... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

उदासियों का सुख

दूर दूर से कई निमंत्रण मिलते हैं गुलजिंदों को . गुलजिंदों पंजाब के एक समृद्व गांव में एक सामाजिक कार्यकर्त्ता के रुप में अपनी पहचान बना चुकी है . जीवन के पचाास बंसत देख चुकी गुलजिंदों निमंत्रण पत्रों को देख कर सोच रही है  सब जगह पहुंचना क्या आसान है . डाक देखते हुये इस बार के पत्रों में एक निमंत्रण पत्र  राजस्थान से आया देख  गुलजिंदों के मन में एकाएक ''अच्छू '' का घ्यान आ गया . वैसे उसका नाम अश्वनी था . बचपन में ये लोग उसे छेड़ते हुये अच्छू कहा करते थे और वह मुस्कुरा देता था . कभी गुस्सा नहीं करता था बल्कि बाद में उसने अच्छू के नाम को ही अपना लिया था . गुलजिंदो  ने सोच लिया वह  राजस्थान जरुर जायेगी . अच्छू के प्रति उसके मन में आज भी एक मीठी सी स्मृति विद़्यमान है . गुलजिंदों को आज भी लगता है वह उसका  बचपन का दोस्त था . अगर वह दुश्मन होता तो क्या आज इसे अच्छू की याद  आती .

गर्मी की छुटिटयों में जब गुलजिंदों अपनी नानी  के घर रहने करनाल शहर में जाती तो अच्छू इसका बहुत घ्यान रखता और इसके साथ खेलता था . यह अच्छे परिवार का लड़का था और इनका काफी बड़ा घर था,  इस घर में इमली का, बेर का और नीम का विशाल पेड़ था. इमली, कच्चे बेर और नीम की निमोलिया अच्छू के साथ खाना  गुलजिंदों  को बहुत पसंद था . गुलजिंदों की मां अच्छू के पिता को अपना भाई मानती थी और हर गांव की तरह यहां भी अपनेपन और प्यार के रिश्तों की कद्र थी .

जब वह 13 वर्ष की थी और अपनी नानी के घर में रहने गयी थी उसे चेचक ने आ घेरा था . उन दिनों की अनेक यादें उसे हमेेशा गुदगुदाती रही हैं . गुलजिंदों  के हाथ पर एक चेचक का दाना बिगड़ कर पक गया था . अच्छू दिन में तीन चार बार नीम की छाल घिस कर उसके हाथ  के बिगड़े दाने पर लगाने आता . उसका मानना था कि नीम के पेड़ में बहुत गुण होते है . गर्मी की छुटिटयों में गुलजिंदों को नीम के पेड़ की पीली पीली  निमोलियां खिलाना और चेचक के दौरान उसके बिस्तर पर नित नये नीम के कोमल पत्तों का स्पर्श  गुलजिंदों को कभी नहीं भूला . उदास रहते हुये  भी अपने लिए सुखभरी यादे गुलजिंदों की संपति बन गयी थी . आज भी राजस्थान का नाम देखते ही उसे अश्विनी को देखने की इच्छा जाग गयी  . कैसा होगा वो . कैसा दिखता होगा . मुझसे तो उम्र में बड़ा था . प्यारी और भोली सी सूरत वाला अच्छू बुढाप़े में कैसा लगता होगा . वो उठी और खुद को आईने में देखने लगी . वह अपना चेहरा देख उदास हो गयी क्योंकि आज उसके चेहरे पर पहले जैसी आभा नहीं थी . वो समझ गयी कि  युवा होना अब कल्पना जैसा है और आज के सत्य में इसका का मिलन तर्कसंगत नहीं . वो निराश होते ही उसे झटक देना जानती है . निराशा की सोच का कोई भविष्य जो नहीं .  

उसे याद है जब  दसवीं की परीक्षा देने के बाद के बाद गुलजिंदों एक महीने के लिए अपनी नानी के पास रहने गयी तब अच्छू कालेज की परीक्षा में व्यस्त था  . एक महीने में केवल एक बार वह उसे मिलने आया था पर कुछ परेशान था . गुलजिंदों भी जवानी की देहलीज पर पांव रख चुकी थी, शर्म और हया उस पर हावी रहीं, चाहते हुये भी वह  उसके घर उससे मिलने नहीं गयी . उसे अच्छू का यह व्यवहार पसंद नहीं आया था ! हालांकि इस बार अच्छू उसे ज्यादा आकर्षक लग रहा था .  तेल से भीगे हुये घुंघराले काले बालों और नाक के नीचे  पतली लकीर सी दिखने  वाली मूंछे गुलजिंदों  को आज भी याद है .

उस एक महीने के दिनों में जब वह अपनी नानी के पास रही थी और  हरे बेर तोड़कर खाते हुये  नीम के पेड़ के पास दूसरे बच्चों के साथ खेल करते हुये गुलजिंदों अच्छू का इंतजार करती पर वह न जाने क्यों  उससे मिलने नहीं आया . वह उदास मन से अपने घर लौट आई . कुछ दिनों के बाद  तो गुलजिंदों की नानी ही नहीं रहीं तो उसका  वहां जाना ही नहीं हुआ .  उसे यह पता चला कि अश्विनी का परिवार करनाल शहर के पास वाला घर छोड़कर कहीं चला गया है . अच्छू की अवहेलना ने उसे पढ़ाई की और धकेल दिया था . उसका मन अशांत रहता तो वह खूब पढ़ती, उसे जब उसकी याद आती तो भी वह पढ़ती . धीरे धीरे वह भी उसे भूल गयी .जब कोई रास्ता न सूझे तो मानव मन को अपना हित पहले देखना ही चाहिए .

मनोविज्ञान और समाजशास्त्र में शिक्षा पूरी कर लेने के बाद पंजाब के ही एक कालेज में गुलजिंदों जब प्रोफैसर  बनी तो प्रतिष्ठित और अच्छे घरों से  उसके लिए रिश्ते भी आने लगें .अपनी शादी के बारे में सुनकर उसे आज इतने बरसों बाद  अश्विनी की याद आ गयी . बहन भाई के पुराने संबंधों के कारण   गुलजिंदों की मां को अच्छू के परिवार से शादी के निमंत्रण की चिटठी भी आई . गुलजिंदों की मां ओर पिता  शादी से लौटकर आये तों गुलजिंदों को बताया कि अश्विनी की शादी हो गयी है . उसने अपनी मां से पूछा मां अच्छू का परिवार कहां गया . गुलजिंदों की  मां ने उसे बताया था कि अच्छू के पिता ने राजस्थान में किसी दोस्त के साथ कारोबार शुरु किया तो वह चल निकला  इसलिए बाद में सारा परिवार वहां चला गया . गुलजिंदों ने अब उदास होना बंद कर दिया था . उदास बने रहने की भी तो कोई सीमा होती है , अधिक समय तक उदास रहना व्यक्ति को मृत्यु के निकट ले जा सकता है वो जान गयी थी .गुलजिंदों के साथ के उम्र की बाकी सब लड़कियों की शादियां हो चुकी थी . उसके लिए भी शादी के रिश्ते आये थे पर कहीं न कहीं अच्छू की प्रतीक्षा का बीज मन में छिपाये वह शिक्षा का आश्रय लेकर अपनी शादी टालती रही . जब उसे अच्छू की शादी का समाचार मिला तो उसने भी शादी के लिए हां कर दी . एक दिन उसका ब्याह एक अत्यंत समृद्व परिवार के होनहार बेटे के साथ हो गया .अपनी शादी के बाद वह अपना मायका भी भूल गयी . ससुराल का कारोबार करोड़ों में था और समाज में इनका बहुत नाम था . अपने ससुराल में आकर गुलजिंदों को अपनी प्रोफैसर की नौकरी छोड़नी पड़ी और इसे सामाजिक संस्था की सर्वेसर्वा बना दिया गया .पंजाब में बेसहारा और गरीब लोगों के लिए काम करने वाली इस संस्था का देश भर में नाम था .अपने दोानो बच्चों के प्रति दायित्व निभाती गुलजिंदों इस सामाजिक कार्य को भी बहुत निष्ठापूर्वक कर रही थी कि आज के निमंत्रण पत्रों में राजस्थान शहर का नाम देख  वह बचपन की अनमोल यादों में पहुंच गयी थी .

उसने नियत समय पर कार द्वारा राजस्थान  जाने का कार्यक्रम पक्का कर लिया और जाने से कुछ समय पहले उसने अपनी मां को फोन किया और बताया कि उसे किसी महत्वपूर्ण काम के लिए राजस्थान जाना पड़ रहा है और यह भी पूछा कि अच्छू राजस्थान में कहा रहता है . मां ने उसे समझाया कि अच्छू अब वहां नहीं है . शादी के बाद उसके घर कोई औलाद नहीं हुयी तो उसने एक बच्चा गोद लिया .चूंकि अच्छू का लगता था कि यहां सब जानते है यह  गोद लिया बच्चा अच्छू का अपना जना नहीं है इसलिए उसने अपना तबादला मुम्बई शहर करवा लिया है और अपनी पत्नी और बच्चें को लेकर वह वहां से चला गया है .

गुलजिंदों इस समय राजस्थान  जााना रद्व नहीं कर सकती थी . उसके पास इसका कोई कारण भी बताने लायक नहीं था .घर के कामकाज से दूर उदासियों की मीठी यादों के साथ गाड़ी  भाग रहीं है और उसे करनाल के पास के गांव का घर याद आ रहा है . गाड़ी की रफतार में तेजी है और गुलजिंदों अपने हाथ के पुराने घाव और चेचक के दौरान अच्छू के साथ बिताये पल याद कर रही है . लगभग 10 धंटे के लगातार सफर के बाद वो राजस्थान  की भूमि पर पहुंची तो उसने एक लंबी सांस ली मानों बचपन से जवानी के दिनों की अनेक खुशबुएं उसके अंतर्मन में समा गयी और  भीतर तक सुगंघित हवाएं उसे शीतल कर गयी . जब से अच्छू ने उससे मुंह मोड़ा है उसने स्वयं को प्रसन्न करने के ऐसे ही रास्ते तलाश लिये है . वो जानती है उदास बने रहना किसी समस्या का हल नहीं . बचपन में उसने कहीं सुना था जिसका भाव कुछ इस प्रकार है '' तुम्हें शक्तिशाली बनना है, अपने भीतर दृढ़ता को संजों कर रखना है  क्योंकि मनुष्य की अंदरुनी ताकत में ही संसार की दुर्भावनाओं से लड़ने की शक्ति है और उदासी इस शक्ति को नष्ट कर देती है .''

आयोजित कार्यक्रम में पहुंचने पर राजस्थान में उसका भव्य स्वागत हुआ, होता भी क्यों न उसने यहां के वृद्व और लाचार लोगों के सहायतार्थ अपने खाते से एक बड़ी राशि भेंट जो की थी . राजस्थान से वापिस  लौटते हुये वो उदास थी पर उसने उदासी को ज्यादा देर टिकएने नहीं दिया और सोचने लगी अगली बार वह मुम्बई जरुर जायेगी .

गुलजिंदों को मैं जानती हूं और उसकी मां को भी मैं जानती हूं सच्ची बात तो यह थी कि गुलजिंदों की मां और अच्छू के पिता नहीं चाहते थे कि इन दोनों की बचपन की आत्मीयता आगे चलकर प्यार में बदलें . इसी बात के चलते ही ये सारा घटनाक्रम बना था .

गुलजिंदों आज भी उदासियों के सुख में जी रही है . मुझे लगता है वो जान गयी है कि पुरुषार्थी ही सब प्रकार की बाधाओं को पार कर लेने की क्षमता रखता है , बहानों का आश्रय लेकर जीने वालों का जीवन तो नरकतुल्य बन जाता है .  उदास होकर भी सुखाभास उसकी जिंदगी बन गयी है . जो सच मैने  आपको बताया है उसे मैंने गुलजिंदों को आज तक नहीं बताया क्योंकि मैं नहीं चाहती वह हमेशा के लिए उदास हो जाये .

 

28 अगस्‍त को जन्‍मी श्रीमती सविता चड्ढा ने उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त की है . एम. ए. हिंदी, एम.ए. अंग्रेजी के अलावा आपने पत्रकारिता, विज्ञापन और जनसंपक में डिप्‍लोमा किया है . दो वर्षीय कमर्शियल प्रैक्टिस डिप्‍लोमा(16 विषयों में) आपने प्रथम श्रेणी में विशेष योग्‍यता के साथ पास किया है . वर्ष 1980 से लेकर वर्ष 2013 तक आपने विभिन्‍न मंत्रालयों और पंजाब नैशनल बैंक में अनुवाद कार्य किया है. अगस्‍त 2013 सेवानिवृत्ति के बाद विदेश मंत्रालय के साथ दो वर्ष अनुवाद कार्य किया .

 

 अब तक आपकी 32 पुस्‍तकें विभिन्‍न विषयों पर ( 12, कहानी संग्रह,3 बाल कहानी संग्रह, 9 पत्रकारिता विषयक पुस्‍तकें,5 काव्‍य संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 उपन्‍यास) प्रकाशित हैं . आपकी 3 कहानियों (बू, हमारी बेटी और विडंबना)पर टेलीफिल्‍म निर्माण हो चुका है और दिल्‍ली के मंडी हाउस में स्थित श्रीराम सेंटर के अलावा कई मंचों पर कहानियों का नाटक मंचन हो चुका है . लगभग सभी कहानियां आकाशवाणी पर प्रसारित है और हिंदी के अलावा4व से अधिक कहानियां पंजाबी में भी प्रसारित हो चुकी है . आपकी पत्रकारिता की तीन पुस्‍तकें (नई पत्रकारिता और समाचार लेखन, हिंदी पत्रकारिता सिद्धांत और स्‍वरूप, हिंदी पत्रकारिता, दूरदर्शन और फिल्‍में)दिल्‍ली, पंजाब, हरियाणा में विभिन्‍न  पत्रकारिता विश्‍वविद्धयालयों के पाठयक्रम में सहायक ग्रंथ के रूप में संस्‍तुत हैं .

 

लंदन, न्‍यु जर्सी, पैरिस, नेपाल, यू.एस.ए. के अलावा देश के विभिन्‍न क्षेत्रों में महत्‍वपूर्ण साहित्यिक अनुष्‍ठानों में सहभागिता और आलेख/पर्चे प्रस्‍तुत किये है.

1987 में हिंदी अकादमी दिल्‍ली से साहित्यिक कृति, मैसूर हिंदी प्रचार प्ररिषद से हिंदी सेवा सम्‍मान, आथर्स गिल्‍ड आफ इंडिया से साहित्यिक सम्‍मान, महादेवी वर्मा सम्‍मान, कलम का सिपाही, आराधकश्री, साहित्‍यश्री,  और वुमैन केसरी के अलावा आपको शिखर सम्‍मान भी दिया गया है . सविता जी को देश की अनेक प्रतिष्ठित  संस्‍थाओं ने उनके सृजनात्‍मक लेखन के लिए  सम्‍मानित किया है . 

लेखक से सम्पर्क के लिये ई-मेल - savitawriter@gmail.com

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