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प्रेम की परिभाषा

February 13, 2017

पूरी दुनिया में वैलंटाइंन्ज़-डे लोग प्यार को साबित करने के लिए बहुत ही शिद्दत से मनाते हैं। अपने प्यार का इज़हार अपने-अपने तरीके से करना पसंद करते है। मेरी नज़र में जो प्यार को समझता है वो 365 दिन प्रेम दिवस मनाता है। क्योंकि प्रेम तो जीवन को दौड़ाने का ईधन है।

हम सबकी ज़िन्दगी किसी न किसी के प्रेम की निशानी है। प्रेम पर लिखना इतना आसान नहीं है, क्योंकि यह भावनाओं से निकलता है और भावनाओं को हुबहू शब्दों के गठ्ठर में बांध देना इतना सरल नहीं है। प्रेम की उपज और उसका परिप्रेक्ष्य जैसे-जैसे रिश्तें बनते जाते हैं वैसे ही यह अपना आकार गढ़ता जाता है।

माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम के बाद जैसे-जैसे रिश्ते जुड़ते जाते हैं वैसे-वैसे प्रेम अपना रूप रिश्तों के आधार पर बदलता रहता है. कोई हमारे बहुत करीब हो जाता है और कोई हमसे बहुत दूर। यह प्रेम ही होता है जो अपना पैमाना खिंचता है और हम तय करने लगते हैं अपनी पसंद, नापसंद और अहमियत देने लगते है जिस भी रिश्तें में हमें प्यार की गहराई मिलने लगती है। उस पर जी-जान छिड़कने लगते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति प्यार को जीने की कला कहीं न कहीं अपने माँ-पिता से या परिवार से मिलती है। वह उन्हें देख कर सीखता है की प्रेम का अर्थ साथ चलने में है न की एक पड़ाव को बस पार कर लेना। 

प्रेम का अर्थ एक दुसरे के प्रति समर्पित हो जाना, एक दुसरे के दुःख को अपने शरीर में दर्द की तरह महसूस करना, एक दुसरे के ख़ुशी को दो दिल एक जान की तरह अनुभति कर लेना। 

प्यार समर्पण की कहानी है जो झुकता है, जो माफ़ी मांगता है और माफ़ कर देने में यकीं रखता हैं। वह प्रेम को जीने में, प्रेम को गढ़ने में, प्रेम को आगे और भी मजबूत करने में सफल रहता है। प्रेम मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है। 

सच्चा प्रेम इतनी आसानी से नहीं होता। सच्चा प्रेम वक्त लेता है अपने बुनियाद को गूंथने  में, प्रेम कोई वस्तु नहीं है। यह अहसास की वह सीमा है जिसमें जो जितना डूबता है वो उतना ही प्यार को महसूस करता है। प्यार अनंत है, प्यार की कोई भी निश्चित परिभाषा नहीं है। यह सभी के नज़र में अपने-अपने अंदाज में परिभाषित होता है। कोई लफ़्ज़ों से, कोई नज़रों से तो, कोई अभिव्यंजना से प्यार को प्रदर्शितकरता है. प्यार देने वाले और प्यार करने वाले जीवन में सकारात्मकता संचार का प्रवाह करते हैं।
 प्राचीन यूनान में प्रेम को पागलपन का देवता कहा गया है। 

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने प्रेम को एक व्यक्ति से अन्य व्यक्ति के साथ भावनात्मक मिलन का संयोजन कहा है। शेक्सपियर ने कहा, "प्रेम अंधा होता है और प्रेमियों को देख नहीं जा सकता। 

अरस्तू ने कहा, "प्यार एक ही आत्मा से बना है जो दो शरीरों में निवास करता है। 

मस्तिष्क विज्ञान कहता है की प्यार प्यास की तरह होता है । जैसे प्यासा पानी के लिए तरसता है, वैसे ही प्यार हो जाने के बाद एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के लिए तरसता है। 

मुझे लगता है : प्यार का बस इतना शर्त हो की वह किसी को दुःख न पहुचाए. प्रेम सहनशील होता है। प्रेम दयालु होता है। प्रेम कभी अभिमानी नहीं होता वह दूसरों के साथ आसानी से मिल जाने में यकीन रखता है। प्रेम गलतियों को याद नहीं रखता है। वह सिर्फ आनंद में जीवन जीने में यकीं रखता है। प्यार धैर्यपूर्वक, भरोसे और विश्वास को लेकर चलता है। प्यार कभी ख़त्म नहीं होता है। प्यार एक दुसरे को मजबूत करता है। प्यार कोई शर्त नहीं रखता है।

- ऋतु राय

 

 

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