गद्दार

शरद भार्गव ने भीतर की दुनिया अचानक जगमगा उठी. इंतज़ार का एक असमंजस जो वह पिछले चार दिनों से झेल रहा था वह एक खुशनुमा हलचल में बदल गया. उसके हाथ में अभी अभी कुरियर से आया एक लिफाफा था, जिसने उसे यकायक जयपुर से उधमपुर पहुंचा दिया था...

लिफ़ाफ़े में ‘बनिहाल क्लब’ का पत्र था, यानी वहां उसे बतौर विशेष अतिथि बुला लिया गया है. शरद भार्गव एक बैंक में अफसर है और टेनिस का राज्य स्तर का खिलाड़ी तो है ही. पिछले तीन साल से वह लगातार इस टूर्नामेंट में जा कर खेलता आया है और हर बार चैम्पियन बन कर लौटा है.

लेकिन भार्गव के कुल आनंद की वजह यह टूर्नामेंट नहीं है. असली बात तो कौल साहब का सदाबहार न्योता है जो उसे तीन साल पहले मिला था. कौल साहब भी किसी जमाने में भार्गव के साथ बैंक में उसके मैनेजर थे और खिलाड़ियों पर उनकी ख़ास मेहरबान नजर रहती थी. जब पहली बार शरद भार्गव के पास इस टूर्नामेंट का न्योता आया था तब कौल साहब बैंक में ही थे, और वह उनके रिटायरमेंट का साल था. टूर्नामेंट जनवरी में होने थे और कौल साहब को इकत्तीस मार्च तक बैंक का चार्ज सम्हाले रहना था. जब कौल साहब को भार्गव के इस टूर्नामेंट का पता चला तो वह ख़ुशी से उछल पड़े,

मजा आ गया यार शरद, श्रीनगर में मेरा एक बड़ा मकान बंद पड़ा है. मेरे दोनों बेटे अमेरिका निकल गये हैं और रिटायर हो कर मुझे भी उनके ही पास जाना है. चलो, मैं भी तुम्हारे साथ उधमपुर चलता हूँ, तुम्हारे मैच के बाद हम श्रीनगर निकल चलेंगे. पूरी सुविधा से लैस है घर. श्रीनगर देखने का असली मज़ा तो सर्दियों में है दोस्त, कभी पहाड़ों बरफबारी का मजा लिया है तुमने...?

भार्गव क्या कहता...श्रीनगर उसके लिए सपना था. एकाध बार पत्नी और बेटे की गर्मियों की छुट्टी में किसी हिल स्टेशन गया भी तो उस मौसम में बर्फ़बारी कहाँ मिलती...

कौल साहब समझ गए... चलो अब सही, और फिर देखना तुम हर साल आओगे, वह भी सर्दियों में. मेरा वह मकान हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करेगा. सारी दुनिया कश्मीर को ज़न्नत कहती है और हम कश्मीरियों के लिए घर ही ज़न्नत है.

वक्त आया. शरद भार्गव ने उधमपुर में कप उठाया और कौल साहब के साथ श्रीनगर पहुँच गया. रावलपोरा सनत नगर में घर था. अशोक किचलू वहां घर की चाभी लेकर हाजिर थे. कौल साहब और अशोक किचलू के बीच जो गर्मजोशी का आलम बना उससे शरद की ठंड भाग गयी. घर सचमुच बहुत बड़ा और शानदार था. सामने हाई वे था जो बाईं ओर एयरपोर्ट की तरफ जाता था. घर के पीछे खेत थे और सामने पहाड़ों पर बर्फ की चांदी छाई हुई थी.

सुबह देखना शरद,  उगते सूरज की धूप इन पहाड़ों पर पड़ेगी तो नज़ारा सुनहरा रुपहला हो जाएगा....

कौल साहब की बात सच थी. सुबह का नज़ारा सचमुच बेहद हसीन था. तभी शरद ने गौर किया कि मकान की हद में भरपूर बगीचा था. सेब के दो घने पेड़ थे, एक पेड़ चेरी का था. मकान के चारों ओर बाउंड्री बनाती एक दीवार थी जो इंसान के कद से करीब दो हाथ ऊंची थी. आस पास के पेड़ उस दीवार की उंचाई को बौना करने के लिए काफी थे.

कौल साहब के पास ठहरने को केवल चार दिन थे. उन्हें अमेरिका जाने के पहले यहाँ के कुछ छोटे मोटे काम निपटाने थे. शरद को घुमाने का काम उन्होंने अशोक किचलू को सौंपा लेकिन इस बीच वह शरद को बहुत सी सुविधाओं का रास्ता दिखा गए. दूध वाला अरमान, खानसामा अब्दुल जो खुशमिजाज़ अर्दली भी बना. अशोक किचलू का परिवार तो एकदम पास में था. जनवरी उसके लिए भी फुर्सत का समय होता था और उसके बेटे के लिए भी. उसका बेटा शिवालिक एक टूरिस्ट ट्रांसपोर्ट में काम करता था. वह एक गाइड भी था और अच्छा ड्राइवर भी. शरद को और चाहिए क्या था.

अब्दुल तो खैर आते ही रसोई में पहुँच जाता था. शरद की दोस्ती होती दूधवाले अरमान से.. वह एक बहुत बातूनी बूढ़ा आदमी था. उसके पास अपने घर के, बदलते जमाने के, और ‘आपके हिन्दुस्तान’ के बहुत से किस्से थे. जब तक अब्दुल नाश्ता लगा कर आवाज़ न देता या अशोक किचलू का बेटा शिवालिक अपनी गाड़ी लगा कर हॉर्न न बजाता अरमान की किस्सागोई चालू रहती. सुनने में शरद की दिलचस्पी भी कम नहीं थी. वह अकेला आया था, लेकिन हर रोज़ वह मन ही मन खुद से वादा करता था कि वह अब हर साल आया करेगा, वह भी अकेले नहीं बल्कि पत्नी शालिनी और बेटे कार्तिक को साथ ले कर.

शरद के पास दस दिन की छुट्टी थी. दो दिन टूर्नामेंट ने खा लिये और बाकी समय यहाँ श्रीनगर में देखते देखते फुर्र होगया. खैर, वक्त तो तेज़ी से भागने वाला हिरन है तो अगले साल फिर आया टूर्नामेंट. कौल साहब अमेरिका जा चुके थे, लेकिन अशोक किचलू तो बाहें फैलाए शरद भार्गव का इंतज़ार कर रहा था. ख़ास ख़ुशी तो उसकी पत्नी रत्ना को थी कि इस बार शरद भाई साहब परिवार के साथ आयेंगे.

यह प्रोग्राम भी परवान चढ़ा. इसे करेले के नीम चढ़ने जैसा भी कहें तो गलत नहीं होगा. यानी कि अरमान की बतकही में शालिनी को बहुत रस आने लगा. ऐसे में अरमान ने अपनी  घरेलू बातें भी हिस्सा बाँट कीं... बेटी की शादी करनी है, बेटे की संगत का पता नहीं क्या रुख है... कश्मीर में टूरिस्ट का आना कम हो रहा है. वगैरह वगैरह...

इसके बावजूद बातों के मुकाबले घुमक्कड़ी का पलड़ा ज्यादा भारी था. सबकी छुट्टियाँ गिनी चुनी थीं, सो अब्दुल का संग-साथ भी सबको भाया. शरद के चलने वाले दिन अरमान ने, अब्दुल ने, शिवालिक ने, अशोक किचलू ने और सबसे ज्यादा अशोक किचलू की पत्नी रत्ना ने वादा कराया कि अगली जनवरी फिर सब लोग आयें. अभी कश्मीर का बहुत सा जलवा अछूता रह गया है, अभी तो बस मुट्ठी भर देखा है. सबने तहे दिल से हामी भरी, जो सच साबित हुई.

अगले साल फिर ठीक तयशुदा तारीख पर शरद सपरिवार कश्मीर पहुंचा. सुबह की दस्तक अरमान ने दी. उसे किचलू के घर से पता चल गया था कि कौल साहब के घर के मेहमान आ गए हैं. दस्तक पहचान कर शालिनी ही बाहर आई और उसने देखा की अरमान से साथ एक पंद्रह सोलह बरस का एक लड़का था. अरमान की ही तरह एक फिरन से ढका हुआ. सिर पर टोपा और हाथ में दूध का केन. पता तो चल रहा था लेकिन अरमान ने बताया की यह उसका बेटा है राशिद... कहते कहते अरमान के चेहरे पर एक अँधेरा सा उतरा जिसे शालिनी ने पढ़ लिया. उसे याद आ गया कि अरमान ने पिछले साल कहा था की उसकी संगत का कुछ पता नहीं चल रहा है, फिर भी शालिनी चुप रही.

सलाम करो राशिद... मेहमान हैं.. अरमान ने धीरे से कहा,

हिंदुस्तान से आये हैं ..? राशिद ने बाप की हिदायत को परे करते हुए सवाल किया. सवाल का जवाब किसी ने नहीं दिया.

घुमक्कड़ी शुरू हो गयी. इस बार कुछ दूर दराज़ के कश्मीर का दौर चला जो बर्फ़बारी के बावजूद नहीं रुका. पहली दस्तक हमेशा अरमान की होती. लगभग हमेशा उसका बेटा राशिद साथ होता. सलाम का सवाल बेमानी हो चुका था. राशिद अक्सर शालिनी या कार्तिक से पूछता कि आज कहाँ निकलना है..? कोई कुछ जवाब नहीं देता. उन्हें रत्ना की सख्त हिदायत थी कि अरमान या राशिद को, सब कहाँ जा रहे हैं, यह बताने की कोई ज़रूरत नहीं है. यही बात शिवालिक ने भी इन सब से कही थी.

वक्त कम था और कश्मीर तो समूचा एक सैरगाह था... छुट्टियाँ खत्म हुईं. बहुत कुछ बचा रह गया. सबने कहा कि सचमुच सर्दियों का कश्मीर बेहद सुन्दर है. गर्मियों का शिमला और नैनीताल यह परिवार देख चुका  था जो उन्हें यहाँ के आगे फीका लगने लगा था. खैर, वादों का सिलसला फिर दोहराया गया. फिर सबने पूरी श्रद्धा से सहमति ज़ाहिर की और पाया की अगली जनवरी अभी दूर है.                       

जनवरी के पहले नवम्बर आया. कार्तिक ने अपने फाइनल इम्तेहान की दुहाई दी. इस साल बोर्ड का इम्तेहान होना था. शालिनी के आगे भी कुछ ‘किन्तु परन्तु’ धरे थे.. बेटा घर पर रहे और वह भी पढ़ाई के लिए, तो भला शालिनी का जाना कैसे होता...? वैसे भी अखबार और रेडियो टी वी की कश्मीर को लेकर ख़बरें योजना की खिलाफत कर रही थीं. इधर शरद के सामने एक दूसरा सवाल था. वह उस टूर्नामेंट में तीन बार चैम्पियन बन चुका था और यह क्लब तीन साल लगातार बने चैम्पियन को अगले साल खेलने का मौका नहीं देते थे, किसी और बहाने बुला लें तो बात दूसरी है. ऐसे में कुल जमा नतीजा यही बना कि शरद क्लब का विशिष्ट अतिथि  बनेगा और एक आखिरी बार कश्मीर भी घूमेगा.

शरद कश्मीर आया. अकेला. अशोक किचलू के परिवार के सवालों का सामना उसने किया और उन्हें समझाया. अगले दिन सुबह उसका सामना अरमान से हुआ. दुआ सलाम, और कुछ दूसरी गपशप के बाद अरमान ने बेहद मायूसी से, नम आँखें लिए बताया की करीब दस महीने हुए राशिद घर से फरार है.... शायद सरहद पार चला गया है.... कोई कहता है की वह ज़ेहादी हो गया है. कंधे पर बंदूक उठाये, बंदूक के साये में जी रहा है. क्या पता सच क्या है ?

शरद सुन कर चुप रह गया. उसे पिछले साल ही कुछ अंदाजा अशोक किचलू, रत्ना और शिवालिक की बातों से हो गया था. खैर, इस बार अकेले आ कर वह कई ऐसी जगहों पर जाना चाहता था जहाँ सैलानियों की दिलचस्पी नहीं होती. वह शाल और रेशमी साड़ियों का बाज़ार टटोलना चाहता था. जयपुर में शालिनी अपना बुटीक चलाती थी और वहां इस सामान से अच्छे  फायदे का चांस था.. बर्फबारी, झीलें और झरने आबशार वह बहुत देख चुका था.

उसका अभियान शुरू हुआ. इन तीन बरसों में शरद को आस पास के लोग पहचानने लगे थे और उनमें पंडित भी थे और गैर पंडित भी. उसे सबसे गर्मजोशी भरा व्यवहार मिलता था, हालांकि जनवरी में बहुत से परिवार श्रीनगर से उतर कर नीचे जम्मू शम्मू चले गए थे, खासतौर पर नौकरी पेशा लोग. सरकारी दरबार तो जम्मू चला ही गया था.

उस शाम शरद बारामूला जा कर लौटा था. दोपहर से ही बर्फ़बारी जारी थी. शिवालिक ने शरद को घर पहुंचा कर कहा था,

अब आज घर से निकल कर कहीं मत जाइएगा. हालात अच्छे नहीं है.

हालत का जायजा शरद भार्गव ले ही रहा था, अखबार और टी वी के जरिये नहीं बल्कि इधर उधर हो रही गोलीबारी की आवाजों से.. बम धमाकों की आवाज़ भी उस तक पहुँचती थी, अक्सर रात को, जब वह बुखारी की गर्माहट में खुद तो सुरक्षित महसूस करता हुआ आज के बीते हुए दिन के बारे में सोच रहा होता था. वह एक खिलाड़ी था और डर को जगह देना उसके अनुभव में नहीं था.

ऐसे में अचानक शरद भार्गव ने गोलीबारी की तेज़ आवाज़ सुनी और उसे ऐसा लगा कि यह मुठभेड़  उसके घर के कहीं नजदीक ही हो रही है. वह घबराया ज़रूर लेकिन डरा नहीं. उसने यह अक्लमंदी बरती कि वह कमरे से निकल कर बाहर नहीं आया. उस समय रात का करीब साढ़े दस बज रहा था, जो कश्मीर के इस मौसम में आधी रात के बराबर था, लेकिन शरद अभी कार्तिक और शालिनी से मोबाईल पर बात कर के चुका था सो वह तुरंत सो जाने के मूड में नहीं था. दूसरे इस गोलीबारी ने भी उसकी उत्सुकता जगा दी थी.

गोलीबारी के करीब आधे घंटे बाद  भार्गव ने अपने मकान के आसपास कुछ धम्म से गिरने की आवाज़ सुनी और उसे लगा की यह आवाज़ उनकी बाउंड्री के भीतर से ही आई है. आवाज़ सुन कर भार्गव सचेत तो हुआ लेकिन वह तय नहीं कर पाया की वह बाहर देखे या नहीं. फिर गौर से सुनने पर उसे कुछ और आहट सुनाई देने लगी जो बगीचे में लगे पेड़ों की तरफ से आती हुई लग रही थी. कुछ ठहर कर भार्गव ने खिड़की का पर्दा खिसका कर उस ओर देखने की कोशिश की जिधर से आवाज़ आई थी. थोड़ी ही देर बाद उसे कुछ सूझना शुरू हुआ और तब उसे समझ में आया की कोई आदमी जैसे पेड़ पर से नीचे गिर पड़ा है और वह आदमी उठने और सरक पाने की कोशिश में भी नाकाम हो रहा है. भार्गव कुछ देर ठिठक कर देखता रहा. वह आदमी घायल था और काफी चोट खा गया था. कुछ देर के बाद भार्गव ने अपनी टॉर्च उठाई, और अपना गाउन लपेट कर बाहर चल दिया. उसका खिलाड़ी उसे बाहर ठेलने लगा था. बाहर बरामदे में आ कर वह उस आदमी से बस दो सीढियां दूर था, जिन्हें पार करते ही भार्गव सीधे उस आदमी के पास पहुँच गया. भार्गव ने उसे बांह से पकड़ कर उठाने की कोशिश की, कुछ जोर उस आदमी ने भी लगाया और कैसे भी शरद भार्गव उस आदमी को अपने घर के भीतर कमरे में लाने में कामयाब हो गया.

कमरे में लगा बल्ब वोल्टेज कम होने के कारण मरियल सी रौशनी दे रहा था, जो फिर भी अँधेरे से बेहतर थी. अब भार्गव ने देखा कि गिरते समय उस आदमी का सिर दीवार से टकराया था और वहां से खून बह रहा था. दूसरे, उसके पैर और कंधा भी शायद मोच खा गए थे, या हो सकता है कि वहां हड्डी की टूट-फूट हुई हो. भार्गव उस आदमी की हालत परख ही रहा था की उसकी नजर उसके चेहरे पर गयी, और वह चौंक उठा.

वह आदमी राशिद था, अरमान दूध वाले का बेटा, जिसके ज़ेहादी हो जाने की खबर हवा में भी थी और उसके बाप के पास भी. पल भर ठिठका भार्गव फिर उसने अपना रास्ता तय कर लिया. उसके टेनिस बैग में प्राथमिक चिकित्सा का काफी सामान था. उसने सोचा कि उससे राहत की कुछ कोशिश की जाय. दूसरे कमरे से अपना बैग उठा कर भार्गव फिर वापस आया और उसने राशिद को खींच कर बुखारी के पास ला दिया. बाहर से ला कर भार्गव ने उसे फर्श पर छोड़ा था जिस पर एक मामूली सा कालीन बिछा हुआ था. पहले उसने एक स्प्रे निकाला जिसे वह उसकी सिर की चोट पर छिडकना चाहता था. उसके पहले उसने उस घाव को साफ़ करना था. हवा में खुश्की से बचने के लिए कश्मीर में बुखारी के ऊपर एक बड़े कटोरे में पानी रखा जाता है जिसकी वाष्प धीरे धीरे हवा में जाती रहती है. भार्गव ने रुई का एक बड़ा टुकड़ा उस कटोरे में डुबाया और फूंक मारते हुए उस घाव को पोछने लगा. भार्गव ने मन ही मन तय कर लिया था की वह अपनी कार्यवाही के दौरान राशिद से कोई बात नहीं करेगा और न ही पहचान जाहिर करेगा. राशिद भी खामोश ही था. सिर पर स्प्रे छिड़कने के दौरान भार्गव की कुहनी दो बार राशिद के कंधे से टकराई और दोनों ही बार राशिद दर्द से छटपटा उठा. इससे भार्गव को पता लग गया कि सिर के बाद कंधे की चोट का जायजा लेना होगा. कंधे तक पहुँचने के लिए भार्गव ने राशिद के बदन पर टंगे फिरन को हटाया और वहां उसे छुपाई हुई छोटी राइफल जैसी बंदूक नज़र आ गयी. भार्गव ने सावधानी से वह बंदूक वहां से खींची और उछाल कर अपने बिस्तर पर फेंक दी.रशीद  चुपचाप देखता रहा. उसके कंधे पर कोई खुला घाव नहीं था लेकिन वहां सूजन आनी शुरू हो गयी थी. भार्गव के बैग में एक स्प्रे केन और था जिसे हिला कर उसने उसके कंधे पर उस केन से फुहार छोड़ दी. भार्गव को मालूम था कि इस फुहार से राशिद को दर्द से आराम तो आएगा लेकिन यह इलाज नहीं है. इलाज का मामला तो कल सुबह देखा जाएगा.  फिर उसने राशिद के बूट खोलने शुरू किये दोनों पैरों में सूजन आने से पैर बूट में जकड गए थे जिसे भार्गव ने धीरे धीरे बहुत जतन से उतारे. वहां भी उसी केन से भार्गव ने स्प्रे किया, भीतर जा कर वह एक गिलास में गर्म पानी लाया और पानी के साथ निगल जाने के लिए उसने राशिद को एक टैबलेट दी. राशिद ने वह टैबलेट चुपचाप निगल ली और भार्गव आश्वस्त हो गया कि अब दस पंद्रह मिनट में राशिद गहरी नींद में चला जाएगा.

दस मिनट तक भार्गव वहीँ बैठा राशिद पर नजर टिकाये रहा. जब उसे विश्वास हो गया कि राशिद अब लगभग अचेत है, वह उठा, उसने अपने बिस्तर पर पड़ी बंदूक उठाई और उसे अन्दर लॉकर में रख आया. फिर उसने कबर्ड खोल कर एक कम्बल निकाला और वह फर्श पर पड़े राशिद को उढ़ाने चल पड़ा. अचानक उसे पता नहीं क्या सूझा कि उसने राशिद की तमाम जेबें तलाश डालीं. उसे वहां दो डायरियां मिली, कुछ फुटकर कागज़ भी थे, डायरियां उर्दू में लिखी हुई थीं जिन्हें पढ़ पाना भार्गव के लिए नामुमकिन था, लेकिन उसने यह ज़रूर देखा कि एक दो जगह उनमे नक्शे बने हुए थे, और चाँद तारे का निशान बना था. भार्गव को कोई हैरत नहीं हुई. पहले उसका दिल किया कि वह सारे कागज़ और डायरियां बुखारी के हवाले कर दे, पर कुछ सोच कर वह रुक गया. उसने वह सब भी भीतर जा कर कहीं रख दिया और फिर आकर बिस्तर के हवाले हो गया. रात भर उसे नींद नहीं आई. वह बेहोश पड़े राशिद को देखता रहा, पता नहीं क्या क्या सोचता रहा, सुबह होते ही अब्दुल हाज़िर हो जाएगा, उससे कुछ भी छिपा पाना नामुमकिन होगा. साथ ही उसके दिल में राशिद की मासूमियत हलचल मचाने लगी थी. नीम अँधेरे में उसे आज राशिद का चेहरा ढंग से नजर नहीं आया था, लेकिन हलचल मचाने के लिए उसका साल भर पहले देखा हुआ चेहरा काफी था....और अरमान का चेहरा भी तो भार्गव के चित्त में दर्ज हो चुका था.

रात को कई बार उसने अपनी दीवार के उस पार किसी के आने जाने की सरसराहट सुनी. पता नहीं कौन था. फौजी, या ज़ेहादी, या कोई जानवर या सिर्फ उसका वहम... कुछ भी हो सकता था.

भोर के पहले उसने तय किया कि अब्दुल को तो विश्वास में लेना ही होगा. वह शायद राशिद के ठीक होने और भगा देने की उसकी योजना में उसका साथ भी दे... बस, अशोक किचलू और उसके परिवार को कुछ पता लगना मुश्किल खड़ी कर सकता है. मुश्किल तो वैसे भी थी ही, क्योंकि इस सब में कम से कम तीन दिन लगने थे.

सुबह अब्दुल अपने समय से आया. भार्गव का अंदाजा था कि वह गोली जो उसने राशिद को खिलाई थी वह बारह घंटे अपना पूरा असर दिखाएगी. अब्दुल के आते ही भार्गव के उससे मिनट भर की बात फुसफुसा कर की और फिर उसकी मदद से राशिद को उठाकर पीछे के कमरे में पहुंचा दिया. इस दौरान एक अजीब सी बात हुई. अब्दुल ने धीरे से कहा,

साहब, इसके बाप को कुछ मत बताना. न अभी, न इसके चले जाने के बाद.

भार्गव हैरत में आ गया. वह तो खुद भी यही चाहता था लेकिन इसके लिए उसके कारण फर्क थे, यही कि आसपास इसकी खबर न फैले. लेकिन अब्दुल के पास इस बात की क्या वजह है..?

क्यों..? भार्गव ने सवाल किया, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला, लेकिन अब्दुल के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, जिसे भार्गव ने पकड़ा तो ज़रूर लेकिन उसे पढ़ कर समझ नहीं पाया.

खेल में ऐसी चोटों का भार्गव को खूब अनुभव था. दोपहर तक उसे पता चल गया कि हड्डी की टूट का कोई चांस नहीं है. बिना कहे, अब्दुल ने राशिद के लिए भी खाने पीने की व्यवस्था की. अब्दुल को देख कर राशिद के चेहरे पर एक भरोसे का भाव आया. भार्गव ने गौर किया कि इस बीच  राशिद और अब्दुल के बीच कुछ फुसफुसाहट भरी बात कश्मीरी भाषा में हुई. भार्गव को कई बार महसूस हुआ की उन दोनों के बीच संकेतों में भी कुछ कुछ चल जा रहा है. घबराहट के बावजूद भार्गव उसे अनदेखा करता रहा. इस बीच उसने योजना यह बनाई कि वह राशिद के जाने तक घर छोड़ कर बाहर नहीं जाएगा. कुछ दवाएं उसने अब्दुल को भेज कर मंगवा लीं. उसने शिवालिक को मना कर दिया कि वह एक दो दिन आराम करेगा और फिर कहीं जाने की सोचेगा. अशोक और रत्ना उससे मिलने आये और यह समझ कर चले गए कि घूमने फिरने की थकान मिटाने के लिए थोडा आराम भी जरूरी है. इस बीच राशिद पीछे के कमरे में पड़ा रहा. उसके कंधे की और पैरों की सूजन कम होने लगी. सिर की चोट भी ज्यादा गंभीर नहीं थी.

अंदाज़े के मुताबिक़ तीसरे दिन राशिद निकल भागने की हालत में था. यह बात भार्गव तक अब्दुल के मार्फ़त पहुंची. तय हुआ कि रात के अँधेरे में किसी भी समय वह निकल भागेगा. इस योजना में भार्गव की भी राजी थी और अब्दुल की भी. इन तीन दिनों में, भार्गव का राशिद से कोई ख़ास आमना सामना या संवाद नहीं हुआ था. सारी जिम्मेदारी अब्दुल ने सम्हाल ली थी और भार्गव केवल मशविरा दे रहा था.

जाने वाले दिन शाम को भार्गव तक अब्दुल के मार्फ़त यह खबर आई कि राशिद बुला रहा है. भार्गव गया. राशिद का चेहरा करीब करीब सामान्य हो गया था.

भार्गव को इस बात का अंदाजा था कि जाने के पहले राशिद कुछ न कुछ बातचीत करेगा ज़रूर, चाहे उस तीमारदारी के बारे में जो उसने इन तीन दिनों में राशिद के साथ निभाई, चाहे अपने ज़ेहादी हो जाने के बारे में, या न कुछ तो अपने बाप के बारे में. भार्गव थोड़ी देर बाद राशिद के पास पहुँच गया. अब्दुल वहां ही बैठा था. भार्गव के पहुँचने पर राशिद का चेहरा सख्त बना रहा और उस पर  सलाम या शुक्रिया जैसा कोई भाव नहीं उभरा.

कहो.. भार्गव ने बात, बिना राशिद का नाम लिए शुरू की.

साहब, मेरा असलाह, मेरी डायरियां और कागज़ात दे देना...

राशिद की इस मांग में गुज़ारिश जैसा कोई लह्ज़ा नहीं था. भार्गव के इस बात को मान लिया. जब वह अपने घर में राशिद का घायल हो कर तीन दिन रहना सबसे छुपाना ही चाहता था तो उन कागजों से उसे क्या लेना देना होता.

मैं रात को दस बजे के आसपास निकलूँगा. कोई लेने आएगा मुझे, उन्हें खबर हो गयी है.

शरद भार्गव ने फिर सिर हिला दिया.

... तब तक अब्दुल अपने घर नहीं लौटेगा. अपने साथियों तक मैं अब्दुल के साथ ही जाना चाहूँगा, अकेले नहीं.

यह भी शरद भार्गव को मंज़ूर हो गया.

 और कुछ...? शरद ने इतनी देर बाद मुंह खोला.

 नहीं...

शरद उठ कर चल दिया. उस समय शाम के करीब साढ़े आठ का समय था और अभी उसे तनाव का डेढ़ घंटा और झेलना था. अब्दुल, बिना मांगे शरद के लिए कॉफ़ी बनाने रसोई की और बढ़ गया. इतना समझदार तो वह था ही... और राशिद बैठा कुछ गहराई से सोचने लगा. उसके चेहरे पर अपनी जगह से उसकी गैरहाजिरी का भाव सघन हो आया था.

करीब पौने दस बजे राशिद ने अब्दुल को पुकारा. अब्दुल शरद के पास जा कर खड़ा हो गया. शरद उठा और भीतर जा कर राशिद की बंदूक और उसके कागज़ उठा लाया और वह सब उसने अब्दुल को थमा दिया. शरद का तनाव अब घटने लगा था... बस अंतिम तीस मिनट, फिर मुक्ति..     

अब्दुल वह सब ले कर राशिद के पास पहुंचा और उसकी अमानत उसे थमा दी.

बाहर जा कर देखो, जब आ जायं तो मुझे मोबाइल पर इत्तिला देना.

अब्दुल बाहर चला गया. शरद अब भी अपने कमरे में अकेला बैठा था. चुपचाप.

राशिद के मोबाईल पर एक छोटी सी ‘टिन्न’ बज कर चुप हो गयी. राशिद खामोशी से उठा और अपना सारा सामन समेट कर चल पड़ा. उसका बाहर जाने का रास्ता उसी कमरे से हो कर था जहाँ शरद बैठा था. वह शरद के सामने से गुज़रता हुआ निकला लेकिन उसने न तो शरद की और देखा और न ही उससे कुछ कहा. निर्द्वंद चलते हुए, उसने मुख्य दरवाज़े का पर्दा खिसकाया और बाहर हो गया.

शरद ने चैन की सांस ली. उसने पिछले तीन दिन से शालिनी या कार्तिक से कोई बात नहीं की थी... इतना ही नहीं, उसने दो बार उनकी आती हुई कॉल को काट दिया था और फिर एस एम् एस किया था कि ‘डिस्टर्ब मत करो’. अब वह उठा और उसने सामने शेल्फ पर पड़ा अपना मोबाइल उठा लिया कि वह घर बात कर ले.

मोबाइल उसके हाथ में आया ही था कि अचानक एक गोली चलने की आवाज़ आई और एक बुलेट आ कर, शरद से कुछ दूर सामने दीवार में धंस गई. शरद हडबडा उठा, कि तभी उसका मोबाईल बजा,

 मैं राशिद बोल रहा हूँ..

शरद समझ गया था... वह सकते में था और उसने कोई जवाब नहीं दिया.

ये मेरा निशाना चूका नहीं है. मेरे साथी जानते हैं की मैं एक पक्का निशानेबाज़ हूँ... मैं आपसे कुछ बात करूँगा.

शरद ने फिर कोई जवाब नहीं दिया.

मैं कश्मीर में पैदा हुआ. वक्त-बेवक्त सुनता रहा कि मैं हिन्दुस्तानी हूँ. हिंदुस्तान क्या होता है यह मुझे कुछ बड़ा होने पर पता लगने लगा.. यह इल्म मेरे लिए ज़ेहादी बनने की बुनियाद था. कश्मीर मेरा था, मेरा है और मेरा रहेगा. हिन्दुतान मेरा नहीं है.. कश्मीर हिन्दुस्तान का नहीं है, न ही कश्मीरी हिन्दुस्तानी है. बतौर ज़ेहादी, यही मेरा सच है और मैं इन बातों को अपने खून में उतार चुका हूँ. जब भी मैंने यह जुमले बोले हैं वह अपने दिल से बोले हैं... हम दिल की आवाज़ से इस रास्ते पर उतरे हैं और इस दौर में न मौत से डरते हैं न बदनामी से... सुन रहे हैं आप ?

हूँ..

 और आप ? एक हिन्दुस्तानी, जो पूरे जोरशोर से एक ज़ेहादी को अपने मुल्क का दुश्मन मानता है, महज़ झंझट से बचने के लिए, सिर्फ इसलिए कि इस साल के बाद आपको ये टेनिस वाले नहीं बुलाएंगे, और इसलिए फिर आप कश्मीर नहीं आयेंगे, आप एक ज़ेहादी के साथ, इंसानियत के लबादे में छिप कर, बेहद कायराना ढंग से लुकाछिपी का खेल खेलते हुए पेश आते हैं. कागज़ी हिन्दुस्तानियों की तरह ज़ेहादी को ललकार कर आप दुश्मन नहीं कहते बल्कि आप रास्ता बनाते हैं कि वह चुपचाप वहां से फरार हो जाय जहाँ आप ठहरे हुए हैं, वह घर एक काफिर हिन्दुस्तानी का है, क्यों है यह उसका घर ? वह हिन्दुस्तान में जा कर पैसा कमाएगा और अपनी सहूलियत के लिए अमेरिका में जा बसेगा, तब भी यह घर उसका है... क्यों भला?

सुनिए मिस्टर भार्गव.... आप एक गद्दार हैं. कागज़ी हिन्दुस्तानी. अपने जयपुर में बैठ कर ज़ेहादी के लिए नफरत ज़ाहिर करेंगे...अपने हिन्दुस्तानी होने के नारे लगाएंगे, लेकिन जब ज़ेहादी से सामना होगा तो अपना ज़ाती नफा नुक्सान सोच कर कदम उठाएंगे, और अगर ज़रूरत हुई तो पलट जाएंगे. मैं, एक ज़ेहादी, एक दुनियादार, हिन्दुस्तान के नकली हिमायती इंसान से नफरत करता हूँ तो उसका दामन छोड़ देता हूँ, फिर चाहे वह मेरा बाप ही क्यों न हो..यही जज्बा हमें ख़ुदकुशी से भी नहीं डराता. आप को देख कर मुझे शर्म आती है. अब्दुल से मुझे पता चला कि आपके पास एक बाकायदा कारतूसों से लैस पिस्टल भी है... आप खिलाड़ी हैं तो हिम्मती भी होंगे ही, लेकिन आपकी हिम्मत का ज़र्रा भर भी हिस्सा आपके अपने मुल्क के नाम नहीं है. आपकी इंसानियत एक नौटंकी है, अपने मुल्क के लिए आपका जज़्बात महज़ मुलम्मा हैं... आप एक गद्दार हैं और जेहाद की किताब में गद्दार के लिए सिर्फ एक सजा है... मौत की सजा..

राशिद की बात खत्म होते ही उसकी बंदूक से एक गोली छूटी, और इस बार फिर उसका निशाना अचूक रहा.

निशाने पर शरद भार्गव था.       

   अशोक गुप्ता- परिचय

 

अशोक गुप्ता. जन्म 29 जनवरी 1947 देहरादून. इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट की पढ़ाई और नौकरी की लम्बी पारी खेल कर अब सेवा निवृत्त.

पांच कहानी संग्रह. दो उपन्यास के अतिरिक्त करीब आठ सन्दर्भ पुस्तकें तथा अनूदित कार्य.

करीब सौ कहानिया प्रकाशित और लेखन जारी. पहले  उपन्यास को हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा कृति सम्मान प्राप्त.

अभी हाल में कथादेश-सर्नुनोज़ की रहस्य-कल्पना कहानी प्रतियोगिता में कहानी पुरस्कृत. कथादेश के अगस्त'16 अंक में प्रकाश्य.

संपर्क : ashok267@gmail.com  

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