसरा था. अभी उसे प्रसूता बेटी, चमकी, के पास जाना था. उसका हाल लेना था और कल का हाल बताना था. खोली में पड़े अगरबत्ती और फूल-पत्तियों को समेट कर बाहर कुड़ेदान में डालकर और फ़र्श साफ करके बाहर निकली. पूरा रास्ता पानी और कीचड़ से भरा था. कहीं-कहीं मोटर-गाड़ियाँ फंस गई थीं. पोयसर के इलाके में जानवर मरे पड़े थे और कुत्ते सुस्त होकर इधर-उधर लुढ़के हुए थे. साँप कीचड़ में लिथड़े थे, जिन्हें देखकर लगता कि बोझा ढोते-ढोते रस्सियाँ दरक कर टूट गईं और इधर-उधर बिखेर दी गई हैं. पूरा इलाका मौत का खंडहर बना मुँह बाए खड़ा था. लग रहा था नरकपुर बसाने के असबाब लाकर धर दिए गए हों. पोयसर नदी को देखकर मनकी को बैतरणी नदी की याद आ गई.

जैसे-तैसे चमकी के पास पहुँच गई. बेटी पूरा हाल पहले ही जान चुकी थी. माँ को देखते ही चमकी बिलखने लगी - माँ, यह करमजली आते ही नाना को खा गई. नहीं चाहिए मुझे ऐसी बेटी. मैं इसे कूड़े में फेंक दूंगी. कितना अच्छा था मेरा बापू. तू, कहां गया रे बापू?

रोते हुए उसने बच्ची को लात से ढकेल दिया. सीमा ताई पास ही बैठी थी. सह नही पाई - अरे पागल मुलगी, कोई कांकर-पाथर नहीं, बेटी जना है तेरी कोख ने. कोख सारथ हो गया. कोख ने कोख जन कर तुमची जीवन पूर्ण झाले.

आँचल में नवजात बेटी को समाते हुए सीमा ताई फिर बोलीं - खुद सोच और बता कि दुनिया कोख के अलावा आखिर है क्या? सरजना का इतना अपमान करना कहाँ से सीखी, वह भी माँ होकर? डर मत. डर महामारी माफिक फैलता है. बेटी को गले से लगा. प्यार दे. देगी तो पाएगी. प्यार से विश्वास पनपता है. विश्वास ही शक्ति है. छाती का दूध पिलाकर उसके तन-मन को विश्वास और शक्ति देना सीख.

इतना सुनकर द्रवित हो चुकी मनकी से नहीं रहा गया - अरे नासपीटी हलकट, जिसके लिए सियापा कर रही है. उसने पूरा जीवन खटते-खटते काट दिया पर बेटियों को दूब की कईन से छूआ तक नहीं और तू उसका नाम लेते हुए नन्हीं सी मासूम जान को लात से मार रही है. उसकी आत्मा को ठेस पहुंचा रही है. तू नहीं जानती कि उसकी जान बसती थी बेटियों में.

चमकी के होश ठिकाने आ चुके थे. एक-एक कर उसे सारी बातें याद आने लगीं कि कैसे बापू उसे स्कूल ले गया, कैसे उस से कहता था - बेटी, अक्षर जानोगी तो दुनिया जानोगी. अक्षर ज्ञान के बिना आदमी अंधे सरीखा होता है और आँख होते हुए भी दुनिया और दुनिया की बातें अबूझी रह जाती हैं. तुम तो कन्या जात हो. तुम्हें तो हर हाल में पढ़ना होगा, नहीं तो तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का जीवन और संस्कार दोनों अकारथ हो जाएगा.

चमकी की आखें भींग गईं. माँ से फिसलती हुई उसकी आँखें एक दिन पहले दुनिया में कदम रखी बेटी पर ठहर गईं. उसनें बच्ची को गोद में उठा लिया.

नन्ही जान की आँखों में आँखें डालते ही पिता की वह बात याद आ गई - बेटी! डर कर मत जीना कभी भी. डर, इसकी कोई सूरत नहीं होती. पर यह हर सूरत में रहता है. ज़रूरत है कि इसे हर सूरत से भगा दिया जाए.

मानों पिता के अरमानों को गले लगा रही हो. अबकी नहीं रोक पाई और फूट-फूट कर रोने लगी. मनकी बेटी के मन की मर्म जान रही थी. रोका नहीं. सोचा रो लेगी तो मन निथर कर हल्का हो जाएगा. चुपचाप सोच में डूब गई. मूआं लड़कियों पर जान भी तो खूब देता था. कभी-कभी लगता था कि वह इस पीरथिवी की पैदाइश है ही नहीं. बार-बार उसका होना सपने सरीखा लगता. आगमजानी तो एक नंबर का था. रात दिन एक किया. हाड़तोड़ मेहनत किया. जीवन भर खटता रहा. भर पेट खाने की कभी सुध नहीं लिया पर बच्चों को कभी भूखा नहीं रखा.  सबका जीवन बीमा कराया. मैं कहती भी कि क्यो पाल रहे यह अमीरों के चोचले. तो झट से कह देता - जीवन बीमा का मतलब होता है -' जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी'. मनकी, अभी तुम नहीं समझोगी रुपयों की ताकत. पर, हांँएक दिन जानोगी भी और मानोगी भी. देवता था. देवताओं की तरह जीया और उन्हीं की तरह धीरे से चल दिया.

मामी घरों में काम करती थी. उनकी अब तक की पूरी जिंदगी इसी मुंबई में लोगों के घरों की साफ़-सफाई, झाड़ू-पोंछा लगाने में लग गया. अब वे शरीर और आत्मा से ढलान पर थीं. वह काम पर जाते समय, दूघ का गिलास चमकी को थमाते बोलीं - बेबी, जो होना था हो गया. अब घर-गृहस्थी पर ध्यान दो.

माँ, माँ, क्या हो गया तुमको, कहाँ खोई हुई हो?

बेटी के झकझोरने से वह होश में आ गई. अरे, कुछ नहीं बेटी जरा सोचने लगी थी कि तुम्हें घर कब ले चलूं? आखिर कितने दिन पराए घर रहा जा सकता है. पर अभी तेरे बाप को गए एक दिन ही हुआ है. सोच रही थी छूत निकल जाता तो ...

बेटी की आँखें भर आईं - माफ करना माँ, मेरा बापू कोई छूत नहीं था. उसने जिस बात पर कभी यकीन नहीं किया, आज तुम उसी के छूत निकलने की बात कर रही हो. सच में तुमने मान लिया कि बापू मर गया है. जबकि तुम जानती हो कि उसने समाज और उसके ढकोसलों पर कभी विश्वास नहीं किया. उसने पूरी उमिर वही किया जो एक समझदार आदमी को करना चाहिए. माँ, मेरी भी सुन ले. मैं आज ही घर चलूँगी. मेरे लिए न वह मरा है, न ही उसकी बातें मरी हैं. जब तक मैं हूँ, मेरा बापू मुझमें जिंदा रहेगा.

कभी-कभी पाँव की बेड़ियाँ पंख सी लगती हैं. जो लगता है कि उड़ा रही हैं, पर वास्तव में वे गिरा रही होती हैं. शायद इस को ही भ्रम कहा जाता है. मनकी इसके बाद कुछ नहीं कह पाई. वह तो बस बेटी का मन टटोल रही थी. तीनों घर तरफ चल दीं.

बेटी ने कहा -  माँ, रास्ता कितना खराब और भयानक लग रहा है? लग रहा जैसे यमराज की जीभ पसरी पड़ी हो.

पर बात का रूख दूसरी दिशा में जाते देख बेटी ने दिशा बदल दी - देखो माँ, कैसे यह टुकुर ताक रही है.

पर मनकी बेटी की चतुराई समझ चुकी थी. आकाश की ओर देखकर मुस्करा भर दिया. और बोली पड़ी - आखिर नातिन किसकी है?

तभी, मोबाईल गुनगुना उठा - धीरज धरो मन आखिर पीय मिलन की बेला है … धीरज धरो मन ... मनकी के होठों पर हलकी सी मुस्कान थिरक गई.

चमकी (शर्माते हुए) – हाँ, हम लोग घर जा रहे हैं. तुम कैसे हो. हाँ, माँ भी साथ है … कौन मुन्नी? ठीक है वह भी.

मुन्नी की बातें चल पड़ी तो रफ़्ता-रफ़्ता रास्ता रास आने लगा. मनकी ने चुटकी ली - आखिर मीयां-बीवी नाम भी रख लिए और नानी को खबर तक नही?

चमकी शर्माते हुए बोली - नहीं माँ, कल निखिल ने फोन किया था और पूछा कि मुन्नी कैसी है. तो ...

कोई बात नहीं मुन्नी के पापा ने मुन्नी को नाम दिया और मुन्नी की अम्मा ने मान लिया तो मान लिया. अब मुन्नी की नानी भी मान गई.

मुन्नी की बातें चल पड़ीं तो घर की दूरी भी कम होती गई. क्षण भर के लिए लगा कि किसी की आने की खुशी, किसी के जाने से आए दुख पर भारी पड़ गया. ख़ैर! पीली सी धूप में नन्ही जान, माँ और नानी के साथ नाना के घर जा रही थी. हांलाकि नाना अब इस दुनिया में नही थे.

घटनाएँ इतनी तेज़ी से घटित हुईं कि सुदक्षणा का गुम होना और उससे उपजी टीस भी कुछ समय के लिए हल्की पड़ गईं. दरअसल मनकी मान लेना चाहती थी कि पति की तरह सुदक्षणा दुनिया से कूच कर गई होती तो थोड़ी सहूलियत होती. कम से कम खुलकर रो लेती और जी हल्का हो जाता. अभी प्रभु के मातम का बहाना है पर कब तक?

आज प्रभु का दसवाँ था. नातिन का छटाँ चार दिन पहले ही हो चुका था. पड़ोसी और रिश्तेदार आए हुए थे. सब खुश रहने का दिखावा कर रहे थे.

पांडुरंग मामा ने नातिन को देखते हुए कहा - ऊपर वाला भी पक्का मदारी है. ऐसा मदारी जो लोगों के वास्ते नहीं बल्कि खुद के वास्ते खेल करता है. उसे रोता, विलखता और कलपता इंसान ही भाता होगा.

हाथ ऊपर करके बोला - ऊपर वाले, कैसा लग रहा है तुझे नाना के दसवें में नातिन को शरीक करके? जो भी हो पर हो तुम बड़े निर्दई. ठीक कहता था प्रभु कि भगवान का चक्कर ही एक बेईमान ख्याल है. उसके फैसले मूर्खतापूर्ण और अहंकार से भरे होते है. सबसे बड़ा माफिया और अंडरवर्ल्ड तो वह खुद है. पता नहीं क्यों लोग उसकी पूजा-पाठ करते हैं. अपना और दूसरों का समय खराब करते हैं. पापी ने अपने मजे के लिए दुनिया रचा है. धरती पर होता तो लात-धूसे से रोज उसकी धूनाई होती.

नवलखा बाई बड़े ध्यान से पांडुरंग मामा को सुन रही थी. आगे बढ़ने के पहले नवलखा बाई पर थोड़ी चर्चा ज़रूरी है.

***

नवलखा बाई आज से पच्चीस साल पहले, जब वह पंद्रह साल की होने वाली थीं, सरायइनायत जिला, देवरिया, उत्तर प्रदेश से मुंबई लाई गईं और मुंबई के फाकलैंड इलाके में ममेरी भाई के द्वारा बेच दी गई थीं. ममेरा भाई मुंबई में काम करता था. और छह-आठ महीनों पर घर जाता था. 1995 में जब वह गांव आया तो बूआ यानि नवलखा बाई की मां का हालचाल लेने उनके गांव आया था. उस समय नवलखा बाई रानी के नाम से जानी जाती थीं. रानी को ममेरा भाई जिसका नाम रोहित था किसी राजा से कम नहीं लगा. जब वह कमा कर आता और ठाठ से रहता, उसके झोले में सबके लिए कुछ ना कुछ होता ही होता. रिश्तेदारों में वह राजा जैसा लगता. इसलिए रानी ने रोहित को जब पुकारा, राजा पुकारा. जब वो खलिहान में उसे खाना पहुचाने गई थी, रोहित ने पूछा भी था, - राजा का मतलब भी जानती हो या बस नाम तक ही वास्ता रखती हो? राजा माने?

राजा एक नाम, जैसे तुम राजा हो.

और रानी माने?

रानी माने भी एक नाम, जैसे हमरा नाम रानी.

सच कही, हम राजा तुम रानी. माने राजा रानी.

बात पूरी करते-करते रानी के दिल में एक हूक उठी, एक बिजली कड़की.

उस की कलाई राजा के मुट्ठी में थी. उसकी नज़रें राजा के आखों से फिसलती हुई पकड़ी कलाई पर टिक गई – अगर मतलब न पता होता तो कलाई आपके पंजो में अब तक फंसी न हुई होतीं.

और उसी दिन से रानी की दुखभरी कहानी शूरू हुई. रोहित के पंजों में उसकी कलाई नहीं उसकी आज़ादी फँस गई. और वह हँसते-हँसते हलाल हो गई. रोहित एक महीना सरायइनायतपूर में रहा और वह पेट से हो गई. अंतत: न चाहते हुए भी उसे मुंबई की राह लेनी पड़ी. मुंबई में कोख की सफाई के साथ ही उसकी किस्मत भी साफ कर दी गई. एक साल तक रोहित और उसके दोस्तों ने लूटा और बाद में फाकलैंड में बेच दिया.

रोहित उस दिन जी भर कर दारू पीया और बोला - हलाल होते होते मालामाल कर गई.

फाकलैंड में ही उसकी कमाई के कारण नवलखा बाई नाम मिला. वह कहती भी कि मेरा शरीर नौ लाख का था. रूपए सहेजे होती तो आज रानी होती. महला-दो-महला बना ली होती.

उसके बाद छोटे-मोटे बदलाव आए. जैसे कि उसने फाकलैंड के साथ नाइटबार में भी काम करना शुरू कर दिया. उसकी एक विशेषता और है. उसकी खोली में एक मोटी सी औरत की तस्वीर टंगी है. पूछने पर बताती है - यह हिडिंबा की तस्वीर है, जिसनें भीम के झूठे प्रेम में पड़ कर अपने भाई को तजी थी. अगर वह ऐसा न करती तो पूरा महाभारत यहीं खतम हो जाता. मैं अपने समय की हिडिंबा हूं और अपनी किस्मत खुद बिगाड़ी हूं, मैं ऐसी औरत हूं जो, खुद की पूजा खुद करती हूं.

और हर बार वह यही कहती और हर बार उसका चेहरा लाचार दिखने लगता.

यह भी कहती - हर बार औरत ने प्रेम किया और हर बार छली गई. औरतों की यह कैसी जात है. जो सदियों को छल को प्रेम समझती आ रही है.

और गुस्से में कह डालती – आखिर, जिंदगी क्या है सिवा कमज़र्फ़ के?

उसकी एक शिकायत यह भी है कि सरकार ने पहले बार बंद किया और ऊपर वाले सरकार यानि नीले आकाश पर बैठे मदारी ने रूप रंग छीनकर फाकलैंड का करोबार छीन लिया. इसलिए पांडुरंग मामा की बात नवलखा बाई को सोलहो आने सही लगी.

***

उसने कहा भी - लोगों की छोड़ो मामा. उसकी दुम पर पहला लात मैं ही लगाऊंगी. तुम सही कहते हो सबसे बड़ा लफ़ंगा तो वह खुद है. लफ़ंगों का सरताज भी वही है. अपने दिल फ़रेबी के लिए उसने दुनिया को कबाड़ खाना बना डाला है.

नंदलाल कचरे ने कहा - इसीलिए सबसे ज्यादा जास्ती काम देवालयों में होते हैं. और और इंसानों को बाँटने और काटने के फैसले भी वहीं पर या उसी के नाम पर लिए-दिए जाते हैं.

गाँजे का कश लेकर धूआँ ज़ब्त करते हुए – इससे अच्छा तो हमारा यह शैतानालय है. जहाँ इंसान को इंसान माना जाता है, और  मुस्कराने के उपक्रम में उसका चेहरा डरावना हो गया. मानो शैतानालय का शैतान खुश होना चाह रहा हो, पर हो नही पा रहा हो.

मीना ताई ने कहा - पूरी जिंदगी नून-तेल सहेजने मे सीझ गई. का पता, अंत समय में तन के वास्ते लकड़ी नसीब होगी भी कि नहीं?

किन्नरों के आने से माहौल हल्का-फुल्का हो गया. जिंदगी फिर रौ में आ गई. उन्होनें बधाई गीत गाए

मुन्नी आई मेरी अम्मा

प्यार का सौगात साथ लाई मेरी अम्मा

फरिस्ता की तरह लगती मेरी अम्मा

मरियम की तरह हंसती है मेरी अम्मा

बाप के आखों का तारा है मेरी अम्मा

मां की बाजू का सहारा है मेरी अम्मा

कुदरता ने धरती अतारा है मेरी अम्मा

धूप नें निखारा है मेरी अम्मा

मुन्नी आई मेरी अम्मा

खुशियों का सौगात लाई मेरी अम्मा.

 

शाम तक दसवाँ निपट चुका था. सारे-पड़ोसी और रिश्तेदार जा चुके थे. एक सदस्य की बढ़त के बाद भी, घर सांय-सांय कर रहा था. बार-बार लगता कि प्रभु और सुदक्षणा कहीं से आ जाएंगे.

और आते ही सुदक्षणा हुमकेगी - वाव, दीदी आई बनी तो बनी पर साथ मुझे भी मौसी बना गई. दीदी एक साथ कितने काम कर गई. कैसे किया होगा यह सब, है ना मम्मी?

और मम्मी कुछ कहे उसके पहले प्रभु कहेगा - बेटी, सब प्रभु की लीला है.

दरअसल ऐसे ही जगहों पर प्रभु अपने नाम को प्रभु से जोड़कर खुश होता था. इस तरह वे नितांत गरीबी में भी अमीरी की ज़िंदगी बसर कर लेता था.

मनकी के सामने कई प्रश्न थे. जैसे बेटी और नातिन की देखभाल कैसे की जाए. माना कि दामाद पैसे भेज देगा. पैसे ही सब कुछ नही होते, पर यह भी सच था कि पैसे के बिना कुछ हो भी नहीं सकता. चलो कोई बात नहीं, पैसे को लेकर मगजमारी नहीं करनी है. मेरी भी हड्डियों को आराम मिलेगा. पर दामाद का पैस्स्सा … छोड़ो दामाद भी तो बेटे जैसा होता है. अरे, हाँ, बेटे से याद आया कि बेटा भी अब रुपए भेजेगा. जिंदगी चल ही जाएगी, जैसे-तैसे. बस प्रभु और सुदक्षणा साथ होते तो ... सुदक्षणा थी ही करमजली. सफेद रंग पर घमंड करती थी. हमेशा हाव-वाव करती रहती. लगता जैसे हम में से है ही नहीं. साथ रहकर ही कौन सा साथ रहती थी. हमेशा लौंडो से लाड़ लड़ाती रहती. समझाने पर बिगड़ जाती - "माम, तुम्हारा जमाना नहीं है, यह. जैसे खेत-खलिहान बदल गए वैसे ही इंसान भी बदल गया है."  बस नाम की सुदक्षणा थी. काम तो सारे कुलक्षणा के करती. इतना घूम-घाम करके फर्स्ट-क्लास से कैसी पास होती. यह एक रहस्य ही था. न जाने कितने रहस्य थे उसके. रौब से ऐसे रहती मानों राजकुमारी हो और हम सभी को चाकरी पर रखा गया हो. चाल में रहते हुए महलों का ख्वाब पाल रखे थे करमजली ने. पर थी भी तो महलों लायक. गले में झूलती तो लगता कहीं मैली न हो जाए. बिल्कुल बाप पर गई थी अपने. बाप-बेटी में दाँत-काटी दोस्ती थी. सारी दुनिया एक तरफ वे दोनों एक तरफ. एक तो वहाँ गया जहां से कोई लौटता नहीं. चलो उसका ग़म तो झेल जाऊंगी, पर इस करमजली को कहाँ ढूँढ़ू?

नातिन की नींद उचट गई. वह रोने लगी. बेटी बोली, अम्मा सो भी जाओ अब.

मनकी ने बत्ती बूझा दिया ताकि बेटी को लगे कि माँ सो गई. पर जिस तरह से यह सच है कि हर दिन के बाद रात आती है, उसी तरह से यह सच नहीं है कि हर रात में नींद आए ही. और यह भी सच नहीं है कि दिया बुझा देने भर से सच में अंधेरा हो ही जाए. ऐसा कितनी बार हुआ है, जब सच से झूठ का और झूठ से सच का काम लिया गया.

बेटी, दामाद से पैसे वास्ते बोल दे. कई काम करने हैं.

ठीक है माँ.

सुबह बेटी ने अपने पति निखिल को फोन किया.

निखिल, माँ पैसों के वास्ते कह रही थी.

क्या कह रही थी?

कि तुम काम के वास्ते पैसे भेजो.

किस काम के वास्ते?

हम लोगों के वास्ते.

हम लोगों में कौन?

मैं, मुन्नी और माँ.

वह डायन हम लोगों में कब शामिल हुई?

अरे, वह आई है मेरी. अब तो बापू भी नहीं रहा.

गलत, आई वह तेरी है. तू कर उसके लिए. मेरी कमाई उसके लिए नहीं है. तेरे बापू को तो मरना ही था. अच्छा हुआ जल्दी चला गया.

तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो?

तो कैसा सोच सकता हूं?

जिम्मेदारी, रिश्ते?

वही तो सोच रहा हूं.

क्या?

रिश्ते और जिम्मेदारी वाली सोच.

ऐसे सोचा जाता है, रिश्ते और जिम्मेदारी वास्ते?

हाँ. मैं सही वाले रिश्ते और जिम्मेदारी यानी अपने तुम्हारे और मुन्नी के लिए सोच रहा हूँ बावरी. पर तुम्हें समझ नहीं आ रहा.

मैं, क्या करूँ जी?

एक तो आई.एस.डी. कॉल. ऊपर से इतनी मगजमारी. पति को गुस्सा आ गया. कुछ भी कर. पर मेरे कमाई का एक पाई भी तेरी आई, तेरे भाई और तेरी रंगीली बहन पर खर्च नही होगा.

अरे, सुदक्षणा को क्यों बोलते हो. वह तो है भी नही.

नहीं है तो आ जाएगी. गई होगी किसी यार के साथ. रंडी थी साली. पढ़ाई के नाम पर पराए लौंडों के साथ चिपकी रहती थी. बड़ी पढ़ाकू बनती थी साली. तेरे माँ-बाप का पैर भी धरती पर नहीं था. हमें सभी जाहिल समझते थे. कुतिया मुझे शक्ति कपूर कहती थी.

पर अभी कुछ दिन तो संभालना होगा ना माँ को.

संभालना नहीं संभलना होगा. और बार–बार इमोशलन लोचा मत करो.

तो क्या करूँ?

पाल घर में एक फ्लैट की बात चल रही है. कुछ महीने बुड्ढी के साथ रह लो. किराए का पैसा बचेगा. जनवरी में फ्लैट बुक कर लेंगे. अपना घर हो जाएगा. खुद पर सोचना सीखो. बुड्ढा मर गया. बुड्ढी भी मर जाएगी कुछ दिन में. जिस चाल में रहती है वह करोड़ों की जमीन है. अगर कुतिया मर जाए और तेरा भाई भी ...

निखिल, तुम क्या अवाट-बवाट सोचते हो?

शुकर करो कि कुछ तो सोचता हूं. अच्छा होगा कि तुम भी कुछ सोचो. बुड्ढी को बचाने की नहीं, मारने की सोचो और मुन्नी के वास्ते कुछ बनाने की सोचो. अब तू बेटी नहीं, माँ है. अगर ध्यान देगी तो पोयसर और पालघर में दो-दो फ्लैट होंगे. भगवान ने तेरे बाप को बुलाकर जो संकेत दिया है उसे समझो. चलो रखता हूं. तीन सौ पचास रुपए का हालचाल कर लिया हमने. धियान रखा करो कि बात करते समय बुड्ढी आसपास न रहा करे.

बेटी के माथे की गुल्ल-बत्ती भक्क से जल गई. सोचने की दिशा बदल गई. पोयसर और पालघर में घर होने के अहसास से निकल नहीं पा रही थी. पोयसर की तीस-बाई-पच्चीस की जमीन सोना बन कर आँखों में चमकने लगी. पहली बार सपने में उसने सोना और महल साथ-साथ देखा. पहली बार पति और पति की बातें अच्छी लगीं. और पहली बार बापू का जाना जायज़ लगा. पहली बार सुदक्षणा अच्छी लगी. सोई माँ को देखा. चेहरा मकड़ी के जाले के समान लकीरों से बिंधा हुआ था. आश्वस्त होते हुए उसकी मुस्कुराती आँखें भारी होने लगीं.

होटों ने हरकत किया - काश कि निखिल का सोचा सच हो जाए.

उजाले का आभास देते दो-चार सकपकाए मरियल से दम तोड़ते तारे आकाश के चमकने का उपक्रम कर रहे थे. लग रहा था जैसे उजास में कालिख पोत दी गई हो. नवलखा बाई, रोज की तरह आज भी बिरहनी बनी थी -

हमहूं त रहली जल के मछरिया जलवा फंसवला हो माधो.

माधो धई देहल तलफी भुभुरिया कि जियते जरवल हो माधो.

हमहूं त रहली भोरी रे चिरईया खेतवा उजरल हो माधो.

माधो, डहकी ले अब दिन रतिया, बिरिहिनिया बनवल हो माधो.

हमहूं त रहली अबला अनारी तिरईया, पिरितिया लगवला हो माधो.

माधो लाज ले लेहला, अंगुरी छोड़ा के नईया डूबवला हो माधो.

 

***

 

मनकी के मन पर अंधेरे के बादल घहराने लगे. वह जिन घरों में चूल्हा-बासन करती थी, वहाँ से जवाब आने लगे - मनकी अभी तेरा मरद गया है. कुछ दिन आराम करले.

जबकि सच्चाई यह थी कि उन घरों में दूसरी बाईयाँ रख ली गई थीं. हांलाकि मनकी अभी पचास के थोड़ा ही ऊपर पहुँची थी, अगर वह रेखा या हेमा मालिनी होती तो अभी भी फिल्मों में लीड रोल कर रही होती. एक डेढ़ साल से ही उसे निकालने के बहाने ढूंढे जा रहे थे. प्रभु ने बैठे-बैठाए मौका दे दिया. मनकी सब जानती थी. बेचारी गरीब औरत हर मोर्चे पर हारती जा रही थी. बड़ी बेटी के रंग-ढंग भी वह देख रही थी. वह एक खुद्दार औरत थी. पति के रहते हुए भी अपनी मेहनत का खाती थी. बेटी-दामाद की रोटी हलक से नहीं उतरता. पर पापी पेट जो भी कराए कम है. गाहे-बगाहे बेटी अहसास भी करा देती कि वह दामाद की कमाई खा रही है.

जो धीरे-धीरे ताने में बदलता गया - जिनके लिए जान देती रही वे तो लात मारके चले गए. एक निखिल ही है जो पाल रहा है इसे …

और नहीं तो क्या. बेचारा निखिल लुगाई दरस-परस से दूर, किसके लिए हाड़ तोड़ रहा है,अपनी जोरू और बच्ची के लिए ही ना? पेट काट कर, चार पैसा भेज रहा है, तो रांड के पेट में चला जा रहा है. छोटी बेटी की पढ़ाई ने पैर चाँद पर धर दिया था. बड़ी बेटी को पढ़ाने का ख्याल तक ना किया, और  छोटी बेटी को नैन मटक्का के लिए कॉलेज में भेजती थी. उसके रंग-ढंग नहीं देखती थी, या ममता ने आँखों पर परदा डाल दिया था. देवा रे देवा, अपनी कोख जाई बेटी के साथ इतना नाइंसाफी! माँ है कि डायन? तू क्या जाने, बात कुछ और है. मैं तेरी दुश्मन थोड़े ही हूं. बाज के साथ चार चुंग लेने से मुर्गी बाज की नहीं बन जाती. पति को समझने की हुनर पैदा कर. बेटी और पड़ोसन की यह बात सुन कर मनकी टूट सी गई. असहाय सा कट के रह गई. रोया भी नहीं गया. रोने के लिए भी तो आँसू पोछने वाले का आसरा चाहिए. आखिर रोए भी तो किसके भरोसे? बिना कुछ खाए पीए, बिना कुछ बताए निकल गई. रास्ते में पांडुरंग मामा मिल गए.

अरे मनकी कहां जा रही है, अकेले - अकेले?

कहीं नही मामा. बस ऐसे ही थोड़ा टहल रही थी.

मनकी कौन सा तू मेम साहब है, जो टहलने का शौक पूरा कर रही है. साफ़-साफ़ बता, बात क्या है?

मनकी की आखें भर आईं. प्रभु के जाने के बाद पहली बार किसी ने उसके विषय में जानना चाहा.

मामा, जितनी बातें होनी थीं, हो गईं. अब क्या होना-हवाना. बस इस पिंजरे से पिंड छूटे. और मुक्ति मिले.

पांडुरंग मामा समझ गए कि बात कुछ और है. अरे पगली! पिंजरे से मुक्ति चाहती है. यह पिंजरा किराए पर थोड़े ही मिला है कि जब चाहो, किराए चुकता कर, त्याग दो? पिंजरा तो मानुष सेवा वास्ते मिलता है. मानुष सेवा कर. उसी में मुक्ति है. तन की मजबूती के लिए मन को मजबूत कर. तू चल, तेरी मामी बुला भी रही थी.

नहीं मामा, बेटी ढूँढेगी.

नहीं मनकी कोई नहीं ढूँढेगा. तू चल मेरे साथ. हठ मत कर.

बड़े दिनों बाद उसने मनकी को देखा था. सूख गई काया, सूजी आँखें और मैली-कुचैली धोती! पांडुरंग मामा का करेजा कट के रह गया था - देवा, तू भी पूरा का पूरा चित्रपति है. कैसा लगता है तुम्हें इंसानों को सताकर. किस ऐंगल से तू करुणानिधान और दया का सागर मानता है खुद को? सबसे बड़ा घमंडी और मसखरा तो तू खुद है. यार, शायद इंसान ने हारकर तेरा अविष्कार किया होगा. असल में तो तू कुछ है ही नही सिवा इंसानी कमजोरी के.

मनकी, मामा और मामी खोली में बैठे थे. मामी ने मनकी को नहलवा कर साफ धोती पहनवा दी थी. खाने-पीने के बाद मनकी थोड़ी स्वस्थ लग रही थी. उम्र के दूसरे पहर में तीन लोग जीवन के प्रश्न पर चर्चा कर रहे थे. जबकि उम्र दामन बचा कर निकलने की जुगत में थी.

मामी ने कहा - मनकी जीवन नदी जैसा है. नदी चलते-चलते या सूखते-सूखते सूख जाए तो ठीक और तभी वह सच्ची में नदी है. एक बार ठीक से विचारो और देखो कि क्या कर सकती हो ताकि खुद और लोगों के काम आ सको.

काफी सोच-विचार के बाद मनकी बोली - मामी, मैं भी अपनी कमाई कर, खुद्दारी से जीना चाहती हूँ. पर हालात पर काबू नहीं पा रही. खून के रिश्ते तो बेमानी हो गए, सो हो गए. दुनिया ऐसे लाचारियों से अटी पड़ी है. पर यहाँ तो मेहनत-मजूरी के रिश्ते भी छीन लिए गए. माना कि उम्र हो रही है. पर ऐसी भी नहीं हुई कि कुछ कर ही नही सकती. मैं खुद से लाचार-बेजार नहीं हूँ. लोगों के रवैए से टूटती जा रही हूं. कम से कम मेहनत की रोटी तो ना छीने कोई.

पांडुरंग मामा ने कहा - मनकी असल लड़ाई तो रोटी छिनने से बचाने की है. क्योंकि रोटी है तो हम हैं. हम मजूर-कामगार लोग हैं. कमाएँगे तो खाएँगें. असल बात तो रोजी कमाने की है. हम बुजुर्गों को ही दिखाना होगा कि बुजुर्ग होने का मतलब लाचार होना नही है. बुजुर्ग लोग भी इज्जत से जी सकते हैं. वे भी जीने का करेजा रखते हैं. पर इसे बताना होगा. समाज को दिखाना होगा.

ठीक है, पांडुरंग मामा, पर यह सब होगा कैसे?

पैसे से होगा. मुंबई में तो आदमी मरने के पहले मरने की व्यवस्था करता है. और हम तो बाकायदा जीने की बात कर रहे हैं. पर कुछ जुगाड़ कर ही लेंगें.

मामा, प्रभु ने हम सभी का जीवन बीमा कराया था. किस्त वही जमा करता था और सारा कागज पत्तर भी वही रखता था. अब तो शायद मियाद भी पूरी हो गई होगी.

मनकी, अगर पैसे आ जाएँ तो बड़ा-पाव और चाय की दुकान खोल लेंगें. तीनों आसानी से चला लेंगें.

ठीक है. आज देखती हूं कागज पत्तर.

मनकी अभी पांडुरंग मामा के घर ही थी कि इधर उसकी बड़ी बेटी ने अपने पति निखिल को मिस काल किया. दो मिनट में ही काल बैक हुआ – हैलो, बुड्ढी कहीं गई है?

हाँ, आज सुनाया था उसे. गई होगी कहीं. पर ज्यादा खुश मत हो. माँस ही गला है. हड्डियॉ साबुत हैं. मांस बनते देर नही लगेगी. मरेगी नहीं. कहीं गई होगी. आ जाएगी.

कोई बात नहीं. लगी रहो. यह परिणाम आने के पहले की परीक्षा है. ऊपर वाले का दरबार में देर है, अंधेर नहीं. एक बार काँटा साफ हो जाने दो बस. उसके बाद खुशियों का कालीन बिछ जाएगा.

तो मैं कौन सा नही चाहती कि काँटा साफ ना हो? पर मनाने से खंडहर थोड़े ही ढहता है. पति के मरने के बाद बेशर्मी से जीए जा रही है खानगिन.

अरे! अरे! मन का गुस्सा मन में. किसी को कानों कान खबर ना होने पाए. वरना सब गुड़-गोबर हो जाएगा. प्यार से मारना सीखो. प्यार को जहर बनाना सीखो.

चलो ठीक है. बाकी प्रवचन बाद में. लगता है बुड्ढी आ रही है.

बुड्ढी नहीं मेरी जान. माँ कहो. प्यार जताना सीखो. प्यार से जान लेना सीखो. प्यार की ताकत का इस्तेमाल करना सीखो. बाई ...

मनकी घर आ चुकी थी. बेटी नें तुरंत पानी दिया और माथे पर हाथ रखते हुए बोली - अरे माँ! तुम्हें तो बुखार है. माथा तप रहा है. दिन भर भटकती रहती हो. अरे, बापू नहीं है तो क्या हुआ. मैं हूँ, तेरा दामाद है, तेरी नातिन है.

मनकी कुछ कहना चाह रही थी पर खुद को रोक लिया. बनावटी अपनेपन से डर लगने लगा. वह बुदाबुदा उठी – बकरे को हलाल करने के पहले फूल-माला पहनाई जाती है, मिठाई खिलाई जाती है. यहाँ बेटी ही जल्लाद बन बैठी है. देवा रे देवा.

बेटी तेल से सिर मालिश करने लगी. मनकी फफक-फफक कर रोने लगी. बेटी को लगा कि माँ प्यार में रोए जा रही है और इतना सोचते ही उसका चेहरा खिल गया. उसकी आँखें भी लालच के बादल से बरसने लगीं. मनकी ने समझा कि आखिरी बिदाई का वक्त पास आ गया है शायद. और यह उसी के आँसू हैं. मनकी बेटी से नफरत करना चाहती थी पर कर नही पाई. दरअसल इंसान मुहब्बत में ही नहीं नफरत में भी हारता है. रात में बेटी ने पूरे मन से खाना बनाया. माँ को खाने का मनुहार किया. पर मनकी पेट खराब का बहाना कर किसी तरह उसे टालने में कामयाब हो गई.

आधी रात तक दोनों सोने का नाटक करती रहीं. बेटी ने दो-एक बार कहा भी - बड़ी गहरी नीद आ रही है.

मनकी हर बार सुनती और हर बार मन में दोहराती - धीया चली है माँ को सिखाने.

अंतत: बेटी सो गई. मनकी झट उठ कर संदूक खोल कर कागज़ ढूँढने लगी. सब कुछ था पर कागज की पोटली नहीं मिली.

हाय दईया कागज तो हैं ही नही. कहाँ गए. कौन लूट लिया?

कोई और समय होता तो बेटी को झिझोड़ कर जगा देती. दोनों मिलकर खोजते और मिलकर मातम मनाते. पर समय के साथ रिश्ते भी बदल गए थे. मातम की छोड़िए मनकी खुल कर रो भी नही पाई. नहीं, गोपनीय हो कर मामला समझना होगा. धीरज छोड़ने से बात बिगड़ जाएगी. चुपचाप आकर खाट पर लेट गई. आँखों-आँखों में पूरी रात काट दी. सूरज निकलने के पहले ही मुँह-हाथ धोकर पांडुरंग मामा की खोली पर पहुंच गई. मामा लोटा लेकर निकल ही रहे थे कि मनकी को देखकर सारा मामला समझ गए – क्या हुआ! कागज गुम गया ना?

हाँ, मामा, पूरी जतन से रखा था. मिला नहीं. किसी का नेत गंदा हो गया लगता है.

किसी का नही, अपनों का नेत खराब हुआ है. बेटियों में लालच आ गया. एक बात ध्यान धर लो सीमा अच्छाई, भलाई और ईमानदारी की होती है, बुराई और बेईमानी की नहीं. ऊपर उठना जितना मुश्किल है, नीचे गिरना उतना ही आसान होता है. इसलिए लोगों की जरा सी भलाई पर भरोसा करने वाले ही छले जाते हैं. चाहत को नफरत में बदलते कितनी देर?

बेटियाँ? सुदक्षणा तो पहले से ही गायब है. बड़ी बेटी ने किया होगा.

मनकी लालच बड़ी-छोटी का भेद नहीं जानता. बड़ी तो पास है. उसे टटोलो. और पक्का हो जाए कि उसके पास कागज नहीं हैं तो छोटी को खोजना होगा.

पर छोटी मिलेगी कहाँ? पस्त होती मनकी ने शंका ज़ाहिर की.

इसी धरती पर इसी लोक में मिलेगी. पहले बड़ी को टटोलो. ध्यान रहे शक नहीं होना चाहिए उसे.

मनकी अपने चाल में लौट आई थी. बेटी के प्यार का जवाब प्यार से दिया. परस्पर प्यार पाकर दोनों आशंकित और आतंकित हो गईं थीं. बेटी ने माँ के बालों में कंघी किया तो माँ ने भी बेटी के बढ़े नाखूनों को बड़े करीने से कतर दिया. और कहा - बेटी तेरे पिता ने अपने जीते जी हम लोगों की व्यवस्था कर दी थी.

हाआं? वो कैसे माँ?

अरे! एड़ी मूलगी. तेरे बाप नें हम सभी का जीवन-बीमा कराया था. याद नहीं तुझे? अब तक तो रकम की मीयाद भी पूरी हो गई होगी. साथ ही उनके नाम का रूपया भी तो मिलेगा.

बेटी के कान खड़े हो गए – अच्छा हुआ बुड्ढी मरी नहीं. वरना रूपया भी मारा जाता. भगवान जो करता है, अच्छा करता है.

थोड़ा ठहर कर – पर माँ, रकम हमें कब और कैसे मिलेगा?

मनकी समझ गई कि कागज इसके पास नहीं है. सुदक्षणा ने करामात किया है. बेटी कुछ पता लगाना होगा. मैं मालूम कर लेती हूँ.

ठीक है माँ. मैं भी तेरे साथ चलूँगी.

अरे! तू मुन्नी को देख. मैं देख लेती हूँ.

बापू के जाने के बाद पहली बार माँ में आत्मविश्वास देखा. बेटी रुक गई. शाम को मनकी पांडुरंग मामा की खोली में थी.

मामा, कागज नहीं है. सुदक्षणा ले गई होगी.

सुदक्षणा को तलाशना होगा.

पर कैसे मामा?

बुद्धी और विवेक से.

कहाँ होगी वह?

सोचने दो. कल मिलो. कुछ नतीजा तो मिलेगा ही.

मनकी बेमन से चाल में लौट आई. इधर माँ के जाने के बाद बेटी ने पूरा घर छान मारा. कागज़ हाथ नहीं आए. निखिल ने बताया - कागज बुड्ढी के पास नहीं होंगे. तेरी बहन ले गई होगी. रूपए मेच्योर होने पर आशिक के साथ ऐश करेगी. साली तन-मन दोनों में तेज़ है. पर बुड्ढी माँ से बनाकर रख. उसी से मामला सेट होगा. जिसके नाम का बीमा है, रकम उसे ही मिलेगी. बस, अच्छी बेटी बनी रह. ज़मीन के साथ रकम भी मिल रहा है. अच्छे दिन आए समझो.

घर आने पर मनकी ने देखा कि बेटी के चेहरे की हवा बिगड़ी हुई है. वह करुणार्द्र हो उठी - बेचारी! दिन रात खटती है. भरी उमिर में मरद को पेट के वास्ते बिदेश में रहना पड़ रहा है.

पास आकर पूछा - क्या हुआ बेटी रंग क्यों उड़ा हुआ है?

पहले से उड़ा हुआ रंग और भी ज्यादा उड़ गया. पर संभलते हुए बोली - माँ, होना क्या है. जिसके सिर से बाप का साया उठ जाता है और माँ दिन पर दिन दुबली होती जा रही हो, उसके चेहरे का रंग तो उड़ेगा ही, कहते हुए फफक-फफक कर रोने लगी. सारे-गिले शिकवे दूर हो गए.

माँ ने बेटी को गले लगा लिया - बेटी, बाप गया है पर माँ अभी साबित है. तेरे सिवा अब है कौन मेरा?

बेटी का चेहरा खिल गया. उसने माँ से कागज के विषय में पूछना चाहा, पर रात में पूछने का सोच, इरादा बदल दिया. पीढ़ा और लोटा भर पानी रख दिया. माँ को बैठाकर रोटी-सब्ज़ी की थाली सामने रखते हुए – माँ, तुम बस सलामत रहो. और अपना ध्यान रखा करो.

माँ की आखें फिर सजल हो गईं.

रात में सोते समय माँ का पैर दबाते हुए बेटी ने पूछा - माँ, बीमा के कागज सही सलामत हैं ना.

दूसरा समय होता तो मनकी समझ जाती पर वह इतने प्यार के बोझ को संभाल नहीं पाई. और बता दिया कि कागज मिल नही रहे. कहीं गुम गए हैं. बेटी को पति की बात कि जिसके नाम का बीमा है, रकम उसे ही मिलेगी याद आते ही होठ खिल गए. रात होने से माँ इसे भी नहीं देख पाई. पहर रात जा चुकी थी. चिंता नागिन की तरह लहरा रही थी. दो एक घरों की खिड़कियों में रोशनी चमक रही थीं, मानों पिशाच पहरा दे रहे हों!

माना कि पोयसर इलाके में प्राकृतिक कोप अभी टला नहीं था. पर इन दिनों इस कहानी के पात्रों के मन में जिस तरह का मानसिक कोप चल रहा था उसके आगे बाहर का कोप मायने नही रखता था. मनकी भोर में ही पांडुरंग मामा की खोली में पहुँच गई. मामा-मामी जग चुके थे. चाय सुड़के हुए मामा ने कहा - सुदक्षणा का पता चल गया.

कहाँ है?

हिमायत नगर, नांदेण जिला में.

नांदेण जिला में, उतना दूर चली गई हलकट?

हाँ, पास क्यों रहती, जब जाना ही था, तो दूर क्यों ना जाती?

तब कैसे मिलना होगा?

आज ही निकलेंगें. कल शाम तक पहुँच जाएँगे. कल लौट भी आएँगे.

अच्छा.

तुम तैयार हो लो. आठ बजे निकलना है.

मनकी बिना कुछ कहे. मामा-मामी के साथ निकल ली. दूसरे दिन शाम को पाँच बजे सुदक्षणा उनके सामने थी. वह छोकरा भी था. मनकी को गुस्सा तो बहुत आया पर मामा के कहे अनुसार ज़ब्त कर गई. साधारण हालचाल हुआ. सुदक्षणा जान चुकी थी कि बापू नहीं रहा अब. सबने खाया-पीया. थोड़ी बात प्रभु पर भी हुई.

थोड़ा इधर-उधर की बात के बाद मामा ने मोर्चा संभाल लिया - सुदक्षणा बेटी. तुम सच में सुदक्षणा हो. पढ़ी-लिखी और समझदार हो. अब माँ की सुध लो. इस बेचारी की देखभाल भी तुम्हें ही करना है. मामा दम लेने के लिए थोड़ा रूके.

सुदक्षणा ने कहा - माँ, न लाचार है और नाही यतीम. बड़ी बहन की नहीं जानती, पर मेरा भाई हर कदम पर मेरे और माँ के साथ है. दिक्कत बस इतना है कि वह देश में है नहीं. वरना न मुझे अपना जीवन साथी चुनने के लिए भागना पड़ता, ना माँ को इस तरह सोचना पड़ता. फिर भी वह नहीं हुआ तो क्या हुआ. मैं हूँ. मैं बापू के सारे कागज साथ लेके यहाँ आ गई. बापू ने जाते-जाते सबके लिए इतना कर दिया है कि सब अपनी जिंदगी की शुरूआत कर सकते हैं. मैंने भी कर दिया है. हम लोगों ने एक जनरल स्टोर की दुकान खोल लिया है. हमारी जिंदगी चल रही है. साथ ही मैं पढ़ भी रही हूँ. लायक का कुछ हो ही जाएगा. माँ, चाहे तो यहीं हमारे साथ रहे. उसे कोई दिक्कत नहीं होगी.

बात पूरी होते-होते मनकी बोल पड़ी - अरे, बेटी सच में तुमने तो पूरी चिंता ही दूर कर दी. पर बेटी जब तक तन में मन और प्राण है तब तक मैं कमाकर खाना पसंद करूंगी. तुमने इतना भरोसा दिया तो तेरी माँ भी कुछ करके दिखाना चाहती है, कहते हुए मामा की ओर देखा. मामा ने सुदक्षणा को बड़ा-पाव और चाय की दुकान का पूरा खाका समझा दिया.

सब सुनने के बाद सुदक्षणा ने कहा  - माँ को यह सब करने की क्या जरूरत है. हम लोग तो हैं ही.

मनकी बोली - बेटी तेरा बाप कमाते-कमाते गया. मैं भी उसी की तरह जीना और जाना चाहती हूँ. मैं जिंदगी का साथ निभाना चाहती हूँ. मैं जिंदगी का फर्ज निभाना चाहती हूँ.

सुदक्षणा माँ की खुद्दारी जानती थी. रोक नहीं पाई. बस इतना कह सकी - माँ, तुम अपनी मर्जी से जी सकती हो. बापू ने तेरे लिए सब कुछ कर दिया है. तेरा कागज मेरे पास है. मैं एजेंट से फोन करके तेरा रुपया भी निकलवा देती हूँ. वहाँ तो तेरी बड़ी बेटी सब हड़प लेगी. पर माँ एक बात याद रखना, सपने और सच, दोनों अलग चीजें हैं. वह सपना ही क्या जो सच हो जाए.

मनकी सुदक्षणा की बात सुनकर कट सी गई – बेटी, मैं तो यह मानती हूँ कि वह सच ही क्या जो सपना हो जाए. अपनी तो पूरी जिंदगी इसी एक लाईन को निभाने में बीत गई.

दूसरे दिन रूपए निकाल लिए गए. बेटी चाहती तो नहीं थी कि माँ वापस मुंबई जाए. उससे रहा नहीं गया - माँ, कुछ दिन रुक जाओ ना. क्या बेटी को इतना भी हक नहीं दोगी.

पहली बार सुदक्षणा के पति, जिससे मनकी नफरत करती थी ने मनकी की बाँह थामते कहा - माँ, माफ कर देना. बहुत दिल दुखाया है मैंने आपका. आप जो समझो पर मैं तुम्हें माँ ही मानता हूं. कभी भी बेटे से कम नही पाओगी.

पर तैयारी तो जाने की ही की गई थी. मामा-मामी के साथ मनकी भी चल पड़ी मुंबई के लिए. टिकट पुने तक का ही था. इसलिए पुने के बाद मामा ने किराए का कार ले लिया ताकि रातों-रात मुंबई पहुँच सकें. मनकी को फिर ज़िंदगी पटरी पर आती दिख रही थी. बुढ़ापा अभिशाप होने से बचता प्रतीत हो रहा था. आधी रात की ठंडी बहार से मन शाँत सा हो रहा था. सौ की ऊपर से कार समुद्र किनारे दौड़ी जा रही थी.

मनकी सोच रही थी - क्या सपने सच होने की रात ऐसी ही होती है, इतनी भंयकर और इतनी हाहकारी?

आगे कुछ सोच पाती कि खुद को पुल के नीचे गिरते पाया. शिवनेरी का पहाड़, शिवरात्रि का मेला, रतन, प्रभु, बड़ी बेटी, बेटा, सुदक्षणा और नातिन की किलकारी के साथ प्रभु की अंतिम बिदाई की याद आते-आते समुद्र की लहरें उसे बाहों में ले चुकी थीं. उखड़ती सासों से बस इतना ही सोच पाई – प्रभु भी यहीं कहीं होगा. फिर धीरे-धीरे अथाह सागर में समाती चली गई. हवा से बात करती कार बहुत दूर निकल चुकी थी, कहानी  खत्म होने की जगह शुरू हो रही थी ...

 

उत्तरप्रदेश के ज़िला मिर्ज़ापुर के ग्राम कौड़िया-खुर्द के श्री जनार्दन गोंड दलित एवं स्त्री साहित्य, आदिवासी साहित्य और सिनेमा-संस्कृति का अध्ययन करते हैं. हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अनुसंधानी रह चुके हैं. ऐम.फ़िल और PGEMFP की डिग्री हासिल कर चुके हैं. आजकल भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान, मुम्बई में कनिष्ठ  तकनीकी अधीक्षक हैं. इनके लेख और कहानियाँ आदिवासी सत्ता, इंडिया न्यूज़, दलित अस्मिता, पूर्वग्रह, इस्पातिका एवं मीडिया विमर्श जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.

लेखक से सम्पर्क के लिये ई-मेल - jnrdngnd@gmail.com

 

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