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महिला दिवस पर ... अफ़गानी औरतों के नाम - दो कविताएँ

(2)

 

 

वो पैदा नहीं हुई थी

इसलिए वो प्रेम भी नहीं कर सकती थी/

संगीत के सातों सुर थे उसके पास

मगर वो संगीत नहीं सुन सकती थी/

पहले पहल इस संगीत को उसके होठों ने

खामोश किया/

फिर चुपके से दफ़्न करती गई वो/

उसे अपनी धज्जी-धज्जी सांसों में।

 

वो पैदा हुई ही नहीं थी/

इसलिए आप उसे रूकैया जहांगीर बुलाएं/

साजिदा ताहिर, संजीदा अब्दुल्लाह/

या कोई भी नाम देना चाहें आप/

 

पैदा होते ही

जिस्म के भीतर दबे संगीत ने उसे प्यार

करना सिखाया

तो सामने पत्थरों की दीवारें थीं/

घर में अपने कहे जाने वाले भाई या बाप/

असलहों से लैस थे/ जिनकी तरफ

नज़र उठाकर देखने की

हिमाकत भी नहीं कर सकती थी वो।

 

वो प्रेम नहीं कर सकती थी/

फिर भी वो प्रेम करना चाहती थी/

और साहब इस इत्तेला के लिए धन्यवाद

कि प्रेम घुटन भरे

माहौल/ और जिंदां (कैदखाना) में भी

तलाश कर लेता है एक रास्ता/

 

वैसा ही रास्ता तलाश किया था/

उस लड़की ने/

जिसे आप साजिदा ताहिर कहें, रूकैया जहांगीर/

या संजीदा अब्दुल्लाह

 

घर के एक मात्र छोटे से रोशनदान से/

वह लगातार देख रही थी/

टैंकर, तोपों के साथ गुजरती बटालियन/

सफेद गन्दे मैले कपड़े वाले/

सर को मोटी पगड़ियों से बांधे/ हाथों में

असलहे लिए/

एक दम पास से गुजरते हुए/

कुछ-कुछ वैसे ही/ जैसे उसके घर के भाई थे

या अब्बूजान/

और जिनके आगे नजरें उठाने की हिमाकत

भी नहीं कर सकती थी वो/

 

लेकिन वे अब्बू या भाई नहीं थे/

और कमरे के इस एकमात्र रोशनदान से/

वो नजारा कर कर सकती थी उस समूह का/

या शोर का/

या फिर इंतज़ार कर सकती थी, उनमें से एक/

उसे चेहरे का/ जो टैंकर या तोप के

दहाने पर बैठा/

अभी कुछ दिन पहले गुजरा था/

उसके छोट से रोशनदान के सामने से/

 

प्रतीक्षा में गुजर गये थे कितने दिन/

फिर वह नहीं आया/

लेकिन उसके आने की प्रतीक्षा बार-बार

उसे रोशनदान तक खींच लाती है/ यद्यपि

उसका चेहरा नहीं

देख सकी थी वो/

 

फिर भी एक चेहरा बना लिया है

उसने मन में/

यद्यपि उसका नाम नहीं जानती वो/

फिर भी एक नाम रख लिया है उसने/

जिसे वो होठों तक नहीं ला सकती/

वो लौटेगा या नहीं/

वो यह भी नहीं जानती/

मगर वह बार-बार प्रतीक्षा करती है उसका

 

बारूदी धुएं और टैंकर-तोपों की आवाजें

अब एक रोमांच जागती हं उसमें/

बेहद घने कोहरे में जाग जाते हैं/

सहसा/ जिस्म में दफ़्न संगीत के

सातों सुर/

वो पैदा हो रही थी.....

इसलिए वो प्रेम कर सकती थी।

 

- तबस्सुम फ़ातिमा

 डी-304 ताज एन्कलेव गीता कालोनी दिल्ली-110031

 मो० 9958583881

email : tabassumfatima2020@gmail.com

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