... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

दीवार हिल गई

 

घंटी फिर बजी. सोचा उठकर दरवाज़ा खोलूँ, पर शरीर की दुर्बलता आड़े आई. उठने की असफल कोशिश की, फिर लेट गई. तीन दिन से बुखार यूं चढ़ा है कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है. घर के जितने दवा-दारू के नुस्खे थे, बदल-बदल कर आजमाएं, पर कुछ फायदा नहीं हुआ. सभी बेकार सिद्ध हुए. मुंह का ज़ायका भी बदल गया है. दिन में दो बार चाय में डबल रोटी डुबा कर खाती, और दवा ले लेती. पीड़ा से शरीर बेजान सा हुआ जा रहा है. सोच में हूँ और कितने दिन इस तरह पड़ी रहूंगी. कार्यालय में सन्देश भेज दिया है. पर तीन दिन बहुत होते हैं. नए काम पर न जाने के ये बहाने ज़्यादा दिन नहीं चलते. जब नौकरी ही अस्थाई हो, तो ऐन समय पर वे काम से निकाल कर किसी और को रख सकते हैं, जैसे मुझे किसी के स्थान की भरपाई के लिए रखा. मैं भी उस रिक्तता को पूरा करने के लिए तीन महीने से उनकी मुलाज़िम हूँ.

पहले पंद्रह दिन नया काम सीखते समय खुशहाली से गुजर गया. पर अब यह विडंबना सामने आई है. एक तपती दोपहर, मैं जैसे ही घर पहुंची, तार मिला. लिखा था - चार दिन पहले राम गुजर गए, शिष्टाचार के नाते अगर आना चाहें तो बेशक आ जाएँ. - अभिनव

दुविधाजनक विडम्बना थी. जीते जी तो मन में एक आस थी कि राम है तो मैं हूँ, फिर चाहे  मैं उनसे कितनी ही दूर क्यों न रहूँ. अब किस संबंध से उस घर जाऊं? उनके जीते जी नाता टूटा था, अब वे हर बंधन तोड़कर मुझे मुक्त कर गए. पुराने उचित-अनुचित संबंधों की हर सीमा रेखा से मुक्त!

मुक्ति की चाह तब होती है, जब बंधन के शिंकजे कसने लगे. मगर वह स्थिति तो चार साल पहले ही मुक्ति का साधन बन गई, जब मैंने अपनी मर्ज़ी से घर का त्याग किया. एक चार दीवारी से निकल कर दूसरी में पनाह पाई. जब रिश्तों के बीच अविश्वास की दीवार आ जाये, तब पास होने न होने का कोई मतलब बाकी नहीं रहता. दिखावा छलावा बन जाता है. मैंने अपनी इच्छा से घर को त्याग दिया, रिश्तों की बेड़ियाँ तोड़ दीं.

उस गांव में जहां मैं शादी करके राम की जीवन-संगिनी बन कर आई, वहां रिश्तों में सच्चाई थी, सादगी और स्नेह था. दिखावा नाम मात्र न था. कच्चे घर थे पर अपनाइयत के पक्के नाते थे. सभी के मन खुशियों की दौलत से मालामाल थे. ऐसे में चोट एक इंसान को लगती, दर्द दूसरे को होता. हरेक का दुःख दर्द दूसरे को अपना लगता. सब एक दूसरे के साथी, सभी एक परिवार के सदस्य, एक छत के तले गुज़र करते. मैंने खुद को बहुत खुशनसीब समझा, और पूरी तरह से अपने आप को उस घर, घर के लोगों के बीच घुल मिलकर रहने की हर संभव कोशिश की. राम और उसके परिवार के अन्य सदस्यों के काम के भार को अपने जवान कंधों पर ढोने लग गई, जो उन्हें बहुत रास आया.         

शादी के बाद के छ: आठ महीने यूं गुज़रे जैसे आठ दिन. मेरी सास भी मुझे अपनी बेटी की तरह बेपनाह प्यार और स्नेह करतीं. मेरी किसी भी गलती पर कभी नाराज़ न होकर प्यार और समझदारी से समझाती. ससुर कई साल पहले प्रभु को प्यारे हो गए थे. राम के बड़े भाई अमर और उनकी पत्नी शकुंतला पास ही एक किराए के मकान में अपने दो बच्चों के साथ रहते थे. परिवार के सभी सदस्य रात को खाने के बाद एक घर के आँगन में मिलते, खुलकर बात करते, सलाह मशवरा करते और एक दूजे की राय अनुसार मिलजुलकर हर निर्णय लेते. कोई भी बात किसी से छुपी न रहती, इस बात ने मुझे सबसे ज्यादा मुतासिर किया.

राम की बड़ी बहन मीरा, पड़ोस के गांव में व्याही गई थी, उम्र में राम से बीस साल बड़ी थी. मेरी शादी  पर अपने दोनों बच्चों, अभिनव और रचना को साथ ले आई, तभी उनसे मिलना हुआ था.

अभिनव, उम्र 18 साल, सुंदर सुघड़ नौजवान. चेहरे पर हमेशा गजब का ताब और आंखों में एक सलोनी लुभावनी मुस्कान लिए रहता. उसकी बहन रचना 15 साल, हूबहू मां पर गई थी. सुनने में आया कि जब १८ साल की उम्र में मीरा ने शादी हुई, तब वह रचना जैसी सी लगती थी. अब कुछ मोटी और बेडोल सी हो गई थी. यह है हमारी छोटी सी परिवर्रिक संस्था के मिलनसार सानंद सदस्य जो अपनेपन की परिभाषा जानते थे.

शादी के कई साल बाद मीरा को कैंसर की निगोड़ी बीमारी ने घेर लिया. बहुत भागमभाग करके उसने रचना के हाथ पीले कर दिए. कन्या जाकर अपने ससुराल में बस गई, यही सोचकर मीरा निश्चिंत सी हो गई. बाकी रहा अभिनव. मीरा को पता था, वह बचने वाली नहीं, इसीलिए अपनी मां और भाई-भाभियों को उसकी जिम्मेवारी के लिए प्रार्थना करते हुए अभिनव का हाथ उनके हाथ में सुपुर्द कर दिया. कुछ दिन जिंदगी के बिताकर वह भी दुनिया से कूच कर गई.

कुछ महीनों के बाद सास भी बेटी के ग़म में चल बसी.

अमर और शकुंतला ने अपने दो बच्चों का बहाना देकर अभिनव को हमारे साथ रहने का फैसला सुनाया. हमने भी अपनेपन की मर्यादा का मान रखते हुए इस जवाबदारी को कबूल कर लिया और बिना किसी खींचातानी के खुशी-खुशी अपने अपने घरों में रहने लगे. वक्त सुख शांति से कट रहा था. घर संसार, व्यापार सबकुछ. रात को काम से लौटने पर राम, अभिनव और मैं साथ खाना खाते. पूरे दिन की खबरचार एक दूसरे को देते, हंसी खुशी अपने सपनों को साथ लेकर सो जाते. हमारे दो कमरे थे. एक भीतर वाला कमरा और दूसरी थी बैठक. अभिनव को औताक में ही सोना पड़ता था.

एक रात ऐसी आई जो मेरे जीवन की अमावस साथ ले आई. रात को 1:30 बजे, अभिनव ने आकर आहिस्ते से मुझे जगाया. मामी मेरे सर में बेहद दर्द है, ऐसे जैसे सर फट रहा है. कुछ दवा दीजिए या मेरा सर दबा दें.

मैं जल्दी से उठकर औताक में गई, सर दर्द की गोली उसे दी और बाम लेकर उसकी खटिया पर बैठकर उसके माथे को दबाने लगी. उसी समय राम अंदर चला आया और मेरे सामने खड़ा हो गया. एक रात का समय, दूसरा शांत वातावरण. राम को देख कर मैं खुद भी घबरा गयी. सच बताकर मैं उठ खड़ी हुई और कमरे की ओर जाने लगी तो राम की आवाज़ ने पैर बाँध लिए.

तुम करो जो कर रही थी. बाद में आ जाना!

राम के आवाज़ और व्यवहार में नाराज़गी के साथ बेगानगी झलक बरपा थी. मैं परेशान थी, इस सोच पर कि राम आजकल की नई रोशनी का पढ़ा-लिखा होकर इतना तंग दिल और शक़ी कैसे हो सकता है? अभिनव ने सोचा बात आई गई हो गई है, पर ऐसा नहीं हुआ. जैसे-जैसे दिन गुज़रने लगे मुझे महसूस होने लगा कि शक का पारा बढ़ रहा है. मुझे घबराहट के साथ बेचैनी ने घेर लिया, कई बार अभिनव को लेकर हमारे बीच तू-तू-मैं-मैं होने लगी. राम का शक बढ़ता रहा, जीवन नरक सा लगने लगा, ज़िंदगी जैसे ज़हर हो गई. दोनों के मुंहों को ताले लग गए. इससे पहले कि जीना दुश्वार हो जाए, मैंने बिना किसी को बताये घुटन भरे माहौल से निकलकर पास के दूसरे छोटे गांव में नए सिरे से नारीशाला में शरण लेकर वही  बस जाने का प्रबंध कर लिया.

अभी माह चार मुश्किल से गुजरे थे कि अभिनव  ने लिखा - मामी राम को खून में केंसर हो गई है, पर वह न तो दवा लेना चाहता है और न ही आपसे मिलने का ख्वाइशमंद  है. आगे और लिखा - मेरे कारण आज तुम वहां बनवास भोग रही हो, और इधर मामा भी बहुत दुखी है. पीड़ादायक दिन गुज़ार रहे हैं. तुम्हारे ज़िक्र पर ज़्यादा खफा हो जाते हैं और वहां से उठकर चले जाते हैं. सूरते हाल यह बनी है कि न तो मैं कुछ कर सकता हूँ और न तुम. पर मैं खुद को गुनहगार समझता रहता हूँ. न जाने क्यों आपके सुखी संसार में मेरा क़दम नामुनासिब बन गया. आप घर होते हुए भी बेघर हो गईं ... और बस खैरख्वाही है.

तार हाथ में, और हाथ की हालत ऐसी कि इस कागज़ को पकड़ना भी मुश्किल हो रहा था. मैं गणित जोड़ने लगी, आज  राम को गुजरे छठा दिन हुआ. चार दिन के बाद उन्हें मेरी याद आई. दर्शन का समय तो निकल गया. मेरे सिवाय सब हो गया है, अब क्या उस घर की उजड़ी दीवारें जाकर देखूं? और फिर नए सिरे से गांव वालों को इस रिश्ते पर कीचड़ उछालने की वजह बनूँ. जो अपना था वही अपने नज़रिए से परख बैठा, अब उसके न होने पर किसी भी बात का कोई भी मतलब न रहा. सब बेकार. सभी बंधन टूट गए!

राम तो जैसे सभी जंजालों से मुक्त हो गया, जीते जी मोह के सभी नाते तोड़ गया था. सब कुछ समाप्त सा हो गया उसके जीवन के साथ. सोचते हुए थके हारे क़दमों से मैं खाट पर जाकर बैठी. लगा कुछ तन से निकल गया है. मैं इसी हालत में बेसुध सी दो दिन यूं ही पड़ी रही!

मन से बीमार, तन से अस्वस्थ. निढाल!

और तीसरे दिन सूरज की रौशनी के साथ उठी, हाथ में चाय ली, दो घूँट पिये कि दरवाजे की घंटी बजी. प्याली वहीँ रखकर दर खोलने के लिए बढ़ी तो घंटी दुबारा बजी और फिर निरंतर बजती रही.

बड़ी मुश्किल से आकर दरवाज़ा खोला तो पोस्टमैन ने एक तार हाथ में थमा दी.

यह दूसरा तार था, सन्देश वही था दुखद. अभिनव कल दिन को अचानक गुजर गया. उसे ब्रेन ट्यूमर था.अमर.

यह क्या से क्या हो गया? कोई किसी का नहीं रहा. दीवार की एक ईंट क्या गिरी कि पूरी की पूरी दीवार हिल गयी. आंखों के आगे धुंध छा गया, शरीर बेजान सा होकर खुद को न संभाल पाने की अवस्था में बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़ा!

 

 

 

 

देवी नागरानी

जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी, 2 भजन-संग्रह, 6 अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक, लखनऊ, महाराष्ट्र अकादमी व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी से व राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरस्कृत।

सम्पर्क -dnangrani@gmail.com

 

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