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पाप और पुण्य

 

तू पगला गया है रे पुत्तन ... कुएं के किनारे नाले के बगल तू पेड़ लगाने चला है. यह नहीं होगा ... तू बेकार में परेशान हो रहा है. कुएं से पानी के छींटे उड़ कर पेड़ पर गिरते हैं. गंदगी पेड़ों को भी नहीं सुहाती. 

एक पौधे में नियमित पानी डालते देख मां मुझे कई बार इस तरह के उलाहने दे चुकी थी. लेकिन मुझे पर तो पेड़ लगाने की अजब सी सनक सवार थी.

मां की नसीहत पर मैं अक्सर खींझ जाता.

तू अपना काम कर न . नहीं होगा तो नहीं होगा. कोशिश करने में क्या जाता है.

दरअसल पेड़ लगाने की मेरी अगाध निष्ठा  के पीछे पाप - पुण्य की भावना के साथ ही एक बड़़ा सा स्वार्थ भी छिपा था. क्योंकि मकान में मिट्टी की पुरानी दीवार गिर जाने की वजह से कुंए के आस - पास की जमीन उजाड़  हो चली थी. गर्मी के दिनों में किसी काम से कुएं पर जाने से तेज धूप से चमड़ी झुलसने लगती. मैने सोचा कि आकाशबनी जैसा कोई ऊंचा पेड़ कुएं के किनारे लग जाए, तो धूप से बढ़िया बचाव हो जाएगा. यही सोच कर मां के मना करने के बावजूद मैं उस पौधे की नियमित देखभाल करने के साथ ही उसमें हर शाम पानी भी डालने लगा. इस दौरान उस पौधे से मेरी संवेदना भी जुड़ती चली गई. पौधे को मुरझाया देख मैं उदास हो जाता तो हरियाली नजर आने पर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता. 

लेकिन एक समय एेसा भी आया जब  जिंदगी की भागदौड़ में मैं उस पौधे को भूल ही गया. 

मुझे लगता होना होगा तो होगा, नहीं तो आखिर उसके पीछे कितना परेशान हुआ जाए.आखिर जिंदगी में और भी तो काम है. 

इसी कश्मकश में वह पौधा कब पेड़ बन कर अपने आकाशबनी नाम को सार्थक करने लगा, मुझे पता ही नहीं चला. देखते ही देखते पेड़ मानो आकाश से बातें करने लगा. पूर्ण संभावना में उस पेड़ को विकसित देख मैं किसी लायक बेटे के पिता होने के अहसास से भर जाता. क्योंकि उसे इस मुकाम तक पहुंचाने में मेरी सीधी औऱ बहुत बड़ी भूमिका थी. 

शाम ढलने पर अजीब सी सरसराहट के साथ उससे निकलने वाली ठंडी हवा मेरे मन - मस्तिष्क को गजब का ठंडक पहुंचाती. वह पेड़ मेरे अहं को तुष्ट करने लगा. क्योंकि परिजनों की मनाही के बावजूद मैने महीनों तक उसकी देखभाल की थी. अपने प्रयासों से एक पौधे को पेड़ का रुप देने में  भूमिका का अहसास मुझे पुण्य की अनुभूति कराने लगा. 

इस बीच वह पेड़ सैकड़ों पक्षियों का आशियाना भी बन गया. हर सुबह उड़ान भरने को आतुर पक्षियों का कलरव मुझे अजीब सुख देता. शाम ढलने के बाद भी उस पेड़ पर पक्षियों का देर तक जमावड़ा लगा रहता. 

असीम आनंद की अनुभूति के साथ गर्मियों के दिनों में मैं उसी पेड़ के नीेचे खाट डाल कर सोने लगा. 

कुछ दिन तो ठीक - ठाक बीते. लेकिन इस बीच एक नई और विचित्र समस्या उत्पन्न हो गई. 

क्योंकि शाम ढलने के बाद पेड़ पर अजीब हलचल शुरू हो जाती. रात का अंधियारा घिरने के साथ पेड़ों पर रहने वाले पक्षी पूरी रात शोर - शराबा कर  मेरी नींद हराम करने लगे. पक्षी अमूमन सारी रात बेचैन रहते. सुबह सूर्योदय के बाद ही वे कुछ शांत हो पाते. 

काफी प्रयासों के बावजूद मैं इसका रहस्य समझ नहीं पा रहा था. कोई दिन एेसा नहीं बीतता था, जब पेड़ पर पक्षियों की बेचैन चीख - पुकार मुझे परेशान न करती. पक्षियों की इस व्याकुलता औऱ शोर - गुल  के चलते लंबा किंतु पतला पेड़ पूरी रात इधर से उधर झूलता रहता. 

यह हर रात की बात हो गई थी. आखिरकार एक रात मैने एक बिल्ली को मुंह में एक पक्षी को दबा  कर अंधेरे से निकल कर दूसरी ओर भागते देखा. शिकारी के मुंह में फंसा होने के बावजूद पक्षी खुद को बचाने के अंतिम प्रयास में छटपटा रहा था. लेकिन इससे पहले कि मैं उसके बचाव में कुछ कर पाता, बिल्ली उसे ले भागी. अब  पक्षियों की बेचैनी का राज मुझे समझ में आया. 

दरअसल पक्षियों के आशियाने के नीचे हर रोज बिल्लियां शाम का अंधियारा घिरते ही घात लगा कर बैठ जाती. मौका मिलते ही वे पेड़ पर भी चढ़ने लगती. यह कवायद पूरी रात चलती. इसी वजह से पक्षी रात भर शोर करते रहते. इस तरह न जाने कितने पक्षी बिल्लियों का निवाला बन चुके थे. उनकी बेचैनी का सारा रहस्य मेरे सामने अनावृत हो चुका था. 

लेकिन इस सच्चाई के खुलासे के बाद मैं गहरी उदासी में डूब गया. मेरी सारी अवधारणा धूल में मिल चुकी थी. मैं मन ही मन सोचने लगा.... यह पेड़ लगा कर मैने पुण्य का कार्य किया या पाप ....  

 

पत्रकारिता और साहित्य में समान रूप से सक्रिय पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार तारकेश कुमार ओझा की जन्मभूमि उत्तर प्रदेश का प्रतापगढ़ है तो कर्मभूमि पश्चिम बंगाल का खड़गपुर. मूल रूप से प्रतापगढ़ जिला अंतर्गत बेलखरनाथ के रहने वाले ओझा पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे. साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की. कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 11 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं. सम- सामयिक विषयों पर निरंतर ब्लॉग लेखन कर रहे ओझा को श्रीमती लीलावाती स्मृति पुरस्कार (मथुरा) मटुकधारी सिंह हिंदी पत्रकारिता पुरस्कार के साथ ही बेस्ट ब्लॉगर के कई एवार्ड भी मिल चुके हैं.

विशेषः

  • दैनिक जागरण , खड़गपुर कार्यालय से संबद्ध रहते हुए माओवादी गतिविधियों व हिंसा पर विस्तृत लेखन

  •  टीम इंडिया के सफलतम  कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी के कुछ साल उनके शहर खड़गपुर में रहते हुए रेलवे की नौकरी से जुड़े कार्यकाल का ओझा का संस्मरण भी विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित हो चुका है

  • संप्रतिः अखबार के साथ ही सम- सामयिक विषयों पर निरंतर लेखन

तारकेश कुमार ओझा से सम्पर्क के लिये ई-मेल tarkeshkumarojha@gmail.com

 

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