"क्या मुझे इसकी आज़ादी मिलेगी?"

इस अंक में हम धर्म, परम्परा और नैतिक व सामाजिक पतन पर कुछ रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं.

  • क़ैस जौनपुरी अपनी कविता में क्या मुझे इसकी आज़ादी मिलेगी? में नवजात शिशु के कानों में अज़ान या संस्कृत मंत्र न पढ़ने की विनती कर रहे हैं

  • आकाश हिंदुजा कहानी ईयरफ़ोन में जवान बेटे का अपनी माँ की श्रद्धालु भावनाओं के प्रति घुटन प्रकट कर रहे हैं

  • महेश चन्द्र द्विवेदी जी की कविता विरोधाभासों का देश में भ्रष्ट सामाज को फटकार है

  • शैलेन्द्र चौहान जी की कहानी विदुर-कथा में शुरुआत से ही विधुरचंद का बड़ा भयंकर दबदबा था ...

 

धार्मिक व पारम्परिक रीतियों का समाज में (शैलेन्द्र जी का शब्द उधार लेते हुए) ऐसा दबदबा है कि हम में से ज़्यादातर जन इन मामलों में अपना छोटा मुँह खोलने की हिम्मत ही नहीं रखते हैं. पता नहीं कौन किस बात का गलत मतलब निकाल ले?

 

जब कि सच तो ये है कि परम्पराओं और धर्म के स्रोत्र जो भी हों मोटे तौर पर इन में से एक  जीवन को रंग देता है, दूसरा समाज में जीने के तरीके की गाईडलाईनें. मगर विभिन्न वजहों की वजह से, यही हैं - धर्म और परम्पराएँ - जो हम में, हमारे समाज में हमारे आपस में असमानता व कुंठता ले आते हैं. इन दो में राष्ट्रवाद या प्रदेशवाद/जातिवाद भी मिला लीजिये. कुछ विकृत धारणाओं ने पनप कर इतने कुछ को इस हद तक हाईजैक कर लिया है कि तर्क-वितर्क करके बढ़ती संख्या में सभ्य लोग अपने जीवन से इन तीनों को पूरी तरह से निकालने को तैयार हैं.

 

लेकिन देश या भगवान के प्रति भक्ति भाव ही जब जीवन से चले जाएँगे, तो क्या वो जीवन बेरंग और  नीरस नहीं बन जाएगा? कुछ लगाव जो अनायास ही हमारे प्रारंभिक वर्षों में लग जाते हैं (उदाहरणतः देश-प्रेम, मातृ-प्रेम, धर्म, खाने-पीने के तौर-तरीके ...) तर्कशून्य या इरैशनल बेशक हों, मगर होते गूढ़ हैं. वयस्कता आने पर हमें उन में दोष दिखने लगते हैं. हम में से कई उन्हें पूरी तरह त्यागने का भी सोचने लगते हैं. ऐसा कुछ मेरे साथ भी हुआ. लेकिन अब मैं कई सालों से वयस्क हूँ. और ऐसा कहा जा सकता है कि समय के साथ बॉर्न-अगैन धार्मिक हो गई हूँ. मुझे पूरा यकीन है इस तरह के अनुभव में मैं अकेली नहीं हूँ.

 

यहाँ आगे यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्यों हमारा मन इतना चंचल होता है कि सालों के बीतने पर एक पक्ष से घूम कर एकदम दूसरे (बाज़ दफ़ा विपरीत) पक्ष में पहुँच जाता है. मेरी पसंदीदा लेखक जया जदवानी ने कुछ दिन पहले लिखा था, कि इच्छाएँ धुएँ की तरह हैं ... हमारे भीतर से बाहर निकलने के बाद वे कौन सा आकार लेंगी, हमें कुछ नहीं मालुम ... जया जी के शब्दों को सुनकर आप कह सकते हैं कि लेखक का काम शब्दों को मरोड़ कर कुछ भी कह डालना है. लेकिन उनकी कही बात ही जीवन की नियति है (फिर से इरैशनल). वो दिल-ए-नादान होता है जो अंततः हमारे सब काम और करतूत तय करता है.

 

आखिर में, कौन कहता है कि आम आदमी समाज में दोषों का मुकाबला नहीं कर सकता. सामाजिक कार्यकर्ता अनुपमा तिवाड़ी का सफ़रनामा पढ़ा, उनके अनुभवों से मैं बहुत प्रभावित हुई. पढ़ने के बाद लगा कि जीना इसी का नाम है. ये लेख पूर्व-प्रकाशित होने के बावजूद इस अंक प्रकाशित कर रहे हैं, आशा है आप भी इस से प्रभावित होंगे.

 

                   - मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

 

 

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