... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

बर्फ़ के फूल

'ये रही हमारे घर की तस्वीर ...' उसने उसके सामने टेबल पर एक सुन्दर सा पिक्चर पोस्टकार्ड एक ख़ास अंदाज़ में रखते हुये कहा.....

'कैसा है ?छोटा है, बट नाट बैड...रहेंगे तो हम दो ही. देखो ज़रा ....ऐसा ही चाहा था न तुमने .'

वह स्वयं ही फ़ोटो को विभिन्न एंगल से देख रहा था. उसने नहीं देखा, वह किस तरह हैरत से कभी उसे कभी पिक्चर पोस्टकार्ड को देख रही है. अनबिलीवेबल ड्रीम है यह तो. एक ख़्वाब, जो उन्होंने साथ देखा था, जिसे लिये -लिये वे इतनी दूर चले आये थे, जीवन के तमाम संघर्षों के बीच जिसकी छवि धूमिल नहीं पड़ने दी थी उन्होंने अपने भीतर. आस्थाएं भी आकार ले लेती हैं कभी -कभी. यह तो पढ़ा था सिर्फ़, देखा तो कभी नहीं.

  'क्या हुआ? पसंद नहीं आया ?' उसने उसे धीरे से हिलाया.

  उसने मानो चौककर उसके हाथ से तस्वीर ले ली....

 'देखो ....ये न ख़्वाब है न मज़ाक ....' उसने उसका चेहरा ध्यान से देखा.

'हां भई....न ख़्वाब है न मज़ाक ....' उसने उसके दोनों हाथों को अपने गर्म हाथों में पकड़ते हुये कहा....

'पर तुम इतने सकते में क्यों बैठी हो ? मैंने खुद अपने कैमरे से यह तस्वीर ली है तुम्हें दिखाने के लिये. मैं तुमसे कहता था न वह घर बन रहा है अभी. तो वह बन ही रहा था मेरे भीतर. तीन साल पहले मैं मसूरी गया था किसी काम के सिलसिले में... यह छोटा सा फ्लैटनुमा घर कोई बाहर की पार्टी बनवा रही थी. हो सकता है उनका इरादा हो गर्मियों में वहां आकर रहने का. अभी फर्नीचर बन ही रहा था कि देहरादून में रह रहे उसके मालिक की मृत्यु हो गयी. उसके बेटे को अब वह घर नहीं चाहिये. किसी दलाल के जरिये मुझे पता लगा था. मैंने तुरंत बात करके पहली क़िस्त दे दी. मैंने तुम्हें फ़ोन पर जानबूझकर नहीं बताया. सोचा, साल दो साल बाद जब मिलेंगे, तुम्हें सरप्राइज दूंगा. कैसा रहा मेरा सरप्राइज ?'

    वह सारी बातें कह गया, पर अभी बन रहा है, पर ही अटकी रह गयी. बनते ही रहते हैं असंभव सपने भीतर सालों- साल. किसी को जल्दी नहीं होती. हम एक- एक ईंट रखते हैं....फिर कभी ईंटें ख़त्म हो जाती हैं....कभी सीमेंट...कभी रेत....कभी बनी -बनाई दीवार गिर जाती है या उसके प्लास्टर उखड़ जाते हैं. हम सारी उम्र फिर -फिर बनाते हैं खुद को झुठलाते हुये.... यह तो एक मुकम्मल तस्वीर है...उसने अपनी उँगलियों से छुआ तो एक अजीब सी सिहरन महसूस हुई. पहली बार हाथ पकड़ा था जब शाश्वत ने, ऐसी तेज सनसनी जिस्म में कि उसे कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया था. पर आज ऐसा नहीं हुआ था. आज उसे लगा, भूल से उसने किसी अजनबी का हाथ पकड़ लिया है. शाश्वत अभी भी उसके जवाब के इंतज़ार में है....

  'जानलेवा .....' उसने भी मुस्कराने की कोशिश की.

  'क्या बात है ?तुम खुश नहीं हुई ?'

  'मुझे अभी भी यकीन नहीं आ रहा. मेरे जीवन में कोई असंभव सपना आज तक सच नहीं हुआ.'

  'असंभव सपना तो एक ही बार सच होता है जीवन में. थोड़ी देर बाद यकीन भी होने लगेगा.'

  'ऐसा क्यों होता है शाश्वत, जब हम बड़े हो जाते हैं, छोटे -छोटे सुखों पर यकीन करना भूल जाते हैं.'

  'हां......पता नहीं.....' उसने लापरवाही से अपना सिर झटका....' वैसे लगता है, बड़ा सिर्फ़ मैं हुआ हूँ. तुम तो अभी भी वैसी ही हो, छोटी बच्ची सी.....'

   वह हंसने लगी. घायल हंसी. दौड़ते -दौड़ते एक गुलाबी फ्राक कंटीली झाड़ियों में फंस जाती है, फंसी रह जाती है....कितने तूफ़ान, कितनी बारिशें, कितने मौसम गुज़र जाते हैं उस पर से...गुलाबी रंग घुल -घुल कर सफ़ेद हो जाता है.

  'तुम्हें पता है सितम्बर में मैं नानी बन  गयी हूँ.'

  'अच्छा ...' वह हंस पड़ा....'कैसी है वह ?'

  'अच्छी है ....'

  'बड़ी प्यारी है तुम्हारी बच्ची.'

  'अपनी मां पर गयी है.' उसने भी इतरा कर कहा.

  'तुम्हें अजीब लग रहा होगा न इस नई भूमिका में...उलझन सी महसूस हो रही होगी.'

  'मुझे लगता ही नहीं, यह मेरा जीवन है....यह मेरा बेटा है कि यह मेरी बेटी है. हां हैं, पर मैं तो वहीँ खड़ी अभी भी अपना रास्ता ढूंढ रही हूँ. यह जो इतनी दूर निकल आई है, यह कौन है ?'

  वह अरसे बाद उसे इतनी भावुक देख रहा है, नहीं तो उससे बिछड़ते वक्त भी वह रोती नहीं. वह कई बार रोया है अलबत्ता. उसने हमेशा कहा है, भीतर और बाहर की दुनिया को मिलायेंगे तो दिक्कत में पड़ेंगे. इन्हें अलग -अलग ही रखना -जीना होगा. वह चुपचाप उसे देख रहा है.

  'मैंने सबकी इच्छा का ख्याल रखा, पति से लेकर बच्चों तक कि इन्हें क्या चाहिये. किसी ने मुझसे नहीं पूछा तुम्हें क्या चाहिये ? बहुत बरस तो मैं खुद से ही पूछते डरती रही, फिर तुम मिल गये. यकीन करो, फ़िर दुबारा मैंने नहीं पूछा खुद से. आपकी इच्छाएं पूरी हों, तो भी आपको डर लगने लगता है.....'

  'फिर डरते -डरते ही जीने की एक नई शुरुआत हुई. इन पच्चीस सालों में हम बीस बार भी नहीं मिले. एक महीना तक नहीं. तुम्हें हैरत हो रही होगी यह सोचकर कि हमने चलने के लिये कुछ ज्यादा ही लम्बा रास्ता चुन लिया.' वह कहते -कहते हंस पड़ा.......

  'क्या -क्या सोचता था, तुम्हारे साथ ऐसे रहूँगा, वैसे जियूँगा. उन -उन जगहों पर जायेंगे, जहाँ -जहाँ तुम्हारे साथ जाना चाहता हूँ. ओ गॉड !वैसे तो मैंने कभी यकीन नहीं किया ईश्वर पर, पर जब -जब तुम्हारी शक्ल आँखों के सामने आती, मैं उससे तुम्हें मांगने लगता. और देखो, तुम मुझे मिल गयीं. सच ही कहते हैं, दिल से कुछ मांगो तो अननोन शक्तियां तुम्हारी मदद करती हैं. पहले मैं यकीन नहीं करता था, पर अब सब पर यकीन करने को जी करता है.'

  'हां....' वह भी हंस पड़ी.....'बूढ़े हरेक बात पर यकीन करने लगते हैं.'

  'ए....ख़बरदार जो खुद को बूढ़ा कहा....'

  'खुद को नहीं जनाब, मैं आपको कह रही हूँ...' उसने भी शोखी से कहा.

  'मुझमें तुम नहीं हो क्या ?' उसने उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा.....'तुम्हीं तो हो.'

  'अच्छा बताओ...हमने कहाँ -कहाँ जाने का सोचा था ?'

       वह ख़ामोश उसकी बगल में लेटी है. वह उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फिरा रहा है...आग निकला करती थी कभी, देह सुलग जाया करती थी, अब गहरी शांति से आँखें झपक जाना चाहती हैं. देह मन की तरह हमेशा भूखी नहीं रहती.

   'मैक्लाड गंज, सिक्किम और तिब्बत. तुम्हें पहाड़ों की बारिश अच्छी लगती है न. अब ये सब तुम्हारे आसपास होगा, तुम्हारी मुट्ठी में.....पच्चीस साल....' वह बोलता जा रहा है.....'कभी इस पर सोचा है तुमने, हमें जो करना होता है, इन पच्चीस सालों में करना होता है. नौकरी, शादी, बच्चे, उन्हें बड़ा करना, घर बनाना, पचासों झंझटें...अपने लिये सोचने का वक्त ही नहीं मिलता. एक बंधी -बंधाई व्यवस्था के खूंटे में बाँध दिये जाते हैं आप...बस फिर गोल -गोल घूमना शुरू...एक वक्त जिन मूल्यों की हम आलोचना करते थे, बाद में उन्हीं मूल्यों की कसौटी पर कसने लगते हैं खुद को.'

  'चलो....एक बार फिर शुरू करें.' उसने अपनी उदासी को पीछे धकेलते हुये कहा.

  'हां....पहली मुलाकात से. कितनी सुन्दर थीं तुम...अद्भुत. मैं तो बस पागल ही हो गया था. उस समय जी किया था, क्या यह हाथ सिर्फ़ एक बार पकड़ा जा सकता है ?'

  'थी ....?' उसने उसे छेड़ा...अपने हाथों से उसका चेहरा घेरते हुये.

  'मेरा मतलब...अभी भी हो.'

 'छोड़ो ...अब झूठ बोलने की तुम्हारी उम्र नहीं रही.'

 'अच्छा ...बीच -बीच में ये साली उम्र कहाँ से आ जाती है, पहले तो ऐसा नहीं होता था.' उसने शिकायत भरे स्वर में कहा.

  'यही मैं सोच रही हूँ शाश्वत. ऐसा मुझे भी पहली बार महसूस हुआ है. ये क्या ऐसा फैक्टर है जिसे भुलाया नहीं जा सकता.' वह भी उतनी ही हैरान है.

  'तुम्हारे आस पास जो है, तुम्हें इसकी याद दिलता होगा. तभी....'

  'जो आस पास होता है, वही हमें हमारी याद दिलाता है शाश्वत. तुम्हारा बेटा भी बड़ा हो गया है, पच्चीस बरस का तो होगा.'

  'हां....साला अपने बाप पर गया है. एक लड़की को चाहता है. ले आया मिलवाने. उसकी आँखें देखते ही मैं समझ गया. हम दोनों ने तुरंत हां कर दी. कितनी अजीब बात है न सहर, पुरुष सारा जहाँ जीत ले, उसे वह ख़ुशी नहीं मिलती जो एक स्त्री को जीत कर मिलती है. आख़िर जहाँ भी लेकर वह करे क्या ?स्त्री उसका ह्रदय भरती है, उसकी आत्मा. वह सब -कुछ लाकर उसे दे देना चाहता है. तुमने किसी ऐसे पुरुष की जीवनी पढ़ी है, जिसके जीवन में स्त्री न हो. उजाड़ रेगिस्तान होता है उसका जीवन.' बाहर की बात करते -करते वह अनायास अपने भीतर झाँकने लगा है. उसने बाधा नहीं दी. उसके कंधे के पास मुंह छिपाये सुन रही है उसे...उसके ह्रदय की आवाज़...उसके रक्त की धप धप....

   'वैसे भी वह मेरे ज्यादा नज़दीक है. अपनी हर प्राब्लम मुझसे शेयर करता है. रात को जब तक मैं आ नहीं जाता, जागता रहता है. मुझे यह सोचकर अच्छा लगता है कि कोई मेरी प्रतीक्षा कर रहा है. मुझे उसका ख्याल आता है और मैं जल्दी लौट आता हूँ.'

  'उससे क्या कहोगे शाश्वत कि हम दोनों बाप-बेटे एक साथ नया जीवन शुरू करने जा रहे हैं. वह नहीं पूछेगा कोई सवाल ?'

  'तुम औरतें बड़ी प्रेक्टिकल होती हो. ख्वाबों से हकीक़त में आने में तुम्हें एक मिनट नहीं लगता.' उसने उसे अपने में भींचकर कहा.

  वे दोनों सहसा चुप हो गये. क्या यह एक ऐसा प्रश्न था जिस पर विचार नहीं किया गया था या अगर किया गया था तो अकेले फिर उसे असुरक्षित भविष्य के गर्भ फेंक दिया गया था.

  'हम उसी व्यवस्था को अपने लिये फिर से चुन रहे हैं, जिससे भाग कर हम यहाँ आये थे. अगर वह सही नहीं है शाश्वत तो यह सही क्योंकर होगी? कोई और विकल्प नहीं हो सकता ?'

  'कौन सा विकल्प यार ?एक तो हमने वैसे ही बहुत देर कर दी. कितना कुछ बीत गया है. विकल्प की तलाश में तो बची -खुची उम्र भी खत्म हो जायेगी. अब कुछ नहीं. फ़ैसला हो चुका. हमारा एक घर होगा. मैं भी रिटायर होने वाला हूँ. हम एक साथ रहेंगे बस.....'

  'थोड़ी सी तकलीफ़ और कर लेते हैं शाश्वत. सबको बुलाकर बाक़ायदा घोषणा भी कर देते हैं. घरवाले भी जिल्लत से बच जायेंगे.'

  'घरवाले ?तुम अभी भी घरवालों के लिये सोच रही हो?'

  'तुम नहीं सोच रहे ?बोल पाओगे अपने जवान बच्चों को. मैं बोल पाऊँगी ?तीस साल एक आदमी के साथ रहने के बाद मैं उसे किस मुंह से कहूँ, मैं जा रही हूँ. वह पूछेगा नहीं, मेरा कुसूर क्या है? बेटे से ज्यादा मुझे अपनी बहू  से डर लगता है. वह समझेगी क्या ?कौन समझेगा ?थोड़ी दूर और जाऊं तो लगता है, हमारे समधी क्या सोचेंगे? कहेंगे, ये दोनों सठिया गये हैं..... ?'

  'अब तुम मुझे डरा रही हो क्या ?इतनी मुश्किल से जब हमारा सपना सच होने जा रहा है.....'

  'डरा नहीं रही...डर रही हूँ वास्तव में...हम कायर थे. हमने बहुत देर कर दी. तभी अपनी मर्जी का कर लिया होता तो क्या कर लेता समाज या परिवार. डांट -डपट, चीख चिल्ला चुप हो बैठ जाता. बच्चे भी छोटे थे, कम अज़ कम सामने जवाब देने की जरूरत नहीं होती. अब तो ऐसा करने की कोई वजह भी पूछेगा तो हम बता नहीं पायेंगे.'

  'कहेंगे, हम प्रेम करते हैं एक -दूसरे से ....'

  'प्रेम.....' वह एकाएक हंसने लगी, क्या कोई सचमुच जानता है, प्रेम क्या होता है ?और यह प्रेम की मांग थोड़े ही है. प्रेम माने क्या ?पर उसने यह नहीं कहा....

  'क्या यह काफ़ी होगा? सबसे बड़ी बात, कह पाओगे क्या ?'

  'हमें किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है. हम एक दिन तय करेंगे, उस दिन एक ख़त में सब कुछ लिखकर चुपचाप घर छोड़ देंगे, बस.' उसने अचानक निर्णायक स्वर में कहा....' बताने की ज़हमत ही क्यों उठायेंगे ?इस तरह तो कभी कुछ नहीं होगा.'

  'हां...इस तरह तो कभी कुछ नहीं होगा.' उसने भी अपने आप में डूबे-डूबे कहा.

  'तुम्हारी क्या प्राब्लम है ?'

  'नहीं....कुछ नहीं....'

  'कुछ तो है. साफ़ -साफ़ बोलो. अब घुमाने -फिराने का वक्त नहीं रहा.'

  'मेरी प्राब्लम बड़ी सिली -सिली है, तुम हंसोगे.'

  'तो हंस लूँगा.....'

  'देखो न, रमन डायबिटिक है, उन्हें समय पर दवायें देना, चेकअप के लिये कहना, वो तो अपने आप कुछ नहीं कर सकते. उनका कोई दोस्त भी नहीं है. घर में घुसते ही सबसे पहले मुझे पुकारते हैं और बेटा, आधी -आधी रात तक बैठा हमसे बातें करता रहता है, जब तक हम उसे उसकी बीबी का डर दिखाकर उसके रूम में नहीं भेज देते. तुम कहोगे, ये गुलामी की जंजीरें तोड़ दो पर एक बात कहूँ, गुलामी की भी आदत पड़ जाती है. अब इन हथकड़ियों के निशान मेरी आत्मा में खुद गये हैं.'

  'इसका मतलब मैं क्या समझूं ?'

  'मैं तुम्हें किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा रही. अपनी फीलिंग्स शेयर कर रही हूँ. मुझे जाने क्यों शिद्दत से लग रहा है, बहुत देर हो गयी है.'

  'बहुत देर क्या मैंने की है ?तुम्हीं कहती रही, बस अपने बच्चों को जरा बड़ा कर लूँ, फिर कहा, इनकी शादी हो जाये, बुढ़ापे में जिसकी मां किसी के लिये घर छोड़ दे, उन बच्चों से कौन सा परिवार रिश्ता जोड़ना पसंद करेगा. अब जब सब हो गया, तुम्हारे पास नये बहाने तैयार हो गये. अब तुम ऐसा करो, अपने पोते की शादी तक रुक जाओ. फिर तो घरवाले भी सोचेंगे, बूढी जाती है तो जाये, पिंड छूटे. कहेंगे, कहाँ जाना है, बताओ, हम छोड़ आते हैं.'

  दोनों एक साथ हंसने लगे. दोनों को ही लग रहा है, वे हंस नहीं रहे, रो रहे हैं.'

  'शाश्वत, मैं जानती हूँ, ऐसा ही कुछ या इससे थोड़ा अलग तुम्हारे साथ भी है. फ़र्क सिर्फ़ यह है कि तुम कह नहीं रहे. मुश्किल तुम्हारी मुझसे कम नहीं है.'

  कभी कुछ नहीं बताया उसने अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में. एक वर्जित क्षेत्र है वह, जिसमें दोनों में से कोई अपनी बातों के दौरान भूलकर भी प्रवेश नहीं करता. उसे भी पता है उसकी कमजोरी, वह खुद को वहां अकेला छोड़ दिया जाना चाहता है. ठीक भी था, एक वक्त के बाद आपको उस द्रश्य से गायब हो जाना चाहिये, जहाँ आपकी मौजूदगी गैरजरूरी है.'

  पर आने वाला यह द्रश्य, जो इस तस्वीर में है, कौन तय करेगा कि इसमें उनकी मौजूदगी जरूरी है या नहीं.

  'अच्छा, तुमने यह तो पूछा नहीं, इसमें किचन कहाँ है, बैडरूम किधर है, बालकनी कितनी बड़ी है और लाइब्रेरी है या नहीं.' उसे लगा वह ख्वाहमख्वाह तनाव में पड़ रहा है तो उसने बात बदल दी.

  'लाओ, मैं बताऊँ....' उसने तस्वीर टेबल पर अपने ठीक सामने रख ली. यह अजीब था...सचमुच अजीब...जो भी उसके घर का किचन रहा होगा, वह वहां खाना बनाये. उसे क्या ऐसा नहीं लगेगा, वह एक अजनबी शरीर को छू रही है. घर की भी तो अपनी एक देह होती है. वह भी किसी परिचय की मांग कर सकता है. क्या करेगी वह ?वैसे ही खाना बनायेगी या पढेगी या वे दोनों शाम को शापिंग के लिये जायेंगे, कभी फ़िल्म...कभी पहाड़ों की सैर...दिन भर पहाड़ आँखों के सामने हों तो दिखना बंद हो जाते हैं.

  'मसूरी में क्या हमेशा ठण्ड होती है ?' अचानक उसने नानसेंस प्रश्न पूछ लिया.

  'क्यों ?'

  'नहीं, बहुत ठण्ड मुझे सूट नहीं करती, मैं परेशान हो जाती हूँ.'

 'ओ. के. जब ठण्ड बहुत बढ़ जायेगी, हम आपको किसी गर्म जगह घुमाने ले जायेंगे.'

 'घुमाने ?' उसने दिमाग में फ़्लैश की तरह चमका....तो वहां खर्च कौन करेगा ?शाश्वत ? वह खुद को असहज महसूस नहीं करेगी, जैसा कि आमतौर पर करती है. जब वे दोनों साथ होते हैं, शाश्वत उसे एक पैसा खर्च करने नहीं देता. तब भी उसे लगता है, वह अपनी आइडेंटिटी खो रही है. यही बात उसे रमन के साथ नहीं महसूस होती. शायद इसलिये कि वहां वह अपना -आप देती है. वहां घर की कमान उसके हाथ में है. क्या लाना, क्या नहीं. कहाँ जाना, कहाँ नहीं. वहां तो वह पति और बेटे को उनकी फिजूलखर्ची के लिये डांट लगाती है. शाश्वत को भी तो उसने अपना आप दिया है. उसके साथ होती है तो उसे लगता है, वह अपने साथ है, पर तमाम वक्त नहीं. वह पल गुज़र जाता है, दोनों वापस लौट आते हैं. समंदर लौटता है जैसे अपनी ओर, उफ़ान के बाद. शायद यह सब साथ रहने से आता है. जब शाश्वत और वह साथ रहने लगेंगे, उसे कुछ भी महसूस नहीं होगा.

  'मुझे पता है, तुम सबसे पहले कहाँ चलना पसंद करोगी. उस गेस्ट हाउस में चौबीस घंटे, जहाँ जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी रुके थे, है न, देखो इतने साल हो गये, वह हमारी दूसरी मुलाकात थी. मुझे एक -एक क्षण याद है, यह भी कि तुमने उस दिन क्या पहना था ?'

  'तुम्हें याद है ?'उसने हैरत से पूछा. हालाँकि खुद उसे कुछ भी याद नहीं था.

  'बिल्कुल. यह भी कि पहली मुलाकात पर क्या पहना था ?' उसने एक पल उसका चेहरा देखा, फिर हंस पड़ा....

  'ब्लैक....माय डियर ब्लैक. मुझे यह भी याद है, मेरे साथ खाने में किस -किस वक्त तुमने क्या -क्या खाया था?'

 'तौबा....' उसने अपने कान पकड़ें...' अब बस करो ....'

 अच्छा लगता है किसी दूसरे के भीतर जीना, अपना जीना नाकाफ़ी हो जैसे. कभी -कभी हम दूसरे के चिमटे से अपने आपको पकड़ते हैं, दूसरे की आँख से देखते हैं अपने आपको.'

  'तुम्हें एक मजेदार बात बताऊँ ?'

  'बताओ ....'

  'मैं जब सायकालाजी में एम. ए. कर रही थी, हमारे एक प्रोफ़ेसर होते थे, संजय. पढ़ाते तो थे वे एबनार्मल सायकालाजी, पर दुनिया का कोई ऐसा विषय न था, जिसकी बाबत वे गहरी से गहरी जानकारी न रखते हों. जिसे भी कुछ पूछना होता, उनके पास भागा चला जाता. चलती- फिरती डिक्शनरी तो थे ही. बोलने से पहले उन्हें सामने वाले की प्रतिक्रिया भी पता होती. एक ही प्रश्न का वे हर स्टूडेंट को अलग जवाब देते...एकदम सही जवाब. जीनियस थे. प्रेम पर तो ऐसा बोलते थे वे, कहाँ -कहाँ की दार्शनिक उक्तियाँ देते हुये....अद्भुत. कहते थे, प्रेम न सिर्फ़ अबोध होता है, अबोधता में ही संभव होता है. समझदारी से इसका कोई लेना- देना नहीं. हमने पूरे दो साल सुना उनको. उन दो सालों में मैंने उनकी शायद ही कोई क्लास मिस की हो. हजारों उक्तियाँ ...हजारों उदाहरण...कभी कहते, तुम लोग जानते ही नहीं हो...देह कितनी गैरजरूरी है यहाँ, कभी कहते, कितनी मीनिंगफुल है यह...यही तो द्वार है...तुम्हें खटखटाने का तरीका आना चाहिये. पर यह सब तुम तभी जानोगे, जब इसके पार जाने का रास्ता तुम जान लोगे.'

      वह सांस लेने के लिये रुकी. वह बड़े ध्यान से उसे सुन रहा है. इतनी तन्मयता से वह कभी -कभी ही बोलती है. नहीं तो अक्सर छोटे -छोटे उत्तरों से उसका काम चल जाता है.

     'जब हमारा रिज़ल्ट आया, मैंने टाप किया था. मैं उन सबसे मिलने कालेज गई. उन्होंने अपनी ख़ुशी प्रगट की, मुझे बधाई दी. जेब से सौ रूपये निकालकर चपरासी को दिये- जाओ, मिठाई लेकर आओ. मैंने चपरासी से सौ रूपये झपटकर उनके सामने रख दिये- सर, ऐसा किया तो मैं बगैर मिठाई खाये चली जाउंगी. वे हंस दिये. मैंने अपने पैसे निकालकर चपरासी को दिये, छोटी सी पार्टी हुई घंटे भर की, हंसी -मज़ाक के बाद जब हम उठे...मैं उनके पास जाकर खड़ी हो गयी. वे समझ गये, मैं कुछ पूछना चाहती हूँ. वे उठे और साथ चलते हुये दरवाज़े तक आये....

  'सर, वह कौन है, जिससे आप प्रेम....मैंने पूरे दो साल आपको इतना सुना है कि उन्हें देखने का मन करता है.' मैंने डरते -डरते कहा कि कहीं सीमाओं का अतिक्रमण न हो जाये, साथ ही जोड़ दिया....

  'सर, मैं आपकी स्टूडेंट नहीं हूँ अब. मैं आपसे कुछ भी पूछ सकती हूँ.'

  वे मेरी तरफ़ देखते हुये बड़े मजे से हंस दिये.....

  'सिली गर्ल...चुपचाप घर जाओ. ऐसा कोई भी नहीं है, न ही मैंने जीवन में कभी प्रेम किया है, न ही इसके अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ. गुड बाय, गाड ब्लेस यू.....' वे मुड़े और अन्दर चले गये.

   'मैं जानती हूँ, वे कभी झूठ नहीं बोलते. उस दिन के बाद आने वाले बरसों में मैंने जाना, हम उसी के बारे में सबसे ज्यादा बात करते हैं, जिसके बारे में सबसे कम जानते हैं.'

   'तुम कहना क्या चाहती हो ?'

        'मैं यह कहना चाहती हूँ कि हम जिन चीजों के बारे में सोचते हैं...प्रेम, व्यवस्था, शादी, बच्चे, घर, जिम्मेदारियां, वे शतरंज की एक बिसात पर अपनी -अपनी जगह घेरे खड़े हैं. हमने जब से होश संभाला है, इन्हें ऐसे ही देखा है. इन्हें किसी और तरीके से भी जमाया जा सकता है, ये बाजियां किसी और तरीके से भी खेली जा सकती हैं, जहाँ हमें अपना -आप जीतना -हारना न पड़े. हम इसके बारे में बातें तो बहुत करते हैं पर हमारे पास कोई ठोस आधार नहीं है, जिस पर हम इस भवन को कागज से उठाकर जमीन पर रख सकें, इसे मनचाहा आकार दे सकें. बहुत सारे ख़्वाब होते हैं शाश्वत, जो सच बनने से पहले मर जाते हैं तो मात्र इसलिये कि उन्हें सच करने का साहस मनुष्य में नहीं होता.'

    वक्त ख़ामोश पानी की तरह उनके बीच बह रहा है. अभी भी वे उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ रहे हैं, जो पच्चीस बरस से उनके भीतर पल रहे हैं.

    'चलिये हुज़ूर, आपको घुमा लायें, दोपहर हो गयी यहीं बैठे -बैठे. चलो, लंच पर एक शानदार जगह चलते हैं.'

  दोनों तैयार होकर गाड़ी तक आये. ड्रायवर नहीं था.

  'ड्रायवर नहीं लाये ?' सहर ने यूँ ही पूछा. वैसे भी उसे उन दोनों के बीच तीसरे की उपस्थिति नागवार गुज़रती थी. पीछे सतर्क होकर बैठना पड़ता. कभी -कभी वह उसकी पतली सी हथेली अपने गर्म हाथों में भींच लेता. भीतर रुकी हुई सहमी सांस को आराम मिल जाता. वह दो हाथों की आपस में हो रही बातचीत सुनती...वर्डलेस. कुछ धीरे -धीरे उतरता....देह में से एक नई देह सिर उठाती....

   'नहीं...बच्चों को बाहर जाना था दो दिन के लिये. एक गाड़ी वे ले गये. दूसरी लेकर मैं यहाँ भाग आया. मेरे पास सिर्फ़ एक दिन है.' उसके होठों पर उदास मुस्कान थी.

   वैसे -वैसे ही डरा -डरा सा जीवन ...दौड़ते -भागते जब जितना मिल जाये....

  'अब ये सब करना बुरा लगता है न ?' उसने प्लेयर पर एक कैसेट लगाते हुये कहा.

  'बहुत. तभी तो स्थायी समाधान खोज लाया हूँ.'

  'तुम्हें याद है, एक कैसेट में तुमने मेरी पसंद के गाने भरवाये थे. हम जब भी मिलते थे, तुम वही बजाते थे और जगजीतसिंह की वह ग़ज़ल हम दोनों को ही पसंद थी बहुत.......'

  'प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है....' वह हंस दिया.... 'जगजीतसिंह सुनने की आदत मुझे तुमने ही लगाई थी. अब तो सालों हो गये, कुछ नहीं सुनता.'

  'वह कैसे खो गयी....?' उसने बॉक्स खोला.

  'खो गयी होगी जाने कहाँ? अब तो एक गाड़ी बेटी ले जाती है, दूसरी बेटा. उनसे फ्री होती है तो बीबी.' वह एक फ़ीकी हंसी हंस दिया.

   खो जाता है बहुत कुछ, जिसे एक वक्त तक हम बहुत कीमती समझते हैं, बाद में बचकानी बातें लगने लगती हैं. सूखे फूल...लम्बी- लम्बी पत्तियां, डायरियां ,कार्ड्स....सब.....

      'तुम्हारे ख़त, तुम्हारे कार्ड्स कुछ भी नहीं है मेरे पास. मैं अपने एक दोस्त के लॉकर में रखता हूँ. सोचता हूँ, ले लूँ. साला ऊपर चला गया तो मेरा भी कितना कुछ ले जायेगा. कोई एक कोना नहीं बचता, जिसे सबसे छिपाकर रखा जा सके. लोगों और चूहों में कोई फ़र्क नहीं है...हर जगह पहुँच जाते हैं...हर चीज़ कुतर डालते हैं...दूसरे का सपना तक नहीं छोड़ते.'

    वह चुप बैठी सुन रही है. कैसेट में पता नहीं क्या बज रहा है. उसका दिमाग ग्रहण नहीं कर रहा.

   इसके पहले भी दोनों मिलते रहे हैं. दोनों को पता होता है -सिर्फ़ एक या दो दिन बस. दोनों वापस लौट आते हैं..अपनी -अपनी गुफ़ाओं में...बगैर प्रतिकार के.

    सीज़नल पक्षी आते हैं न एक ख़ास मौसम में...एक ख़ास वक्त के लिये...उसी तरह वे उड़ते रहे...इधर -उधर, कभी किसी मकबरे के बुर्ज पर...कभी -किसी आधी टूटी दीवार पर. दो- चार दाने चुगकर वे किसी तन्हा शाख पर जा बैठते अगल -बगल...देखते रहते संसार की आवाजाही....

   आख़िर उन सीज़नल पक्षियों का भी वापस जाने का वक्त आ गया....

   'तो ?तुमने अपना फ़ायनल जवाब नहीं सुनाया, कब ?'

   'जब तुम कहो, मैं तुम पर छोड़ती हूँ...'

  वह सोच में पड़ गया. कुछ देर बाद बोला...

  'ऐसा करते हैं, सिर्फ़ तीन महीने और रुक जाते हैं. बेटे की शादी या सगाई जो भी हो, निबटा देते हैं. शादी हो जाये तो और भी अच्छा. पत्नी अकेला महसूस नहीं करेगी. बेटी भी अमेरिका जाने को है. उसकी मुझे ख़ास फ़िक्र नहीं है. वह जब जैसा होगा, मैं समझा दूंगा उसे. मुझे हमेशा लगता है, लड़कों से लड़कियां जयादा समझदार होती हैं. अपने पेरेंट्स को वे ज्यादा अच्छी तरह समझती हैं.'

    हां, वह जानती है. उसकी अपनी बेटी भी तो उसे समझने में एक लम्हे से भी कम वक्त लेती है. वह उससे कह सकती है, पर क्या - कि बेटा, मैं तुम्हारे पापा और भाई को छोड़कर जा रही हूँ, उन्हें समझा देना. ऐसा कभी हुआ है बेटी ने मां की मदद की हो घर से भागने में. उसने दिल्लगी से सोचना चाहा पर उसका ह्रदय भारी हो गया.

   हम आख़िरी वक्त की खुशियों के लिये सब -कुछ दांव पर लगा रहे हैं. नहीं, हम उन्हें बताना चाहते हैं कि जब हमें सचमुच जीने नहीं दिया जाता तो हम अपना -आप तुमसे छीन लेते हैं.

   'पत्नी को क्या कहोगे ?'

  'आय एम गोइंग और क्या ?क्या इससे ज्यादा भी कुछ कहा जा सकता है ?'

  'लग तो नहीं रहे इतने बहादुर ?' वह हंसी.

  'तुमने बना दिया है न, मैं सचमुच था नहीं. सहर, क्या तुम यकीन करोगी, इस दुनिया में सिर्फ़ तुम हो, जिसके लिये मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ. तुम मुझे निराश तो नहीं करोगी न, आख़िरी वक्त पर कोई एक्सक्यूज़...'

  'नहीं शाश्वत....कभी नहीं. ऐसा कभी हुआ है कि तुमने कहा हो और मैं न पहुंची हूँ. बात सिर्फ़ तुम्हारी नहीं मेरी भी है. मरने से पहले मैं शाश्वत,चाहे थोड़े दिन ही सही, अपने लिये जी लेना चाहती हूँ. कैसा होता होगा वह जीना, मुझे सचमुच कुछ पता नहीं है.' उसका गला भर आया.

    उसने उसके आंसू चूमे. भीतर का समंदर अचानक किनारे तोड़ उन्हें अपने साथ बहा ले गया.

    जब से लौटी है वहां से निर्णय लेकर...भीतर एक अजब सी वीरानी, एक अजीब से नयेपन के अहसास से भर उठी है. कुछ महीने और...घर पहले से ज्यादा संभाल देती है. रमन की आलमारी, कागजों से लबालब भरी दराजें, जिन्हें वह रमन के कहने से भी छूती नहीं थी कि इस मुसीबत से तुम्हीं निबटो, ठीक -ठाक कर रही है. उन सम्बन्धों के सारे निशान मिटा रही है ढूंढकर, जो जिस-तिस कोने में छिपाकर रखे थे. रमन की आदत नहीं कुछ भी खोलखाल कर देखने की सो वह निश्चिन्त रहती है. यह आख़िरी बार है, सब ठीक -ठाक कर दे. शाश्वत अपनी चीजें खुद संभालता है, वह जानती है. फिर उसके करने के लिये कुछ भी नहीं रह जायेगा. बहू को कुछ समझाने बैठती है तो समझाती ही चली जाती है. कभी -कभी अकेली ही कार ले लांग ड्राइव पर चली जाती है. होशपूर्वक जी रही जीवन को, जितना बचा है यहाँ, जी ले. बहुत वक्त साथ रहो तो जरूरी गैर जरूरी सब चीजें अपनी लगने लगती हैं......

   'मां...आजकल आप बहुत चुप -चुप रहते हो. दिन भर किसी न किसी काम में लगे रहते हो. सारे घर की सफ़ाई हो गयी. कुछ ढूंढ रहे हो क्या ?'

   'हां....अपना आप.' कहना था, पर कहा...

  'क्या ढूँढूंगी इला, सोचती हूँ, महीने दो महीने के लिये कहीं हो आऊं. बहुत ऊब गयी हूँ इस सबसे.'

      'जब कहो मां, इनको बोलकर आपका रिज़र्वेशन करा देते हैं. आप तो हरिद्वार और ऋषिकेश वगैरह जाना चाहते थे न, अपने बेटे से और पापा से पूछ लीजिये, वे दोनों कैसे रहेंगे आपके बिना ?'वह मुस्कराती रही.

     'सबके बिना सब रह लेते हैं इला. मैं बात करती हूँ आज. जानते हैं, ठान लिया तो रुकूंगी नहीं.'

    'ठीक है मां. ऐसा करो, हरिद्वार का रिज़र्वेशन करा लो, कुछ दिन वहां रहने के बाद आगे चले जाना.'

   हां, आगे ही तो जाना है, उसने सोचा, शाश्वत से बात करके एक तारीख पक्की कर ली. भीतर कुछ मरता जा रहा है धीरे -धीरे....अनाम भय के पंजे जैसे गर्दन मरोड़ रहे हैं. हे ईश्वर ! इस बुढ़ापे में...कितनी फ़जीहत होगी. लोगों और रिश्तेदारों द्वारा कहे जाने वाले संभावित अपशब्द दिन भर उसके कानों में गूंजते रहते. कुछ अच्छा न लगता...भूख भी न लगती ठीक -ठीक, न नींद आती. रात को चौंक -चौंक कर उठती...शाश्वत के पास है या रमन के पास. सोते हुये रमन का चेहरा बहुत देर तक देखती...क्या बुरा किया है इसने मेरे साथ ? इसका कुसूर सिर्फ़ इतना है कि मैंने स्वयं इसे नहीं चुना. बाक़ी रही प्रेम की बात तो तीस साल से ऊपर हो गये....बहुत खूबसूरत लम्हे  भी बिताये हैं हमने एक -दूसरे के साथ तो अगर वह प्रेम नहीं था तो क्या था ?पर अब तो निर्णय की घड़ी आ चुकी...निर्णय तो लेना ही है. वादा कर चुकी है वह शाश्वत से....अब तो सारे असमंजसों के अंत का वक्त आ गया..

       तीसरा दिन....शाश्वत पहुँच चुका है वहां....पुरानी सारी लकीरें मिटाकर ....आसान नहीं था...पर चुना उसने आसान रास्ता.... पत्नी को बतायेगा तो जानता है, उसे दौरा पड़ जायेगा, उसका जाना फिर असंभव. बेटा समझ नहीं पायेगा. वह सिर्फ़ एक हफ्ते के लिये आया है कहकर...किसी अनहोनी की आशंका से उसका ह्रदय काँप रहा है. अगर यह एक हफ्ता ठीक -ठीक गुज़र गया तो वह इसे दूसरे हफ्ते में तब्दील कर देगा, फिर और...फिर और... अपनी मोबाईल तक नहीं लाया जानबूझकर, जैसे भूल गया हो.

    सहर नहीं पहुंची अभी तक. उनके बीच फ़ोन पर यही तय हुआ था. सहर ने बताया था, उसने बेटी को बुला लिया है, उसे सब समझा देगी. जानती है, बेटी उसी का साथ देगी. फिर क्या हुआ? बेटी नहीं आई या कोई बीमार पड़ गया. वह खुद तो कभी बीमार पड़ी नहीं. हमेशा कहती है, इतनी उम्र हो गयी, एक दिन के बुखार के लिये तरस गयी हूँ....कोई फूल लेकर आये, बार -बार पूछे, खूब सारे फ़ोन बजें. बहुत बड़ा सर्कल है उसका पर भीतर एकदम अकेली. खुशनसीब समझता है वह खुद को, जब वह पास होती है.....

  'तुम्हारे पास कितना कुछ है, तुम्हें खुद पता नहीं है...' एक दिन कहा था उसने.

  'अच्छा....जरा विस्तार से बताइये, हमारा भी सुनने को जी चाहता है.' उसने शरारत से कहा था. जब वह गिनाने लगा, वह हंस पड़ी थी....

   'कुछ और भी है शाश्वत, जो कोई भी देख नहीं पाया.'

        क्या करे? वह कुछ सोच नहीं पा रहा. मसूरी में है. घर से इतनी दूर....फिर भी डरता है किसी परिचित के देख लिये जाने से. टूरिस्ट प्लेस है, सभी आते -जाते हैं. उसने भी गलत जगह चुन ली, लगता है. प्रेमियों के लिये इस संसार में कोई जगह सुरक्षित नहीं है.

       तीन बार फ़ोन लगाया. अजनबी आवाज़ सुनता तो फ़ोन रख देता. वह तो घर के सभी लोगों की आवाज़ पहचानता है. लगता है, कुछ अनजाने मेहमान आ गये हैं, तभी. हो सकता है, समधी आ गये हों बड़ोदा से. रहा नहीं गया तो चौथी, पांचवीं, छठवीं बार लगाया. सातवीं बार उसकी बेटी ने उठाया....

   'हलो......' आवाज़ भारी थी पर वह पहचान गया. कह दिया होगा सब -कुछ अब तो सहर ने.

  'हलो बेटा, मैं शाश्वत बोल रहा हूँ.' उसकी बेटी से उसकी गहरी पहचान है, कई बार बातें हो चुकी हैं, मिल चुके हैं. वह उसे अपनी मां के अच्छे दोस्तों में गिनती है.

  'अंकल...' वह फ़ोन पर फफककर रो पड़ी.

  'क्या हो गया ?' वह सकते में आ गया. कहीं रमन को तो कुछ....डायबिटिक है....हार्ट पेशेंट भी. सहर ने कुछ कहा हो और ....हे भगवान ! उसके हाथ कांपने लगे, हार्ट बीट तेज हो गयी. उसे लगा, वह बेहोश होकर गिर पड़ेगा...सब ख़त्म हो गया.

  'अंकल...ममा इज़ नो मोर.' वह बेतहाशा बिलख रही है.

     समूची पृथ्वी एक बार जोर से घूमी और घूमती चली गयी...उसके साथ उस पर जमी सारी चीजें...फिर एकदम से रुक गयी...एक स्टिल तस्वीर...उसकी अपनी देह तक...भीतर कुछ काँप तक नहीं रहा...सब कुछ सख्त बर्फ़ सा ठंडा..

  'कब ?' उसके सुन्न दिमाग से एक शब्द बाहर गिरा.

  'आज तीसरा दिन है. उन्होंने एक हफ्ते पहले मुझे बुलाया था. कह रही थीं, तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है, अपने हरिद्वार जाने से पहले. तू समझ जायेगी फिर सबको समझा देना. मैं आई, उसी दिन उन्हें अटैक आया. चार दिन आई. सी. यू. में रहीं. मैंने बहुत पूछने की कोशिश की, क्या बात है ? पर वे सूनी -सूनी निगाहों से सिर्फ़ मुझे देखती रहीं. आख़िरी दिन...शायद उन्हें पूर्वाभास हो गया था. जाने कहाँ से एक छोटे से घर का फ़ोटोग्राफ़ निकालकर मुझे दिया....मेरा चेहरा अपनी छाती से लगा लिया...' और जोर से रो पड़ी वह.....

   'फिर मेरे कानों में बोलीं....शाश्वत से कहना, फिर मिलेंगे. उसके बाद उन्होंने आँखें नहीं खोलीं.'

   वह हिचकियाँ भर -भर कर रो रही है.

    गर्मियों के दिन हैं....अचानक मसूरी में हिमपात होने लगा है...समूची वादियाँ....जंगल...घर...पशु -पक्षी गुम होने लगे हैं बर्फ़ में....सीज़नल पक्षियों के जोड़े में एक अकेला बैठा है तन्हा शाख पर....अब कोई नहीं आयेगा. बर्फ़ लगातार गिर रही है...कहाँ जाना है अब उड़कर.....

  'आप कहाँ से बोल रहे हैं अंकल ?'

 'मसूरी से.......'

'अंकल, जो मैं सोच रही हूँ, सच है न ?' उसने अपनी हिचकियों के बीच की ख़ाली जगह में एक लम्बी सांस भरते हुये कहा.

  वह कुछ नहीं कह सका. बर्फ़ इतनी तेजी से गिर रही थी कि पहले उसके शब्दों को फिर उसके हाथ में थमे रिसीवर को भी अपनी लपेट में ले लिया. शाख पर बर्फ़ का एक सफ़ेद फूल खिला था.

                                                        जया जादवानी / रायपुर

 

रायपुर, छत्तीसगढ़ की श्रीमति जया जादवानी  को जीवन के रहस्यों और दुर्लभ पुस्तकों के अध्ययन, यायावरी, और दर्शन और मनोविज्ञान में विशेष रूचि है. हिंदी और मनोविज्ञान में इन्होंने ऐम.ए. किया है. इनकी 3 कविता संग्रह, अनेकों कहानी संग्रह, यात्रा वृतांत, 3 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. अनेक रचनाएँ अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, उड़िया, सिन्धी, मराठी, बंगाली भाषाओँ में अनुवाद हो चुकी हैं, स्कूल के पाठ्यक्रम का भाग हैं और अन्दर के पानियों में कोई सपना कांपता है  पर इंडियन क्लासिकल के अंतर्गत एक टेलीफिल्म बन चुकी है. इनकी कहानियों को कई बार सम्मानित किया गया है. इन्हे मुक्तिबोध सम्मान भी प्राप्त हुआ है.

सम्पर्क के लिये ई-मेल : jaya.jadwani@yahoo.com

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