... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

जयबंती

 

शहर की हवा से बहुत पतली होती है गांव की हवा. और शायद हलकी भी. इसलिए कोई फुसकारी भी भरे तो वह गांव के इस कोने से उस कोने तक पार चली जाती है. औरतों और मर्दों को चर्चा के लिए गोलबंद करती हुई. बदलाव का रंग गांवों पर भी चढा है. जब से पक्के घर बनने शुरू हुए हैं, तब से गांव वालों ने भी बातों को कैद करके रखना प्रारंभ कर दिया है. किंतु मन तो अब भी कच्चे घड़े जैसे हैं. जरा-सी नरमी-गरमी पर फेस जाने वाले. बहुत अधिक दबाव वे झेल ही नहीं पाते. बात कान में आई नहीं कि झट इधर से उधर. पल-भर में आगे को धकिया देते हैं. मानो कान आई बात और हवा के झोंके में कोई फर्क ही न हो. उनका मानना है कि जैसे रुकी हुई हवा गंधियाने लगती है, वैसे ही रुकी बात भी अपना वजन खो देती है. नई सभ्यता के रंग में रंगे शहरी यह बात नहीं जानते. नतीजा दिल के रोग, डायबिटीज, उच्च और निम्न रक्तचाप, पेट गैस और बदहजमी न जाने कितनी नई-नई बीमारियों से दिल लगा बैठते हैं. ये सब आदमी के घुट-घुटकर मरने से पैदा होती हैं. चतुर गांववाले गोया यह सब शुरू से ही जानते हैं. इसलिए बात चाहे छोटी हो या बड़ी, उनके कान में पड़ते ही ‘फुर्र’ हो जाती है. किसी दूसरे कान के लिए. वहां से फिर आगे बढ़ जाती है. जब तक कि सिमाने पार कर दूसरे गांव में प्रवेश न कर जाए. आगे का सिलसिला और रफ्तार बात के वजन पर निर्भर करता है.

आप गांववालों दोष दें या उनकी समझदारी की दाद दें. वे वैसे ही हैं जैसे वे होना चाहते हैं. कि जैसा उनको होना चाहिए. उससे न एक इंच न ज्यादा. फिर भी उस दिन जो घटा वह पच जाने वाली बात भी नहीं थी. शहरवालों के लिए हो तो हो. गांववालों के लिए तो हरगिज नहीं. इसलिए निकलते-निकलते जैसे ही किसी को भनक लगी, मानो उसको पंख लग गए. फिर तो बांस-भर सूरज चढ़ने से पहले ही बात सिमाने बाहर थी. गली-कूंचों में औरत-मर्द जब जहां भी मिले, कानाफूसी वाले अंदाज में एक-दूसरे के मन की लेने-देने लगे―

‘कुछ सुना? जयबंती की बेटी भाग गई.’

‘गैर जात के लड़के के साथ! सुना है दोनों में काफी दिनों का नयन-मटक्का था!’

‘मौका देख चिड़िया जाल से फुर्र हो गई.’

‘अब जयबंती का क्या होगा....वह तो शरम से मर ही जाएगी न!’

‘करम लिखा तो भोगना ही पड़ता है.’

पता नहीं, इस गांव को क्या हो चला है. कुछ दिन पहले धनसिंगा अचानक चल बसा था. आज यह बवाल. लगता है पूरे गांव पर शनि की कुदृष्टि है.  

‘बेचारी जयबंती! पहले आदमी ने मुंह फेरा अब बेटी भी....’

इस मामले में औरत-मर्द सब एक. पर बात यदि और औरत को लेकर हो रही हो तो गांव की औरतें उसको हवा देने में भला कैसे पीछे रह सकती हैं―

‘मैं वहीं से आ रही हूं....जयबंती को जितना तुम समझते हो, उतनी भोली भी नहीं है. मुझे तो मां-बेटी की मिली-भगत लगती है.’

आंगन में भीड़ थी. जिसने भी सुना तसल्ली देने चला आया. तसल्ली न हो तो दस्तक ही सही. हर कोई जानना चाहता था कि लड़की खाली हाथ गई है या कुछ माल-मत्ता लेकर. जयबंती लाख कहे कि सबकुछ सुरक्षित है, इसपर किसी को भरोसा नहीं होता. सब जानते हैं, आजकल की लड़कियां और लड़के कम चालाक नहीं होते. भागकर तो मुंह काला करेंगे ही, जितना कुछ हाथ लगेगा, साथ ले जाएंगे. ताकि सुख-चैन से रह सकें. धीरे-धीरे जब रुपया खत्म हो जाता है, तब घर की याद आती है. बाद में कुछ वापस भी लौट आते हैं. कुछ को उम्मीद है कि जयबंती की बेटी भी वापस लौट आएगी. सप्ताह, महीने-दो महीने के भीतर. इस बारे में ठीक-ठीक तो तभी कहा जा सकता जब जयबंती अपना मुंह खोले. सच-सच बताए कि बेटी कितना माल-असबाब लेकर गई है.

भीड़ के सारे सवालों को पिए जा रही है जयबंती. लोग हैरान, जयबंती की चुप्पी उन्हें कचोट रही है. न जाने वह क्यों गांठ बांधे बैठी है. ठीक है, बेटी के भाग जाने का दुख उसे है. बुढ़ापे में वही सहारा थी. बेटा नहीं है. आदमी कभी का छोड़कर दूसरी के साथ हो लिया. एक बार मुंह फेरा तो झांका तक नहीं. ऐसे में सिर्फ बेटी का सहारा था. सुख-दुख में उसी को कलेजे से लगाए रखती थी. खुद कष्ट झेला पर बेटी को कभी कोई परेशानी नहीं होने दी. पेट काट-काट कर पाली गई बेटी इस तरह अचानक छोड़ जाएगी, किसने सोचा था. पर करम लिखा तो भोगना ही पड़ता है. जयबंती क्या दुनिया से न्यारी है! उसे हिम्मत दिखानी चाहिए. बात कहने से जी हल्का हो जाता है.

भीड़ में हर कोई इस इंतजार में है कि जयबंती मुंह खोले. इसके लिए सबके पास अपने तर्क है. सबका अपना तरीका है.

‘धीरज रख भौजी, बाली उमर में ऐसी चूक हो ही जाती है. भगवान पर भरोसा रख....इस संकट का निस्तार वही करेगा.’ रमला फूफी ने कहा था. वह आज से तीस-बतीस साल पहले विधवा होकर सदा के लिए अपने पिता के घर आ बसी थीं. आजकल जो नाती-पोते वाले हैं, उन दिनों गबरू जवान थे. रमला की उम्र को देखकर सब उन्हें फूफी कहते थे. आजकल बुढ़ापा भारी पड़ने लगा है. नाती-पोतों की उम्र है. पर मां-बाप की देखा-देखी बच्चे भी उन्हें ‘रमला फूफी’ ही पुकारते हैं. अब तो सिर्फ ‘रमला’ या ‘फूफी’ संबोधन सुनने को मिले तो उन्हें अधूरा-सा लगता है. इसी भरोसे वे आज ‘जगत फूफी’ हैं. पर इससे भी बड़ी बात है कि वे घट-घट की जानती हैं. गांव की कोई घटना उनसे छिपी नहीं रहती. जिस घर में चाहें बेधड़क घुसी चली जाती हैं.

‘रमला फूफी तुम्हें याद होगा, पार साल अधन्ना की भैंस गुम हुई थी.’ बगल में बैठी चंद्रो ने याद दिलाया.

‘अरे हां, याद आया! उस मुश्किल घड़ी में अधन्ना की घरवाली ने लाखा पीर के दरबार में माथा टेका था. एक भेली गुड़ और चादर चढ़ाने की मन्नत मांगी थी. बाबा का चमत्कार ऐसा फला कि चार दिन बाद ही खोई भैंस जुगाली करती घर लौट आई थी.’ बराबर में बैठी दूसरी औरत ने सूत्र अपने हाथ में लेते हुए जोड़ा.

‘लाखा पीर इस बार भी महर करें, चादर तो मैं ही चढ़ा दूंगी....आखिर हम कोई गैर थोड़े ही हैं....भतीजी तो वह मेरी भी थी.’

रमला फूफी ने जयबंती की ओर देखा. इतनी बड़ी बात कही. अपनी ओर से लाखा पीर पर चादर चढ़ाने का वादा भी किया. आखिर किसलिए? इसलिए कि वह जयबंती भाभी को अपना समझती है. जब से ससुराल छूटा है, गांव के हर छोटे-बड़े को अपने सगों जितना मान देती हैं. तभी तो उनकी बात तो दूर, इशारा तक कोई नहीं टालता. पर जयबंती को क्या हुआ? चट्टान-सी निस्पंद बैठी है. बिना कुछ बोले. किसी और की बात को भले भाव न दे. पर रमला फूफी की बात का न्यादर वह कैसे कर सकती है!

लगता है, बेटी के जाने के गम में छोटे-बड़े, अपने-पराये का लिहाज करना ही भूल चुकी है. परेशानी में आदमी का दिमाग ठीक से काम भी कहां करता है. रमला फूफी की तरह न जाने कितने औरत-मर्द निराश होकर जा चुके हैं. कुछ यह भी सोचने लगे है कि बेटी के भागने के गम में जयबंती का दिमाग चल गया है. दिल मैं ऐसा हौल बैठा है कि पूछो मत!

 

 

जयबंती के ऊपर जो बीत रही है, वह अनहोनी तो नहीं है. यह तो एक दिन होना ही था. सांप को दूध पिलाओ तो वह एक न एक दिन डसेगा ही. लोगों ने तो पहले ही समझाया था―‘विष्णु के चाल-चलन अच्छे नहीं है. घर में जवान बेटी है. आग और पानी को एक-दूसरे से जितना दूर रखा जा सके, उतना अच्छा.’ पर उस समय तो वह गुमान से तनी थी. यह गुमान उससे भी बड़ा था जब पति ने कहा था कि वह ‘दूसरी’ को छोड़ नहीं सकता. जयबंती चाहे तो दोनों साथ रह सकती हैं. उस समय इस हठीली ने सबके सामने अपने मर्द का पानी उतारते हुए कहा था―

‘औरत कोई गले पड़ा ढोल तो नहीं कि आदमी जब चाहे, जैसा चाहे बजा ले....’

‘पर इतनी बड़ी जिंदगी, ऊपर से बेटी का साथ कैसे चलेगी?’

उस समय भी गांववाले जयबंती के साथ थे. चाहते थे कि वह आगा-पीछा सोचकर फैसला करे. उन्हीं के भरोसे जयबंती ने रमसिंगा को दो-टूक जवाब भिजवाया था―

‘अनजाने में चाहे रोज जूठन चखो, पर जानबूझकर एक भी दिन खानी पड़े तो गले से नीचे न उतरेगी.’

उसके बाद पति शहर चला गया. नई औरत के साथ. वहां उसकी अच्छी नौकरी, अच्छा घर था. जयबंती गांव में रह गई. अकेली. ससुराल में पति के हिस्से को संभालने लगी.

जयबंती की जिंदगी में अंधेरा छा गया. किंतु इम्तिहान और भी बाकी थे. जयबंती जिंदगी से अकेली जूझ ही रही थी कि चौधरी रमसिंगा ने कहलवाया―‘जेब से निकला रुपया और घर से गए मर्द के वापस लौटने का भरोसा नहीं करना चाहिए....अकेली औरत के लिए दुनिया में सौ जोखिम होते हैं.’

रमसिंगा के नाम पर डेढ़ सौ बीघा जमीन है. न जाने कितनी मजबूर औरतों का पेट उसके खेत-खलिहान से भरता है. वही रमसिंगा पांच सौ गज का एक प्लॉट और पांच बीघा जमीन जयबंती के नाम करने को तैयार था. अगर मान जाती तो जिंदगी से सारे संकट हवा हो जाते. बेटी के हाथ भी पीले कर चुकी होती. जिस रमसिंगा के आगे अच्छे-खासे मर्दों की धोती गीली हो जाती है, उससे इसी जयबंती ने हुंकार कर कहा था―

‘चौधरी, जूठन ही अगर खानी होती तो उसके साथ खाती जो ब्याह करके लाया था. कम से कम पता तो रहता कि किसकी है. तेरे साथ तो यह पता भी नहीं चल पाएगा.’

रमसिंगा इसपर इतना नाराज हुआ था कि पूछो मत. उसका गुस्सा गांव में किसी से छिपा नहीं है. वह तो अच्छा है कि कुछ दिन बाद ही उसे फालिज ने अधमरा कर दिया और जयबंती का रास्ता साफ हो गया. नहीं तो....आज उन बातों को दोहराने से भले कोई लाभ न हो. इस समय तो पूरे गांव में बस जयबंती की चर्चा थी. तब भी लोग उसके दुख में दुखी थे. आज भी लोग उसके दुख से कातर हैं. उन्हें गुस्सा भी है जयबंती पर. उसकी चुप्पी उन्हें कचोट रही है. वह कुछ सुराग दे तो बेटी को वापस लाने के लिए दौड़-धूप की जाए. गांव वाले उसके साथ हैं. थाना-पुलिस की जरूरत हो तो वहां जाकर पैरवी भी कर सकते हैं. बस जयबंती के इशारे की देर है. गांव की बेटी को फुसलाने वाला, बदचलन विष्णु दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न छिपा हो, उसको खोज ही लाएंगे.

वैसे जो हुआ उसके लिए जयबंती भी कम दोषी नहीं है. उसी ने बेटी को सिर चढ़ाकर रखा था. लड़की जन्मी थी तो उसे लड़की की तरह पालती. समझाती कि बेटी पराया धन होती है. ऊपर से जवान लड़की को तो हर कदम फूंक-फूंक कर चलना पड़ता है. वरना कांच-सी इज्जत, जरा-सी ठेस पर चकनाचूर हो जाती है. पर जयबंती तो न जाने किस नशे में थी. जिससे मिलो उससे यही कहती थी कि रेशम मेरी बेटी नहीं बेटा है. मानो पूरे समाज का चलन बदल देना चाहती हो.

 

जयबंती चाहती तो विष्णु को घर में पांव न रखने देती.

नादान जयबंती, रमसिंगा की कैद से खुद को तो ले बचा गई पर अपनी बेटी को विष्णु के जाल से न बचा सकी. पर इसमें गांववालों का क्या कसूर! उन्होंने तो समझाया था कि विष्णु अजनबी है, मजदूरी करता है तो उससे मजदूर की तरह ही व्यवहार करो. खेती यदि खुद नहीं कर सकती तो जमीन बटाई पर दे दे. मां-बेटी को चाहिए ही कितना. बटाई से भी दोनों का काम खूब सधेगा. खेती का बहाना करके घर आने वाले मजदूर को तो लगाम लगेगी. पर जयबंती कहां मानी थी. इधर कुछ महीनों से कहने लगी थी कि विष्णु मेरे बेटे जैसा है. वो तो दुनिया का चलन बर्दाश्त नहीं कर सका और घर छोड़कर चला आया. दूर किसी जिले का वासी. मन में बेचैनी लिए दर-दर भटकता फिर रहा था. किस्मत की बात, उस समय जयबंती ही मिली थी, उसको बातों में फंसाने के लिए. खेतों से घर लौटती हुई. मर्द-मानुष की तरह खेतों को पानी देकर लौट रही थी. कंधे पर फाबड़ा उठाए. जो मिट्टी फाबड़े पर थी, हाथ-पैर भी मिट्टी-सने हुए थे....

शैतान की वैसे भी तीसरी आंख होती है. विष्णु ने फौरन ताड़ लिया कि औरत बिपता की मारी है. सो लग गया पीछे―‘माई, तुझे बोझ लग रहा होगा....फाबड़ा मुझे दे दे.’

‘आठ घंटे तक खेतों को पानी दिया है, तब बोझ न लगा, अब क्यों लगेगा!’

‘तभी तो कह रहा हूं माई, थक गई होगी.’

जयबंती ने बाद में बताया था कि एक अनजान लड़के द्वारा फाबड़ा मांगने पर पहले तो वह खुद चौंकी थी. घबराहट भी हुई थी. कौन जाने फाबड़ा लेकर चलता बने. आजकल के चोरों का क्या ठिकाना! छोटी-छोटी चीजों पर ईमान डिगा देते हैं. लेकिन अगली बार जब उसने टोका तो वह खुद को रोक न पाई. चुपचाप फाबड़ा लड़के को थमा दिया था. वह शांत भाव से फावड़ा साथ लेकर चलने लगा था. जयबंती घर के दरवाजे तक ले जाने से हिचकिचा रही थी. रास्ते में उसने फावड़ा वापस भी मांगा था. पर वह जिद ठाने रहा. इस बीच घर कब आ गया, पता ही नहीं चला. दरवाजे पर फावड़ा लेकर वह घर में जाने लगी, तभी उसने टोक दिया―

‘माई मजूरी!’

‘मजदूरी?’ जयबंती चौंक पड़ी.

‘भूख लगी है, दो रोटी खाने को मिल जाएं तो आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लूंगा.’ लड़के ने इस तरह कहा था कि जयबंती की ममता डोलने लगी.

‘रोटी तो तुझे वैसे ही खिला देती, फावड़ा ढोने की क्या जरूरत थी!’

‘हट्टा-कट्टा हूं माई...पर न मैं तुझे जानता हूं न तू मुझे. ऐसे में बिना कुछ किए रोटी मांगता तो भीख जैसी लगती.’

‘कह तो ऐसे रहा है, जैसे कहीं का नवाब हो.’ जयबंती मुस्करा दी थी.

‘जो आदमी धरती को बिछौना और आसमान को चादर मान ले, उससे बड़ा कोई क्या नवाब होगा.’

‘चल-चल...बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी करता है.’ और जयबंती, नादान औरत उसकी बातों में आ गई. उसके न केवल भोजन दिया, बल्कि रहने को सहारा भी. पर वो तो जादूगर था. बातों की ऐसी मीठी पुड़िया बांधता कि सामने वाला देखकर ही सम्मोहन में बंध जाता. जयबंती को सहारे की जरूरत थी. वह घर बैठे मिल गया. खूब कुरेदने के बाद एक दिन उसने अपने बारे में बताया था―घर पर चार भाइयों में वह तीसरे नंबर का है. दो भाइयों का विवाह हो चुका था. उसका नंबर आया तो उससे भी लड़की पसंद करने को कहा गया. पर उसने विवाह करने से मना कर दिया. गृहस्थी से बड़ा कोई जंजाल नहीं. उसके मना करने पर लड़की वाले उससे छोटे का रिश्ता पक्का करके चले गए. तीनों का विवाह हो जाने पर उसके सामने संकट हो गया. हर कोई भाई उसको अपने साथ रखना चाहता था. भौजियां उसकी चिरौरी करतीं. ‘देवरजी-देवरजी’ कहते मुंह नहीं सूखता था. छोटे भाई की पत्नी का वह जेठ था, पर न जाने क्यों, वह भी उसे ‘देवरजी’ ही कहती थी. सुनकर उसे आश्चर्य होता.

एक दिन उसने बता भी दिया कि वह उसके पति से बड़ा है. वह कुछ नहीं बोली. पर अगले दिन से वही देवरजी-देवरजी. वह हैरान. उसको लगता कि वह दुनिया का सबसे खुशनसीब आदमी है. शादी नहीं की. पर इसका लाभ ही हुआ. शादी कर लेता तो एक ही औरत प्यार करने को मिलती. अब तो तीन-तीन भौजियां हैं. अपने-अपने पति से वे भले लड़ती-झगड़ती हों. पर उसपर वे बलिहारी जाती हैं.

एक दिन इस रहस्य से पर्दा हट गया. उसको लगा कि वह आसमान से जमीन पर आ गिरा हो. आदमी तो आदमी, स्वार्थ की मारी औरत भी प्यार का नाटक करने लगती है. इसका रहस्य उसके सामने सहसा खुल गया. उस साल फसल खूब अच्छी हुई थी. भुस को खेत में जमा करने के बाद वह घर लौटा था. कंधे पर रखी चादर से पसीना पौंछते हुए वह छोटी के घर की ओर निकल गया. इधर उसने क्रम बना लिया था. कलेवा सबसे छोटी के हाथ का करता. दोपहर का भोजन मंझली के यहां और रात का भोजन करने वह सबसे बड़ी के घर जाता. उस दिन बड़ी अपने मैके गई थी. इसलिए सबसे छोटी के घर भोजन करना था. कंधे पर रखी चादर को अलगनी पर लटकाकर वह आवाज लगाने ही जा रहा रहा था कि भीतर से आती आवाजों ने उसको चौका दिया. छोटा भाई अपनी पत्नी से कहा रहा था―

‘जब भइया मना करते हैं तो तुम उन्हें ‘देवरजी’ क्यों कहती हो?’

‘जाने दो, तुम यह कभी नहीं समझोगे?’

‘तो तुम्हीं समझा दो, वैसे तुम्हारा रिश्ता उन्हीं के लिए आया था. कहीं ऐसा तो नहीं कि....!’

‘अगर उनमें कुछ होता तो ब्याह ही न कर लेते!’ जवाब मिला.

‘फिर क्या है?’

‘अब इतने नादान भी मत बनो जी....जैसे कुछ जानते ही न हो.’

‘मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’

‘तुम चार भाई हो....चौथाई हिस्सा जमीन तो उनकी भी है. दोनों जिठानियां पीठ पीछे उन्हें निठल्ला कहकर गाली देती हैं. पर सामने ‘देवरजी-देवरजी’ की रट लगाए रखती हैं. तुम तो कोशिश करोगे नहीं, अब जेठ का लिहाज करके मैं भी चुप रहूं और उन्होंने भाभियों के प्यार में फंसकर अपने हिस्से की जमीन उनके नाम कर दी तो....’

उसके बाद एक भी शब्द सुन पाना उसके लिए असंभव था. आदमियों को उसने झूठ बोलते, स्वार्थ में मारा-मारी करते देखा था. औरत भी प्यार का नाटक करेगी, वह भी तीन-तीन....उसने कभी नहीं सोचा था. उसके बाद वह भीतर नहीं गया. उल्टे पांव घर से बाहर निकल आया. गांव छोड़ते समय मन घबरा रहा था. पर थोड़ी देर बाद ही सारा अंधेरा छंट गया. अब खुश है. जीवन में आजादी क्या होती है, वह महसूस कर रहा है.

 

इस कहानी ने ही जयबंती पर जादू किया था. उसके बाद विष्णु को घर-चौके में पूरी जगह मिल गई. उसने भी काम को ऐसा संभाला कि जयबंती का सगा बेटा होता तो भी न करता. उस साल दो-गुनी फसल घर आई. जयबंती फूली न समा रही थी. आदमी के छोड़ने के बाद वह खुद को उपेक्षित समझती थी. अब आदमी तो न था. पर एक पुरुष था, बेटे की उम्र का. बेटे की नजर से ही उसको वह देखती थी. बहुत सहारा लगता था उसको. दुगुना अनाज घर में आया तो ढेर के सामने सामने खड़ी होकर जयबंती ने कहा था―

‘बेटा यह तेरी ही मेहनत का है. इसमें से जितना भी मन करे उठा ले.’

‘माई, लालच मत दे. इससे बचने के लिए ही तो अपना घर-जंगल छोड़ा है.’

जयबंती का कलेजा भर आया था.

शुरू में रेशम विष्णु से कटी-कटी रहती थी. धीरे-धीरे वह भी खुलने लगी. दोनों आपस में लड़ते-झगड़ते. पर एक-दूसरे को देखे बिना भी उन्हें चैन न था. जयबंती ने दुनिया देखी थी. विष्णु की आंखों में उसको कोई मैल नजर न आता था. वह खुश थी, बहुत खुश. जीवन सुंदर सपने की तरह भाग रहा था. विष्णु ने बेटे की कमी को पूरा किया था. उसके साथ रहने से सुरक्षा का एहसास बढ़ा था. रेशम भी खुश थी. वह दिनों-दिन बड़ी होती जा रही थी. जयबंती बेटी की निखरती जा रही कद-काठी देख प्रसन्न होती, स्निग्ध त्वचा और रूप-संपदा को देख-देख सिहाती. पर अगले ही पल उदासी उसको घेर लेती थी.

 

सुख की बीच दुख, हर्ष के बीच उदासी, जीवन के इस दौर से जयबंती अनजान न थी. पर इधर जो चिंता का नया दौर शुरू हुआ था, उसे त्राण की कोई डगर उसके पास न थी. बाप तो बेटी और पत्नी को तो भूलकर अपनी नई गृहस्थी में रमा था. रेशम के लिए तो जयबंती को ही मां और बाप का धर्म निभाना था. यही सोचकर जयबंती ने रेशम के लिए लड़का खोजने की कवायद शुरू कर दी थी. नाते-रिश्तेदार तो वर्षों पहले साथ छोड़ चुके थे. इसलिए लड़का खोजने के लिए पंडित का ही सहारा था. जहां से भी किसी लड़के बारे में जानकारी मिलती वहां किसी को पठाती. पर जवाब मिलते ही सारी उम्मीद हवा हो जाती. जी को कोई दुख न हो इसलिए जानबूझकर वह बात को विपरीत दिशा से आरंभ करती―

‘लड़का ठीक नहीं निकला क्या?’

‘लड़के में तो कोई कमी नहीं है. खाता-पीता घर है. घर में दुधारू पशुओं की भरमार है....’

‘हमारी रेशम क्या कम है?’

‘रेशम को तो वे कहीं देख चुके हैं. उन्हें पसंद है.’

‘फिर...?’ जयबंती पर घबराहट सवार हो जाती.

‘कह रहे थे बाप ने मां को....छोड़कर दूसरी कर ली है.’

‘फिर वही....’ जयबंती माथा पकड़ लेती. रमसिंगा को उसने शुरुआत में ही आड़े हाथों लिया था. ऐसे कि बाद में उसकी कभी हिम्मत ही नहीं पड़ी. फिर भी गांव में मुंह-वाचा करने वाले लोग कम नहीं हैं,  ‘नीयत में ही खोट रहा होगा. वरना आदमी क्यों छोड़कर जाता.’ जयबंती रमसिंगा से लड़ सकती है. गांव से कैसे लड़े! क्या जवाब दे ओछी बातों का! कैसे लोगों को समझाए कि मनमर्जी बाप ने की थी. बेटी तो बेकसूर है.’

‘तुम उन्हें बताते कि इसमें लड़की का कोई दोष नहीं है!’

‘खूब कहा, वे गर्दन झुकाए सुनते भी रहे. लेकिन ऐसा कोई जवाब नहीं दिया, जिससे उम्मीद बंधे.’

जयबंती इस तरह की बातें कई बार सुन चुकी थी. उसकी समझ में आने लगा है कि ऐसे मामलों में दोष सदा औरत का होता है. आदमी भला है तो उसकी भलमनसाहत. बुरा है तो गलती औरत की. जो उसको संभाल नहीं पाई.

एक बार उसने दूर शहर में बात चलाई. सुन रखा था कि शहर वाले इन बातों की परवाह नहीं करते. केवल लड़की पर ध्यान देते हैं. लड़का पढ़ा-लिखा और अच्छी नौकरी पर है. जयबंती को उम्मीद बंधी. खुले दिमाग का होगा तो बात बन ही जाएगी. लड़की को दूर भेजना पड़ेगा. तो कोई बात नहीं. यहां तो अकेली किसी न किसी तरह दिन काट ही लेगी.

बातचीत करने गया आदमी दूसरे दिन लौटा. बेटे वालों ने खूब खातिर-तव्वजो की थी. आते ही खुशी-भरा संदेश सुनाया―‘लड़के वाले बहुत भले हैं. बेटी के भाग अच्छे हैं. बात पक्की समझो. शादी की तैयारी शुरू कर दो.’

‘कुछ लेन-देन?’ जयबंती ने डरे मन से कहा.

‘अगले सप्ताह बिटिया को देखने आ रहे हैं. तभी बातचीत होगी. पर मेरा मन कहता है कि रिश्ता जमा समझो.’

जयबंती को लगा मन की मुराद फली. वह लड़की दिखाने की तैयारी करने लगी. ब्याह में कितना खर्च होगा, उसका इंतजाम कैसे होगा, इसका जुगत भिड़ाने लगी.

विष्णु को घर के मामलों से अलग रखती आ रही थी. परंतु अब जब मेहमान घर आ रहे हैं, उनसे छिपाना ठीक नहीं रहेगा. विष्णु को बताया गया तो वह खुशी से झूम उठा.

निर्धारित समय पर वे लोग घर पहुंच गए. जयबंती और विष्णु भाग-दौड़ कर रहे थे. रसोई की जिम्मेदारी खुद रेशम संभाल रही थी. आनेवालों में चार लोग थे. लड़के के माता-पिता, लड़का और उसकी बहन. जयबंती ने गौर किया कि लड़के की मां आने के साथ ही विष्णु की ओर देखे जा रही थी―

‘हमें तो बताया गया था कि लड़की का कोई भाई नहीं है?’

‘आपने सही सुना है.’ कहते हुए जयबंती ने विष्णु के बारे में सबकुछ बता दिया.

‘ठीक है, पर कोई इस तरह अपना घर, जमीन-जायदाद सबकुछ छोड़कर पड़ा रहे, बात जमती नहीं....’ जयबंती ने लड़के के माता-पिता की आंखों में उमड़ती संदेह की डोर को परखा. आवाज को भरसक वजनदार बनाते हुए उसने कहा―

‘मेरे लिए वह बेटे से भी बढ़कर है.’

आखिर वह रिश्ता भी लौट गया. जयबंती हाथ मलती रह गई. पता चला कि उन लोगों को भड़काने में धनसिंगा का हाथ था. पहले तो जयबंती को विश्वास ही नहीं हुआ. वह भला क्यों अपना मुंह गंदा करेगा. पर जब गांव के कई आदमियों-औरतों ने यही कहा तो उसको विश्वास होने लगा. जयबंती जानती थी, धनसिंगा की नजर उसके खेतों पर थी. जैसे आदमी ने गांव छोड़ा है, वैसे ही मां-बेटी भी गांव से चली जाएं तो उपजाऊ जमीन आसानी से कब्जे में आ जाएगी. वर्षों पहले उसने इसी धनसिंगा के बाप रमसिंगा को उसने सरेआम लताड़ा था. अब उसका बेटा....

बात को पीना, गुस्सा पचाना जयबंती के स्वभाव में नहीं था. पर उस दिन अजब बात हुई. खेतों से लौटते समय धनसिंगा सामने पड़ा तो भी उसने कुछ नहीं कहा. यहीं चूक गई. बाद में जो होता सो होता. उस समय सामने पड़कर यदि धनसिंगा को खरी-खरी सुना देती तो उसकी आगे बढ़ने की हिम्मत ही नहीं पड़ती.

  

विष्णु को न जाने क्या हुआ था! जब से आया तब से कभी बाहर का जिक्र न किया. घर से खेत, खेत से घर. जयबंती खाना दे देती. खाकर खेतों पर निकल जाता. दिन-भर वहीं रहता. जी-तोड़ मेहनत करता, पशु-पक्षियों, लताओं और वृक्षों से बतियाता. शाम ढले भोजन का समय होता तभी घर की राह लेता. वहीं विष्णु, एक दिन अचानक बाहर जाने को कह उठा. जयबंती ने रोकने की कोशिश की. वह जिद ठाने रहा. जिस जयबंती को वह मां-समान मानता था, उसका भी कोई असर नहीं हुआ. जयबंती समझ गई. जानती थी कि विष्णु पर उसका कोई जोर तो है नहीं. सो एक दिन प्रस्थान कर गया. उसके जाने के बाद घर और खेत दोनों की जिम्मेदारी जयबंती पर आ गई. रेशम को घर पर अकेली छोड़कर जाने की उसकी मंशा न थी. पर मजबूरी बनी. जितने समय बाहर होती, बेटी की चिंता दम साधे रखती.

एक दिन लौटी तो रेशम को रोते हुए पाया. जयबंती का कलेजा ‘धक’ रह गया. इससे पहले रेशम के पिता की कभी कमी न खली थी. न उसने उससे कोई शिकायत ही की थी. पर उस दिन उसने उसके पिता को खूब जमकर कोसा. कम से कम अपनी जवान बेटी का तो ख्याल किया होता. बुढ़ापे में अपनी जबानी का सुख छोड़ा नहीं जाता पर गांव में जवान बेटी अकेली है, यह बात पूरी तरह भुला बैठा है.

रेशम ने रोते-रोते बताया था कि दिन में धनसिंगा आया था. मना करते-करते आंगन में घुसकर चारपाई पर पसर गया. विष्णु को लेकर न जाने कैसी-कैसी बातें करने लगा. जयबंती धड़धड़ाती हुई घर से निकली. पर देहलीज से बाहर निकलते-निकलते उसके पांव जम गए. धनसिंगा के घर जाकर खरी-खोटी सुनाने की हिम्मत न जुटा सकी. उस समय विष्णु का वहां न होना भी उसको अखरने लगा. अचानक छोड़कर चले जाने के लिए कोसकर अपना जी ठंडा करने लगी. परंतु अगले ही क्षण अपनी गलती पर पछतावा होने लगा. एक न एक दिन तो उसे जाना ही था. उसकी अपनी जिंदगी, जमीन-जायदाद सबकुछ है. अगर ब्याह हो गया होता तो अब तक कई बच्चों का पिता होता. संत का स्वभाव पाया है. सो भटक रहा है. वरना घर बैठे मौज कर रहा होता. यहां नौकर की तरह काम तो न करता. पर यदि जाना ही था तो आया ही क्यों था! मां तो ऐसे कहता था, मानो दूध पीकर पला हो. जवान लड़का है, पर रेशम की ओर कभी आंख उठाकर भी न देखा. जाने कौन-सी मिट्टी का बना है. जयबंती विष्णु को भुला देना चाहती है. पर भुला नहीं पाती. घर में, खेत-खलिहान पर काम करते हुए उसकी कमी खलती ही रहती है.

 

चौंकाना जैसे उसकी आदत हो. उस दिन पूरा गांव सोया हुआ था. गली में कुत्तों की आवाज सुनकर जयबंती की नींद टूट गई. समय का अंदाजा लगाने के लिए आसमान की ओर देखा. वहां अब भी तारों की भरमार थी. तभी लगा कि कोई दरवाजे को पीट रहा है. हौले-हौले. जयबंती को संकेत जाना-पहचाना लगा. सधे कदमों से जाकर दरवाजा खोल दिया. दरवाजे पर विष्णु था. सिर से पांव तक कंबल में लिपटा हुआ. चोरों की तरह छिपता-छिपाता. देखकर जयबंती की आंखें फटी की फटी रह गईं. जयबंती कुछ पूछे उससे पहले ही विष्णु ने उसके मुंह पर हाथ रख लिया. फिर मुड़कर दरवाजे को बंद करता हुआ बोला―‘भीतर चल माई, सब जान जाएगी.’

दरवाजा बंद की कर पाई थी कि गली में दोड़ते कदमों की आवाज जयबंती के कानों में पड़ी. ऊपर से चीख-पुकार. मानो पूरे गांव को भारी बिपदा ने घेर लिया हो―‘धनसिंगा नहीं रहा रे...’ कोई गली में चिल्लाया. जयबंती का कलेजा धक-धक करने लगा. उसने विष्णु की ओर देखा―

‘क्या किया है, तूने!’

‘करने तो बहुत कुछ आया था. परंतु हरामजादा कमजोर दिल का निकला. मौत सामने देखते ही ‘फुस्स’ हो गया.’

‘तू उसे मारने आया था.’

‘मेरे कारण रेशम का रिश्ता लौट गया....पूरे गांव में तुम्हारी बदनामी हुई. मुझे कुछ न कुछ तो करना ही था. इसलिए मैं अपने गांव गया था. वहां जाकर सारी जमीन का सौदा कर, शहर में घर खरीद लिया है. एक डेयरी भी है. आगे से तुम वहीं चलकर रहोगी. वहां रहकर रेशम का विवाह भी आसानी से हो जाएगा.’

‘धनसिंगा ने रेशम के साथ बदसलूकी की थी. ऐसे में तुझे अचानक यहां देख लोगों को शक हो सकता है. इसलिए जिस रास्ते आया है, उसी रास्ते वापस लौट जा. यहां जो होगा, मैं उससे निपट लूंगी.’ बड़ी मुश्किल से माना था विष्णु. धनसिंगा की मौत पर गांव में कुछ दिन चर्चाएं रहीं. लोगों ने तरह-तरह के कयास लगाए. धीरे-धीरे सब शांत होने लगा. जयबंती को फिर रेशम की चिंता सताने लगी थी. खुद खेती करने का हौसला टूट चुका था. इसलिए खेतों को बंटाई पर देना ही उचित समझा. बंटाई से जो मिल जाता, उससे मां-बेटी का काम सध जाता था.  सब-कुछ ठीक-ठाक था.

जिस बेटी के लिए अपने पति से बिछोह का गम नहीं किया था. आज वही अचानक घर छोड़कर चली गई.

 

 जयबंती का दुख बड़ा है. साथ में कलेजा भी. आज भी वह अकेली अपने गम से जूझ रही है. मौन-निस्पंद. गांव वाले उसके दुख से ज्यादा उसके मौन से परेशान हैं. एक तो खोटे भाग. ऊपर से जिद. सूरज ढलान पर है. जुबान बंद रखकर तो यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है. वरना अकेली जान बेटी को कहां-कहां खोजेगी. पुलिस-थाना करना भी पड़ा तो कैसे करेगी? उसे गांव वालों पर भरोसा करना चाहिए. यहां के लोग इतने हिम्मती हैं कि लड़की के भगाने वाला चाहे जिस कोने में जा छिपे, उसे खोज ही निकालेंगे. लेकिन पता चले तब न―

‘जयबंती कुछ तो बताओ....’

‘मुंह खोलो जयबंती....’

‘गांव वालों पर भरोसा रख जयबंती....’

गांव वालों का धैर्य चुक रहा है. दो पहर हुए खुशामद करते हुए. यह औरत अपना मुंह खोलने को तैयार ही नहीं है. चुप्पी मन में संदेह पैदा करने वाली है―

‘जाने दो....बेटी पराये मर्द के साथ मुंह काला करके भागी है. बेचारी किस तरह मुंह खोलेगी.’

‘मुझे तो लड़की के चाल-चलन पर पहले ही शक था....’ 

इस आवाज ने जयबंती का कलेजा चीर दिया. एक-एक शब्द उसकी छाती में बर्छी की तरह चुभने लगा. गांववालों ने जयबंती पर इससे पहले भी आरोप लगाए थे. उसे बेहया-बेशर्म घमंडी तक कहा था. सीने पर पत्थर रखकर वह ताने-उलाहने सब सुनती रही. परंतु सहनशक्ति की सीमा होती है. जयबंती धीरज वाली औरत है....पर औरत के साथ माँ भी तो है. लोग बेटी पर इल्जाम लगाएं, भला कैसे सह सकती है.

उस दिन जयबंती का गुस्सा फूटा तो बबंडर बन गया―’‘हां, भागकर गई है मेरी बेटी. जिसके साथ गई है, वो लड़का हमारी जात-बिरादरी का भी नहीं है. पर उसने अच्छा किया है. दोनों आपस में प्यार करते हैं. और तुम सब, जो पंच बनकर घर में घुसी चली आई हो....वे सब भी जो गली-कूंचों में मुंह-वाचा कर रही हैं, जिसके साथ रोज रात को सोती हैं....जिसके बच्चों को जन्म देती हैं....जिसके नाम से अपनी मांग रंगकर सधवा होने का ढोंग रचती हैं, पता नहीं उससे प्यार करती भी हैं या नहीं. मेरी बेटी भागी है....अपनी पसंद के लड़के के साथ....मैंने ही उसे भगाया है. कहा था, गांव वाले सात फेरों के साथ बेटी को विदा नहीं करने देंगे. दम है तो भगाकर ले जाए. लड़के ने दम दिखाया और अब मेरी बेटी जहां है, वहां खुश है.’’

उस दिन के बाद जयबंती और उसकी बेटी को लेकर तरह-तरह की बातें हुईं. किसी ने उसे बदलचन बताया, किसी ने कुलटा कहकर भड़ास निकाली. लेकिन उस दिन के बाद किसी रमसिंगा की उसका रास्ता रोकने या किसी धनसिंगा की घर आकर आंगन में पसर जाने की हिम्मत न हुई.

 

जो आत्मलीन रहकर लिखते हैं, उनका वास्तविक परिचय उनके शब्द होते हैं. वे कृतियां भी जिन्हें उन्होंने खुद से संवाद करते हुए रचा है. मैं खुद को ऐसा ही लेखक पाता हूँ. इसका नुकसान तो पता नहीं लाभ काफी हुआ है, सदा वही लिखा जो मन को भाया. कम छपा पर गम नहीं किया. जिस परिवेश से आना हुआ उसमें जन्मतिथि प्राइमरी स्कूल में दाखिले के समय तय की जाती है. अपना जन्म जिला बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश के एक गांव में हुआ था. जन्मतिथि ‘पंडिज्जी’ ने तय की—15 जनवरी 1959. न माता-पिता ने विरोध किया था, न ही अपुन ने. उसी के साथ गाँव की मिट्टी में, खेत-खलिहानों के बीच पला-बढा. दर्शन में परास्नातक और दूसरी डिग्रियां प्राप्त कीं. अलाव किनारे बैठ किस्सा-कहानी सुनकर गुनना सीखा. जमीन से जुड़ाव वैचारिक प्रतिबद्धता का कारण बना. गांव में जातिवाद ने विद्रोही बनाया. धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड ने नास्तिक. लेखक बनने का सपना था, कितना फला—, समझने में देर है.

 

फिलहाल शब्दों से दोस्ती को 40 वर्ष बीत चुके हैं. इस दोस्ती ने पांच उपन्यास, चार कहानी संग्रह, चार नाटक संग्रह दिए हैं. इनके अलावा लघुकथा, व्यंग्य, समीक्षा, विज्ञान, कविता, बालसाहित्य, समाजवाद, सहकारिता दर्शन पर वैचारिक पुस्तकें नाम की हैं. जिनकी संख्या 40 से अधिक है. वैचारिक निबंधों का ब्लाग ‘आखरमाला’ है. उसपर दो सौ से ऊपर आलेख, 3000 पृष्ठों की सामग्री के रूप में सुरक्षित हैं. दो-तीन ब्लॉग और हैं जिनपर कथासाहित्य और बालसाहित्य को जगह मिली है. हिंदी अकादमी, दिल्ली(2002) तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान( 2013) द्वारा सम्मानित.

ओमप्रकाश कश्यप

जी-571, अभिधा, गोविंदपुरम,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश, पिन-201013

दूरभाष : 9013 254 2 32    

Email. opkaashyap@gmail.com

आखरमाला : omprakashkashyap.wordpress.com

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags