दंश

पिछले कुछ सालों से रूटीन हो गया है मार्च-अप्रैल के महीने में प्रेक्टिकल-परीक्षा लेने सुदूर अंचल के कालेजों में एक्जामीनरबनकर जाना. कभी बालोद तो कभी बिलासपुर. कभी डोंगरगढ़ तो कभी पामगढ़. कभी नांदगांव तो कभी कोंडागांव. ये दिन मेरी नौकरी के सबसे अच्छे दिन होते हैं. इसे मैं पूरी तरह एंज्वाय करता हूँ. आधे दिन परीक्षा तो आधे दिन जी-भरकर सैर-सपाटा. इस बार नक्सल क्षेत्र नारायणपुर जिले के शासकीय कालेज में जाना है. जब से विभा नारायणपुर का नाम सुनी है, घबरा गई है. अक्सर नक्सली वारदातों की लोमहर्षक खबर अखबारों में पढ़ती रहती है इसलिए उसका घबरा जाना लाजिमी भी है. बार-बार कह रही है, अपनी कार से जाना ताकि वक्त से वापस लौट सको. बस-वस का कोई ठिकाना नहीं रहता. और नक्सली लोग बस को ही ज्यादा ‘टार्गेट’ करते हैं. मैंने उसे बताया कि कई साल पहले एक बार नारायणपुर हो आया हूँ. डरने वाली कोई बात नहीं. तो वो कहती है - तब की बात और थी जी अब की कुछ और.

तीन दशक पहले इसी आदिवासी अंचल में एक पत्रकार मित्र के साथ नारायणपुर-मेला देखने गया था. तब सब कुछ वहाँ बेहद ही ठेठ हुआ करता. न ठीक-ठाक सड़कें थी न बिजली. न यातायात का कोई उचित साधन. बस. दिन भर में एकाध बस ही हाँफ़ती—बिगड़ती खरामा-खरामा धूल का गुबार उड़ाते चलती थी. रास्ते भर हरे-भरे, बड़े-बड़े साल-सागौन के जंगल दिखते और दिखता दूर-दूर में बसे चार-छः झोपड़ियों का गाँव. और गाँव में काले-कलूटे अधनंगे गठीले बदन वाले माडिया-मूरिया आदिवासी मर्द और सिर से पाँव तक गोदने से लबरेज अर्धनग्न महिलायें. बच्चे और युवक-युवतियाँ. पर उस मेले में कई ऐसी जवाँ युवतियाँ भी देखे जो कोयल-सी काली तो थीं पर बला की खूबसूरत भी. वो सब अनजान आदमी को देख इस कदर शर्माती थी कि दोनों हथेलियों से सूरत ही ढाँप लेतीं. मुँह छिपा लेतीं. एक सोलह-सत्रह साल की बाला तो इस कदर खूबसूरत थी कि एकबारगी मैं उसका दीवाना सा हो गया था. उसकी एक झलक देखने मुझे पूरा एक चक्कर लगाना पड़ा और वो भी मेरे साथ-साथ मुँह ढाँपे अपने ही स्थान पर गोल-गोल घूमती रही. फिर भी दर्शन अधूरा रहा. शुक्र है कि मेरे पत्रकार मित्र ने वहाँ एक दुभाषिये की व्यवस्था कर रखी थी इसलिए फोटो लेना सहज हुआ. बाप के कहने पर वो फोटो खिंचाने तैयार तो हुई पर चेहरे को पीछे ही करके रखी. साथ में उसकी बहन भी थी. मैंने वैसे ही, बैक पोज़ वाली, उन दोनों की तस्वीर ले ली. एवज में उसके बाप को पाँच रूपये दिए. आज भी वो बिना चेहरे वाला तीस बाई चालीस का लार्ज श्वेत-श्याम फोटो मेरे ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाता टंगा है. मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत फोटो है वो. नारायणपुर के और भी कई सुन्दर-सुन्दर फोटो मेरे एलबम में सजे-धजे हैं. वहाँ की याद आते ही नथुनों में एकबारगी महुए की महक भरने लगता है. इसी महक से तो बहका-महका रहता था पूरा जंगल और पूरा नारायणपुर.  

पहली बार ऐसा हुआ कि परीक्षा निबटने के बाद कहीं सैर-सपाटे में नहीं गया. जबकि कालेज- स्टाफ़ ज़िद में थे कि विश्व-प्रसिद्ध कुटूम्बसार की गुफाएं देखूँ और दुसरे दिन प्रस्थान करूँ. पर विभा ने रात रुकने से एकदम ही मना किया था और देर शाम-रात तक लौट आने को कहा था इसलिए कालेज के स्टाफ़ को कोई ठोस बहाना बताना भी जरुरी था. एकाएक मुँह से निकल गया - ‘रुक तो जाता पर एक नज़दीकी रिश्तेदार आई. सी. यु. में ज़िंदगी और मौत से लड़ रहा है. कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता. पत्नी घर में अकेली है इसलिए मुझे अविलम्ब ही जाना होगा ताकि सीधे हास्पिटल पहूँच सकूँ.’ मेरी बातें सुन सभी चुप्पी साध गए. मैंने चुपचाप भोजन किया और पेमेंट ले वापसी के लिए निकल पड़ा.

कोलतार की सपाट, चौड़ी और वीरान सड़क में कार दौड़ाते अच्छा लग रहा था. पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, खेत-खलिहान, जंगल, गाँव, सब तेज़ी से पीछे छूटते जा रहे थे पर तीन दशक पहले का नारायणपुर यादों में तेज़ी से करीब आ रहा था. तब के सारे दृश्य सजीव हो रहे थे. बड़ी इच्छा थी कि एक बार उन्ही जगहों को देख आऊँ जहाँ ‘वो’ खूबसूरत आदिवासी बाला मिली थी. उस दुभाषिये से भी मिलने की तमन्ना थी पर विभा और नक्सली खौफ़ के चलते ये संभव नहीं हो सका. खैर अतीत तो आखिर अतीत है. इसे तो झटकना ही बेहतर होगा. किन्तु क्या यह संभव है? यादों और विचारों के उहापोह के चलते कब भानुप्रतापपुर पहुँच गया, पता ही न चला. चाय की बड़ी तलब थी सो कार को बस-स्टैंड की ओर मोड़ दिया.

एक नज़र बस-स्टैंड में दौड़ाया. दो-तीन बस खड़ी थी. यात्री उतर-चढ़ रहे थे. एक छूट रही थी नारायणपुर की ओर. तो दूसरे कोने से एक बस अन्दर स्टैंड में घुस रही थी. शायद राजहरा से आ रही थी. चाय के लिए नज़र दौड़ायी तो पाया कि एक होटल के बरामदे में एक ठेलेवाले के पास चाय पीनेवालों की भीड़ उमड़ी पड़ी है. मैंने भी एक स्पेशल चाय बनाकर देने को कहा. उसने एक नज़र मुझ पर डाली और तुरंत ही तीन-चार मिनटों में स्पेशल चाय थमा दी. मैंने चुस्की ली तो मन तर हो गया. बहुत ही बढ़िया चाय बनी थी. अभी चुस्की ही ले रहा था कि एकाएक एक बस के पास से ज़ोर-ज़ोर से लड़ने-झगड़ने जैसी आवाज़ आने लगी. लोग अनायास ही उधर लपकने लगे.  क्षण भर में एक भीड़ सी इकट्ठी हो गई वहाँ. किसी ड्राईवर-कंडक्टर की लड़ने जैसी ऊँची और गन्दी-गन्दी गाली भरी आवाज़ आ रही थी. चाय ख़त्म कर मैं भी उत्सुकतावश उधर बढ़ गया. मामला समझने में तनिक भी देर नहीं लगी. सबसे पहले मैंने उस बस के ड्राईवर-कंडक्टर को आदेशात्मक लहज़े में कहा कि पहले ये भीड़ खारिज करो. फिर तुम जो चाहोगे होगा.

भीड़ छंटते ही मैंने कहा कि लड़के से गलती हुई है, मैं मानता हूँ. उसकी मजबूरी रही होगी. उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं होंगे तभी तो एक लाश को पीछे की सीट में बिठाकर, साड़ी ओढ़ा कर चुपचाप दो टिकट ले यहाँ तक ले आया. आपको तो पता भी नहीं चलता अगर कोई हो-हल्ला न करता. अब अगर पता चल भी गया है तो ये क्या बात हुई कि आप उसे गाली-गलौज भी करें और ऊपर से दो हजार रुपयों की मांग भी. अरे कामन सेन्स की बात है - अगर इतने पैसे होते तो क्या अपनी माँ की लाश को बस में लेकर आता? एम्बुलेंस नहीं कर लेता? कभी सोचा भी है कि ये सफ़र उसके लिए कितना कष्टदायी रहा होगा. उसकी विवशता, उसकी दुविधा. उसकी भावनाओं के बारे में कुछ सोचा है? उसकी सगी माँ है वो जिसे तुम बार-बार लाश-लाश कह रहे हो. उसकी मजबूरी देखो कि रास्ते भर वह चाहकर भी न रो सका. न बिलख सका. इसलिए कि किसी को पता न चल जाए. कहीं उसे बस से उतार न दिया जाए. तीस किलोमीटर की यात्रा में उसने तीस हजार बिच्छुओं के दंश को भोगा है. इसके पहले हास्पीटल में भी न जाने क्या-कुछ भोगा होगा. इंसानियत नाम की कोई चीज़ आप लोगों में है या नहीं ?

‘ठीक है सरजी. आपमें तो है न? आप एक हजार दे दीजिये और इसे पूरी इंसानियत के साथ इनके घर छोड़ आईये. उपदेश देना सरल होता है पर अमल करना उतना ही कठिन.’

उनकी बातें सुन इच्छा तो हुई कि दोनों को दो-चार जड़ दूँ. पर चुपचाप मैं आगे बढ़ने लगा तो कंडक्टर ने ताना कसा - ‘क्यों सर जी? कहाँ चले? अपनी इंसानियत को तो लेते जाओ.’

‘मैं कहीं नहीं जा रहा. बस दो मिनट रुको मैं कार लेकर आता हूँ.’

कार से बटुआ निकाल मैंने उसे पांच-पांच सौ के दो नोट दिए और कहा - ‘कम से कम अब इतनी इंसानियत तो दिखा दो. इस बच्चे की माँ को कार की पिछली सीट में लिटा दो.’

चुपचाप दोनों ने लाश को पीछे लिटा दिया. मैंने लड़के को आगे की सीट पर बिठाया और पूछा कि कहाँ चलना है? उसने बताया कि  पूरब की ओर बीस किलोमीटर दूर स्थित गाँव कोरर. मैंने तेज़ी से कार चलाते आधे घंटे में उसे घर पहुँचा दिया. घर क्या था - एक टूटा-फूटा छोटा सा दो खोली वाला घास-फूस का आशियाना था. रास्ते भर न मैंने उस लड़के से बात की न ही उस लड़के ने मुझसे. कार से उतर वह न जाने कहाँ गायब हो गया. फिर कुछ मिनटों बाद वह तीन-चार ग्रामीणों के साथ लौटा. दो-तीन महिलायें भी आई और बरामदे में गोबर लीप उस पर एक साड़ी बिछा दी. फिर लाश को बाहर निकाल साड़ी पर लिटा दिया. लड़के ने कातर नज़रों से देखते मुझे कार से उतरने की मूक-प्रार्थना की. मैं उतरा तो उसने एक खोलीनुमा कमरे में बैठने का आग्रह किया. मना करते भी नहीं बना, मैं यंत्रवत उसके साथ अन्दर घुस गया. अन्दर बिछी चारपाई में बैठा ही था कि चौंक सा गया. खिड़की से आती रोशनी में देखा कि सामने की दीवार में एक बहुत पुरानी चार बाई छः की फ्रेम टंगी थी जिसमें किसी बहुत पुराने अखबार में छपी फोटो की कतरन लगी थी. ये वही फोटो थी जो मैंने नारायणपुर-मेले में खींची थी. और जो मेरे ड्राइंगरूम में है. मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत फोटो. मुझे समझते देर न लगी कि पत्रकार मित्र का लेख मेरे खींचे फोटुओं के साथ कभी किसी अखबार में छपा होगा तो दुभाषिये ने इसे यहाँ तक पहुँचाया होगा.

मैंने सहमे-सहमे किसी अनहोनी के डर से लड़के से पूछा - ‘कौन है ये?‘

‘मेरी माँ है बाबूजी. ददाजी को नक्सलियों ने चार साल पहले पुलिस का मुखबिर कहते मार दिया था तबसे मैं अपनी माँ के साथ यहाँ आ गया था. नानाजी का घर है ये. जबसे यहाँ आई, उसे बीमारी ने ही घेरे रखा. आज वह भी मुझे अकेला छोड़ चली गई.’ और वह सुबकने लगा.

मेरी आँखों के सामने अँधेरा सा छाने लगा. मैंने घड़ी देखी. दोपहर के तीन बज रहे थे. लड़के से पूछा कि क्या मै उसकी माँ की शक्ल देख सकता हूँ? वह बाहर आया और माँ के चहरे से साडी हटा दी. मैं दंग रह गया. चार साल की बिमारी के बाद भी वह उतनी ही खूबसूरत दिख रही थी जैसा मैंने पहली बार देखा था. आज वो अल्हड, चुलबुली बाला जो घूम-घूमकर चेहरे को शर्म से छिपाती-ढंकती थी, बेनकाब थी. मैंने दोनों हथेलियों से अपनी सूरत ढांप ली. आँखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ आया. जल्द ही अपने को संयत करते मैंने लड़के से कहा कि शाम होने को है. अंत्येष्टि की तैयारी करो. फिर पर्स से रूपये निकाल उसे देते कहा कि रख लो. काम आयेंगे. और बिना पीछे मुड़े कार की तरफ बढ़ गया. लगा कि लड़के की छाती का दंश अब मेरे भीतर भी उतरने लगा है.  

 

 

 

 

समझ नहीं आ रहा- किस तरह मैं खुद को अभिव्यक्त करूं? अपने समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व को ज्यों का त्यों प्रगट कर पाना मुमकिन नहीं. बचपन ठीक ही था,अभावों में नहीं बीता किन्तु कोई ज्यादा उन्नत रहन-सहन भी न था. उन दिनों जीवन का जो लक्ष्य निर्धारित था, वह था-एक नेक इंजीनियर बनने का...

मैट्रिक में अच्छे मार्क्स थे इसलिए चयन भी हुआ पर वक्त के तेवर ठीक न थे, बी.ए. की डिग्री से संतोष करना पड़ा.

सत्तर के दशक में घर पर फोटोग्राफी का माहौल शिखर पर था. कैमरा, लेंस, इन्लार्जर, फ्लड-लाईट्स, डेवलपिंग-प्रिंटिंग, आदि से सहज सामना हुआ. पढ़ाई के साथ-साथ कैमरे की आँख से जीवन के विविध आयामों को देखना शुरू किया तो सब बड़ा ही रोचक लगने लगा. तस्वीरें जब अंचल के ख्यातनाम अखबारों और पत्रिकाओं में छपते तो एक खुशनुमा अनुभूतियों से मन भर जाता. तस्वीरों के साथ फिर शब्द भी जुड़ते गए और यूं लिखने-पढ़ने का सिलसिला चल निकला.

फिर ‘हाबी’ के अनुरूप ही नौकरी मिली . सन 1980 में एशिया के सबसे बड़े स्टील प्लांट ‘भिलाई स्टील प्लांट’ में फोटोग्राफर नियुक्त हुआ. श्वेत-श्याम से लेकर रंगीन चित्रों के दौर को देखा फिर फिल्म कैमरे के बदलते स्वरुप डिजिटल कैमरे के अद्भुत दौर को भी अपनाया और बड़े ही सुकून के साथ 2012 में सेवानिवृत हुआ.

सैकड़ो कथा-लघुकथा और व्यंग विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. अनेक वेब-मैगजीनों में भी लिखता रहा. पिछले महीने ही पुस्तक बाजार डॉट काम से एक ई-बुक प्रकाशित हुआ है - ‘नेता के आँसू’ जो व्यंग्य-संग्रह है..

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बैकग्राऊंड फ़ोटो श्रेय- श्री प्रमोद यादव

 

 

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