... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

 

वह भागता चला जा रहा था. सुनसान काली अन्धेरी रात. गर्म उमस भरी रात. उपर तारों भरा आसमान, लेकिन चाँद नदारद. पैरों तले उबड़-खाबड़ ज़मीन. ऊंचे ऊंचे घने दरख्तों के साये. वह जैसे कोई अन्जान दुनिया की अन्जान रात थी. वह जंगल का बेटा था. ऐसी कितनी अन्धेरी उजली रातें उसने जंगल मे पैदल चलते हुये गुज़ारी है. कभी अकेले तो कभी संगी-सथियों साथ. लेकिन आज वाली बात कभी न थी. कंटीले तारों मे उलझकर उसके कपड़े जगह जगह से फ़ट गये और जिस्म लहू लुहान हो चुका था. लगातार भागते-भागते उसके पैर जवाब देने लगे थे. सांस फ़ूलने लगी थी और पेट मे दर्द होने लगा था. प्यास से हलक सूखने लगा था और उसमे कांटों की चुभन महसूस होने लगी थी. शरीर का सारा पानी पसीना बनकर बह चुका था. फ़िर भी वह रुकना नही चाहता था. वह रात भर मे जितना अधिक से अधिक हो सके दूर भाग जाना चाहता है. उसे पता नहीं कि वह किस दिशा मे भागा जा रहा है; और यह भी नहीं पता कि मंज़िल कहां है. बस वह एक ही दिशा मे दौड़ा जा रहा था.

       वह रुक नहीं सकता. क्या पता वे लोग पीछे आ रहे हों. अंधेरे और सन्नाटे मे अपने पैरों की आवाज़ भी उसे डरा देती और वह रुक जाता तो अंधेरा और गहरा हो जाता. सन्नाटा उसके होशोहवास पर और हावी होने लगता. उसे अपने दिल की धड़कन भी बिल्कुल साफ़ सुनाई देने लगी. अपनी ही सांसों की आवाज़ इतनी तेज़ सुनाई देने लगती कि महसूस होता जैसे कोई भयंकर जानवर उसके बिल्कुल नज़दीक खड़ा है और उसके पीछे घूमते ही उसपर झपट पड़ेगा.

अरे नही, कहीं कोई नहीं है. यह तो बस प्यास और थकान का उसके दिमाग पर असर लगता है. उसने सिर को झटका दिया और अपने घुटनो पर हाथ रखकर दोहरा हो गया. उसने अपनी सारी इच्छाशक्ति समेटकर अपने मस्तिष्क को शांत करने मे लगा दी. उसने रुक कर हालात का जायज़ा लिया. नहीं ! कहीं कोई नहीं है. मीलों तक कोई नहीं है. तो अब दौड़ने के बजाय पैदल चलना ही ठीक रहेगा. इसलिये भी कि, दौड़ने की आवाज़ तो दूर तक सुनाई देगी पैदल चलना ही ठीक रहेगा. उसने इरादा कर लिया और अब पैदल ही चलने लगा.

लेकिन उसे लगातार चलते ही रहना होगा; क्या पता वे लोग आ पहुंचे? और एक गोली सनसनाती हुई उसके भेजे को चीरती हुई निकल जाये. नहीं ! ऐसा हुआ तो उन सारे लोगों का क्या होगा जिन सबका जीवन उसने खतरे मे डाल दिया है; वहां से भागकर? वे तीनो जो वहां उसी के साथ बंदी थे. बेशक उन्होने उसकी योजना मे शामिल होने से इन्कार कर दिया था; लेकिन वे उसी की तरह वहां पकड़ कर लाये गये थे और उसके भाग जाने से उन सबकी जान खतरे मे पड़ गयी थी. उसे यहां से जिन्दा निकलना पड़ेगा तभी वह उन्हे बचाने की अपनी योजना को पूरा कर पायेगा. फ़िर उसके मां बाप और यहां तक कि उसका पूरा गांव उसके भागने का दण्ड भुगत सकता है ...

अचानक उसका पैर किसी चट्टान जैसी चीज़ से टकराया और वह मुंह के बल किसी ठोस धरातल पर गिर पड़ा. उसने अपने दांये पैर, पेट और मुंह मे दर्द महसूस किया. उसने हाथ से टटोल कर देखा… यह तो चट्टान है. बड़ी और सपाट चट्टान. वह कब पथरीले इलाके में आ पहुंचा पता ही नहीं चला. यह तो काफ़ी बड़ी और सपाट चट्टन है. इसपर तो आराम से सोया जा सकता है.

अमावस्या की रात के इस पहर मे चट्टान के ऊपर बैठा वह एक प्रेत की तरह ही लग रहा था. वह थका हुआ था. बेहद थका हुआ. और अभी तक अपने आत्मबल के सहारे ही क्रियाशील था; लेकिन थोड़ा सा सुस्ताने के इरादे ने उसके आत्मबल को अपने कब्ज़े मे ले लिया था. शरीर की थकान उसकी आत्मा पर हावी होने लगी. प्यास ने उसके गले मे और ओठों पर कांटे बो दिये. अभी इस जगह इस अंधेरे मे वह पानी कहां तलाश करे. शरीर का पोर पोर दुखने लगा और वह निढाल होकर वहीं लुढक गया.  धीरे धीरे आंखें बंद होने लगी. तभी कुछ शोर सुनाई देने लगा. लगा जैसे बहुत से लोग बातें करते हुए चले आरहे हैं. कमर पर लंगोट और ऊपर से शरीर बिल्कुल वस्त्रहीन. कुछ के कंधे पर फ़रसा और कुछ के कंधों पर तीर-कमान. अरे ! ये तो उसके गांव वाले हैं. लेकिन इतनी रात गये ? रात कहां ? रात नहीं यह तो शाम का समय है. और वह अपने गांव मे ही है. वे सारे लोग उसके अपने ही तो हैं. उसका बाप, चाचा और गांव के दूसरे लोग. वे जंगल से लौट रहे हैं. वे अपनी जीविका का सारा सामान जंगल से ही पाते हैं. और वह अपने आप को भी देख रहा है. वह एक छोटा बच्चा है, बिल्कुल नंग-धड़ंग, धूल मे लिथड़ा हुआ. एक आम आदिवासी बच्चे की तरह. वह अपने पिता की तरफ़ दौड़ लगाता है. लेकिन वह जितना तेज़ दौड़ता है, उतना ही पीछे की तरफ़ बढता जाता है. धीरे-धीरे सब कुछ पीछे छूटने लगता है. अचानक अंधेरा छाने लगता है, अरे ! वह तो किसी अंधेरी गहराइयों मे गिरता चला जारहा है, गिरता चला जारहा है….

ओफ़्फ़ !

 

वह एक झटके से उठ बैठता है. ओह ! तो यह सब एक सपना था. नहीं ! नहीं ! वह सो नहीं रहा है. वह सो नहीं सकता. ऐसा नहीं कि उसे जंगल या जंगली जानवरों का डर हो. वह तो जंगल का बेटा है. जंगल मे पैदा हुआ , पल बढा , आदिवासी बाप की आदिवासी संतान. जंगल तो उसका दूसरा घर है. जहाँ वह अपने आप को हमेशा सुरक्षित महसूस करता रहा है. उसे तो डर लगता है उन सभ्य लोगों से जिन्होने उनके जंगल की फ़िज़ा मे आग लगा रखी है ; उनकी जिविकोपर्जन के साधन जो जंगल की ही देन है- इमली, तेंदूपत्ता , चिरौंजी , महुआ और महुए की शराब सब उसी आग मे धू-धू करके जल रहे हैं. उनकी संस्कृति को तहस नहस कर दिया है. और उनकी ज़िन्दगी को एक ऐसे चक्रव्यूव्ह मे ढकेल दिया है , जहां से उनकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं दिखता. जंगली जानवर तो इतने खतरनाक नहीं होते ; और जंगल तो बिल्कुल भी खतरनाक नहीं होता. लेकिन उसे अभी सोना नहीं है. उसके पास इतना समय नहीं है.

लेकिन उसका अपने आप पर कोई वश नहीं रह गया है. उसका दिमाग बोझल होने लगता है. वर्तमान और अतीत उसके दिमाग मे गड्मड होने लगे हैं. वह उठना चाहता है. अपने गांव , घर , परिवार को याद करना चाहता है. उन्हें देखना चाहता है ; लेकिन ….

उसे नींद घेरने लगती है. उसकी यादों पर अंधेरे के काले बादल छाने लगते हैं, और वह एक सुकून सा महसूस करने लगता है … यका यक वे तीन चेहरे फ़िर उसके दिल ओ दिमाग पर छाने लगते हैं. उसका सिर झटका सा खाता है और वह फ़िर सचेत हो जाता है.  

वह अपने चारों ओर देखने की कोशिश करता है. अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है. कहीं कोई राह नहीं, कोई मंज़िल नहीं. जैसा खुद उसके और उसके लोगों के जीवन मे है. जैसे वे सब एक चक्रव्युह में कैद हों. और सब ने इस चक्रव्यूव्ह को अपना मुकद्दर मान लिया है. वे जानते हैं – यहां हर कदम पर कोई न कोई जाल है ; कहीं कुआं है तो कहीं खाई. जिधर भी जाये जाल मे फ़सना है. या तो कुयें मे गिरेंगे या खाई मे. क्या यह सब कुछ यूं ही चलता रहेगा. नहीं , वह ऐसा नहीं सोंचता. आखिर कब तक इस चक्रव्यूव्ह मे जीना होगा. कोई कोशिश तो करनी होगी. मुक्ति नहीं न सही , मुक्ति के लिये संघर्ष ही सही.

यही सब उसने अपने उन तीनो साथियों को भी समझाने की कोशिश की थी, जो उसके साथ उस नक्सलियों के कैम्प मे कैद थे. और उसी की तरह अपने अपने गावों से अगवा किये गये थे ; और नक्सलियों के साथ मिलकर, पुलिस के खिलाफ़ लड़ने के लिये प्रशिक्षित किये जारहे थे.

 “हम यहां से नहीं निकल सकते … “ उन लोगों ने समझाने की कोशिश की थी- “फ़िर भागकर जायेंगे कहां ? ये लोग हमे पकड़ ही लेंगे. और हमारे मां-बाप और हमारा परिवार ? वे कहां जायेंगे ? ये लोग हमारे बदले उन्हें पकड़ेंगे और सज़ा देंगे. ये लोग उन्हे मार देंगे. हम अपने लिये उनकी बलि नहीं दे सकते.“

“और उन बेकसूरों का क्या जो हमारे हाथों मारे जायेंगे ?… क्या यह ठीक है कि हम अपने को बचाने के लिये बेकसूरों को कत्ल करते रहें ?”

“हम आखिर कर ही क्या सकते हैं ?”

“हम इस चक्र से निकल सकते हैं.“

“और पकड़े गये तो… ?”

“तो हम फ़िर यही सब करेंगे.“

“वे हमे ज़िन्दा ही नहीं छोड़ेंगे.“

“तो यह हमारी जीत होगी.“

“जीत ??? हम मारे जायेंगे …”

“हां ! फ़िर इसके बाद वे हमे कैद नहीं रख सकेंगे … अपनी मर्ज़ी नहीं करा सकेंगे … उनकी बंदूकें हमे डरा नहीं सकेंगी … हम डर के इस चक्रव्यूव्ह से मुक्त हो जायेंगे.“

“हम पगल नहीं है…” वे लोग बोले “हम अपनी जान नहीं देंगे.“

“इनके साथ भी कितने दिन जियेंगे ? किसी दिन पुलिस या फ़ौज की एक गोली हमारा काम खत्म कर देगी …”

“… … …”

“… … …”

उन्हें नहीं मानना था , वे नहीं माने.

और वे यह भी नही चाहते थे कि वह भागे और उन पर मुसीबत आये ; इसलिये वह उन्हे बिना बताये ही वहां से भाग गया था. अब वह चाहता था कि, इससे पहले कि सुबह हो और उसके भागने का पता चले और उन तीनो पर मुसीबत आये वह किसी तरह पुलिस तक पहुंच कर उस जगह और उन बंदियों का पता पुलिस को दे ; ताकि वे आज़ाद हो सके.

       हां ! उसे अब चलना होगा. वह उन्हें छुड़वायेगा. उसे सुबह तक किसी बस्ती किसी कस्बे या शहर तक पहुंचना होगा जहां पुलिस थाना हो … हां … पुलिस … सिपाही … गाड़ियाँ … बंदूकें … धांय धांय … कहां ? किधर ??

       धीरे-धीरे उसका दिमाग फ़िर थकने लगा. वह उसी चट्टन पर लुढ़क गया और नींद ने उसे अपने आगोश मे ले लिया.

       सपने में उसे फ़िर अपने लोग नज़र आने लगे … अपने लोग … अपना घर … अपना गांव …. महुए के पेड़ और बिखरे हुये महुये के फ़ूल … ओह ! ऐ गहरे जामुनी काले खट्टे मीठे फ़लों की झाड़ियाँ … गुठलियां और उसमे से निकलने वाली चिरौंजी …। खुशबू … यह कैसी खुशबू है… ? आवाज़ें … ए कैसी आवाज़ें हैं … ? क्या यह संगीत है ? यह क्या नज़र आता है ? यह गांव के बाहर मकान … ??? ओह यह तो घोटुल है.

       वह नींद मे कसमसा रहा है.

       घोटुल … जहां जाना उसके बचपन का सपना था. यह उसके जैसे हर बच्चे का सपना था. हां ! यह सच है कि उसकी तरह उसके गांव के सभी बच्चे भी यह सपना देखते थे. क्यों न हो, इस अदिवासी समाज का बच्चा जब बड़ा होता है, वह लड़का हो या लड़की तो इसी जगह उसके नये सामाजिक सम्बन्ध बनते हैं. जब बड़े होकर वे अपने माँ-बाप के घर की सुरक्षा के साये से निकल कर यहां रहने आते हैं; तभी उन्हें अपने समाजिक अस्तित्व का बोध होता है. उनमे आत्मविश्वास विकसित होता है. यहीं वे प्रेम करते हैं, रिश्ते बनाते है और वे अपना जीवनसाथी भी यहीं चुनते हैं; और उससे विवाह के बाद ही गृहस्थ जीवन मे प्रवेश करते हैं ….

       … लेकिन यह क्या ? वे आवाज़ें कहां चली गई ? और कई नई आवाज़ें उन आवाज़ों की जगह लेने लगती हैं … और ये अन्जान चेहरे … ये काले साये … ये कैसे साये हैं जो चारों तरफ़ से घोटुल पर प्रेत की तरह मंडरा रहे हैं. वे धीरे धीरे घोटुल को लील रहे हैं.

       लगता है जैसे सब कुछ खत्म होगया. यहाँ सिर्फ़ सन्नटा है. घोटुल वीरान है. अब यह सिर्फ़ एक मकान रह गया है; उजड़ा हुआ और बेजान. जैसे किसी ने इसे चूस लिया हो, और एक कंकाल छोड़ दिया हो. संस्कृति का कंकाल.

       फ़िर सन्नाटे पर शोर गुल हावी हो जाता है. वीराना चहल पहल मे बदल जाता है. यहां लोग ही लोग हैं. यहां सब कुछ है. जगली फ़लों से लेकर अनाज तक. महुआ है , महुये की शराब है , चीटियों की चट्पटी चटनी चिपोड़ा के साथ. यह तो उनका बाज़ार है. यहां आदिवासी अपना सामान लेकर आते हैं … मुर्गे , बकरे , इमली , चिरौंजी …. शहर के व्यापारी भी आते हैं अपने रंगबिरंगे सामान के साथ. वे आदिवासियों से नमक या कपड़ों के बदले मे इमली और चिरौंजी जैसी वनोपज भी खरीदते हैं.

                अचानक बाज़ार पर घबराहट छाने लगती है. चहल पहल , भगदड़ का रूप ले लेती है. लूट मार शुरू हो जाती है. मुर्गे, बकरे और शराब उठाई जा रही है. दुकानदार अपनी दुकाने समेटने मे लगे हैं. धांय! धांय!! गोलियों की गूंज मे ग्रामीणों के कंधे पर टंगे हुये टंगिया ( कुल्हाड़ी ) की चमक फ़ीकी पड़ने लगी है. हर तरफ़ वर्दियाँ ही वर्दियाँ नज़र आरही है. बंदूकों के आगे तीर कमान शर्म से पनाह मांगने लगे हैं. और तभी धांय … धांय … हर तरफ़ से … बस एक ही आवाज़ …

       और उसके बाद … सन्नाटा …

       हर तरफ़ लाशें ही लाशें … कुछ वर्धी धारी सिपाहियों की, और बाकी ग्राम वासियों की या दुकानदारों की. इन सिपाहियों मे कुछ पुलिस वाले हैं तो कुछ भीतरी जंगल से आये अंजान रहस्यमय सिपाही. वे कौन है किसी को नही पता. इन सबके बीच खड़ा वह एक छोटा सा बच्चा है , जो न जाने कैसे जीवित बच गया है. वह बे बसी से चारों तरफ़ देख रहा है. वह सांस भी नहीं ले पा रहा है … हवा मे खून और बारूद की मिली जुली गन्ध घुली हुयी है और हर तरफ़ सिर्फ़ घुटन ही घुटन है … घुटन … घुटन … घुटन ….

       वह हड़बड़ाकर उठ बैठता है. उसका सारा शरीर पसीने से तर है. वह ज़ोर ज़ोर से सांस लेने लगता है. जंगल की ताज़ी हवा उसके फ़ेफ़ड़ों मे भरने लगती है. ताज़ी हवा का एक झोंका उसके चेहरे से टकराता है. वह जैसे अपने अस्तित्व को महसूस करने लगता है.

       ओह ! तो यह सब सपना था …. वह नींद मे था और सपने मे अपने बचपन को देख रहा था. यह घटना उसके बचपन की थी और इसके बाद तो छत्तीसगढ़ के इस दक्षिणी भूभाग के जंगलों मे जीवन बदल ही गया. कई नए शब्द सुनाई देने लगे – शोषण , अत्याचार , वर्गसंघर्ष , जन आन्दोलन , जन सन्घर्ष , दलम , माओवाद, नक्सलवाद और न जाने क्या क्या.

       शुरू शुरू मे यह सब मन को बड़ा अच्छा लगता था. अच्छा लगता जब तेन्दूपत्ता के ठेकेदार जब अपनी मनमानी नहीं कर पाते. अच्छा लगता था जब अपनी वर्दी का रोब दिखाने वाले , गांव वालों से जबर्दस्ती दारू और मुर्गा लूटने वाले लोगों के चेहरे भय से पीले पड़ने लगते थे. अच्छा लगता यह देखकर कि हमारी भी अस्मिता है और हमे इसका एहसास होने लगा है.  उसे अच्छी तरह याद है कि कैसे बचपन मे वे फ़ुसफ़ुसा कर इन रहस्यमय सिपाहियों के बारे मे बात करते. ‘वो जंगल के अंदर रहते हैं. वहीं से आते हैं. उन्हे आदिवासियो का बूढ़ा देव भेजता है कि जाकर गांव वालों की रक्षा करो …’

        लेकिन यह सब बहुत दिन नहीं चलने वाला था. धीरे से परिदृश्य बदलने लगा. गांव के वे मदद्गार, वे आदिवासी देवताओं के दूत, अब उतने रहस्यमय नही रह गये. और न देवता के कोई दूत निकले. उन्होने पुलिस को, प्रशाशन को कमज़ोर किया और गरीब, जंगली, आदिवासी गावों मे अपनी पैठ बनाने लगे. वे गावों मे आते. लोगों को इकट्ठा करते और एक शोषण मुक्त समाज की स्थापना की बातें करते. ऐसे समाज की स्थापना की बातें करते जहां कोई ऊंच-नीच नही होगा. न अत्याचार होगा न अन्याय होगा. न कोई ज़ोर ज़बरदस्ती करने वाला रहेगा न कोई हुक्म देने वाला. जहां कोई गरीब नही होगा कोई अमीर नही होगा. कोई किसी को डरा नही सकेगा.

वे एक खूबसूरत दुनिया का खाका खीचते. वह दुनिया बड़ी रूमानी थी. उस दुनिया को पाने के लिये मन मचल उठता. एक दीवानगी सी छा जाती उस दुनिया को पाने के लिये. फ़िर वे लोगों का आह्वान करते उस समाज की स्थापना के लिये. इस समाज की स्थापना के लिये संघर्ष की बातें करते, और संघर्ष मे साथ देने की अपील करते.

धीरे-धीरे उन लोगों ने अपने कायदे कानून बस्तियों पर लागू करने शुरू कर दिये. उन कायदे कानून को मानना लोगो ज़रूरी कर दिया गया. जो नही माने उसके लिये दण्ड निर्धारित कर दिये गये. जन अदालते लगायी जाने लगी, जहां न्यायधीश, वकील से लेकर अर्दली तक वे ही लोग होते. जन-अदालतो मे प्रकरण वे ही प्रस्तुत करते. आरोप वे ही निर्धारित करते. आरोप के सही होने का(सही-गलत नही, सिर्फ़ सही होने का) निर्णय भी वे ही करते. दण्ड भी वे ही निर्धारित करते, जो कि अक्सर वीभत्स तरीके से पिटाई करके मृत्यु देना अथवा अंग भंग करके तड़पाने जैसे दण्ड होते. फ़िर दण्ड भी वे ही देते. कोई अपील नही, कोई दलील नही. इन जन-अदालतो मे जन का कोई हस्तक्षेप नही होता. यहां जन को मूक दर्शक बनना और समर्थन करना अनिवार्य होता. शायद यह जन की नियति यही है; ठीक जनतंत्र की तरह जहां जन का योगदान समर्थन और मूक दर्शक बनने तक सीमित होता है. दरअसल यह तो एक सत्ता की स्थापना की कोशिश थी… समानन्तर सत्ता की…

धीरे-धीरे वे पैर फ़ैलाते गये. शहरो तक गरीब आदिवासियों से उन्हे कुछ नही मिल सकता था, तो बड़े बड़े सेठो, ठेकेदारो, इस क्षेत्र मे स्थापित बड़ी कम्पनियो से वसूली की जाने लगी. यह सत्ता की नियति है वह शोषको के टुकड़ो पर ही पलती है. अब एक तरफ़ सरकार थी और दूसरी तरफ़ वे. और दोनो के बीच पिसने लगे गरीब आदिवासी, दो पाटन के बीच मे साबित बचा न कोय …. वह इन्ही हालात के बीच बड़ा हुआ था जब उनका यह फ़र्मान निकला कि जंगल की रक्षा और जनता के संघर्ष के लिये, सरकारी सेना और पुलिस के आतंक और शोषण से गरीब आदिवासियों की रक्षा के लिये, हर गांव से नौजवान लड़के और लड़कियों को सशस्त्र दलों मे शामिल होना है.

एक रात जब वह गहरी नींद मे था कि भारी गड़बड़ आवाज़ो और शरीर मे उठती पीड़ा की तीव्र लहरो से वह जागा. कुछ लोग उसे घसीटते हुये झोपड़ी से बाहर ला रहे थे. ये वेही लोग थे , जो उसे खींचते घसीटते जनसंघर्ष की राह पर लिये चले जारहे थे. पीछे-पीछे उसके मा बाप रोते गिड़गिड़ाते उसे छुड़ाने का संघर्ष जारी रखे चले आरहे थे. और जनसंघर्ष के वे हथियारबंद मसीहा उसके मा बाप को बंदूक के हत्थे और डंडो से मार पीट कर भगा रहे थे. धीरे-धीरे, रोते बिलखते उसके मा बाप पीछे छूट गये. गांव पीछे छूट गया. अब वह समझ गया कि यह उनके अंतिम दर्शन थे. विधाता ने उसका भाग्य तय कर दिया है. उसकी मृत्यु के दो ही विकल्प बचे हैं. एक – पुलिस की गोली से, नक्सलि के रूप मे, दूसरा नक्सलियों के हाथों गद्दार के रूप मे.

उसे नक्सलियों के जिस कैम्प मे रखा गया था, वहां उससे पहले से ही तीन और नवजवान रखे गये थे; जिनमे एक लड़की भी थी. वे भी उसी की तरह विभिन्न आदिवासी बस्तियों से अगवा करके लाये गये थे. वे उससे दो दिन पहले ही लाये गये थे. लेकिन वह उनसे जल्द ही घुल-मिल गया.

शाम को ही उनके हाथो मे बंदूकें थमा दी गई. मौका था जनअदालत का. पास की एक बस्ती मे आस-पास के सारे ग्रामिणो को इकट्ठा करके जनअदालत लगाई गई थी. इसका न्यायधीश इनके ग्रुप का कमांडर ही था.

उनके पहुंचते ही अदालत की कार्रवाही शुरू हो गई थी. उनकी ही उम्र के एक नवयुवक को हाथ-पैर बांध कर लाया गया. उसके विरुद्ध आरोप-पत्र पढ़ा गया. उस पर आरोप था कि उसने अपने सशस्त्र ग्रुप को छोड़ कर भागने का दुस्साहस दिखाया जो उसके ग्रुप के साथियों और महान जनता के संघर्ष के साथ गद्दारी है. और यह अपने आप मे बहुत बड़ा अपराध है. आरोप पत्र पढ़ते ही आरोप साबित हो गया. न सफ़ाई, न सबूत, न वकील, न गवाह. बस तुरंत ही फ़ैसला हो गया. उनके कमांडर ने तुरंत ही सज़ा सुना दी जो हमेशा की तरह मौत की सज़ा ही थी.

हालांकि ये जनअदालतें उनके लिये सामान्य बात थी. उन लोगों ने ऐसी कार्रवाहियां कई बार देखी थी. लेकिन आज वे अंदर तक दहल गये. यह उनकी ट्रेनिंग का पहला अध्याय था. भागे तो मौत ! यह सारी कार्रवाही उन्हे दिखाने के लिये ही तो थी. और वे अच्छी तरह समझ भी गये थे.

इस घटना ने उसे और भी ज़्यादह विचलित कर दिया था. वह इस तरह नही रुकने वाला. जान जाये तो जाये, वह भागने का प्रयास ज़रूर करेगा. वह जानता है कि यहां से भागने के बाद उसे कहीं पनाह नही मिलने वाली. वह अच्छी तरह जानता है कि यहां से भागना मौत को चुनौती देना है , फ़िर भी …

अगले दिन उसने अपने साथियों के सामने यह बात रखी लेकिन उसका साथ देने कोई तैयार नही था. उन लोगो ने उसे समझाया कि यह सिर्फ़ खुदकुशी ही नही, बल्कि इससे उसका सारा परिवार नक्सलियों द्वारा मारा जा सकता है. लेकिन उसने किसी की एक नही सुनी और रात को जब सब सो रहे थे …….

अचानक उसकी तंद्रा भंग होती है. हवा की दिशा बदल गयी थी. उसकी नाक कहीं पानी की गंध महसूस करने लगी थी. पास ही शायद कोई गड्ढा हो या नाला हो. हालांकि रात उतनी ही काली थी. आसमान के तारे उतने ही चमकदार और उतने ही सघन थे. वह अंधेरे मे रास्ता टटोलते हुये उस ओर चल दिया जहां से पानी की गंध आरही थी.

XXX

वह रात भर चलता रहा था और जब पौ फ़टी तो उसने अपने आप को पक्की इमारतों और मकानो की एक बस्ती के मुहाने पर पाया. वह एक पक्की सड़क पर खड़ा था. सूर्य की पहली किरण के साथ उसकी इंद्रियां जागृत हो उठी थीं. मस्तिष्क सक्रिय हो गया था. अब कहां जाना चाहिये ? क्या करना चाहिये ? लेकिन अब उसे अपने से ज़्यादह अपने उन तीन साथियों की चिंता सता रही थी जिन्हे वह नक्सलियों के कैम्प पर सोता हुआ छोड़ आया था. अब तक तो सब जान गये होंगे . पता नही उनपर क्या बीत रही होगी. उसे भगाने का आरोप तो उन्ही पर लगेगा. कहीं वे मार ही न डाले जायें. उफ़ ! मैने उन्हे कैसी मुसीबत मे डाल दिया. मुझे कुछ भी कर उन्हे बचाना होगा.

उसने उन्हे बचाने के लिये पुलिस की सहायता लेनी होगी. बस यही एक रास्ता है. वह पुलिस को उनके कैम्प तक लेजा सकता है. वह पूछते पुछाते जब थाने के पास पहुंचा तो वहां पहले ही बड़ी भीड़ मौजूद थी. रात मुखबिर की सूचना पर पुलिस की टीम ने जंगल मे चार नक्सलियों के एक ग्रुप पर हमला बोला था. जिसमे से तीन नक्सली मारे गये और उनका कमांडर बचकर भागने मे सफ़ल हो गया. तीनो नक्सलियों के शव बाहर रखे हुये थे. जहां देखने वालों का हुजूम लगा हुआ था. प्रेस, फ़ोटोग्राफ़र और टी वी रिपोर्टरों का मजमा लगा हुआ था. एक पुलिस अधिकारी उन्हे बता रहा था कि जैसे ही वे मौका-ए-वारदात पर पहुंचे तो नक्सलियों ने उन पर गोलियां चलानी शुरू कर दी. लेकिन पुलिस ने जवाबी हमला करके उन्हे मार गिराया. लेकिन उनका शातिर कमांडर भागने मे कामयाब हो गया. लेकिन वह ज़्यादह दिन पुलिस से बच नही सकता क्योंकि उनके सामान मे से पुलिस को उसकी फ़ोटो और ज़रूरी जानकारी मिल गयी है.

उसकी जिज्ञासा बढ़ने लगी. वह भीड़ को चीरता हुआ उस जगह पहुंचा जहां उन नक्सलियों के शव रखे थे. वे वीभत्स लाशें देखते ही उसे चक्कर आगया. वह गिरने को ही था कि भीड़ ने उसे थाम लिया “अरे जब लाश देख नही सकते तो भीड़ मे क्यों घुसे आते हो ? चलो बाहर निकलो…” और भीड़ ने उसे बाहर निकाल दिया.

वह एक पल को रुका, सम्भला फ़िर उल्टे पैर वापस लौट गया. उसने सड़क पार की. बाज़ार पार किया, पक्के मकानो को पार कर सामने के मैदान को पार करता हुआ वापस जंगल मे दाखिल हो गया.

अभी भी उसे अपने देखे पर भरोसा नही हो रहा था. यह कैसे हो सकता है. वे तीनो लाशें … ? वे तीनो … ? अभी कुछ घंटे पहले तो वह उन्हे सोता हुआ छोड़ आया था. यह सब अविश्वसनीय है. लेकिन सत्य है. उसे स्वीकर करना चाहिये. हां ! ऐसा होता है …

यहां सब कुछ सम्भव है.

और उनका चौथा साथी, नक्सलियों का कमांडर … वह स्वयम् … ? वह कहां जाये ? किस पर विश्वास करे ? जंगल ही उसे रास आता है. आखिर वह जंगल का बेटा है.

XXX

इस दिन के बाद, किसी ने उसे देखा नही. न पुलिस ने … न नक्सलियों ने … न गांव वालों ने. दिन गुज़रे महिने गुज़र गये और साल गुज़र गये … लोग कहते हैं वह आज भी जंगल मे मौजूद है. जंगल का बेटा.  

सुनसान अंधेरी रातों मे आज भी लोग उसके भागते हुये कदमो की आहट पाते हैं. कहते हैं, अमावस्या की काली अंधेरी रातों मे जब सितारे आहें भरते हैं, वह अपने लोगों के हाल पर सिसकिया भरता है. जंगल से गुज़रते हुये लोगों ने कई बार उसे हवा के साथ सुर मिला कर गुनगुनाते हुये सुना है. और यहां तक सुना गया कि जंगल स्वयम् ही उसकी रक्षा करता है और एक दिन वह वापस अपने लोगो मे वापस ज़रूर आयेगा.

लोग इंतेज़ार करते हैं कि एक दिन वह जंगल से बाहर आयेगा; और अपने लोगों की, सभी उत्पीड़ित भाईयों की हर प्रकार के उत्पीड़न से मुक्ति की घोषणा करेगा.     

 

मिर्ज़ा हफीज़ बेग

 

 

अपने बारे मे. . .

अपने बारे मे मै क्या लिखूं? मैं कभी समझ नही पाता हूँ, और शायद इसी लिए मै कहानियाँ लिखता हूँ ; और इन्हीं मे अपने आप को तलाशता हूं । मै इनसे अलग हूं भी नही, फिर अलग से क्या कहूँ. . . .
यह उन दिनों की बातें हैं, जब दिन सुनहरे हुआ करते और आसमान नीला । बिल्कुल साफ शफ्फाक । मै एक विशिष्ट शहर भिलाई का रहने वाला हूं; और भिलाई के ऊपर उन दिनो आसमान बिलकुल खुला खुला सा हुआ करता, और इसके दक्षिण में क्षितिज पर एक तसवीर थी बहुत सारी चिमनियों और कुछ विचित्र आकृतियों की । वे रहस्यमयी चिमनियां , अकसर बहुत सारा गाढ़ा गाढ़ा धुआँ उगलती । कभी दूध सा उजला सफेद, कभी गेरुआ लाल जिसके बारे मे मुझे लगता कि उस सफेद धुयें मे ही ईट पीसकर मिला देते होंगे और कभी काला धुआँ, जो मै सोचता कि ज़रूर, चिमनी के नीचे डामर(कोलतार) जलाया जारहा होगा जैसे सङक पर बिछाने के लिए जलाते हैं ।
"वो क्या है?" मै पूछता ।
"वो कारखाना है ।" दादा दादी बताया करते "तेरे अब्बा वहीं काम करते हैं ।"
मेरे अब्बा एक विशिष्ट इनसान थे, वे अथक संघर्षशील, मृदुभाषी और मुस्कुराकर बात करने वाले थे । उन जैसा दूसरा इनसान मैने दूसरा नही देखा । वे जहाँ जाते लोग उनसे प्यार करने लगते । उनके व्यक्तित्व मे जादू था ।
जादू तो उन रातों का भी कम न था, जब अंधेरे के दामन पर जगह पुराने दौर के बिजली के लैम्प पोस्ट के नीचे धुंधली पीली रौशनी के धब्बे पङ जाते । जब कोई चीज उन धब्बों से होकर गुज़रती तो नज़र आने लगती और बाहर होती तो गायब होजाती । एक और जादू आवाज़ का होता । रात की खामोशी पर कुछ रहस्यमयी आवाज़ें तैरती . . . . जैसे - ए विविध भारती है. . . या हवा महल. . . . और बिनाका गीतमाला की सिग्नेचर ट्यून या अमीन सयानी की खनकती शानदार आवाज़ ।
ये आवाज़ें रेडियो से निकलती और हर खास ओ आम के ज़हन पर तारी हो जाती । मेरे खयाल से उन बङे बङे डिब्बों  (रेडियो) मे छोटे छोटे लोग कैद थे जो बिजली का करंट लगने पर बोलने और गाने लगते । और उन्हें देखने के लिये मै रेडियो मे झांकता और डाट खाता कि- करंट लग जायेगा । अब्बा जब रेडियो को पीछे से खोलकर सफाई या और कोई काम करते तो मै उसमे अपना सिर घुसाकर जानने की कोशिश करता कि वे छोटे छोटे लोग किस जगह होंगे , एकाध बार मै रहस्योदघाटन के बिलकुल करीब पहुँच भी गया लेकिन हर बार अब्बा डाटकर भगा देते । क्या अब्बा को यह राज़ मालूम था ? मै अब तक नही जान पाया ।
किसी रात जब हम बाहर सोते तो आसमान पर अनगिनत तारों को मै गिनने की कोशिश करता । ठीक है वे अनगिनत हैं , फिर भी इनकी कोई तादाद तो होगी । मै उन्हे गिनकर दुनिया को उनकी तादाद बता दूंगा, फिर कोई नही कहेगा कि आसमान मे अनगिनत तारे होते हैं । अफसोस !! हर बार मुझे नींद आ जाती और मै यह काम अब तक पूरा नही कर पाया और अब तो शहर के आसमान पर गिनती के तारे होते हैँ, जिन्हें ढूँढ ढूँढ कर गिनना पङता है ; लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं कि आसमान में अनगिनत तारे हैं । खैर!
रातें जब सर्दी की होतीं, हम दादा दादी के साथ अपनी बाङी मे छोटी सी आग जलाकर आग तापते आस पङोस के और बच्चे भी आ जाते और दादा दादी की कहानियों का दौर शुरू हो जाता । दादी के पास उमर अय्यार की जम्बिल के नाम से कहानियों का खजाना था और उमर अय्यार मेरा पसंदीदा कैरेक्टर था । कई बार वो मोहम्मद हनीफ की कहानियां भी सुनाती । दादा की कहानियाँ मुख्तलिफ होती और वे मुझे अब भी याद हैं, उन्हें मैने अपने बच्चों को उनके बचपन मे सुनाई ।
हम बी एस पी के क्वार्टर में रहते जहां हमारे क्वार्टर के पीछे ही गणेशोत्सव होता । जिसमे नाटक, आरकेस्ट्रा जैसे कई आयोजन होते । बस यहीं से नाटक का शौक पैदा हुआ और इसके लिए मैने एक नाटक(एकांकी-प्रहसन) लिखा 'कर्ज़' इसका मंचन हुआ तब मै कक्षा छठवीं मे था । इसके बाद ज़िंदगी मे कई अकस्मिक मोड़ आये जिन्हे बताने के लिये बहुत वक्त और बहुत जगह की दरकार है । तो मुख्तसर मे यही कि नवमी कक्षा मे मै एक साप्ताहिक मे संवाददाता बन गया । दसवीं मे था तब पहली कहानी ‘क ख ग घ …’ प्रकाशित हुई जो जलेस की बैठक मे खूब चर्चा मे आई । तभी रेडिओ से एक कहानी प्रसारित हुई जिसके लिये पहली बार मानदेय प्राप्त हुआ । लेकिन लेखक बनने और दुनिया भर मे घुमते रहने के मेरे सपने ने मेरे घर मे मुझे भारी संकट मे डाल दिया । मेरे अब्बा से मेरे रिश्ते बिगड़ गये, वे चाहते थे कि मै अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाऊं, खूब तालीम हासिल करूं और उसके बाद बी एस पी मे नौकरी करूं । वे मुझसे बहुत ज़्यादह उम्मीद रखते थे और अपने टूटे हुये ख्वाबों को मेरी ज़िंदगी मे साकार होते देखना चाहते थे, तो वे कुछ गलत नही चाहते थे, क्योंकि बेटे की कहानी तो बाप की कहानी का ही विस्तार होती है । लेकिन मेरे अपने अब्बा से रिश्ते बिगड़ गये और यह हाल तब तक रहा जब उस दिन सुबह – सुबह मेरी अम्मी बद हवास सी मुझे जगा रही थी । नींद से जागते ही पता चला मेरे सर से आसमान छिन गया है; सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई । तीन बहन और तीन भाईयों मे सबसे बड़ा बेटा था मै । अब्बा, जो हमेशा मेरी फ़िक्र मे रहते थे और मै यह बात अच्छी तरह जानते हुये भी कभी उनसे कहता नही, उस रात ट्रक एक्सिडेंट मे दुनियां से रुख्सत हुये तो हम दोनो के बीच बातचीत तक बंद थी । मै अपने दिल की बात उन्हे बताना चाहता था लेकिन …… वह हादसा मेरी ज़िंदगी का बड़ा सबक बन गया । अफ़सोस ! ज़िंदगी सबक तो देती है लेकिन उसपर अमल करने के लिये दूसरा मौका नही देती ।

अब मेरे सामने दूसरा विकल्प नहीं था, नौकरी के सिवाय । फ़िर वह वक्त भी आया जब लेखन और नौकरी के बीच एक को चुनना था और निश्चित रूप से मैने चुना नौकरी को । मैने अपना लिखा सारा साहित्य रद्दी मे बेच दिया, अपनी सारी पसंदीदा किताबों का संग्रह भी । मैने अपने अंदर के लेखक की हत्या की और अपने अंदर ही कहीं गहराइयों मे दफ़न कर दिया । मै मुतमईन था कि उस लेखक से पीछा छूटा लेकिन करीबन चौथाई सदी बाद किसीने मुझसे मेरे ही नाम के एक पुराने लेखक का ज़िक्र किया और मै चुप रहा । किस मुंह से कहता कि वह मै ही था । वह दिन बड़ी तड़प के साथ गुज़रा और रात को जनम हुआ एक कहानी का ‘एक लेखक की मौत’ । दरअसल वह एक लेखक के पुनर्जनम की कहानी थी ।

वह लेखक जो आज आपसे रू-ब-रू है …

 

लेखक से सम्पर्क : zifahazrim@gmail.com

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