... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

 

उनका वास्तविक नाम कुछ और था, लेकिन साहित्य जगत में वे गम्भीर के नाम से विख्यात थे. कहानी लेखन, उपन्यास और फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखना, इन तीनो कामों में वे अपना लोहा मनवा ही चुके थे. बहुत कम उम्र में ही उन्होंने बहुत सी दौलत और शोहरत हासिल कर ली थी. साहित्य के बाज़ार में उनके नाम की अपनी ब्रांडवैल्यू थी. काम की कोई कमी नहीं थी. फ़िल्मकार तो उनके दरवाज़े पर लाईन लगाकर खड़े रहते ही थे; बड़े-बड़े प्रकाशक और छोटी छोटी पत्रिकाओं के सम्पादक भी उनसे नवाज़िश की उम्मीद रखते थे. और वे किसी को निराश भी नहीं किया करते. बड़े-बड़े पुरस्कार और सम्मान वे बटोर चुके थे, तथा हर सभा समारोह और गोष्ठियों का वे मुख्य आकर्षण हुआ करते. लोग उन्हे आग्रह पूर्वक बुलाते और उनके आगमन से अपने आप को वी आई पी समझने लगते.

ज़ाहिर है उन्होंने बहुत सी प्रॉपर्टी भी कर रखी थी. शहर में और शहर के बाहर कई मकान, दुकान, मॉल आदि के अलावा शहर के बाहर उनका अपना एक फ़ार्महाउस भी था जिसे वे अपने निजी कार्यों में इस्तेमाल करते. जब वे शहरी ज़िन्दगी से बेज़ार होजाते या अक्सर जब काम का बोझ ज़्यादा हो जाता, या कोई प्रोजेक्ट जल्दी पूरा करके देना होता तो वे अपना बोरिया बिस्तर समेटकर यहाँ डेरा जमा लेते और अपना मोबाईल बंद करके चौबीस घंटे काम में डूबे रहते. माफ़ कीजियेगा, चौबीस घंटे तो नहीं अलबत्ता दिन भर ज़रूर काम में जुटे रहते. हाँ शाम को अक्सर वे अपने एकांतवास का आनंद उठाया करते.

वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे; लेकिन कुछ बरस पहले एक कार एक्सिडेन्ट में माता-पिता भी नहीं रहे. अब वे इस दुनिया में नितांत अकेले रह गये थे.

परिस्थियाँ इंसान के चरित्र का निर्माण करती हैं. अब कम उम्र, धन, यश और आगे नाथ न पीछे पगहा; इन परिस्थितियों में गम्भीर जी के चरित्र का जैसा निर्माण होना था, वे बिल्कुल वैसे ही थे. शादी की उम्र तो निकली नहीं जारही थी, लेकिन शादी का उनका कोई इरादा भी नहीं था. बल्कि वे शादी ब्याह के इस बंधन में विश्वास भी नहीं रखते. हालांकि कई लड़कियां उनसे शादी की आस लगाये बैठी थीं. और कई तो इसी आशा में उन्हे अपना सब कुछ दे चुकी थीं. हालांकि गम्भीर जी ने किसी से कोई वादा नहीं किया था, और न किसी से अपने विचार छुपाये. वैसे भी विचार छुपाना उनकी फ़ितरत में ही नहीं था. इस सब के बावजूद ऊँची सोसाइटी की लड़कियाँ यह सोचती कि कभी तो यह बुत टूटेगा. पता नहीं किस बिल्ली के भाग से यह छींका टूटेगा, लेकिन रिस्क तो लेना ही है. और दाव पर जब गम्भीर जी जैसी सेलिब्रिटि है तो…

एक बार गम्भीर जी की मुलाकात मिसेज़ फ़लां फ़लां से हो गई. अब आप कहेंगे कि मिसेज़ फ़लां फ़लां भी कोई नाम हुआ, तो आप की बात सही है ऐसा कोई नाम नहीं होता लेकिन इस किरदार के लिये कोई नाम, कोई वास्तविक नाम जम नहीं रहा था इस लिये… चलिये इसे आगे हम मिसेज़ फ़ कहेंगे. तो, मिसेज़ फ़ से उनकी मुलाकात एक चैरिटी कार्यक्रम में हुई थी. यह आयोजन भी मिसेज़ फ़ का ही था. यह एड्स से प्रभावित लोगों के सहायतार्थ था. असल में मिसेज़ फ़ अपने एक एन जी ओ के ज़रिये एड्स पीड़ितों की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय सहायता के लिये प्रयासरत थीं. इतना ही नहीं, वे इनके मानवाधिकार, सामाजिक और सामान्य अधिकारों को लेकर भी काफ़ी मुखर थीं.

गम्भीर जी ने अपने किसी ख़ास मित्र के आग्रह पर ही यह आमन्त्रण स्वीकार किया था. वैसे भी वे अपने ख़ास मित्रों का आग्रह कभी नहीं ठुकरा पाते. यह बात और है के उनके ख़ास मित्र अक्सर महिलायें ही हुआ करतीं. इस कार्यक्रम में उन्होंने मिसेज़ फ़ को पहली बार देखा था.

मिसेज़ फ़ का व्यक्तित्व उन्हे काफ़ी आकर्षण और संभ्रांत स्वरूप प्रदान करता था. उनका ऊँचा कद और छरहरी काया, उनका ड्रेसिंग सेंस उनके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता था. हाई क्वालिटी के ड्रेस मटेरियल से बनी, बिना तड़क भड़क वाली महंगी साड़ियाँ और उसे पहनने का और उसे सम्हालने का उनका शालीन और संभ्रांत अंदाज़, उन्हे उच्च और उच्च मध्यम वर्ग की अन्य महिलाओं से बिलकुल अलग स्वरूप और गरिमा प्रदान करता है. चेहरे पर एक स्निग्ध सी मुस्कान, बिल्कुल नपी तुली हमेशा मौजूद रहती. न ज़्यादा लम्बी न ज़्यादा छोटी. यहाँ तक कि चेहरे के भाव भी बिल्कुल नपे तुले होते. आँखें आम तौर पर ज़ुबान का काम करतीं. जब वे खामोश रहतीं तो उनकी आँखें और चेहरे के हाव भाव बातें कर रहे होते; लेकिन जब वे बोलतीं…

…जब वे बोलतीं, तो सिर्फ़ वे ही बोलतीं. हवायें सरसराना बन्द कर देती. चिड़ियाँ चहकना भूल जातीं, साजिन्दे अपना साज़ परे रख देते. गो कि कायनात थम जाती. यह प्रभाव भी उनकी आवाज़ का नहीं; बल्कि उनकी बोलने की शैली और शब्दों के चयन का होता. मजाल है कोई उनके सामने ज़ुबान खोले. वहाँ ज़ुबान खोलना सूरज को दिया दिखाने जैसा होता. ज़ुबानें खुलतीं उनके पीठ पीछे. संभ्रांत और कुलीन घराने की महिलायें उन्हें नकचढ़ी, दिखावेबाज़ और मर्दों पर जादू करने वाली जादूगरनी जैसे खिताबों से नवाज़ कर अपनी कमियों और उनके सामने आने पर अपने अंदर महसूस होने वाली हीन भावना पर पर्दा डालतीं. लेकिन कुछ महिलायें उनकी पिछलग्गू बनकर अपने अंदर की हीन भावनाओं पर काबू पाती.

उस दिन गम्भीर जी, मिसेज़ फ़ से ज़्यादा बात नहीं कर पाये थे. मिसेज़ फ़ से उन्होंने आयोजन की खुलकर तारीफ़ की थी- “आपका आयोजन बहुत अच्छा था और उद्देश्य भी… मुझे यहाँ आकर बहुत खुशी हुई.“

“आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! आपके आगमन के कष्ट के लिये भी और आपके प्रोत्साहन के लिये भी.“ मिसेज़ फ़ का संतुलित जवाब था “आप जैसे सेलिब्रिटी के कीमती समय और समर्थन से हमारी संस्था को बहुत बल मिलता है और हम समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेंदारियों को बेहतर ढंग से निभा पाते हैं … एक बार फिर से धन्यवाद.“

गम्भीर जी के जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था. पहली बार उनका सामना किसी ऐसी महिला से हुआ था जो उनकी तारीफ़ से अप्रभावित रही और बिल्कुल नपा-तुला जवाब प्रस्तुत कर दिया.

‘यह टेढ़ी खीर लगती है.‘ गम्भीर जी ने मन में कहा लेकिन प्रगट में यही कहा “नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है; हमारा समय आपके सामाजिक सरोकार से ज़्यादह कीमती नहीं है. आप बेझिझक आधी रात को पुकारें, आप निराश नहीं होंगी.“

मिसेज़ फ़ मन ही मन मुस्कुरा उठीं. वे कोई कच्ची खिलाड़ी नहीं थीं. भले युवा शादीशुदा महिला थी, लेकिन मर्दों को हैंडल करना जानती थी और उनकी फ़ितरतों से खूब वाकिफ़ थी. लोगों को वह खुली किताब की तरह पढ़ना जानती थी. वह आपके शब्दों से ज़्यादह उसके पीछे छिपे आपके मनोभाव पर विश्वास करती थी. उन्होंने एक पल को गम्भीर जी की तरफ़ अर्थपूर्ण नज़रों से देखा और और अवसर को तुरंत लपक लिया- “तो, आशा करती हूँ आपका सहयोग यूँ ही बना रहेगा.“

“और मुझे भी आशा है कि सहयोग का सौभाग्य मुझे ज़रूर मिलेगा.“ गम्भीर जी ने भी अवसर को लपक लिया.

सो इस प्रकार यह खेल चल पड़ा.

इसके बाद गम्भीर जी को सौभग्य मिलने में ज़्यादह समय नहीं लगा. दूसरे दिन ही एक मरीज की आर्थिक सहायता हेतु मिसेज़ फ़ को गम्भीर जी की याद आ गई. गम्भीर जी ने भी इसे अपना सौभाग्य समझा और एक कॉल पर मिसेज़ फ़ की सेवा में हाज़िर हो गये और अपने योगदान में कोई कसर नहीं छोड़ी. वे मिसेज़ फ़ को प्रभावित करने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे.

मानना तो पड़ेगा जो बात इस औरत में है, वह शायद ही कहीं और देखने को मिले. गम्भीर जी को उस दिन यही ख़्याल आया. यही तो वह कैरेक्टर है जिसे मैं तलाश रहा था. एक दिन यह मेरे बेस्ट सेलर उपन्यास की नायिका होगी. जब गम्भीर जी ऐसा सोच रहे थे, वह नायिका एक हास्पिटल प्रशाशन की बखिया उधेड़ रही थी.

किस्सा यूँ था कि हास्पिटल प्रशासन की लापरवाही से एक एड्स पीड़ित की पहचान उजागर हो गयी थी; जिसका उसके जीवन पर बड़ा प्रतिकूल असर पड़ा था. वह अपनी जॉब से भी हाथ धो बैठा था, क्योंकि वहाँ सबको पता चल गया था. वह बेचारा परिस्थितियों से जूझ नहीं पाया और आत्महत्या कर बैठा था.

मिसेज़ फ़ को पहली बार इतना उखड़ा हुआ पाया था.

बढ़ती हुई नज़दीकियों ने कई बार गम्भीर जी को विचित्र स्थितियों में फंसा दिया था. जैसे कि उस दिन जब वे एक डाक्टर से उलझ गई. गम्भीर जी समझ नहीं पारहे थे कि मिसेज़ फ़ का समर्थन करें, विरोध करें या उन्हे समझायें.

इसके बाद वे किसी डॉक्टर से इस बात पर उखड़ गई कि एक एच आई वी पॉज़िटिव महिला को वह डॉक्टर सहवास संबंधित सलाह देरही थी. जबकि मिसेज़ फ़ का कहना था कि यह उस मरीज का निजी मामला है और इस बारे में निर्णय लेना उस महिला का अधिकार है. गम्भीर जी को लग रहा था कि वह डॉक्टर का उद्देश्य इस बीमारी को फैलने से रोकना था. लेकिन मिसेज़ फ़ प्रतिक्रिया से वे हत्प्रभ थे कि एक भारतीय महिला इस विषय में इतनी मुखर हो सकती है. खैर गम्भीर जी ने उस समय अपने विचारों को अपने अंदर ही समेट लिया.

तो इस तरह उनकी दूसरी मुलाकात हुई और मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन दूसरी मुलाकात ने गम्भीर जी को खासा बेचैन कर दिया था. गम्भीर जी के जीवन में हमेशा नई-नई महिलाये और युवतियाँ आती जाती रहतीं लेकिन जो बेचैनी वे मिसेज़ फ़ से मिलने के बाद वे अपने अंदर बड़ी बेचैनी महसूस करने लगे थे. क्या वह भी ऐसा ही महसूस करती होगी? हाँ! बिल्कुल ! उन्हे अपने आप पर काफ़ी गुमान था और यह सच भी है, महिलायें उनके लिये उनसे ज़्यादह बेचैन रहतीं. लेकिन, शायद मिसेज़ फ़ की बात कुछ और ही थी. इस बार खेल बराबरी का था. दोनो को अपने आप पर अत्यधिक गुमान था.

 

एक दिन गम्भीर जी ने उत्सुकतावश पूछ लिया “आप सामाजिक कार्यों में इतना बिज़ी रहती हैं, परिवार के लिये समय कैसे निकालती हैं?”

“क्या यह इतना ज़रूरी है?” मिसेज़ फ़ ने प्रतिप्रश्न कर डाला.

गम्भीर जी को इस प्रतिक्रिया की उम्मीद न थी. वे इस अकस्मिक प्रतिक्रिया से हड़बड़ा गये; लेकिन बात सम्हालते हुए बोले “नहीं… मेरा मतलब… आप शादी शुदा हैं…”

“मर्द भी तो शादी शुदा होते हैं, वे क्या बाहर नहीं निकलते? वे अपना कितना समय परिवार को देते हैं? उनसे कोई नहीं पूछता.“ मिसेज़ फ़ ने गम्भीर जी की बात काटते हुए कहा तो गम्भीर जी को कोई जवाब ही नहीं सूझा. वे समझ नहीं पाये क्या जवाब दूँ. उन्होंने रक्षात्मक रूप अपना लिया.

“आपके पति एतराज़ नहीं करते?”

“क्यों?” मिसेज़ फ़ का स्वर आक्रामक होगया. गम्भीर जी, गम्भीर रूप से घिर गये थे. वे अपनी सफ़ाई भी ठीक से नहीं दे पा रहे थे. सो उन्होंने बात बदलना ही ठीक समझा.

“नहीं… मेरा यह मतलब नहीं था…” वे इतना ही बोल पाये.

“नहीं, नहीं. आप सफ़ाई मत दीजिये. इसमें आपका कोई कसूर नहीं. आप भी तो मर्द ही है फिर आपकी सोच बाकी मर्दों से अलग कैसे हो सकती है, आपकी भी वही सोच रहेगी.“ मिसेज़ फ़ ने उसी अंदाज़ में कहा.

“बिल्कुल नहीं !” अब गम्भीर जी ने दमदार तरीके से अपनी बात रखी “ऐसा बिल्कुल नहीं है. आप मुझे जानती हैं. आप मेरा सारा साहित्य उठाकर देख लीजिये. मैं औरतों की आज़ादी का प्रबल समर्थक हूँ. मैंने अपने साहित्य में हमेशा स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के पक्ष में ही बात की है. इससे भी बढ़कर मैं नारी सशक्तिकरण का पक्षधर हूँ. और इसी लिये ही मैं आपका प्रशंसक हूँ.“

अब मिसेज़ फ़ को जैसे अपनी गल्ती का अहसास हुआ. यह क्या कर रही है; उसने अपने आप को उलाहना दिया. ऐसे समर्थक और सपोर्टर आसानी से नहीं मिला करते. उसने बात सम्हालने की कोशिश की “नहीं, नहीं, सॉरी… दरअसल यह प्रश्न इतनी बार मेरे सामने आता है न, मैं इसीलिये उखड़ गई थी. असल में अक्सर ऐसे प्रश्न मुझे हर्ट करने के लिये ही पूछे जाते हैं, लेकिन आपका ऐसा इरादा नहीं था, इतना तो मैं समझ सकती हूँ.“

मिसेज़ फ़ की इस बात ने गम्भीर जी को सहज कर दिया. वे बोले “एक्चुअलि मेरे मन में एक जिज्ञासा थी कि आपको समाज में यह मुकाम हासिल करने में काफ़ी स्ट्रगल करना पड़ा होगा. आपकी राह में कई रुकावटें आई होंगी, आपने उन्हे कैसे पार किया होगा वगैरह वगैरह ….“ गम्भीर जी ने अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करने की कोशिश की “देखिये, आप तो जानती हैं, आप जैसे सशक्त नारी किरदार मेरे साहित्य को कितना प्रभावित करते हैं.“

“अच्छा छोड़िये.“ मिसेज़ फ़ ने इस वार्तालाप को हल्का करने की गरज़ से कहा “मैं आपके सवाल का सही सही जवाब दे देती हूँ…” उन्होंने आगे कहा “वे एतराज़ नहीं करते. उन्हे मेरी व्यस्तता से कोई कष्ट नहीं होता.“

“वाह बड़े सपोर्टिव हैं मिस्टर फ़.“ गम्भीर जी प्रभावित होते हुए बोले.

“दरअसल… “ वे बोलीं “वे खुद इतने व्यस्त रहते हैं कि मेरे व्यस्त रहने से उन्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.“

दोनों चुप हो गये.

 

एक दिन मिसेज़ फ़ और गम्भीर जी होटल में ब्रेकफ़ास्ट ले रहे थे. अक्टूबर महिने का मध्यकाल था. दशहरा गुज़र चुका था और दीपावली की तैयारियाँ चल रही थीं. बाज़ार दीपावली की आगवानी में लगा हुआ था. इस साल मानसून भी अच्छा रहा था. बाज़ार भी अच्छा रहने की सम्भावना थी. इसलिये भी हर तरफ़ उत्साह और उमंग का माहौल था. कभी दिन थे कि जनमानस बाज़ार को प्रभावित करता था, आज कल बाज़ार जनमानस को प्रभावित करने लगा है. यह बाज़ार की जनसाधारण पर एतिहासिक जीत थी. अब इसे विकास समझा जाने लगा था. हालांकि यह विकास ही था, लेकिन किसका? जनसाधारण तो यहाँ हारा हुआ था. तूती तो बाज़ार की बोल रही थी. पुराने आदर्श अब पिछड़ेपन की निशानी बन गये थे और चरित्र की दृढ़ता, उपहास की चीज़ बन चली थी. इस दौर के सिर्फ़ दो ही आदर्श थे, एक- उपभोग, दूसरा- मुनाफ़ा. इस दौर के वे दोनो आदर्श प्राणी थे.

मौसम भी खुशनुमा था. न गर्मी थी न सर्दी. दिन उजला-उजला था लेकिन तपिश का नामोंनिशां नहीं. अपने अपने क्षेत्र के सफल इन दोनो प्राणियों पर माहौल का असर साफ़ नज़र आ रहा था. दोनो प्रफ़ुल्लित थे, और हल्की फुल्की बातें कर रहे थे.

“आपने अब तक शादी क्यों नहीं की?” मिसेज़ फ़ के अंदर की स्त्री उनके व्यक्तित्व के आडम्बरों को तोड़ कर बाहर आने लगी.

“देखिये अब आप एक घिसा पिटा सवाल मेरे सामने लारही हैं. मैं भी उखड़ जाऊँगा….“ गम्भीर जी ने भी विनोद के स्वर में कहा. दोनो हंस पड़े. “बस ऐसे ही.“ गम्भीर जी ने बात पूरी की.

“कर लेनी चाहिये.“ मिसेज़ फ़ ने कहा.

“क्यों? क्या मेरी आज़ादी पसंद नहीं?“

“वह बात नहीं है.“

“फिर क्या बात है?”

“बड़ी खुश किस्मत होगी जो आप से शादी करेगी.“

“क्यों?”

“आपकी पत्नी आपके साथ बड़ी खुश रहेगी.“

“आपको ऐसा लगता है?”

“बिल्कुल …”

“मुझे तो नहीं लगता.“

“आप शादी करके तो देखिये.“ मिसेज़ फ़ ने इसरार किया.

“मुझे शादी में विश्वास नहीं.“ गम्भीर जी ने जवाब दिया.

“क्यों?” वे बोली.

“बस ! नहीं है.“ वे इतना ही बोले.

“शादी से डरते हैं?” मिसेज़ फ़ ने गम्भीर जी की आँखों में झाँकते हुए पूछा.

“नहीं, मैं किसी बात से नहीं डरता.“ गम्भीर जी ने उखड़ते हुए कहा.

“फिर क्या बात है?” मिसेज़ फ़ ने मुस्कुराते हुए पूछा. मिसेज़ फ़ की मुस्कान ने गम्भीर जी के उखड़े हुए मूड को हल्का कर दिया. मन की कड़वाहट चली गयी और मन फिर प्रफ़ुल्लित होगया.

“पता नहीं. बस, मैं किसी रिश्ते में बंधना नहीं चाहता.“ गम्भीर जी ने अपनी बात स्पष्ट की.

“ज़िम्मेदारी उठाने से बचना चाहते हैं?” मिसेज़ फ़ ने, गम्भीर जी से सच्चाई स्वीकार करवाने की नाकाम कोशिश की. गम्भीर जी सचेत हो गये. लगता है यह मेरी नस पकड़ना चाहती है. मैं तो सिर्फ़ अपने लिये यहाँ सम्भावना तलाश रहा था. लेकिन वे भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे. “ऐसा नहीं है…” वे बोले “बस, मैं इसकी ज़रूरत नहीं समझता.“

‘लेकिन मैं आपको खूब समझती हूँ, लेखक महोदय …’ मिसेज़ फ़ ने मन में सोचा लेकिन प्रकट में अंजान बनने की कोशिश की “मतलब?” उन्होंने अंजान बनते हुए पूछा.

“मतलब कुछ नहीं है. बस मैं कोई ऐसा कमिटमेंट नहीं करना चाहता जिससे मैं किसी एक का असीर हो जाऊँ और अपने ….“ मिसेज़ फ़ को लगा कि वे अपने मक्सद में कुछ हद तक कामयाब हो चली है; अत: बात बीच में काटते हुए बोली-

“क्या आप ऐसा सोचते है कि शादी गुलामी है?”

“नहीं, मैं ऐसा सोचता हूँ कि यह एक बेकार की चीज़ है.“

 

“मैं आपके ऊपर एक उपन्यास लिख रहा हूँ.“ एक दिन गम्भीर जी ने मिसेज़ फ़ से बताया तो मिसेज़ फ़ को यह मज़ाक लगा.

“आप लेखक हैं, इस लिये ऐसे मज़ाक कर लेते हैं. लेकिन मैं आप को बता दूँ कि ऐसे मज़ाक किसी के दिल को ठेस पहुंचा सकते हैं.“ उन्होंने कहा.

“लेकिन इसमें ठेस वाली क्या बात है? मैं कोई मीडिया रिपोर्ट तो नहीं बना रहा. मैं तो बस एक उपन्यास लिख रहा हूँ; आप जिसकी नायिका हैं.“

“आर यू सीरियस? क्या आप सच कह रहे हैं?”

“हाँ, बिल्कुल!”

“ओह, आई एम सॉरी! मुझे लगा आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं.“

“आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं? क्या अपने प्रति मेरी भावनाओं को आप नहीं जानतीं.“

“लेकिन मैं ऐसे भी कैसे सोच सकती हूँ कि देश का इतना बड़ा लेखक मुझ पर लिखे.“

“आप खुद को अंडर एस्टिमेंट कर रही हैं.“

“नहीं. लेकिन आपने मुझमें ऐसा क्या देख लिया?” मिसेज़ फ़ बोलते हुए खुशी के अतिरेक से खिलखिला उठी और इससे गम्भीर जी ने परम संतोष का अनुभव किया. इस खुशी पर कुछ भी कुर्बान कर दूँ तो कम है.

“आप मेरी नज़र से अपने आप को देखें तभी समझ पायेंगी.“

“आप ने ऐसा क्या देख लिया मुझमें?”

“आप जैसी महिला मैंने दूसरी नहीं देखी. आप जैसी बोल्ड और आधुनिक विचारों वाली महिला की तो भारतीय समाज में कल्पना तक नहीं की जा सकती.“

मिसेज़ फ़ मन ही मन मुस्कुरा उठी. उन्हे अहसास होगया था कि यह उनका जादू ही है जो इस लेखक के सर चढ़ कर बोल रहा है. इस अहसास से वे गर्व और आत्मविश्वास के अतिरेक से भर उठी. यह अहसास उनकी देह भाषा पर साफ़ नज़र आने लगा.

 

और कुछ महिने बीतते बीतते मिसेज़ फ़, गम्भीर जी के जज़्बात पर हावी होने लगी. अब वे अपने नाम के अनुसार काफ़ी गम्भीर लगने लगे थे और दूसरी महिलाओं में भी उनकी कोई रुचि नहीं रह गई थी. उन्होंने कई बार सोचा कि मिसेज़ फ़ से हाल-ए-दिल कह दें; लेकिन कहें क्या? सच तो यह है कि वे खुद नहीं जानते थे कि वे चाहते क्या है. एक तो वे शादीशुदा महिला थी और गम्भीर जी के अनुमान के अनुसार वे अपने वैवाहिक जीवन से काफ़ी सुखी और संतुष्ट थी. और यदि ऐसा नहीं भी होता तो क्या कहते? क्या वे किसी बंधन में बंधने के लिये तैयार है? बिल्कुल नहीं ! फिर यह कैसी अनबूझ सी प्यास थी … और इसका असर उनके काम पर भी पड़ने लगा. एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट और एक उपन्यास का काम भी काफ़ी पिछड़ने लगा तो गम्भीर जी ने अपना शहर का आशियाना छोड़ दिया और अपने फ़ार्म हाऊस पर चले गये.

लेकिन यहाँ भी वे अपने काम में मन नहीं लगा पा रहे थे. एक बेचैनी थी, ऐसी बेचैनी कि जिस पर खुद उन्हे कोई काबू नहीं था.

वह फ़रवरी महीने की शुरुआत थी. यानि बसंत का मौसम …. खुशनुमा धूप जिसमें सिर्फ़ नूर था, तपिश का नाम-ओ-निशां नहीं. गम्भीर जी अपने फ़ार्म हाऊस के सामने गुलाब की क्यारियों में गुलाब के तैंतीस किस्म के गुलाब अपनी खूबसूरती और खुशबू से वातावरण को और खुशनुमा कर रहे थे. हरे भरे लॉन के चारों ओर मौसमी फ़ूलों की क्यारियों में रंगबिरंगे फूल खिले थे. लेकिन इन सब का गम्भीर जी के दिलो दिमाग को पर उल्टा ही असर पड़ रहा था. वे तरो ताज़ा महसूस करने के बजाय और ज़्यादह उदासी महसूस करने लगे थे. वे सारा दिन कोशिश करने के बावजूद एक शब्द नहीं लिख पा रहे थे. आखिर दोपहर के भोजन के बाद उन्होंने एक झपकी लेने का फ़ैसला किया और सोने चले गये. शायद एक नींद, दिल दिमाग को फिर ताकत दे दे. लेकिन वे यहाँ भी कामयाब नहीं हुए और लैपटॉप पकड़ कर, मिसेज़ फ़ पर लिखे जा रहे अपने नये उपन्यास की रूपरेखा पर काम करने बैठ गये. लेकिन मिसेज़ फ़ की बातें याद कर वे और ज़्यादह उदासी महसूस करने लगे और लैपटॉप को बंद कर आँखें मूंद कर सोफ़ा पर ही लेट गये.

शाम हो चली थी. गम्भीर जी बरामदे में कुर्सी डाले अपना लैपटॉप पकड़े दूर क्षितिज पर नज़रे गड़ाये बैठे आसमान के बदलते हुए रंगो का खेल देख रहे थे जब उन्हें लगा जैसे कोई बिन मांगी मुराद मिल गई हो, जैसे टूटा हुआ कोई सपना पूरा हो गया हो. वह मिसेज़ फ़ की कार थी जो उनके फ़ार्म हाऊस के अहाते में प्रविष्ट हो रही थी. मिसेज़ फ़ खुद कार चला रही थीं …

वह रात मुरादों की रात थी. ख्वाबों के सजने और सच हो जाने की रात. मिसेज़ फ़ और गम्भीर जी ने साथ में खाना खाया, छत पर बैठ खुले अनगिनत तारों से भरे झिलमिलाते आसमान तले बैठकर शैम्पेन पी, और बेडरूम में आकर एक दूसरे में डूब गये. उस रात उन्होंने एक दूसरे को अपना सब कुछ दे दिया और सब कुछ पा लिया. यहाँ तक कि रात थक कर चूर हो गई. अंतत: थकी मांदी रात ने उनसे विदा ली और सुबह के कदमों की आहट सुनाई देने लगी.

मिसेज़ फ़ सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर तैयार हो गई. वे बिल्कुल तरोताज़ा लग रही थी. रात के कोई तास्सुरात कोई निशान उनके चेहरे पर नुमाया न थे. मानो यह निशान भी पानी और साबुन से धुल गये हों. या जैसे कल की रात उनकी ज़िंदगी में कभी आई ही न हो. गम्भीर जी अभी बिस्तर में ही थे जब वे जाने के लिये तैयार थी. वह गम्भीर जी को उठाना नहीं चाहती थी लेकिन गम्भीर जी को अनुमान हो गया और वे उठ बैठे. गम्भीर जी आज एक अलग ही अह्सास से दो चार थे. पिछली रात जैसी कई रातें उनकी ज़िंदगी में आई और गई लेकिन यह अहसास उनके लिये बिल्कुल नया था. एक अपराध बोध कहीं सर उठा रहा था; मन के किसी कोने में. पहली बार उन्हे ऐसा लगा जैसे किसी पवित्र चीज़ को छू कर अपवित्र कर दिया हो. जैसे जिस मूरत को पूजा, फिर उसी को तोड़ दिया हो. ऐसा क्यों? वे नहीं समझ पा रहे थे. आज से पहले तक तो मिसेज़ फ़ उनके लिये एक ऐसी मछली थी जो आसानी से नहीं फंसती … लेकिन आज जब वह मछली खुद ही आ फ़सी तो दिलो दिमाग में यह कैसी हलचल? यह कैसी प्रतिक्रिया थी.

वे मिसेज़ फ़ को नाश्ते के लिये रोकना चाह रहे थे; लेकिन उनका सामना करने से डर रहे थे. आखिर जब वह जाने लगी तो बड़ी मुश्किल से गम्भीर जी के मुख से निकला- “सॉरी ….“

“सॉरी? सॉरी फ़ॉर व्हाट?” मिसेज़ फ़ हैरान थी.

“रात … रात के लिये …”

“गम्भीर जी ! मैं समझती थी कि हम दोनो ने इसे इन्जॉय किया. फिर यह सॉरी किस लिये? मैं तो समझती थी कि आप खुले विचारों वाले व्यक्ति हैं. और जहाँ तक मैं जानती हूँ आप कोई दूध के धुले नहीं है. बल्कि इस खेल के तो आप मंझे हुए खिलाड़ी हैं. आप ऐसा मत दिखाईये कि आप इसे गलत समझते हैं. ऐसा करके आप मुझे शर्मिन्दा करना चाहते हैं. लेकिन लेखक महोदय! सो कॉल्ड महान लेखक जी मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं. क्योकि हम दोनो समझदार हैं और दोनो की सहमति से हुआ है, जो कुछ हुआ है. अगर आप इसे गलत समझते हैं तो यह करके आपने पाप किया है. निश्चित रूप से पाप किया है. लेकिन मैंने नहीं … क्योंकि यह मेरी नज़र में पाप नहीं है.“ वे उखड़ गई और अपना पर्स उठा कर तेज़ी से बाहर को लपकी. गम्भीर जी भी पीछे पीछे लपके. “मेरा यह मतलब नहीं है. दरअसल मैं आपके लिये परेशान हूँ.“ वे बोले.

“मेरी चिंता मत कीजिये मैं जिस काम के लिये गिल्टी फ़ील करूँ वह काम करती ही नहीं.“

“ऐसा नहीं है. मैं तो इस बात के लिये परेशान हूँ कि घर में आप किन किन परेशानियो का सामना करेंगी. और यह सब मेरे कारण आपको झेलना पड़ेगा.“

“इसके लिये आप क्यों फ़िक्र कर रहे हैं?” मिसेज़ फ़ ने हंसकर प्यार से झिड़की दी “मैं सम्हाल लूँगी, आप फ़िक्र न करें.“ रुक कर फिर बोली “वैसे, अच्छा लगा. मेरी फ़िक्र करने के लिये थैंक्स !”

“मेरे कारण आपको झूट बोलना पड़ेगा.“ गम्भीर जी ने जैसे क्षमा याचना के स्वर में कहा.

“कितना अच्छा लगता है जब कोई आपकी फ़िक्र करे, थैंक्स अगेन. फिर भी आप निश्चित जानिये ऐसा कुछ नहीं होगा.“

“और आपके पति? वे तो शहर में ही है न ….“

“उन्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.“ मिसेज़ फ़ के मुख से अनायास निकला जिससे वे खुद ही चौंक उठी और तुरंत “अच्छा मैं चलती हूँ…” कहकर जाने लगी.

“क्या मतलब?” गम्भीर जी ने रास्ता रोकते हुए कहा.

“कुछ नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.“ मिसेज़ फ़ हड़बड़ाई.

“कोई बात कैसे नहीं है? कोई ऐसी बात यूँ ही नहीं कह बैठता.“ गम्भीर जी को आशा की किरण सी नज़र आई.

“आप को इस बात से मतलब नहीं होना चाहिये. देखिये हर सम्बंध की एक सीमा होती है.“

“देखिये ! मैं कोई सीमा नहीं तोड़ना चाहता, लेकिन मैं समझता हूँ कि हम इतने अच्छे दोस्त हैं कि अपना-अपना दर्द एक दूसरे से शेयर कर सकते हैं.“

“लेकिन मैं शेयर नहीं करना चाहती.“

“पर मैं आपके बारे में जानना चाहता हूँ. आप भूल रही है मैं आप पर ही एक उपन्यास लिख रहा हूँ. आपके हर संघर्ष को लिखना चाहता हूँ. आपके जीवन के हर पहलू को जानना, और समझना मेरे लिये ज़रूरी है.“ गम्भीर जी ने ज़ोर देकर कहा. मिसेज़ फ़ कुछ पल मौन खड़ी रही फिर यकायक अपने पैरों में भीषण कमज़ोरी महसूस करने लगी और लड़खड़ा कर बैठ गईं.

“कुछ समय पहले … सब खत्म हो गया. बस अब हम दोनो नाम के ही पति पत्नी है. बस एक दूसरे की लाज बचाने के लिये यह रिश्ता निभाये जा रहे है, वर्ना न मेरी किसी बात से उन्हे फ़र्क पड़ता है और न उनकी किसी बात पर मुझे कोई फ़र्क पड़ता है.“ मिसेज़ फ़ सिसकने लगी. गम्भीर जी वहीं पास में बैठ गये, मिसेज़ फ़ का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाने लगे. शायद वे कहना चाहते थे कि- मैं हूँ आपके साथ; लेकिन कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये.

थोड़ी देर बाद मिसेज़ फ़ ने स्वयं ही कहा “आप मुझे जानना चाहते है न?”

गम्भीर जी ने हाँ में सिर हिलाया.

“मैं जानती हू कि आप मुझ पर उपन्यास लिखना चाहते है; और इस लिहाज़ से आपको मेरी कहानी में रुचि होना स्वाभाविक भी है. और कल मैं इसी उद्देश्य से आई थी, लेकिन …”

“जो कुछ हुआ, वह स्वाभाविक था. हमने कुछ सोचा नहीं, हमने कुछ चाहा नहीं, बस अपने आप हो गया.“ गम्भीर जी ने तसल्ली देने की कोशिश की.

“हाँ, मैं जानती हूँ; और मुझे इसका कोई मलाल भी नहीं. क्या हम सचमुच यही नहीं चाहते थे. क्या आपके मन में भी यह कामना नहीं पल रही थी.“ मिसेज़ फ़ ने कहा.

“हाँ, यह सच है; और इसे स्वीकर करने में मुझे कोई हिचकिचाहट भी नहीं. और मुझे कोई अफ़सोस भी नहीं; बल्कि, मैं तो खुश हूँ.“ गम्भीर जी ने जोड़ा.

“अफ़सोस तो आपको होगा. मेरी कहानी सुनने के बाद आप इस बात पर अफ़सोस ज़रूर करेंगे…”

“कहानियां तो मैं लिखता हूँ. ऐसी क्या बात है, आपकी कहानी में?” गम्भीर जी बोले.

मिसेज़ फ़ बोली तो बोलती चली गई…

“मैं किसी उच्चवर्ग या हाई सोसाइटी की बेटी नहीं हूँ. मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय या कहिये निम्न मध्यमवर्गीय घराने में हुआ. पिता एक कारखाने के कर्मचारी थे. माँ, सीधी सादी घरेलू महिला. आप लोग सोच सकते है कि, एक कारखाने के कर्मचारी की लाईफ़ बड़ी तक़लीफ़देह होगी. लेकिन इन उच्चवर्गीय अवधारणाओ के विपरीत हमारी ज़िंदगी बड़ी खुशहाल थी. कम से कम आज के मेरे जीवन से तो बहुत अच्छी ज़िंदगी थी वह. हमारे पास सुविधाओं की कमी थी, लेकिन सलाहियतें बेशुमार थी. बल्कि अपनी सलाहियतों के दम पर ही हम खुशहाल थे. मेरे पापा बहुत मेहनती और इमानदार इंसान थे. वे बड़े धीर गम्भीर और बिल्कुल सुलझे हुए विचारों वाले व्यक्ति थे. मुझे हमेशा लगता था कि वे बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति हैं. उनके पास मेरे हर सवाल का स्पष्ट जवाब हमेशा रहता. वे कभी भी कनफ़्यूज़्ड नहीं लगते. ज़रा से भी नहीं. उन्हे पढ़ने पढ़ाने का शौक था और वे हमेशा अध्ययन करते रहते. मुझे लगता जैसे वे मेरे सामने आने वाले सवालो की ही पूर्व तैयारी में लगे रहते. वे एक आदर्श पिता थे और मेरे आदर्श. मैं हमेशा सोचती मैं उनके जैसी बनूगी. वे मुझे हमेशा पढ़ाई लिखाई के लिये प्रोत्साहित करते. वे हमेशा मुझे समझाते- ‘पढ़ो ! खूब पढ़ो ! अच्छी नौकरी के लिये नहीं, परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने के लिये नहीं, रुपया पैसा कमाने के लिये नहीं; ज्ञान हासिल करने के लिये. पैसा तो अनपढ़ इंसान भी कमा लेता है, लेकिन वह एक पढ़े लिखे इंसान जैसा व्यक्तित्व हासिल नहीं कर सकता.‘

“मैं मंत्रमुग्ध सी उनकी बातों को सुनती. मैं घंटो बैठी उनकी बातें सुन सकती थी. उनकी बातों से कभी बोर नहीं हो सकती थी. मुझे हमेशा लगता वे दुनिया के सबसे विलक्षण इंसान है. ‘फिर वे इतने प्रसिद्ध क्यों नहीं है, जैसे और महान लोग होते है. उन्हे प्रसिद्ध होना चाहिये मैं हमेशा सोचती.‘ लेकिन वे आम मध्यमवर्गीय लोगों की तरह, चमक दमक से दूर सीदी सादी ज़िन्दगी पसन्द करते. मेरी मां, आम मधयमवर्गीय माँओं की तरह थी. उसकी ज़िन्दगी मेरे पिता और मेरी ज़रूरतों के इर्द-गिर्द ही सीमित थी. उसकी सोच और विचारो का दायरा बस मैं ही थी और कुछ हद तक मेरे पिता. पहले मैं समझा करती कि मेरी माँ एक बेकार सी स्त्री हैं; जिसे घर के काम और बेटी पर हुक्म चलाने के सिवा और कुछ नहीं आता. इस बात के बावजूद कि मुझे घर में पढ़ाने लिखाने और होमवर्क आदि करवाने का काम वही करती; मुझे वह एक अनपढ़ महिला ही लगती थी. मुझे यह जानने में काफ़ी समय लग गया कि मेरी माँ न कि खुद एक पढ़ी लिखी महिला थी, बल्कि वह किसी स्कूल में अंग्रेज़ी विषय की प्रध्यापक रही और ग्यारहवी और बारहवी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाती रही. जब मैं बड़ी होने लगी तो मेरी अच्छी परवरिश और शिक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने के लिये उन्होंने न सिर्फ़ अपना कैरियर छोड़ दिया बल्कि अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को भी तिलांजली दे दी. कुल मिलाकर मैं ही अपने माता पिता की हर गतिविधी का केंद्र बिंदु रहती. मैं हमेशा देखती, मेरी छोटी से छोटी सफलता उनके लिये बड़ी खुशी का कारण बनती. वे अपनी हर ज़रूरत को पूरी करने से पहले, मेरी हर ज़रूरत के बारे में अच्छी तरह सोच विचार कर लिया करते. और यह सब उनके लिये बिल्कुल सामान्य बात थी. वे कहते कि हर माँ-बाप यही करते है. लेकिन मैं आज उनसे कहना चाहती हूँ कि नहीं मम्मी पापा हर माँ बाप आप जैसे नहीं हुआ करते. इव्हन मैं. मैं भी अपनी प्यारी बच्ची के लिये यह सब नहीं करती और न अपने परिवार के लिये…. क्यों? क्योंकि मैं नारी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जाने किस-किस स्वतंत्रत की छवि से बंधी हुई हूँ.“

वे कुछ पल के लिये खामोश हो गई. हर तरफ़ गहरा सन्नाटा छा गया. सारी आवाज़ें खामोश थी. हवा की रवानी रुक गई थी. पेड़ पौधे स्तब्ध से खड़े बात के आगे बढ़ने का इंतज़ार करने लगे. पेड़ पर बैठे परिंदो ने पर फ़ड़फ़ड़ाना बंद कर दिया. गहरी नीरवता छा गई. लगा उस इक पल में सारी कायनात थम गई…

“बंधी हुई… अरे हाँ ! बिल्कुल सही. यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मैं बंधी हुई हूँ. सारी स्वतंत्रता के बावजूद. स्वतंत्रता के सारे दावों के बावजूद. बंधन में हूँ… अपनी ही बनाई हुई छवि की कैदी हूँ. अपनी ही गढ़ी हुई काल्पनिक आज़ादी की दुनिया में कैद हूँ. मैंने अपनी सीमायें तोड़ी. अपनी मर्यादायें तोड़ी. परिवार और वैवाहिक जीवन में आस्था से मुक्त हो गई लेकिन कहाँ आकर कैद हो गई? स्वतंत्रता … कैसी स्वतंत्रता? कहाँ है स्वतंत्रता? क्या यह कल्पना मात्र है? क्या हम कभी स्वतंत्र नहीं हो सकते? कैसी विडम्बना है …?”

वे फिर रुकी. नेपकिन से, अपने गाल तक बह आये आँसुओं को पोछा और नज़र उठा कर गम्भीर जी की तरफ़ देखा जो सब कुछ भूल उन्हे एकटक देखे जारहे थे. फिर उन्होंने कहना जारी रखा “सॉरी… मैं ज़रा बहक गई थी. वह एक अलग तरह का संसार था. वहाँ परिवार सर्वोपरी था. वहाँ बहुत कुछ ऐसा था जिसका अभाव था. सुविधाओं का अभाव. लेकिन आश्चर्य की बात है कि कभी कमी महसूस नहीं होती. या शायद, सचमुच में हमें सुविधाओं की उतनी ज़रूरत नहीं होती जितनी हम महसूस करते है? और फिर सुख दुख वास्तव में है क्या? एक एहसास ! बस ! और संतान? वह तो सारे परिवार की प्राथमिकता होती. पापा कहते कि संसार के सारे सुख और सारे दुख संतान से ही होते है; भले वह मुँहबोली ही हो. जिसकी कोई संतान नहीं उसका सुख और उसका दुख दोनो भ्रम मात्र है. और बताते कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत संतान ही है; उसमें भी सबसे कीमती दौलत तो पुत्री ही है. इसी लिये उसे सबसे ज़्यादह हिफ़ाज़त की ज़रूरत होती है. जब बड़ी होने लगी तो माँ हमेशा लड़कों से मेल-जोल पर रोक-टोक करती. वह हमेशा कहती ‘अपनी सीमाये समझो.‘ मगर मुझे यह सीमाये समझ नहीं आती. ऐसे कपड़े पहनो वैसे मत पहनो ; ऐसी बातें मुझे बुरी लगने लगी.

“मुझे समझ ही नहीं आता कि माँ क्या चाहती है. और सच तो यह है कि मुझे कभी यह भी समझ में नहीं आता था कि मैं क्या चाहती हूँ. वह उम्र ही ऐसी होती है. वह उम्र थी जब इंसान अपने आप को पहचानने और अपनी पहचान बनाने की कोशिशों में लगा होता है. कितनी अजीब बात है कि यह सब हम अनजाने में ही करते रहते हैं? शायद हमारे जीन में इसकी प्रोग्रामिंग पहले से मौजूद होती है; हमारे जीन में. और शायद इसी लिये हम दूसरों की अवहेलना करने लगते है. क्योंकि इसी तरह हमें अपने अस्तित्व का बोध होता है. और इसी प्रक्रिया में हम अपने अस्तित्व पर विश्वास करना सीखते हैं. हम दुनिया को अपने अस्तित्व का बोध कराना चाहते है. अपनी एक छवि स्थापित करने में लगे होते है. दरअसल इस दुनिया में हर कोई जाने अनजाने में, अपनी छवि एक ताकतवर के रूप में स्थापित करना चाहता है. क्योंकि ताकतवर ही राज करता है. फिर यह ताकत चाहे दौलत के रूप में हो या इज़्ज़त के रूप में अथवा बुद्धिमत्ता के रूप में. वैसे भी कहा गया है- समर्थ को नहीं दोष गुसाई. ताकतवर ही जीतता है, ताकतवर का ही कानून लागू होता है और ताकतवर का ही सम्मान होता है. और शायद इसी लिये हर कोई ताकतवर की नकल करता है. इतिहास गवाह है कि पराजित कौमें हमेशा विजेता कौमों की नकल करती है और इस तरह से अपनी हीन भावना से मुक्ति पाती है; झूठी ही सही.

“तो इसी तरह हम मध्यम वर्ग के लोग भी हर बात में उच्च वर्ग की नकल करते है. चरित्र में, भाषा में और पहनावे में. और यही चीज़ हमें कमज़ोर करती है.

“तो जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, इसी धारा का हिस्सा बनने लगी. स्कूल के ज़माने से ही लड़के मेरे इर्द-गिर्द मंडराने लगे. यह मुझे अच्छा लगता. इससे मुझे अपने नारित्व का बोध होता. जबकि मेरी माँ का फ़रमान था कि शिक्षा पूरी होने तक कोई प्यार मोहब्बत का चक्कर नहीं… बल्कि इस बारे में सोचना भी नहीं. पिता का कहना था कि ‘यह सब बातें शिक्षा के लिये विष के समान है. पढ़ाई के दिनो में सिर्फ़ पढ़ाई करो, फिर अपने पैरो पे खड़े होओ फिर शादी ब्याह के बारे में सोचना है. तुम्हे आत्मनिर्भर बनना चाहिये. हर लड़की को आत्मनिर्भर बनना ही चाहिये.‘

“लेकिन … आखिर मैंने उनके सपनो को तोड़ दिया. मैंने शिक्षा बीच में छोड़ कर अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली. भले मेरी शादी एक हादसा थी. अचानक बिना सोचे समझे उठाया गया कदम. मुझे तब लगता था कि मैंने नारी मुक्ति के लिये बड़ा महान कार्य किया है. मैंने नारी के बंधनो को तोड़ दिया है. लेकिन शायद मैं गलत थी… शायद मैंने कुछ और ही तोड़ा था. मैंने शायद अपने माँ-बाप के सपनो को तोड़ा था. एक नारी होते हुए, एक नारी की, मेरी अपनी माँ की कुर्बानियों को मिट्टी में मिला दिया था. किस लिये? इस ज़िन्दगी के लिये …”

“आपने कुछ गलत नहीं किया. अपने आप को दोष न दें …” गम्भीर जी ने बात बीच में काटते हुए कहा “उन्होंने कुर्बानियाँ अपने सपनो के लिये दी थी. और किसी को भी हक नहीं कि वह अपने सपनो का बोझ आपके ऊपर लादे.“

“लेकिन वे सपने मेरे लिये थे. उनके लिये नहीं.“

“लेकिन थे तो उनके ही…”

“तो क्या माता पिता को अपनी संतान के लिये सपने देखने का अधिकार नहीं?”

“देखने का अधिकार है, लादने का नहीं.“

“लेकिन उनके पास इसकी ताकत भी नहीं होती. सिर्फ़ विश्वास होता है; अपनी संतान पर. क्या यह उनका कसूर है. क्या माता पिता को चाहिये कि सिर्फ़ अपने लिये सपने देखें, अपनी खुशियाँ अपनी मौज-मस्ती, अपने अधिकार. और संतान का क्या? क्या वे सिर्फ़ मौज-मस्ती का नतीजा है? क्या माता-पिता की ज़िम्मेदारी नहीं है. क्या मैं अपनी बेटी की बेहतर ज़िंदगी देने के लिये, बेहतर इंसान बनाने के लिये या जीवन के प्रति बेहतर दृष्टिकोण देने का अधिकार नहीं रखती. वह दृष्टिकोण जो मैंने कितनी गल्तियां करके और कितना कुछ खो कर पाया है. यह दृष्टिकोण जो मेरी जमा पूंजी है, जो मेरी विरासत है क्या इस विरासत को उसके वारिस को सौपना गलत है. वारिसों को उनकी विरासतों से दूर रखना कोई न्याय नहीं है, लेखक महोदय।“

पता नहीं गम्भीर जी ने मिसेज़ फ़ के अन्तिम वाक्य के व्यंग को समझा या नहीं; लेकिन वे आहत ज़रूर हुए. उन्हे कोई जवाब देते नहीं बना. यह उनकी कल्पना से परे था कि कोई उनसे ज़्यादह विचारशील, उनसे ज़्यादह तर्कशील हो सकता है.

एक बार फिर खामोशी छा गई.

“लेकिन मुझे अपनी कहानी पूरी करनी है …” मिसेज़ फ़ ने कुछ देर बाद फिर कहना शुरू किया.

“मेरे पिता के लिये वह सदमा असहनीय था. मुझसे धोखा खाते ही उन्होंने आत्महत्या करली थी. ‘मेरे पास जीने की अब कोई वजह ही नहीं बची, हाँ मरने की वजह ज़रूर पैदा हो गई है. मैं सिर्फ़ सर उठा कर ही जी सकता हूँ…’ उनकी सुसाइड नोट में लिखा था. मेरी माँ ने मेरी सूरत देखने से भी इंकार कर दिया. ‘तुमने मुझसे मेरा पति ही नहीं छीन लिया, मेरे जीने की वजह छीन ली. हम साथ-साथ जीना और साथ मरना चाहते थे, लेकिन तुमने उन्हे मजबूर किया कि मुझे अकेले छोड़ दें…’ अपने सुसाइड नोट में माँ ने मेरे लिये संदेश छोड़ा था. इससे पहले मुझे कभी यह अहसास नहीं हुआ कि वे एक दूसरे को इतना चाहते थे. उन्होंने अपने प्यार का कभी दिखावा नहीं किया. वे मेरे लिये सिर्फ़ माता और पिता ही थे. दो नीरस लोग, जिन्हें प्यार मुहब्बत की कोई समझ ही नहीं. लेकिन वो तो प्यार में मुझसे बाज़ी मार गये. क्या मैं किसी के लिये अपनी जान दे सकती हूँ? बेशक नहीं. शायद हम लोग प्यार करना ही नहीं जानते. प्यार हमारे लिये सिर्फ़ दिखावे की चीज़ है. और हम इसे सिर्फ़ अपनी सही गलत ख्वाहिशों को पूरा करने के लिये हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं.“

गम्भीर जी स्तब्ध थे. क्या-क्या छिपा है इस स्त्री के अंदर? कितने रूप हैं इसके? कितना अंतर है इसके प्रत्यक्ष और परोक्ष में? लेकिन अभी कितने रूप सामने आने बाकी है… …

“मैं शादी के बाद, मध्यम वर्ग को छोड़, कथित उच्च वर्ग या जैसा कि ये लोग कहते है ‘हाई सोसाईटी’ में आ गई थी. से लोग इसे मेरा सौभाग्य मानते हैं. कई लोग इसे मेरी महत्वकांक्षा कहते रहे है, जिसे मौका मिलते ही मैंने पूरी कर ली. हाँ मैं महत्वकांक्षी रही हूँ. मैंने अपनी महत्व्कांक्षा के लिये अपने माता-पिता को छोड़ा. उनकी शिक्षा, उनके सपने, उनकी खुद्दारी, उनके स्वाभिमान, उनका अत्मसम्मान, सब कुछ अपने पैरों तले रौंद कर यहाँ आई. लेकिन मुझे अपना कर क्या इस वर्ग ने मेरे साथ कोई उपकार किया है? इतना उदार नहीं यह वर्ग. यह तो अपने व्यवहार में सबसे क्रूर है. ये तो अपने वर्ग के सदस्यो को भी कच्चा चबाने पर आमादा लोगों का एक झुंड है. ये बिना मतलब किसी और को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? आप याद करें सामंतकाल में कैसे पुराने राजा-महाराजा सहित सभी समंत, सुंदर स्त्रियों से अपने महलों को सजाते थे. उन्हे हड़पने के लिये क्या क्या षड्यंत्र रचते थे. थोड़े बहुत हेर-फ़ेर के साथ यह मानसिकता आज भी मौजूद है. आज भी औरत, उसका सौंदर्य, दिखावे की चीज़ है. ज़माना बदला, व्यवस्थायें बदली, लोगों का रहन सहन बदला. लेकिन स्त्री के प्रति अधिकतर पुरुषों का दृष्टिकोण वही समंतकालीन है. हाँ, तरीके ज़रूर बदल गये हैं. शायद इनके तरीके कुछ सभ्य होगये है… सभ्य? या शायद आधुनिक शब्द ठीक रहेगा. जैसे-जैसे स्त्री अपनी स्थिति को मज़बूत कर रही है, वे स्त्री को प्रेम, प्रशंशा या आधुनिकता के भ्रमजाल में फ़साकर अपने वश में करने की कोशिश करते है. निचले वर्गों की बात और है. यहाँ इतना पैसा होकर भी …“

गम्भीर जी ने पहलू बदला. अब गम्भीर जी बेचैन होने थे. ‘यह तो कुछ ज़्यादह हो रहा है…’ गम्भीर जी के ज़ेहन में सवाल उठने लगे ‘ऐसा ही था तो वह सब क्या था जो अब तक हमारे बीच हुआ? आखिर क्या चीज़ है यह … क्या है इसके मन में? कितने चेहरे है इसके, और असली चेहरा क्या है इसका?’ हैरानी की बात है कि यह सब अब तक छिपा कैसे रहा.

“… मुझे तो लगता है, आज भी स्त्री का स्त्रीत्व, उसका आत्मसम्मन, उसका स्वाभिमान ही सारी धन-दौलत पर भारी है. और इसी को अपने सामने नत्-मस्तक देख ही ऐसे लोगों को आत्मसंतोष मिलता है ; लेकिन …”

“आप शायद मुझे अपनी कहानी सुनाने वाली थीं; लेकिन ये तो कुछ विचित्र सोच और मान्यताओं का ज़िक्र लेकर बैठ गईं है …” अब गम्भीर जी से रहा नहीं गया, इस लिये वे बोल उठे. ‘पता नहीं, कितना पाखंड है इस औरत में … क्या सति सावित्री बन रही है अभी …’ वे सोचने लगे.

“सॉरी ! मैं शायद अपने अतीत में मिले संस्कारों के कारण भावनाओं में बह गई थी. मैं अब शॉर्ट में खत्म करती हूँ ….“ मिसेज़ फ़ ने क्षमा याचना सी करते हुए कहा.

‘हुंह, ढोंगी कहीं की. मक्कार ….‘ नफ़रत से भर कर गम्भीर जी ने मन ही मन कहा.

“… तो इधर शुरुआती रोमान्टिक दिन खत्म हुए, मिस्टर फ़ का बिजनेस बढ़ने लगा. वे ज़्यादह व्यस्त रहने लगे. फिर बेटी के जनम के बाद तो वे ज़्यादातर विदेश भ्रमण पर रहने लगे, और मैं बिल्कुल तन्हा …. माँ-बाप तो रहे नहीं, और किसी के पास मेरे लिये समय नहीं. पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पैसों के अलावा भी इंसान की ज़रूरते होती है. इंसान की भावनात्मक आवश्यकतायें रिश्तों से ही पूरी होती है; पैसों से नहीं. मैं अकेली पड़ गई. पति से अकेलेपन की शिकायत करने पर वे बोले कि- ‘आखिर तुम्हारे लिये ही तो इतनी भाग दौड़ करता हूँ … तुम्हारे और हमारी बेटी के लिये …’ मैंने कहा- ‘हमारे पास बहुत है. मैं इतने में ही संतुष्ट हूँ. अपने आप को इतना हलाकान न करो. ज़रूरत लायक कमाओ. मैं कभी भी शिकायत नहीं करूंगी …’

“वे बोले ‘वह तो मैं जानता हूँ. तुम्हारे लिये तो वह भी बहुत होगा जितना हम अपने नौकरों को देते हैं. लेकिन मैं उनमें से नहीं हूँ, और न मेरी बेटी उनमें से है. मुझे तो ज़रूरत है. मेरी बेटी को ज़रूरत पड़ेगी. मैं उसे अच्छी से अच्छी ज़िन्दगी देना चाहता हूँ.‘

“मैं सन्न रह गयी.

“’यह क्या कह दिया तुमने. तुम्हारी नज़र में मेरी इतनी ही हैसियत है. तुम मुझे अपने नौकरो के बराबर समझते हो? अपने बराबर नहीं?’ मैं सुबकने लगी. वह बोले- ‘फिर तुम इन निचले तबके की मानसिकता से ऊपर क्यो नहीं आती? तुम्हे इतनी अच्छी लाईफ़ देरहा हू, फिर भी तुम डाऊन मार्केट सोसाईटी लोगों की तरह क्यो सोचती हो. तुम और बेहतर लाईफ़ नहीं चाहती? और आगे नहीं बढ़ना चाहती? और तरक्की नहीं चाहती…?’

“’किस कीमत पर?’ मैंने कहा. परिवार की कीमत पर? परिवार को तुम्हारे पैसों से ज़्यादह तुम्हारी ज़रूरत है.‘

“’परिवार के लिये ही तो कर रहा हूँ. अगर समय नहीं कटता तो औरो की तरह पार्टीज़ में जाओ, क्लब जाओ, शॉपिंग जाओ, लाईफ़ इंजॉय करो. पैसो की कोई रोक टोक नहीं है. यह नहीं होता तो सामाजिक काम करो. किसी एन जी ओ को जॉईन करलो. समय कट जायेगा.‘

“इस तरह मैं सामाजिक कार्य के लिये कदम बढ़ाया. पहले मैं, गरीबो के लिये काम करने वाली एक संस्था से जुड़ी लेकिन वहाँ के माहौल में मैं अपने आप को स्थापित नहीं कर पाई और उसे छोड़ दिया. फिर औरतों के अधिकारो के लिये काम करने वाली कई संस्थाओ में काम किया. लेकिन वहाँ भी राजनैतिक चालबाज़ियो से हार गई. फिर मैं इस संस्था से जुड़ी जिसमें मैं अभी हूँ. यहाँ आते ही मैंने अपने पिछले अनुभवों का फ़ायदा उठाकर अपनी स्थिति मज़बूत करनी शुरू कर दी. मैं यहाँ से हार कर नहीं जाना चाहती थी, सो मैंने हर दाव-पेच और हर सही गलत हथकण्डो का इस्तेमाल कर, एक-एक करके सारे पुराने लोगों को दरकिनार किया और सर्वेसर्वा बन बैठी. इस बीच मर्दों को उंगलियो पर नचाना, उनसे अपने मतलब साधना, इन सब बातों में मैं माहिर हो गई. मेरे कितने किस्से बने. मेरे पति तक भी पहुंचे तो ज़रूर होंगे. लेकिन वे चुप ही रहे. वे भी कोई दूध के धुले नहीं रहे थे. महिनो बिजनेस परपज़ से विदेश में बिताते थे. वे आखिर क्या कहते. लेकिन अभी कुछ दिन पहले जब वे विदेश दौरे से वापस आते ही मुझसे पूछा कि क्या मैं एच आई वी पॉज़िटिव हूँ तो मैंने कहा ‘हाँ’ बस इसके बाद हमारे रास्ते अलग हो गये …” वे रोते हुए बोली.

गम्भीर जी हैरान हो गये. बोले- “लेकिन आपने ऐसा क्यों कहा?”

“क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलना चाहती.“ वे बोली- “और मैं यही बात कल आपको बताना चाहती थी, बल्कि यही बता कर अपना दर्द बाटने आई थी. लेकिन बस यह सब हो गया …”

अब गम्भीर जी को काटो तो खून नहीं. उनका चेहरा पीला पड़ गया. वे निढाल होकर नीचे फ़र्श पर ही बैठ गये. एक पल में ही यह क्या हो गया. किसी ने बड़ी बेरहमी से उन्हे जाल में फ़साकर उनकी सारी खुशियां, जीवन की सारी उमंगे लूट ली. एक पल में ही वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. और वह ठगिनी जिसने उन्हे ठगा है, मौन नहीं है, शर्मिंदा नहीं है … वह बेझिझक कहे जारही है-

“मुझे एक व्यक्ति के बारे में जानकर ज़बर्दस्त झटका लगा. उस व्यक्ति से मेरे सम्बंध रहे हैं और मुझे पता चला कि वह एच आई वी से इन्फ़ेक्टेड है. मेरे तो होश उड़ गये. फिर मैंने अपना टेस्ट करवाया तो मैं भी पॉज़िटिव थी. वैसे तो यह बात गुप्त रखी जानी होती है. लेकिन डॉक्टर मेरे पति के पुराने परिचित निकले और फ़ोन करके उनसे अपना टेस्ट करवाने कह कर सब बात बता दिया था.“

“तुमने मुझे पहले से बताया क्यों नहीं …” गम्भीर जी लगभग चीख उठे.

“मैं तो बताना चाहती थी; आपने मौका ही नहीं दिया.“ मिसेज़ फ़ ने संयत स्वर में कहा.

“पता नहीं, मुझसे किस जनम का बदला लिया है?” गम्भीर जी ने झल्लाते हुए कहा- “जी में आता है… “

“अब आप मुझे दोष देना बंद करें. हम दोनो समझदार हैं और दोनो इस सम्बंध के खतरों से अच्छी तरह वाकिफ़ है.“ मिसेज़ फ़ बोली- “हमारे साथ जो कुछ हुआ या हमने जो कुछ किया उसके परिणाम के लिये हम खुद ज़िम्मेंदार हैं. क्या पता आप पहले से पॉज़िटिव हों और आपसे मुझे लगा हो…”

“क्या बक रही हो… बेशरम औरत !!!” गम्भीर जी चीख उठे.

“मैं क्या झूठ कह रही हूँ??? क्या जो आपकी लाईफ़ स्टाईल है, उसमें यह सम्भव नहीं है? आप दूसरों को दोष क्यों देते है? यह तो आपकी जीवन-शैली का ही परिणाम है.“

“लेकिन तुमने मुझे धोका दिया है, तुमने मेरी ज़िन्दगी तबाह कर दी. मैं तुम्हे क्या समझता था और तुमने मेरे साथ यह किया. तुम तो एक मायावी ठगिनी हो…. तुमने मुझे ठग लिया है.“

“हाँ मैं ठगिनी हूँ ! हाँ मैंने तुम्हे ठगा है ! तो क्या? मैं भी तो ठगी गई हूँ. मुझे जिसने यह इन्फ़ेक्शन दिया उसने भी तो मुझे नहीं बताया था … उसका क्या? हम सभी तो एक दूसरे को ठग रहे हैं…. एनिवे ! वेल्कम टू द वर्ल्ड ऑफ़ एड्स लेखक महोदय …”

गम्भीर जी हुमक हुमक कर रोये जारहे थे, बिल्कुल एक बच्चे की तरह. किसने उनके इस रूप की कल्पना की थी? इस समय कोई उन्हे देखता तो बिल्कुल नहीं मानता कि यही वह महान लेखक है. मिसेज़ फ़ उन्हे देखती रही. थोड़ी देर बाद वे उठी और चलने लगी फिर रुकी और एक ऐसा सवाल किया जिसकी गम्भीर जी इस समय कल्पना भी नहीं कर सकते थे- “क्या अब भी आप मेरे ऊपर उपन्यास लिखेंगे?”

गम्भीर जी हैरानी से उन्हे देखते रहे. यह क्या कह रही है. मुझे इस हाल में पहुंचा कर यह सवाल उठाने का क्या मतलब है.

मिसेज़ फ़ धीरे से मुस्कुराई, फिर हसने लगी और बोली- “अब यह रोना-धोना बंद करो. तुम्हे कुछ नहीं हुआ है, और न मुझे. मैंने झूठ कहा था. लेकिन अपना टेस्ट करवाते रहो ताकि अगर इन्फ़ेक्ट हो गये तो दूसरो को इन्फ़ेक्शन न दे दो. और इससे बचने का सबसे बेहतर तरीका है कि सुधर जाओ. अपनी इस लाईफ़ स्टाईल से बाज़ आओ.“ कहते हुए वह बाहर अपनी गाड़ी तक पहुंच गई. वह गाड़ी में बैठी और बिना एक बार भी पीछे देखे चल दी.

गम्भीर जी अपनी जगह बैठे, स्तब्ध से उसे जाते देखते रह गये. उन्हे समझ नहीं आरहा था अभी-अभी उनके साथ क्या हुआ. वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे रोयें या हसें …

“ठगिनी …” गम्भीर जी धीरे से बुद्बुदाये- “हाँ … ज़रूर … और उस उपन्यास का नाम होगा--- ठगिनी.“

उनका वास्तविक नाम कुछ और था, लेकिन साहित्य जगत में वे गम्भीर के नाम से विख्यात थे. कहानी लेखन, उपन्यास और फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखना, इन तीनो कामों में वे अपना लोहा मनवा ही चुके थे. बहुत कम उम्र में ही उन्होंने बहुत सी दौलत और शोहरत हासिल कर ली थी. साहित्य के बाज़ार में उनके नाम की अपनी ब्रांडवैल्यू थी. काम की कोई कमी नहीं थी. फ़िल्मकार तो उनके दरवाज़े पर लाईन लगाकर खड़े रहते ही थे; बड़े-बड़े प्रकाशक और छोटी छोटी पत्रिकाओं के सम्पादक भी उनसे नवाज़िश की उम्मीद रखते थे. और वे किसी को निराश भी नहीं किया करते. बड़े-बड़े पुरस्कार और सम्मान वे बटोर चुके थे, तथा हर सभा समारोह और गोष्ठियों का वे मुख्य आकर्षण हुआ करते. लोग उन्हे आग्रह पूर्वक बुलाते और उनके आगमन से अपने आप को वी आई पी समझने लगते.

ज़ाहिर है उन्होंने बहुत सी प्रॉपर्टी भी कर रखी थी. शहर में और शहर के बाहर कई मकान, दुकान, मॉल आदि के अलावा शहर के बाहर उनका अपना एक फ़ार्महाउस भी था जिसे वे अपने निजी कार्यों में इस्तेमाल करते. जब वे शहरी ज़िन्दगी से बेज़ार होजाते या अक्सर जब काम का बोझ ज़्यादा हो जाता, या कोई प्रोजेक्ट जल्दी पूरा करके देना होता तो वे अपना बोरिया बिस्तर समेटकर यहाँ डेरा जमा लेते और अपना मोबाईल बंद करके चौबीस घंटे काम में डूबे रहते. माफ़ कीजियेगा, चौबीस घंटे तो नहीं अलबत्ता दिन भर ज़रूर काम में जुटे रहते. हाँ शाम को अक्सर वे अपने एकांतवास का आनंद उठाया करते.

वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे; लेकिन कुछ बरस पहले एक कार एक्सिडेन्ट में माता-पिता भी नहीं रहे. अब वे इस दुनिया में नितांत अकेले रह गये थे.

परिस्थियाँ इंसान के चरित्र का निर्माण करती हैं. अब कम उम्र, धन, यश और आगे नाथ न पीछे पगहा; इन परिस्थितियों में गम्भीर जी के चरित्र का जैसा निर्माण होना था, वे बिल्कुल वैसे ही थे. शादी की उम्र तो निकली नहीं जारही थी, लेकिन शादी का उनका कोई इरादा भी नहीं था. बल्कि वे शादी ब्याह के इस बंधन में विश्वास भी नहीं रखते. हालांकि कई लड़कियां उनसे शादी की आस लगाये बैठी थीं. और कई तो इसी आशा में उन्हे अपना सब कुछ दे चुकी थीं. हालांकि गम्भीर जी ने किसी से कोई वादा नहीं किया था, और न किसी से अपने विचार छुपाये. वैसे भी विचार छुपाना उनकी फ़ितरत में ही नहीं था. इस सब के बावजूद ऊँची सोसाइटी की लड़कियाँ यह सोचती कि कभी तो यह बुत टूटेगा. पता नहीं किस बिल्ली के भाग से यह छींका टूटेगा, लेकिन रिस्क तो लेना ही है. और दाव पर जब गम्भीर जी जैसी सेलिब्रिटि है तो…

एक बार गम्भीर जी की मुलाकात मिसेज़ फ़लां फ़लां से हो गई. अब आप कहेंगे कि मिसेज़ फ़लां फ़लां भी कोई नाम हुआ, तो आप की बात सही है ऐसा कोई नाम नहीं होता लेकिन इस किरदार के लिये कोई नाम, कोई वास्तविक नाम जम नहीं रहा था इस लिये… चलिये इसे आगे हम मिसेज़ फ़ कहेंगे. तो, मिसेज़ फ़ से उनकी मुलाकात एक चैरिटी कार्यक्रम में हुई थी. यह आयोजन भी मिसेज़ फ़ का ही था. यह एड्स से प्रभावित लोगों के सहायतार्थ था. असल में मिसेज़ फ़ अपने एक एन जी ओ के ज़रिये एड्स पीड़ितों की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय सहायता के लिये प्रयासरत थीं. इतना ही नहीं, वे इनके मानवाधिकार, सामाजिक और सामान्य अधिकारों को लेकर भी काफ़ी मुखर थीं.

गम्भीर जी ने अपने किसी ख़ास मित्र के आग्रह पर ही यह आमन्त्रण स्वीकार किया था. वैसे भी वे अपने ख़ास मित्रों का आग्रह कभी नहीं ठुकरा पाते. यह बात और है के उनके ख़ास मित्र अक्सर महिलायें ही हुआ करतीं. इस कार्यक्रम में उन्होंने मिसेज़ फ़ को पहली बार देखा था.

मिसेज़ फ़ का व्यक्तित्व उन्हे काफ़ी आकर्षण और संभ्रांत स्वरूप प्रदान करता था. उनका ऊँचा कद और छरहरी काया, उनका ड्रेसिंग सेंस उनके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता था. हाई क्वालिटी के ड्रेस मटेरियल से बनी, बिना तड़क भड़क वाली महंगी साड़ियाँ और उसे पहनने का और उसे सम्हालने का उनका शालीन और संभ्रांत अंदाज़, उन्हे उच्च और उच्च मध्यम वर्ग की अन्य महिलाओं से बिलकुल अलग स्वरूप और गरिमा प्रदान करता है. चेहरे पर एक स्निग्ध सी मुस्कान, बिल्कुल नपी तुली हमेशा मौजूद रहती. न ज़्यादा लम्बी न ज़्यादा छोटी. यहाँ तक कि चेहरे के भाव भी बिल्कुल नपे तुले होते. आँखें आम तौर पर ज़ुबान का काम करतीं. जब वे खामोश रहतीं तो उनकी आँखें और चेहरे के हाव भाव बातें कर रहे होते; लेकिन जब वे बोलतीं…

…जब वे बोलतीं, तो सिर्फ़ वे ही बोलतीं. हवायें सरसराना बन्द कर देती. चिड़ियाँ चहकना भूल जातीं, साजिन्दे अपना साज़ परे रख देते. गो कि कायनात थम जाती. यह प्रभाव भी उनकी आवाज़ का नहीं; बल्कि उनकी बोलने की शैली और शब्दों के चयन का होता. मजाल है कोई उनके सामने ज़ुबान खोले. वहाँ ज़ुबान खोलना सूरज को दिया दिखाने जैसा होता. ज़ुबानें खुलतीं उनके पीठ पीछे. संभ्रांत और कुलीन घराने की महिलायें उन्हें नकचढ़ी, दिखावेबाज़ और मर्दों पर जादू करने वाली जादूगरनी जैसे खिताबों से नवाज़ कर अपनी कमियों और उनके सामने आने पर अपने अंदर महसूस होने वाली हीन भावना पर पर्दा डालतीं. लेकिन कुछ महिलायें उनकी पिछलग्गू बनकर अपने अंदर की हीन भावनाओं पर काबू पाती.

उस दिन गम्भीर जी, मिसेज़ फ़ से ज़्यादा बात नहीं कर पाये थे. मिसेज़ फ़ से उन्होंने आयोजन की खुलकर तारीफ़ की थी- “आपका आयोजन बहुत अच्छा था और उद्देश्य भी… मुझे यहाँ आकर बहुत खुशी हुई.“

“आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! आपके आगमन के कष्ट के लिये भी और आपके प्रोत्साहन के लिये भी.“ मिसेज़ फ़ का संतुलित जवाब था “आप जैसे सेलिब्रिटी के कीमती समय और समर्थन से हमारी संस्था को बहुत बल मिलता है और हम समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेंदारियों को बेहतर ढंग से निभा पाते हैं … एक बार फिर से धन्यवाद.“

गम्भीर जी के जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था. पहली बार उनका सामना किसी ऐसी महिला से हुआ था जो उनकी तारीफ़ से अप्रभावित रही और बिल्कुल नपा-तुला जवाब प्रस्तुत कर दिया.

‘यह टेढ़ी खीर लगती है.‘ गम्भीर जी ने मन में कहा लेकिन प्रगट में यही कहा “नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है; हमारा समय आपके सामाजिक सरोकार से ज़्यादह कीमती नहीं है. आप बेझिझक आधी रात को पुकारें, आप निराश नहीं होंगी.“

मिसेज़ फ़ मन ही मन मुस्कुरा उठीं. वे कोई कच्ची खिलाड़ी नहीं थीं. भले युवा शादीशुदा महिला थी, लेकिन मर्दों को हैंडल करना जानती थी और उनकी फ़ितरतों से खूब वाकिफ़ थी. लोगों को वह खुली किताब की तरह पढ़ना जानती थी. वह आपके शब्दों से ज़्यादह उसके पीछे छिपे आपके मनोभाव पर विश्वास करती थी. उन्होंने एक पल को गम्भीर जी की तरफ़ अर्थपूर्ण नज़रों से देखा और और अवसर को तुरंत लपक लिया- “तो, आशा करती हूँ आपका सहयोग यूँ ही बना रहेगा.“

“और मुझे भी आशा है कि सहयोग का सौभाग्य मुझे ज़रूर मिलेगा.“ गम्भीर जी ने भी अवसर को लपक लिया.

सो इस प्रकार यह खेल चल पड़ा.

इसके बाद गम्भीर जी को सौभग्य मिलने में ज़्यादह समय नहीं लगा. दूसरे दिन ही एक मरीज की आर्थिक सहायता हेतु मिसेज़ फ़ को गम्भीर जी की याद आ गई. गम्भीर जी ने भी इसे अपना सौभाग्य समझा और एक कॉल पर मिसेज़ फ़ की सेवा में हाज़िर हो गये और अपने योगदान में कोई कसर नहीं छोड़ी. वे मिसेज़ फ़ को प्रभावित करने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे.

मानना तो पड़ेगा जो बात इस औरत में है, वह शायद ही कहीं और देखने को मिले. गम्भीर जी को उस दिन यही ख़्याल आया. यही तो वह कैरेक्टर है जिसे मैं तलाश रहा था. एक दिन यह मेरे बेस्ट सेलर उपन्यास की नायिका होगी. जब गम्भीर जी ऐसा सोच रहे थे, वह नायिका एक हास्पिटल प्रशाशन की बखिया उधेड़ रही थी.

किस्सा यूँ था कि हास्पिटल प्रशासन की लापरवाही से एक एड्स पीड़ित की पहचान उजागर हो गयी थी; जिसका उसके जीवन पर बड़ा प्रतिकूल असर पड़ा था. वह अपनी जॉब से भी हाथ धो बैठा था, क्योंकि वहाँ सबको पता चल गया था. वह बेचारा परिस्थितियों से जूझ नहीं पाया और आत्महत्या कर बैठा था.

मिसेज़ फ़ को पहली बार इतना उखड़ा हुआ पाया था.

बढ़ती हुई नज़दीकियों ने कई बार गम्भीर जी को विचित्र स्थितियों में फंसा दिया था. जैसे कि उस दिन जब वे एक डाक्टर से उलझ गई. गम्भीर जी समझ नहीं पारहे थे कि मिसेज़ फ़ का समर्थन करें, विरोध करें या उन्हे समझायें.

इसके बाद वे किसी डॉक्टर से इस बात पर उखड़ गई कि एक एच आई वी पॉज़िटिव महिला को वह डॉक्टर सहवास संबंधित सलाह देरही थी. जबकि मिसेज़ फ़ का कहना था कि यह उस मरीज का निजी मामला है और इस बारे में निर्णय लेना उस महिला का अधिकार है. गम्भीर जी को लग रहा था कि वह डॉक्टर का उद्देश्य इस बीमारी को फैलने से रोकना था. लेकिन मिसेज़ फ़ प्रतिक्रिया से वे हत्प्रभ थे कि एक भारतीय महिला इस विषय में इतनी मुखर हो सकती है. खैर गम्भीर जी ने उस समय अपने विचारों को अपने अंदर ही समेट लिया.

तो इस तरह उनकी दूसरी मुलाकात हुई और मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन दूसरी मुलाकात ने गम्भीर जी को खासा बेचैन कर दिया था. गम्भीर जी के जीवन में हमेशा नई-नई महिलाये और युवतियाँ आती जाती रहतीं लेकिन जो बेचैनी वे मिसेज़ फ़ से मिलने के बाद वे अपने अंदर बड़ी बेचैनी महसूस करने लगे थे. क्या वह भी ऐसा ही महसूस करती होगी? हाँ! बिल्कुल ! उन्हे अपने आप पर काफ़ी गुमान था और यह सच भी है, महिलायें उनके लिये उनसे ज़्यादह बेचैन रहतीं. लेकिन, शायद मिसेज़ फ़ की बात कुछ और ही थी. इस बार खेल बराबरी का था. दोनो को अपने आप पर अत्यधिक गुमान था.

 

एक दिन गम्भीर जी ने उत्सुकतावश पूछ लिया “आप सामाजिक कार्यों में इतना बिज़ी रहती हैं, परिवार के लिये समय कैसे निकालती हैं?”

“क्या यह इतना ज़रूरी है?” मिसेज़ फ़ ने प्रतिप्रश्न कर डाला.

गम्भीर जी को इस प्रतिक्रिया की उम्मीद न थी. वे इस अकस्मिक प्रतिक्रिया से हड़बड़ा गये; लेकिन बात सम्हालते हुए बोले “नहीं… मेरा मतलब… आप शादी शुदा हैं…”

“मर्द भी तो शादी शुदा होते हैं, वे क्या बाहर नहीं निकलते? वे अपना कितना समय परिवार को देते हैं? उनसे कोई नहीं पूछता.“ मिसेज़ फ़ ने गम्भीर जी की बात काटते हुए कहा तो गम्भीर जी को कोई जवाब ही नहीं सूझा. वे समझ नहीं पाये क्या जवाब दूँ. उन्होंने रक्षात्मक रूप अपना लिया.

“आपके पति एतराज़ नहीं करते?”

“क्यों?” मिसेज़ फ़ का स्वर आक्रामक होगया. गम्भीर जी, गम्भीर रूप से घिर गये थे. वे अपनी सफ़ाई भी ठीक से नहीं दे पा रहे थे. सो उन्होंने बात बदलना ही ठीक समझा.

“नहीं… मेरा यह मतलब नहीं था…” वे इतना ही बोल पाये.

“नहीं, नहीं. आप सफ़ाई मत दीजिये. इसमें आपका कोई कसूर नहीं. आप भी तो मर्द ही है फिर आपकी सोच बाकी मर्दों से अलग कैसे हो सकती है, आपकी भी वही सोच रहेगी.“ मिसेज़ फ़ ने उसी अंदाज़ में कहा.

“बिल्कुल नहीं !” अब गम्भीर जी ने दमदार तरीके से अपनी बात रखी “ऐसा बिल्कुल नहीं है. आप मुझे जानती हैं. आप मेरा सारा साहित्य उठाकर देख लीजिये. मैं औरतों की आज़ादी का प्रबल समर्थक हूँ. मैंने अपने साहित्य में हमेशा स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के पक्ष में ही बात की है. इससे भी बढ़कर मैं नारी सशक्तिकरण का पक्षधर हूँ. और इसी लिये ही मैं आपका प्रशंसक हूँ.“

अब मिसेज़ फ़ को जैसे अपनी गल्ती का अहसास हुआ. यह क्या कर रही है; उसने अपने आप को उलाहना दिया. ऐसे समर्थक और सपोर्टर आसानी से नहीं मिला करते. उसने बात सम्हालने की कोशिश की “नहीं, नहीं, सॉरी… दरअसल यह प्रश्न इतनी बार मेरे सामने आता है न, मैं इसीलिये उखड़ गई थी. असल में अक्सर ऐसे प्रश्न मुझे हर्ट करने के लिये ही पूछे जाते हैं, लेकिन आपका ऐसा इरादा नहीं था, इतना तो मैं समझ सकती हूँ.“

मिसेज़ फ़ की इस बात ने गम्भीर जी को सहज कर दिया. वे बोले “एक्चुअलि मेरे मन में एक जिज्ञासा थी कि आपको समाज में यह मुकाम हासिल करने में काफ़ी स्ट्रगल करना पड़ा होगा. आपकी राह में कई रुकावटें आई होंगी, आपने उन्हे कैसे पार किया होगा वगैरह वगैरह ….“ गम्भीर जी ने अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करने की कोशिश की “देखिये, आप तो जानती हैं, आप जैसे सशक्त नारी किरदार मेरे साहित्य को कितना प्रभावित करते हैं.“

“अच्छा छोड़िये.“ मिसेज़ फ़ ने इस वार्तालाप को हल्का करने की गरज़ से कहा “मैं आपके सवाल का सही सही जवाब दे देती हूँ…” उन्होंने आगे कहा “वे एतराज़ नहीं करते. उन्हे मेरी व्यस्तता से कोई कष्ट नहीं होता.“

“वाह बड़े सपोर्टिव हैं मिस्टर फ़.“ गम्भीर जी प्रभावित होते हुए बोले.

“दरअसल… “ वे बोलीं “वे खुद इतने व्यस्त रहते हैं कि मेरे व्यस्त रहने से उन्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.“

दोनों चुप हो गये.

 

एक दिन मिसेज़ फ़ और गम्भीर जी होटल में ब्रेकफ़ास्ट ले रहे थे. अक्टूबर महिने का मध्यकाल था. दशहरा गुज़र चुका था और दीपावली की तैयारियाँ चल रही थीं. बाज़ार दीपावली की आगवानी में लगा हुआ था. इस साल मानसून भी अच्छा रहा था. बाज़ार भी अच्छा रहने की सम्भावना थी. इसलिये भी हर तरफ़ उत्साह और उमंग का माहौल था. कभी दिन थे कि जनमानस बाज़ार को प्रभावित करता था, आज कल बाज़ार जनमानस को प्रभावित करने लगा है. यह बाज़ार की जनसाधारण पर एतिहासिक जीत थी. अब इसे विकास समझा जाने लगा था. हालांकि यह विकास ही था, लेकिन किसका? जनसाधारण तो यहाँ हारा हुआ था. तूती तो बाज़ार की बोल रही थी. पुराने आदर्श अब पिछड़ेपन की निशानी बन गये थे और चरित्र की दृढ़ता, उपहास की चीज़ बन चली थी. इस दौर के सिर्फ़ दो ही आदर्श थे, एक- उपभोग, दूसरा- मुनाफ़ा. इस दौर के वे दोनो आदर्श प्राणी थे.

मौसम भी खुशनुमा था. न गर्मी थी न सर्दी. दिन उजला-उजला था लेकिन तपिश का नामोंनिशां नहीं. अपने अपने क्षेत्र के सफल इन दोनो प्राणियों पर माहौल का असर साफ़ नज़र आ रहा था. दोनो प्रफ़ुल्लित थे, और हल्की फुल्की बातें कर रहे थे.

“आपने अब तक शादी क्यों नहीं की?” मिसेज़ फ़ के अंदर की स्त्री उनके व्यक्तित्व के आडम्बरों को तोड़ कर बाहर आने लगी.

“देखिये अब आप एक घिसा पिटा सवाल मेरे सामने लारही हैं. मैं भी उखड़ जाऊँगा….“ गम्भीर जी ने भी विनोद के स्वर में कहा. दोनो हंस पड़े. “बस ऐसे ही.“ गम्भीर जी ने बात पूरी की.

“कर लेनी चाहिये.“ मिसेज़ फ़ ने कहा.

“क्यों? क्या मेरी आज़ादी पसंद नहीं?“

“वह बात नहीं है.“

“फिर क्या बात है?”

“बड़ी खुश किस्मत होगी जो आप से शादी करेगी.“

“क्यों?”

“आपकी पत्नी आपके साथ बड़ी खुश रहेगी.“

“आपको ऐसा लगता है?”

“बिल्कुल …”

“मुझे तो नहीं लगता.“

“आप शादी करके तो देखिये.“ मिसेज़ फ़ ने इसरार किया.

“मुझे शादी में विश्वास नहीं.“ गम्भीर जी ने जवाब दिया.

“क्यों?” वे बोली.

“बस ! नहीं है.“ वे इतना ही बोले.

“शादी से डरते हैं?” मिसेज़ फ़ ने गम्भीर जी की आँखों में झाँकते हुए पूछा.

“नहीं, मैं किसी बात से नहीं डरता.“ गम्भीर जी ने उखड़ते हुए कहा.

“फिर क्या बात है?” मिसेज़ फ़ ने मुस्कुराते हुए पूछा. मिसेज़ फ़ की मुस्कान ने गम्भीर जी के उखड़े हुए मूड को हल्का कर दिया. मन की कड़वाहट चली गयी और मन फिर प्रफ़ुल्लित होगया.

“पता नहीं. बस, मैं किसी रिश्ते में बंधना नहीं चाहता.“ गम्भीर जी ने अपनी बात स्पष्ट की.

“ज़िम्मेदारी उठाने से बचना चाहते हैं?” मिसेज़ फ़ ने, गम्भीर जी से सच्चाई स्वीकार करवाने की नाकाम कोशिश की. गम्भीर जी सचेत हो गये. लगता है यह मेरी नस पकड़ना चाहती है. मैं तो सिर्फ़ अपने लिये यहाँ सम्भावना तलाश रहा था. लेकिन वे भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे. “ऐसा नहीं है…” वे बोले “बस, मैं इसकी ज़रूरत नहीं समझता.“

‘लेकिन मैं आपको खूब समझती हूँ, लेखक महोदय …’ मिसेज़ फ़ ने मन में सोचा लेकिन प्रकट में अंजान बनने की कोशिश की “मतलब?” उन्होंने अंजान बनते हुए पूछा.

“मतलब कुछ नहीं है. बस मैं कोई ऐसा कमिटमेंट नहीं करना चाहता जिससे मैं किसी एक का असीर हो जाऊँ और अपने ….“ मिसेज़ फ़ को लगा कि वे अपने मक्सद में कुछ हद तक कामयाब हो चली है; अत: बात बीच में काटते हुए बोली-

“क्या आप ऐसा सोचते है कि शादी गुलामी है?”

“नहीं, मैं ऐसा सोचता हूँ कि यह एक बेकार की चीज़ है.“

 

“मैं आपके ऊपर एक उपन्यास लिख रहा हूँ.“ एक दिन गम्भीर जी ने मिसेज़ फ़ से बताया तो मिसेज़ फ़ को यह मज़ाक लगा.

“आप लेखक हैं, इस लिये ऐसे मज़ाक कर लेते हैं. लेकिन मैं आप को बता दूँ कि ऐसे मज़ाक किसी के दिल को ठेस पहुंचा सकते हैं.“ उन्होंने कहा.

“लेकिन इसमें ठेस वाली क्या बात है? मैं कोई मीडिया रिपोर्ट तो नहीं बना रहा. मैं तो बस एक उपन्यास लिख रहा हूँ; आप जिसकी नायिका हैं.“

“आर यू सीरियस? क्या आप सच कह रहे हैं?”

“हाँ, बिल्कुल!”

“ओह, आई एम सॉरी! मुझे लगा आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं.“

“आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं? क्या अपने प्रति मेरी भावनाओं को आप नहीं जानतीं.“

“लेकिन मैं ऐसे भी कैसे सोच सकती हूँ कि देश का इतना बड़ा लेखक मुझ पर लिखे.“

“आप खुद को अंडर एस्टिमेंट कर रही हैं.“

“नहीं. लेकिन आपने मुझमें ऐसा क्या देख लिया?” मिसेज़ फ़ बोलते हुए खुशी के अतिरेक से खिलखिला उठी और इससे गम्भीर जी ने परम संतोष का अनुभव किया. इस खुशी पर कुछ भी कुर्बान कर दूँ तो कम है.

“आप मेरी नज़र से अपने आप को देखें तभी समझ पायेंगी.“

“आप ने ऐसा क्या देख लिया मुझमें?”

“आप जैसी महिला मैंने दूसरी नहीं देखी. आप जैसी बोल्ड और आधुनिक विचारों वाली महिला की तो भारतीय समाज में कल्पना तक नहीं की जा सकती.“

मिसेज़ फ़ मन ही मन मुस्कुरा उठी. उन्हे अहसास होगया था कि यह उनका जादू ही है जो इस लेखक के सर चढ़ कर बोल रहा है. इस अहसास से वे गर्व और आत्मविश्वास के अतिरेक से भर उठी. यह अहसास उनकी देह भाषा पर साफ़ नज़र आने लगा.

 

और कुछ महिने बीतते बीतते मिसेज़ फ़, गम्भीर जी के जज़्बात पर हावी होने लगी. अब वे अपने नाम के अनुसार काफ़ी गम्भीर लगने लगे थे और दूसरी महिलाओं में भी उनकी कोई रुचि नहीं रह गई थी. उन्होंने कई बार सोचा कि मिसेज़ फ़ से हाल-ए-दिल कह दें; लेकिन कहें क्या? सच तो यह है कि वे खुद नहीं जानते थे कि वे चाहते क्या है. एक तो वे शादीशुदा महिला थी और गम्भीर जी के अनुमान के अनुसार वे अपने वैवाहिक जीवन से काफ़ी सुखी और संतुष्ट थी. और यदि ऐसा नहीं भी होता तो क्या कहते? क्या वे किसी बंधन में बंधने के लिये तैयार है? बिल्कुल नहीं ! फिर यह कैसी अनबूझ सी प्यास थी … और इसका असर उनके काम पर भी पड़ने लगा. एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट और एक उपन्यास का काम भी काफ़ी पिछड़ने लगा तो गम्भीर जी ने अपना शहर का आशियाना छोड़ दिया और अपने फ़ार्म हाऊस पर चले गये.

लेकिन यहाँ भी वे अपने काम में मन नहीं लगा पा रहे थे. एक बेचैनी थी, ऐसी बेचैनी कि जिस पर खुद उन्हे कोई काबू नहीं था.

वह फ़रवरी महीने की शुरुआत थी. यानि बसंत का मौसम …. खुशनुमा धूप जिसमें सिर्फ़ नूर था, तपिश का नाम-ओ-निशां नहीं. गम्भीर जी अपने फ़ार्म हाऊस के सामने गुलाब की क्यारियों में गुलाब के तैंतीस किस्म के गुलाब अपनी खूबसूरती और खुशबू से वातावरण को और खुशनुमा कर रहे थे. हरे भरे लॉन के चारों ओर मौसमी फ़ूलों की क्यारियों में रंगबिरंगे फूल खिले थे. लेकिन इन सब का गम्भीर जी के दिलो दिमाग को पर उल्टा ही असर पड़ रहा था. वे तरो ताज़ा महसूस करने के बजाय और ज़्यादह उदासी महसूस करने लगे थे. वे सारा दिन कोशिश करने के बावजूद एक शब्द नहीं लिख पा रहे थे. आखिर दोपहर के भोजन के बाद उन्होंने एक झपकी लेने का फ़ैसला किया और सोने चले गये. शायद एक नींद, दिल दिमाग को फिर ताकत दे दे. लेकिन वे यहाँ भी कामयाब नहीं हुए और लैपटॉप पकड़ कर, मिसेज़ फ़ पर लिखे जा रहे अपने नये उपन्यास की रूपरेखा पर काम करने बैठ गये. लेकिन मिसेज़ फ़ की बातें याद कर वे और ज़्यादह उदासी महसूस करने लगे और लैपटॉप को बंद कर आँखें मूंद कर सोफ़ा पर ही लेट गये.

शाम हो चली थी. गम्भीर जी बरामदे में कुर्सी डाले अपना लैपटॉप पकड़े दूर क्षितिज पर नज़रे गड़ाये बैठे आसमान के बदलते हुए रंगो का खेल देख रहे थे जब उन्हें लगा जैसे कोई बिन मांगी मुराद मिल गई हो, जैसे टूटा हुआ कोई सपना पूरा हो गया हो. वह मिसेज़ फ़ की कार थी जो उनके फ़ार्म हाऊस के अहाते में प्रविष्ट हो रही थी. मिसेज़ फ़ खुद कार चला रही थीं …

वह रात मुरादों की रात थी. ख्वाबों के सजने और सच हो जाने की रात. मिसेज़ फ़ और गम्भीर जी ने साथ में खाना खाया, छत पर बैठ खुले अनगिनत तारों से भरे झिलमिलाते आसमान तले बैठकर शैम्पेन पी, और बेडरूम में आकर एक दूसरे में डूब गये. उस रात उन्होंने एक दूसरे को अपना सब कुछ दे दिया और सब कुछ पा लिया. यहाँ तक कि रात थक कर चूर हो गई. अंतत: थकी मांदी रात ने उनसे विदा ली और सुबह के कदमों की आहट सुनाई देने लगी.

मिसेज़ फ़ सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर तैयार हो गई. वे बिल्कुल तरोताज़ा लग रही थी. रात के कोई तास्सुरात कोई निशान उनके चेहरे पर नुमाया न थे. मानो यह निशान भी पानी और साबुन से धुल गये हों. या जैसे कल की रात उनकी ज़िंदगी में कभी आई ही न हो. गम्भीर जी अभी बिस्तर में ही थे जब वे जाने के लिये तैयार थी. वह गम्भीर जी को उठाना नहीं चाहती थी लेकिन गम्भीर जी को अनुमान हो गया और वे उठ बैठे. गम्भीर जी आज एक अलग ही अह्सास से दो चार थे. पिछली रात जैसी कई रातें उनकी ज़िंदगी में आई और गई लेकिन यह अहसास उनके लिये बिल्कुल नया था. एक अपराध बोध कहीं सर उठा रहा था; मन के किसी कोने में. पहली बार उन्हे ऐसा लगा जैसे किसी पवित्र चीज़ को छू कर अपवित्र कर दिया हो. जैसे जिस मूरत को पूजा, फिर उसी को तोड़ दिया हो. ऐसा क्यों? वे नहीं समझ पा रहे थे. आज से पहले तक तो मिसेज़ फ़ उनके लिये एक ऐसी मछली थी जो आसानी से नहीं फंसती … लेकिन आज जब वह मछली खुद ही आ फ़सी तो दिलो दिमाग में यह कैसी हलचल? यह कैसी प्रतिक्रिया थी.

वे मिसेज़ फ़ को नाश्ते के लिये रोकना चाह रहे थे; लेकिन उनका सामना करने से डर रहे थे. आखिर जब वह जाने लगी तो बड़ी मुश्किल से गम्भीर जी के मुख से निकला- “सॉरी ….“

“सॉरी? सॉरी फ़ॉर व्हाट?” मिसेज़ फ़ हैरान थी.

“रात … रात के लिये …”

“गम्भीर जी ! मैं समझती थी कि हम दोनो ने इसे इन्जॉय किया. फिर यह सॉरी किस लिये? मैं तो समझती थी कि आप खुले विचारों वाले व्यक्ति हैं. और जहाँ तक मैं जानती हूँ आप कोई दूध के धुले नहीं है. बल्कि इस खेल के तो आप मंझे हुए खिलाड़ी हैं. आप ऐसा मत दिखाईये कि आप इसे गलत समझते हैं. ऐसा करके आप मुझे शर्मिन्दा करना चाहते हैं. लेकिन लेखक महोदय! सो कॉल्ड महान लेखक जी मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं. क्योकि हम दोनो समझदार हैं और दोनो की सहमति से हुआ है, जो कुछ हुआ है. अगर आप इसे गलत समझते हैं तो यह करके आपने पाप किया है. निश्चित रूप से पाप किया है. लेकिन मैंने नहीं … क्योंकि यह मेरी नज़र में पाप नहीं है.“ वे उखड़ गई और अपना पर्स उठा कर तेज़ी से बाहर को लपकी. गम्भीर जी भी पीछे पीछे लपके. “मेरा यह मतलब नहीं है. दरअसल मैं आपके लिये परेशान हूँ.“ वे बोले.

“मेरी चिंता मत कीजिये मैं जिस काम के लिये गिल्टी फ़ील करूँ वह काम करती ही नहीं.“

“ऐसा नहीं है. मैं तो इस बात के लिये परेशान हूँ कि घर में आप किन किन परेशानियो का सामना करेंगी. और यह सब मेरे कारण आपको झेलना पड़ेगा.“

“इसके लिये आप क्यों फ़िक्र कर रहे हैं?” मिसेज़ फ़ ने हंसकर प्यार से झिड़की दी “मैं सम्हाल लूँगी, आप फ़िक्र न करें.“ रुक कर फिर बोली “वैसे, अच्छा लगा. मेरी फ़िक्र करने के लिये थैंक्स !”

“मेरे कारण आपको झूट बोलना पड़ेगा.“ गम्भीर जी ने जैसे क्षमा याचना के स्वर में कहा.

“कितना अच्छा लगता है जब कोई आपकी फ़िक्र करे, थैंक्स अगेन. फिर भी आप निश्चित जानिये ऐसा कुछ नहीं होगा.“

“और आपके पति? वे तो शहर में ही है न ….“

“उन्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.“ मिसेज़ फ़ के मुख से अनायास निकला जिससे वे खुद ही चौंक उठी और तुरंत “अच्छा मैं चलती हूँ…” कहकर जाने लगी.

“क्या मतलब?” गम्भीर जी ने रास्ता रोकते हुए कहा.

“कुछ नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.“ मिसेज़ फ़ हड़बड़ाई.

“कोई बात कैसे नहीं है? कोई ऐसी बात यूँ ही नहीं कह बैठता.“ गम्भीर जी को आशा की किरण सी नज़र आई.

“आप को इस बात से मतलब नहीं होना चाहिये. देखिये हर सम्बंध की एक सीमा होती है.“

“देखिये ! मैं कोई सीमा नहीं तोड़ना चाहता, लेकिन मैं समझता हूँ कि हम इतने अच्छे दोस्त हैं कि अपना-अपना दर्द एक दूसरे से शेयर कर सकते हैं.“

“लेकिन मैं शेयर नहीं करना चाहती.“

“पर मैं आपके बारे में जानना चाहता हूँ. आप भूल रही है मैं आप पर ही एक उपन्यास लिख रहा हूँ. आपके हर संघर्ष को लिखना चाहता हूँ. आपके जीवन के हर पहलू को जानना, और समझना मेरे लिये ज़रूरी है.“ गम्भीर जी ने ज़ोर देकर कहा. मिसेज़ फ़ कुछ पल मौन खड़ी रही फिर यकायक अपने पैरों में भीषण कमज़ोरी महसूस करने लगी और लड़खड़ा कर बैठ गईं.

“कुछ समय पहले … सब खत्म हो गया. बस अब हम दोनो नाम के ही पति पत्नी है. बस एक दूसरे की लाज बचाने के लिये यह रिश्ता निभाये जा रहे है, वर्ना न मेरी किसी बात से उन्हे फ़र्क पड़ता है और न उनकी किसी बात पर मुझे कोई फ़र्क पड़ता है.“ मिसेज़ फ़ सिसकने लगी. गम्भीर जी वहीं पास में बैठ गये, मिसेज़ फ़ का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाने लगे. शायद वे कहना चाहते थे कि- मैं हूँ आपके साथ; लेकिन कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये.

थोड़ी देर बाद मिसेज़ फ़ ने स्वयं ही कहा “आप मुझे जानना चाहते है न?”

गम्भीर जी ने हाँ में सिर हिलाया.

“मैं जानती हू कि आप मुझ पर उपन्यास लिखना चाहते है; और इस लिहाज़ से आपको मेरी कहानी में रुचि होना स्वाभाविक भी है. और कल मैं इसी उद्देश्य से आई थी, लेकिन …”

“जो कुछ हुआ, वह स्वाभाविक था. हमने कुछ सोचा नहीं, हमने कुछ चाहा नहीं, बस अपने आप हो गया.“ गम्भीर जी ने तसल्ली देने की कोशिश की.

“हाँ, मैं जानती हूँ; और मुझे इसका कोई मलाल भी नहीं. क्या हम सचमुच यही नहीं चाहते थे. क्या आपके मन में भी यह कामना नहीं पल रही थी.“ मिसेज़ फ़ ने कहा.

“हाँ, यह सच है; और इसे स्वीकर करने में मुझे कोई हिचकिचाहट भी नहीं. और मुझे कोई अफ़सोस भी नहीं; बल्कि, मैं तो खुश हूँ.“ गम्भीर जी ने जोड़ा.

“अफ़सोस तो आपको होगा. मेरी कहानी सुनने के बाद आप इस बात पर अफ़सोस ज़रूर करेंगे…”

“कहानियां तो मैं लिखता हूँ. ऐसी क्या बात है, आपकी कहानी में?” गम्भीर जी बोले.

मिसेज़ फ़ बोली तो बोलती चली गई…

“मैं किसी उच्चवर्ग या हाई सोसाइटी की बेटी नहीं हूँ. मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय या कहिये निम्न मध्यमवर्गीय घराने में हुआ. पिता एक कारखाने के कर्मचारी थे. माँ, सीधी सादी घरेलू महिला. आप लोग सोच सकते है कि, एक कारखाने के कर्मचारी की लाईफ़ बड़ी तक़लीफ़देह होगी. लेकिन इन उच्चवर्गीय अवधारणाओ के विपरीत हमारी ज़िंदगी बड़ी खुशहाल थी. कम से कम आज के मेरे जीवन से तो बहुत अच्छी ज़िंदगी थी वह. हमारे पास सुविधाओं की कमी थी, लेकिन सलाहियतें बेशुमार थी. बल्कि अपनी सलाहियतों के दम पर ही हम खुशहाल थे. मेरे पापा बहुत मेहनती और इमानदार इंसान थे. वे बड़े धीर गम्भीर और बिल्कुल सुलझे हुए विचारों वाले व्यक्ति थे. मुझे हमेशा लगता था कि वे बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति हैं. उनके पास मेरे हर सवाल का स्पष्ट जवाब हमेशा रहता. वे कभी भी कनफ़्यूज़्ड नहीं लगते. ज़रा से भी नहीं. उन्हे पढ़ने पढ़ाने का शौक था और वे हमेशा अध्ययन करते रहते. मुझे लगता जैसे वे मेरे सामने आने वाले सवालो की ही पूर्व तैयारी में लगे रहते. वे एक आदर्श पिता थे और मेरे आदर्श. मैं हमेशा सोचती मैं उनके जैसी बनूगी. वे मुझे हमेशा पढ़ाई लिखाई के लिये प्रोत्साहित करते. वे हमेशा मुझे समझाते- ‘पढ़ो ! खूब पढ़ो ! अच्छी नौकरी के लिये नहीं, परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने के लिये नहीं, रुपया पैसा कमाने के लिये नहीं; ज्ञान हासिल करने के लिये. पैसा तो अनपढ़ इंसान भी कमा लेता है, लेकिन वह एक पढ़े लिखे इंसान जैसा व्यक्तित्व हासिल नहीं कर सकता.‘

“मैं मंत्रमुग्ध सी उनकी बातों को सुनती. मैं घंटो बैठी उनकी बातें सुन सकती थी. उनकी बातों से कभी बोर नहीं हो सकती थी. मुझे हमेशा लगता वे दुनिया के सबसे विलक्षण इंसान है. ‘फिर वे इतने प्रसिद्ध क्यों नहीं है, जैसे और महान लोग होते है. उन्हे प्रसिद्ध होना चाहिये मैं हमेशा सोचती.‘ लेकिन वे आम मध्यमवर्गीय लोगों की तरह, चमक दमक से दूर सीदी सादी ज़िन्दगी पसन्द करते. मेरी मां, आम मधयमवर्गीय माँओं की तरह थी. उसकी ज़िन्दगी मेरे पिता और मेरी ज़रूरतों के इर्द-गिर्द ही सीमित थी. उसकी सोच और विचारो का दायरा बस मैं ही थी और कुछ हद तक मेरे पिता. पहले मैं समझा करती कि मेरी माँ एक बेकार सी स्त्री हैं; जिसे घर के काम और बेटी पर हुक्म चलाने के सिवा और कुछ नहीं आता. इस बात के बावजूद कि मुझे घर में पढ़ाने लिखाने और होमवर्क आदि करवाने का काम वही करती; मुझे वह एक अनपढ़ महिला ही लगती थी. मुझे यह जानने में काफ़ी समय लग गया कि मेरी माँ न कि खुद एक पढ़ी लिखी महिला थी, बल्कि वह किसी स्कूल में अंग्रेज़ी विषय की प्रध्यापक रही और ग्यारहवी और बारहवी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाती रही. जब मैं बड़ी होने लगी तो मेरी अच्छी परवरिश और शिक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने के लिये उन्होंने न सिर्फ़ अपना कैरियर छोड़ दिया बल्कि अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को भी तिलांजली दे दी. कुल मिलाकर मैं ही अपने माता पिता की हर गतिविधी का केंद्र बिंदु रहती. मैं हमेशा देखती, मेरी छोटी से छोटी सफलता उनके लिये बड़ी खुशी का कारण बनती. वे अपनी हर ज़रूरत को पूरी करने से पहले, मेरी हर ज़रूरत के बारे में अच्छी तरह सोच विचार कर लिया करते. और यह सब उनके लिये बिल्कुल सामान्य बात थी. वे कहते कि हर माँ-बाप यही करते है. लेकिन मैं आज उनसे कहना चाहती हूँ कि नहीं मम्मी पापा हर माँ बाप आप जैसे नहीं हुआ करते. इव्हन मैं. मैं भी अपनी प्यारी बच्ची के लिये यह सब नहीं करती और न अपने परिवार के लिये…. क्यों? क्योंकि मैं नारी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जाने किस-किस स्वतंत्रत की छवि से बंधी हुई हूँ.“

वे कुछ पल के लिये खामोश हो गई. हर तरफ़ गहरा सन्नाटा छा गया. सारी आवाज़ें खामोश थी. हवा की रवानी रुक गई थी. पेड़ पौधे स्तब्ध से खड़े बात के आगे बढ़ने का इंतज़ार करने लगे. पेड़ पर बैठे परिंदो ने पर फ़ड़फ़ड़ाना बंद कर दिया. गहरी नीरवता छा गई. लगा उस इक पल में सारी कायनात थम गई…

“बंधी हुई… अरे हाँ ! बिल्कुल सही. यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मैं बंधी हुई हूँ. सारी स्वतंत्रता के बावजूद. स्वतंत्रता के सारे दावों के बावजूद. बंधन में हूँ… अपनी ही बनाई हुई छवि की कैदी हूँ. अपनी ही गढ़ी हुई काल्पनिक आज़ादी की दुनिया में कैद हूँ. मैंने अपनी सीमायें तोड़ी. अपनी मर्यादायें तोड़ी. परिवार और वैवाहिक जीवन में आस्था से मुक्त हो गई लेकिन कहाँ आकर कैद हो गई? स्वतंत्रता … कैसी स्वतंत्रता? कहाँ है स्वतंत्रता? क्या यह कल्पना मात्र है? क्या हम कभी स्वतंत्र नहीं हो सकते? कैसी विडम्बना है …?”

वे फिर रुकी. नेपकिन से, अपने गाल तक बह आये आँसुओं को पोछा और नज़र उठा कर गम्भीर जी की तरफ़ देखा जो सब कुछ भूल उन्हे एकटक देखे जारहे थे. फिर उन्होंने कहना जारी रखा “सॉरी… मैं ज़रा बहक गई थी. वह एक अलग तरह का संसार था. वहाँ परिवार सर्वोपरी था. वहाँ बहुत कुछ ऐसा था जिसका अभाव था. सुविधाओं का अभाव. लेकिन आश्चर्य की बात है कि कभी कमी महसूस नहीं होती. या शायद, सचमुच में हमें सुविधाओं की उतनी ज़रूरत नहीं होती जितनी हम महसूस करते है? और फिर सुख दुख वास्तव में है क्या? एक एहसास ! बस ! और संतान? वह तो सारे परिवार की प्राथमिकता होती. पापा कहते कि संसार के सारे सुख और सारे दुख संतान से ही होते है; भले वह मुँहबोली ही हो. जिसकी कोई संतान नहीं उसका सुख और उसका दुख दोनो भ्रम मात्र है. और बताते कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत संतान ही है; उसमें भी सबसे कीमती दौलत तो पुत्री ही है. इसी लिये उसे सबसे ज़्यादह हिफ़ाज़त की ज़रूरत होती है. जब बड़ी होने लगी तो माँ हमेशा लड़कों से मेल-जोल पर रोक-टोक करती. वह हमेशा कहती ‘अपनी सीमाये समझो.‘ मगर मुझे यह सीमाये समझ नहीं आती. ऐसे कपड़े पहनो वैसे मत पहनो ; ऐसी बातें मुझे बुरी लगने लगी.

“मुझे समझ ही नहीं आता कि माँ क्या चाहती है. और सच तो यह है कि मुझे कभी यह भी समझ में नहीं आता था कि मैं क्या चाहती हूँ. वह उम्र ही ऐसी होती है. वह उम्र थी जब इंसान अपने आप को पहचानने और अपनी पहचान बनाने की कोशिशों में लगा होता है. कितनी अजीब बात है कि यह सब हम अनजाने में ही करते रहते हैं? शायद हमारे जीन में इसकी प्रोग्रामिंग पहले से मौजूद होती है; हमारे जीन में. और शायद इसी लिये हम दूसरों की अवहेलना करने लगते है. क्योंकि इसी तरह हमें अपने अस्तित्व का बोध होता है. और इसी प्रक्रिया में हम अपने अस्तित्व पर विश्वास करना सीखते हैं. हम दुनिया को अपने अस्तित्व का बोध कराना चाहते है. अपनी एक छवि स्थापित करने में लगे होते है. दरअसल इस दुनिया में हर कोई जाने अनजाने में, अपनी छवि एक ताकतवर के रूप में स्थापित करना चाहता है. क्योंकि ताकतवर ही राज करता है. फिर यह ताकत चाहे दौलत के रूप में हो या इज़्ज़त के रूप में अथवा बुद्धिमत्ता के रूप में. वैसे भी कहा गया है- समर्थ को नहीं दोष गुसाई. ताकतवर ही जीतता है, ताकतवर का ही कानून लागू होता है और ताकतवर का ही सम्मान होता है. और शायद इसी लिये हर कोई ताकतवर की नकल करता है. इतिहास गवाह है कि पराजित कौमें हमेशा विजेता कौमों की नकल करती है और इस तरह से अपनी हीन भावना से मुक्ति पाती है; झूठी ही सही.

“तो इसी तरह हम मध्यम वर्ग के लोग भी हर बात में उच्च वर्ग की नकल करते है. चरित्र में, भाषा में और पहनावे में. और यही चीज़ हमें कमज़ोर करती है.

“तो जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, इसी धारा का हिस्सा बनने लगी. स्कूल के ज़माने से ही लड़के मेरे इर्द-गिर्द मंडराने लगे. यह मुझे अच्छा लगता. इससे मुझे अपने नारित्व का बोध होता. जबकि मेरी माँ का फ़रमान था कि शिक्षा पूरी होने तक कोई प्यार मोहब्बत का चक्कर नहीं… बल्कि इस बारे में सोचना भी नहीं. पिता का कहना था कि ‘यह सब बातें शिक्षा के लिये विष के समान है. पढ़ाई के दिनो में सिर्फ़ पढ़ाई करो, फिर अपने पैरो पे खड़े होओ फिर शादी ब्याह के बारे में सोचना है. तुम्हे आत्मनिर्भर बनना चाहिये. हर लड़की को आत्मनिर्भर बनना ही चाहिये.‘

“लेकिन … आखिर मैंने उनके सपनो को तोड़ दिया. मैंने शिक्षा बीच में छोड़ कर अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली. भले मेरी शादी एक हादसा थी. अचानक बिना सोचे समझे उठाया गया कदम. मुझे तब लगता था कि मैंने नारी मुक्ति के लिये बड़ा महान कार्य किया है. मैंने नारी के बंधनो को तोड़ दिया है. लेकिन शायद मैं गलत थी… शायद मैंने कुछ और ही तोड़ा था. मैंने शायद अपने माँ-बाप के सपनो को तोड़ा था. एक नारी होते हुए, एक नारी की, मेरी अपनी माँ की कुर्बानियों को मिट्टी में मिला दिया था. किस लिये? इस ज़िन्दगी के लिये …”

“आपने कुछ गलत नहीं किया. अपने आप को दोष न दें …” गम्भीर जी ने बात बीच में काटते हुए कहा “उन्होंने कुर्बानियाँ अपने सपनो के लिये दी थी. और किसी को भी हक नहीं कि वह अपने सपनो का बोझ आपके ऊपर लादे.“

“लेकिन वे सपने मेरे लिये थे. उनके लिये नहीं.“

“लेकिन थे तो उनके ही…”

“तो क्या माता पिता को अपनी संतान के लिये सपने देखने का अधिकार नहीं?”

“देखने का अधिकार है, लादने का नहीं.“

“लेकिन उनके पास इसकी ताकत भी नहीं होती. सिर्फ़ विश्वास होता है; अपनी संतान पर. क्या यह उनका कसूर है. क्या माता पिता को चाहिये कि सिर्फ़ अपने लिये सपने देखें, अपनी खुशियाँ अपनी मौज-मस्ती, अपने अधिकार. और संतान का क्या? क्या वे सिर्फ़ मौज-मस्ती का नतीजा है? क्या माता-पिता की ज़िम्मेदारी नहीं है. क्या मैं अपनी बेटी की बेहतर ज़िंदगी देने के लिये, बेहतर इंसान बनाने के लिये या जीवन के प्रति बेहतर दृष्टिकोण देने का अधिकार नहीं रखती. वह दृष्टिकोण जो मैंने कितनी गल्तियां करके और कितना कुछ खो कर पाया है. यह दृष्टिकोण जो मेरी जमा पूंजी है, जो मेरी विरासत है क्या इस विरासत को उसके वारिस को सौपना गलत है. वारिसों को उनकी विरासतों से दूर रखना कोई न्याय नहीं है, लेखक महोदय।“

पता नहीं गम्भीर जी ने मिसेज़ फ़ के अन्तिम वाक्य के व्यंग को समझा या नहीं; लेकिन वे आहत ज़रूर हुए. उन्हे कोई जवाब देते नहीं बना. यह उनकी कल्पना से परे था कि कोई उनसे ज़्यादह विचारशील, उनसे ज़्यादह तर्कशील हो सकता है.

एक बार फिर खामोशी छा गई.

“लेकिन मुझे अपनी कहानी पूरी करनी है …” मिसेज़ फ़ ने कुछ देर बाद फिर कहना शुरू किया.

“मेरे पिता के लिये वह सदमा असहनीय था. मुझसे धोखा खाते ही उन्होंने आत्महत्या करली थी. ‘मेरे पास जीने की अब कोई वजह ही नहीं बची, हाँ मरने की वजह ज़रूर पैदा हो गई है. मैं सिर्फ़ सर उठा कर ही जी सकता हूँ…’ उनकी सुसाइड नोट में लिखा था. मेरी माँ ने मेरी सूरत देखने से भी इंकार कर दिया. ‘तुमने मुझसे मेरा पति ही नहीं छीन लिया, मेरे जीने की वजह छीन ली. हम साथ-साथ जीना और साथ मरना चाहते थे, लेकिन तुमने उन्हे मजबूर किया कि मुझे अकेले छोड़ दें…’ अपने सुसाइड नोट में माँ ने मेरे लिये संदेश छोड़ा था. इससे पहले मुझे कभी यह अहसास नहीं हुआ कि वे एक दूसरे को इतना चाहते थे. उन्होंने अपने प्यार का कभी दिखावा नहीं किया. वे मेरे लिये सिर्फ़ माता और पिता ही थे. दो नीरस लोग, जिन्हें प्यार मुहब्बत की कोई समझ ही नहीं. लेकिन वो तो प्यार में मुझसे बाज़ी मार गये. क्या मैं किसी के लिये अपनी जान दे सकती हूँ? बेशक नहीं. शायद हम लोग प्यार करना ही नहीं जानते. प्यार हमारे लिये सिर्फ़ दिखावे की चीज़ है. और हम इसे सिर्फ़ अपनी सही गलत ख्वाहिशों को पूरा करने के लिये हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं.“

गम्भीर जी स्तब्ध थे. क्या-क्या छिपा है इस स्त्री के अंदर? कितने रूप हैं इसके? कितना अंतर है इसके प्रत्यक्ष और परोक्ष में? लेकिन अभी कितने रूप सामने आने बाकी है… …

“मैं शादी के बाद, मध्यम वर्ग को छोड़, कथित उच्च वर्ग या जैसा कि ये लोग कहते है ‘हाई सोसाईटी’ में आ गई थी. से लोग इसे मेरा सौभाग्य मानते हैं. कई लोग इसे मेरी महत्वकांक्षा कहते रहे है, जिसे मौका मिलते ही मैंने पूरी कर ली. हाँ मैं महत्वकांक्षी रही हूँ. मैंने अपनी महत्व्कांक्षा के लिये अपने माता-पिता को छोड़ा. उनकी शिक्षा, उनके सपने, उनकी खुद्दारी, उनके स्वाभिमान, उनका अत्मसम्मान, सब कुछ अपने पैरों तले रौंद कर यहाँ आई. लेकिन मुझे अपना कर क्या इस वर्ग ने मेरे साथ कोई उपकार किया है? इतना उदार नहीं यह वर्ग. यह तो अपने व्यवहार में सबसे क्रूर है. ये तो अपने वर्ग के सदस्यो को भी कच्चा चबाने पर आमादा लोगों का एक झुंड है. ये बिना मतलब किसी और को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? आप याद करें सामंतकाल में कैसे पुराने राजा-महाराजा सहित सभी समंत, सुंदर स्त्रियों से अपने महलों को सजाते थे. उन्हे हड़पने के लिये क्या क्या षड्यंत्र रचते थे. थोड़े बहुत हेर-फ़ेर के साथ यह मानसिकता आज भी मौजूद है. आज भी औरत, उसका सौंदर्य, दिखावे की चीज़ है. ज़माना बदला, व्यवस्थायें बदली, लोगों का रहन सहन बदला. लेकिन स्त्री के प्रति अधिकतर पुरुषों का दृष्टिकोण वही समंतकालीन है. हाँ, तरीके ज़रूर बदल गये हैं. शायद इनके तरीके कुछ सभ्य होगये है… सभ्य? या शायद आधुनिक शब्द ठीक रहेगा. जैसे-जैसे स्त्री अपनी स्थिति को मज़बूत कर रही है, वे स्त्री को प्रेम, प्रशंशा या आधुनिकता के भ्रमजाल में फ़साकर अपने वश में करने की कोशिश करते है. निचले वर्गों की बात और है. यहाँ इतना पैसा होकर भी …“

गम्भीर जी ने पहलू बदला. अब गम्भीर जी बेचैन होने थे. ‘यह तो कुछ ज़्यादह हो रहा है…’ गम्भीर जी के ज़ेहन में सवाल उठने लगे ‘ऐसा ही था तो वह सब क्या था जो अब तक हमारे बीच हुआ? आखिर क्या चीज़ है यह … क्या है इसके मन में? कितने चेहरे है इसके, और असली चेहरा क्या है इसका?’ हैरानी की बात है कि यह सब अब तक छिपा कैसे रहा.

“… मुझे तो लगता है, आज भी स्त्री का स्त्रीत्व, उसका आत्मसम्मन, उसका स्वाभिमान ही सारी धन-दौलत पर भारी है. और इसी को अपने सामने नत्-मस्तक देख ही ऐसे लोगों को आत्मसंतोष मिलता है ; लेकिन …”

“आप शायद मुझे अपनी कहानी सुनाने वाली थीं; लेकिन ये तो कुछ विचित्र सोच और मान्यताओं का ज़िक्र लेकर बैठ गईं है …” अब गम्भीर जी से रहा नहीं गया, इस लिये वे बोल उठे. ‘पता नहीं, कितना पाखंड है इस औरत में … क्या सति सावित्री बन रही है अभी …’ वे सोचने लगे.

“सॉरी ! मैं शायद अपने अतीत में मिले संस्कारों के कारण भावनाओं में बह गई थी. मैं अब शॉर्ट में खत्म करती हूँ ….“ मिसेज़ फ़ ने क्षमा याचना सी करते हुए कहा.

‘हुंह, ढोंगी कहीं की. मक्कार ….‘ नफ़रत से भर कर गम्भीर जी ने मन ही मन कहा.

“… तो इधर शुरुआती रोमान्टिक दिन खत्म हुए, मिस्टर फ़ का बिजनेस बढ़ने लगा. वे ज़्यादह व्यस्त रहने लगे. फिर बेटी के जनम के बाद तो वे ज़्यादातर विदेश भ्रमण पर रहने लगे, और मैं बिल्कुल तन्हा …. माँ-बाप तो रहे नहीं, और किसी के पास मेरे लिये समय नहीं. पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पैसों के अलावा भी इंसान की ज़रूरते होती है. इंसान की भावनात्मक आवश्यकतायें रिश्तों से ही पूरी होती है; पैसों से नहीं. मैं अकेली पड़ गई. पति से अकेलेपन की शिकायत करने पर वे बोले कि- ‘आखिर तुम्हारे लिये ही तो इतनी भाग दौड़ करता हूँ … तुम्हारे और हमारी बेटी के लिये …’ मैंने कहा- ‘हमारे पास बहुत है. मैं इतने में ही संतुष्ट हूँ. अपने आप को इतना हलाकान न करो. ज़रूरत लायक कमाओ. मैं कभी भी शिकायत नहीं करूंगी …’

“वे बोले ‘वह तो मैं जानता हूँ. तुम्हारे लिये तो वह भी बहुत होगा जितना हम अपने नौकरों को देते हैं. लेकिन मैं उनमें से नहीं हूँ, और न मेरी बेटी उनमें से है. मुझे तो ज़रूरत है. मेरी बेटी को ज़रूरत पड़ेगी. मैं उसे अच्छी से अच्छी ज़िन्दगी देना चाहता हूँ.‘

“मैं सन्न रह गयी.

“’यह क्या कह दिया तुमने. तुम्हारी नज़र में मेरी इतनी ही हैसियत है. तुम मुझे अपने नौकरो के बराबर समझते हो? अपने बराबर नहीं?’ मैं सुबकने लगी. वह बोले- ‘फिर तुम इन निचले तबके की मानसिकता से ऊपर क्यो नहीं आती? तुम्हे इतनी अच्छी लाईफ़ देरहा हू, फिर भी तुम डाऊन मार्केट सोसाईटी लोगों की तरह क्यो सोचती हो. तुम और बेहतर लाईफ़ नहीं चाहती? और आगे नहीं बढ़ना चाहती? और तरक्की नहीं चाहती…?’

“’किस कीमत पर?’ मैंने कहा. परिवार की कीमत पर? परिवार को तुम्हारे पैसों से ज़्यादह तुम्हारी ज़रूरत है.‘

“’परिवार के लिये ही तो कर रहा हूँ. अगर समय नहीं कटता तो औरो की तरह पार्टीज़ में जाओ, क्लब जाओ, शॉपिंग जाओ, लाईफ़ इंजॉय करो. पैसो की कोई रोक टोक नहीं है. यह नहीं होता तो सामाजिक काम करो. किसी एन जी ओ को जॉईन करलो. समय कट जायेगा.‘

“इस तरह मैं सामाजिक कार्य के लिये कदम बढ़ाया. पहले मैं, गरीबो के लिये काम करने वाली एक संस्था से जुड़ी लेकिन वहाँ के माहौल में मैं अपने आप को स्थापित नहीं कर पाई और उसे छोड़ दिया. फिर औरतों के अधिकारो के लिये काम करने वाली कई संस्थाओ में काम किया. लेकिन वहाँ भी राजनैतिक चालबाज़ियो से हार गई. फिर मैं इस संस्था से जुड़ी जिसमें मैं अभी हूँ. यहाँ आते ही मैंने अपने पिछले अनुभवों का फ़ायदा उठाकर अपनी स्थिति मज़बूत करनी शुरू कर दी. मैं यहाँ से हार कर नहीं जाना चाहती थी, सो मैंने हर दाव-पेच और हर सही गलत हथकण्डो का इस्तेमाल कर, एक-एक करके सारे पुराने लोगों को दरकिनार किया और सर्वेसर्वा बन बैठी. इस बीच मर्दों को उंगलियो पर नचाना, उनसे अपने मतलब साधना, इन सब बातों में मैं माहिर हो गई. मेरे कितने किस्से बने. मेरे पति तक भी पहुंचे तो ज़रूर होंगे. लेकिन वे चुप ही रहे. वे भी कोई दूध के धुले नहीं रहे थे. महिनो बिजनेस परपज़ से विदेश में बिताते थे. वे आखिर क्या कहते. लेकिन अभी कुछ दिन पहले जब वे विदेश दौरे से वापस आते ही मुझसे पूछा कि क्या मैं एच आई वी पॉज़िटिव हूँ तो मैंने कहा ‘हाँ’ बस इसके बाद हमारे रास्ते अलग हो गये …” वे रोते हुए बोली.

गम्भीर जी हैरान हो गये. बोले- “लेकिन आपने ऐसा क्यों कहा?”

“क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलना चाहती.“ वे बोली- “और मैं यही बात कल आपको बताना चाहती थी, बल्कि यही बता कर अपना दर्द बाटने आई थी. लेकिन बस यह सब हो गया …”

अब गम्भीर जी को काटो तो खून नहीं. उनका चेहरा पीला पड़ गया. वे निढाल होकर नीचे फ़र्श पर ही बैठ गये. एक पल में ही यह क्या हो गया. किसी ने बड़ी बेरहमी से उन्हे जाल में फ़साकर उनकी सारी खुशियां, जीवन की सारी उमंगे लूट ली. एक पल में ही वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. और वह ठगिनी जिसने उन्हे ठगा है, मौन नहीं है, शर्मिंदा नहीं है … वह बेझिझक कहे जारही है-

“मुझे एक व्यक्ति के बारे में जानकर ज़बर्दस्त झटका लगा. उस व्यक्ति से मेरे सम्बंध रहे हैं और मुझे पता चला कि वह एच आई वी से इन्फ़ेक्टेड है. मेरे तो होश उड़ गये. फिर मैंने अपना टेस्ट करवाया तो मैं भी पॉज़िटिव थी. वैसे तो यह बात गुप्त रखी जानी होती है. लेकिन डॉक्टर मेरे पति के पुराने परिचित निकले और फ़ोन करके उनसे अपना टेस्ट करवाने कह कर सब बात बता दिया था.“

“तुमने मुझे पहले से बताया क्यों नहीं …” गम्भीर जी लगभग चीख उठे.

“मैं तो बताना चाहती थी; आपने मौका ही नहीं दिया.“ मिसेज़ फ़ ने संयत स्वर में कहा.

“पता नहीं, मुझसे किस जनम का बदला लिया है?” गम्भीर जी ने झल्लाते हुए कहा- “जी में आता है… “

“अब आप मुझे दोष देना बंद करें. हम दोनो समझदार हैं और दोनो इस सम्बंध के खतरों से अच्छी तरह वाकिफ़ है.“ मिसेज़ फ़ बोली- “हमारे साथ जो कुछ हुआ या हमने जो कुछ किया उसके परिणाम के लिये हम खुद ज़िम्मेंदार हैं. क्या पता आप पहले से पॉज़िटिव हों और आपसे मुझे लगा हो…”

“क्या बक रही हो… बेशरम औरत !!!” गम्भीर जी चीख उठे.

“मैं क्या झूठ कह रही हूँ??? क्या जो आपकी लाईफ़ स्टाईल है, उसमें यह सम्भव नहीं है? आप दूसरों को दोष क्यों देते है? यह तो आपकी जीवन-शैली का ही परिणाम है.“

“लेकिन तुमने मुझे धोका दिया है, तुमने मेरी ज़िन्दगी तबाह कर दी. मैं तुम्हे क्या समझता था और तुमने मेरे साथ यह किया. तुम तो एक मायावी ठगिनी हो…. तुमने मुझे ठग लिया है.“

“हाँ मैं ठगिनी हूँ ! हाँ मैंने तुम्हे ठगा है ! तो क्या? मैं भी तो ठगी गई हूँ. मुझे जिसने यह इन्फ़ेक्शन दिया उसने भी तो मुझे नहीं बताया था … उसका क्या? हम सभी तो एक दूसरे को ठग रहे हैं…. एनिवे ! वेल्कम टू द वर्ल्ड ऑफ़ एड्स लेखक महोदय …”

गम्भीर जी हुमक हुमक कर रोये जारहे थे, बिल्कुल एक बच्चे की तरह. किसने उनके इस रूप की कल्पना की थी? इस समय कोई उन्हे देखता तो बिल्कुल नहीं मानता कि यही वह महान लेखक है. मिसेज़ फ़ उन्हे देखती रही. थोड़ी देर बाद वे उठी और चलने लगी फिर रुकी और एक ऐसा सवाल किया जिसकी गम्भीर जी इस समय कल्पना भी नहीं कर सकते थे- “क्या अब भी आप मेरे ऊपर उपन्यास लिखेंगे?”

गम्भीर जी हैरानी से उन्हे देखते रहे. यह क्या कह रही है. मुझे इस हाल में पहुंचा कर यह सवाल उठाने का क्या मतलब है.

मिसेज़ फ़ धीरे से मुस्कुराई, फिर हसने लगी और बोली- “अब यह रोना-धोना बंद करो. तुम्हे कुछ नहीं हुआ है, और न मुझे. मैंने झूठ कहा था. लेकिन अपना टेस्ट करवाते रहो ताकि अगर इन्फ़ेक्ट हो गये तो दूसरो को इन्फ़ेक्शन न दे दो. और इससे बचने का सबसे बेहतर तरीका है कि सुधर जाओ. अपनी इस लाईफ़ स्टाईल से बाज़ आओ.“ कहते हुए वह बाहर अपनी गाड़ी तक पहुंच गई. वह गाड़ी में बैठी और बिना एक बार भी पीछे देखे चल दी.

गम्भीर जी अपनी जगह बैठे, स्तब्ध से उसे जाते देखते रह गये. उन्हे समझ नहीं आरहा था अभी-अभी उनके साथ क्या हुआ. वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे रोयें या हसें …

“ठगिनी …” गम्भीर जी धीरे से बुद्बुदाये- “हाँ … ज़रूर … और उस उपन्यास का नाम होगा--- ठगिनी.“

 

 

अपने बारे मे. . .

अपने बारे मे मै क्या लिखूं? मैं कभी समझ नही पाता हूँ, और शायद इसी लिए मै कहानियाँ लिखता हूँ ; और इन्हीं मे अपने आप को तलाशता हूं । मै इनसे अलग हूं भी नही, फिर अलग से क्या कहूँ. . . .
यह उन दिनों की बातें हैं, जब दिन सुनहरे हुआ करते और आसमान नीला । बिल्कुल साफ शफ्फाक । मै एक विशिष्ट शहर भिलाई का रहने वाला हूं; और भिलाई के ऊपर उन दिनो आसमान बिलकुल खुला खुला सा हुआ करता, और इसके दक्षिण में क्षितिज पर एक तसवीर थी बहुत सारी चिमनियों और कुछ विचित्र आकृतियों की । वे रहस्यमयी चिमनियां , अकसर बहुत सारा गाढ़ा गाढ़ा धुआँ उगलती । कभी दूध सा उजला सफेद, कभी गेरुआ लाल जिसके बारे मे मुझे लगता कि उस सफेद धुयें मे ही ईट पीसकर मिला देते होंगे और कभी काला धुआँ, जो मै सोचता कि ज़रूर, चिमनी के नीचे डामर(कोलतार) जलाया जारहा होगा जैसे सङक पर बिछाने के लिए जलाते हैं ।
"वो क्या है?" मै पूछता ।
"वो कारखाना है ।" दादा दादी बताया करते "तेरे अब्बा वहीं काम करते हैं ।"
मेरे अब्बा एक विशिष्ट इनसान थे, वे अथक संघर्षशील, मृदुभाषी और मुस्कुराकर बात करने वाले थे । उन जैसा दूसरा इनसान मैने दूसरा नही देखा । वे जहाँ जाते लोग उनसे प्यार करने लगते । उनके व्यक्तित्व मे जादू था ।
जादू तो उन रातों का भी कम न था, जब अंधेरे के दामन पर जगह पुराने दौर के बिजली के लैम्प पोस्ट के नीचे धुंधली पीली रौशनी के धब्बे पङ जाते । जब कोई चीज उन धब्बों से होकर गुज़रती तो नज़र आने लगती और बाहर होती तो गायब होजाती । एक और जादू आवाज़ का होता । रात की खामोशी पर कुछ रहस्यमयी आवाज़ें तैरती . . . . जैसे - ए विविध भारती है. . . या हवा महल. . . . और बिनाका गीतमाला की सिग्नेचर ट्यून या अमीन सयानी की खनकती शानदार आवाज़ ।
ये आवाज़ें रेडियो से निकलती और हर खास ओ आम के ज़हन पर तारी हो जाती । मेरे खयाल से उन बङे बङे डिब्बों  (रेडियो) मे छोटे छोटे लोग कैद थे जो बिजली का करंट लगने पर बोलने और गाने लगते । और उन्हें देखने के लिये मै रेडियो मे झांकता और डाट खाता कि- करंट लग जायेगा । अब्बा जब रेडियो को पीछे से खोलकर सफाई या और कोई काम करते तो मै उसमे अपना सिर घुसाकर जानने की कोशिश करता कि वे छोटे छोटे लोग किस जगह होंगे , एकाध बार मै रहस्योदघाटन के बिलकुल करीब पहुँच भी गया लेकिन हर बार अब्बा डाटकर भगा देते । क्या अब्बा को यह राज़ मालूम था ? मै अब तक नही जान पाया ।
किसी रात जब हम बाहर सोते तो आसमान पर अनगिनत तारों को मै गिनने की कोशिश करता । ठीक है वे अनगिनत हैं , फिर भी इनकी कोई तादाद तो होगी । मै उन्हे गिनकर दुनिया को उनकी तादाद बता दूंगा, फिर कोई नही कहेगा कि आसमान मे अनगिनत तारे होते हैं । अफसोस !! हर बार मुझे नींद आ जाती और मै यह काम अब तक पूरा नही कर पाया और अब तो शहर के आसमान पर गिनती के तारे होते हैँ, जिन्हें ढूँढ ढूँढ कर गिनना पङता है ; लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं कि आसमान में अनगिनत तारे हैं । खैर!
रातें जब सर्दी की होतीं, हम दादा दादी के साथ अपनी बाङी मे छोटी सी आग जलाकर आग तापते आस पङोस के और बच्चे भी आ जाते और दादा दादी की कहानियों का दौर शुरू हो जाता । दादी के पास उमर अय्यार की जम्बिल के नाम से कहानियों का खजाना था और उमर अय्यार मेरा पसंदीदा कैरेक्टर था । कई बार वो मोहम्मद हनीफ की कहानियां भी सुनाती । दादा की कहानियाँ मुख्तलिफ होती और वे मुझे अब भी याद हैं, उन्हें मैने अपने बच्चों को उनके बचपन मे सुनाई ।
हम बी एस पी के क्वार्टर में रहते जहां हमारे क्वार्टर के पीछे ही गणेशोत्सव होता । जिसमे नाटक, आरकेस्ट्रा जैसे कई आयोजन होते । बस यहीं से नाटक का शौक पैदा हुआ और इसके लिए मैने एक नाटक(एकांकी-प्रहसन) लिखा 'कर्ज़' इसका मंचन हुआ तब मै कक्षा छठवीं मे था । इसके बाद ज़िंदगी मे कई अकस्मिक मोड़ आये जिन्हे बताने के लिये बहुत वक्त और बहुत जगह की दरकार है । तो मुख्तसर मे यही कि नवमी कक्षा मे मै एक साप्ताहिक मे संवाददाता बन गया । दसवीं मे था तब पहली कहानी ‘क ख ग घ …’ प्रकाशित हुई जो जलेस की बैठक मे खूब चर्चा मे आई । तभी रेडिओ से एक कहानी प्रसारित हुई जिसके लिये पहली बार मानदेय प्राप्त हुआ । लेकिन लेखक बनने और दुनिया भर मे घुमते रहने के मेरे सपने ने मेरे घर मे मुझे भारी संकट मे डाल दिया । मेरे अब्बा से मेरे रिश्ते बिगड़ गये, वे चाहते थे कि मै अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाऊं, खूब तालीम हासिल करूं और उसके बाद बी एस पी मे नौकरी करूं । वे मुझसे बहुत ज़्यादह उम्मीद रखते थे और अपने टूटे हुये ख्वाबों को मेरी ज़िंदगी मे साकार होते देखना चाहते थे, तो वे कुछ गलत नही चाहते थे, क्योंकि बेटे की कहानी तो बाप की कहानी का ही विस्तार होती है । लेकिन मेरे अपने अब्बा से रिश्ते बिगड़ गये और यह हाल तब तक रहा जब उस दिन सुबह – सुबह मेरी अम्मी बद हवास सी मुझे जगा रही थी । नींद से जागते ही पता चला मेरे सर से आसमान छिन गया है; सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई । तीन बहन और तीन भाईयों मे सबसे बड़ा बेटा था मै । अब्बा, जो हमेशा मेरी फ़िक्र मे रहते थे और मै यह बात अच्छी तरह जानते हुये भी कभी उनसे कहता नही, उस रात ट्रक एक्सिडेंट मे दुनियां से रुख्सत हुये तो हम दोनो के बीच बातचीत तक बंद थी । मै अपने दिल की बात उन्हे बताना चाहता था लेकिन …… वह हादसा मेरी ज़िंदगी का बड़ा सबक बन गया । अफ़सोस ! ज़िंदगी सबक तो देती है लेकिन उसपर अमल करने के लिये दूसरा मौका नही देती ।

अब मेरे सामने दूसरा विकल्प नहीं था, नौकरी के सिवाय । फ़िर वह वक्त भी आया जब लेखन और नौकरी के बीच एक को चुनना था और निश्चित रूप से मैने चुना नौकरी को । मैने अपना लिखा सारा साहित्य रद्दी मे बेच दिया, अपनी सारी पसंदीदा किताबों का संग्रह भी । मैने अपने अंदर के लेखक की हत्या की और अपने अंदर ही कहीं गहराइयों मे दफ़न कर दिया । मै मुतमईन था कि उस लेखक से पीछा छूटा लेकिन करीबन चौथाई सदी बाद किसीने मुझसे मेरे ही नाम के एक पुराने लेखक का ज़िक्र किया और मै चुप रहा । किस मुंह से कहता कि वह मै ही था । वह दिन बड़ी तड़प के साथ गुज़रा और रात को जनम हुआ एक कहानी का ‘एक लेखक की मौत’ । दरअसल वह एक लेखक के पुनर्जनम की कहानी थी ।

वह लेखक जो आज आपसे रू-ब-रू है …

 

लेखक से सम्पर्क : zifahazrim@gmail.com

 

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