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बस्तर के आदिवासी-क्षेत्र की संस्कृति और जीवनपद्धति

1 नवम्बर सन् 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर अस्तित्व मे आने वाले राज्य छत्तीसगढ़ को यूं तो आदिवासी राज्य ही समझ लिया जाता है लेकिन वास्तव मे 1991 की जनगणना के अनुसार ये यहां की आबादी का 32.16% है । और इनमे से भी सब अपने मूल रूप मे नहीं बल्कि शहरों मे रहकर शहर के रंग-ढंग मे रच बस गये हैं । शहरों मे वैसे तो आदिवासी संस्कृति की नुमाइशें भी लगाई जाती हैं, लेकिन यह हमारा विषय नहीं । जगदलपुर का दशहरा आदिवासी त्योहार के रूप मे पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है । यह आयोजन 75 दिनो तक चलता है । हालांकि यह त्योहार जनजातीय परम्पराओं से अस्तित्व मे नही आया अपितु यहां के राजवंश के शासक महाराज पुरुषोत्तम देव द्वारा शुरू किया गया है, फ़िर भी इस आयोजन मे छत्तिसगढ के सभी जनजातीय समुदायों के धार्मिक अनुष्ठान देखने को मिल जाते हैं । इसके आयोजन के बारे मे कई किंव्दन्तियां हैं; लेकिन मुझे लगता है अपनी विभिन्न जनजातीय समुदायों मे बटी प्रजा को एक साथ लाना ही शायद इसका मकसद रहा हो । हां ! यहां जो ताम-झाम, जो चमक दमक और चकाचौंध देखने को मिलती है, इन जनजातियों का वास्तविक रूप इससे बिल्कुल भिन्न है । अत: हम आज इस विषय पर भी बात नही करेंगे । हां ! कभी न कभी यहां के जनजातीय त्योहारों के साथ इस पर विस्तार से बात करना चाहूंगा । आज हम इन आदिवासी जनजातीयों के वास्तविक जीवन मे अपनायी जाने वाली परम्पराओं, संस्कारों और संस्कृति पर बात करेंगे ।

 

 

वैसे साम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को मुख्यत: दो आदिवासी क्षेत्रों मे बाटा जाता है । उत्तर-पूर्वी आदिवासी क्षेत्र और दक्षिण आदिवासी क्षेत्र । दक्षिण क्षेत्र के आदिवासी, सामान्यत: बस्तर के आदिवासी कहलाते हैं; जबकि यह क्षेत्र मुख्यत: बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, बिजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा आदि जिलों तक फ़ैला हुआ है । हम आज इसी दक्षिण क्षेत्र के आदिवासियों की बात करेंगे । इन दोनो क्षेत्रों मे मुख्य अंतर यहां की भौगोलिक एवम् राजनैतिक परिस्थितियाँ का अन्तर हैं ।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से अपनी यात्रा शुरू कर NH43 यानि राष्ट्रीय राजमार्ग 43, विशाखापट्टनम को चली जाती है । यह राजमार्ग, महाराष्ट्र से आरहे राष्ट्रीय राजमार्ग-16 को जगदलपुर मे काटते हुये सुकमा और छत्तिसगढ़ के अन्तिम छोर कोन्टा की ओर निकल जाता है । इस राजमार्ग पर धमतरी पार करके कांकेर, केसकाल, कोंडागाँव, बस्तर, जगदलपुर, सुकमा और धुर दक्षिण मे कोंटा जैसे कई शहर और भी कई आबादियाँ पड़ती हैं । लेकिन इन दोनो राजमार्गों की दोनो तरफ़ दूर दूर तक जाने पर आपका सामना घने जंगलो, नदियों और पहाड़ों से होता है । यह छत्तीसगढ़ का दक्षिणी आदिवासी क्षेत्र है; जो बस्तर के आदिवासी क्षेत्र के रूप मे भी जाना जाता है । यहाँ के जंगल मे प्रवेश करते ही, ये जंगल भयावह रूप से शांत नज़र आयेंगे । लेकिन आप महसूस करेंगे कि यहाँ आकाश आपको हज़ारो आखों से घूर रहा है । यहाँ के पेड़ के पत्तों के कान है और धरती आपके एक-एक कदम का जायज़ा ले रही है । और आपका एक गलत कदम आपको यहीं से स्वर्ग पहुंचा सकता है । और यह सब इसलिये क्योंकि सोना, हीरे और लौह अयस्क जैसी खनिज सम्पदा और अनेकों प्रकार की बेशकीमती वन सम्पदा से मालामाल यह भूमि आज सरकार और नक्सलवादी या माओवादी आदि नामो से पुकारेजाने वाले कई उग्रवादी वामपंथी गुटों के बीच रणभूमि बनी हुई है ।

खनिज सम्पदा के अलावा यह क्षेत्र साल, बीज, महुआ, चिरौंजी, इमली, लाख, गोंद, और तेन्दूपता जैसी वन सम्पदा से मालामाल है । लेकिन इन सम्पदा के वारिस, यहां के मूल निवासी आदिवासी इन खतरनाक हालात मे, बिजली और पीने लायक पानी के भयंकर अभाव के बावजूद, अपनी संस्कृतियों और परम्पराओं के सहारे अपना अस्तित्व बनाये हुये हैं । हम इसी संस्कृति और परम्पराओं को जानने की कोशिश करेंगे । हां ! हम सिर्फ़ बात करेंगे उस संस्कृति की जो जंगल के अन्दर रहने वालों के वास्तविक जीवन मे दिखाई देती है और मैं राजनीतिक सममस्याओं से भी मुंह चुराता नज़र आ सकता हूं क्योंकि यह भी हमारे आज के विषय से बाहर की बात है ।

ऊपर मैने सिर्फ़ यह एहसास कराने की कोशिश की है कि, ये जनजातियाँ किन परिस्थितियों मे जीवित है । अब तक आप समझ गये होंगे कि ये बड़े जीवट और साहसी होंगे; लेकिन इन जनजातियों की स्त्रियां विशेष रूप से मज़बूत और जीवट होती हैं । इसीलिये जब यहाँ ऐसे समाचार सुनने-पढ़ने मिले तो कोई आश्चर्य नही कि, एक बालिका ने अपने भाई की जान बचाने लकड़ी से शेर(बाघ) पर हमला कर दिया , या दो किशोर भाई बहन ने लकड़ी से पीट-पीट कर तेंदुये को भगा दिया ।

 

वैसे तो पूरे छत्तीसगढ़ मे ही आदिवासियों की लगभग बयालीस प्रजातियाँ निवासरत है; जिनमे से   यहां आदिवासियों की मुख्यत: गोंड, हल्बा, बैगा, मुरिया, भतरा, दोरला, परजा, मढ़िया, धुरवा आदि जनजातियाँ निवास करती हैं और गोंडी, हल्बी तथा बस्तरिया आदि बोलियां बोली जाती हैं । इन बोलियों पर आम तौर पर उड़िया, मराठी या छत्तीसगढ़िया की बोलियों का स्पष्ट प्रभाव नज़र आता है ।

सम्भवत: कई जनजातियाँ होने के कारण इनकी आस्थाओं के स्वरूप मे भी काफ़ी विरोधाभास दृष्टिगोचर है । आदिकालीन जीवनपद्धती के कारण ये प्रकृति के साथ इतने एकरस हैं कि इनकी आस्थायें भी जल, जंगल और प्रकृतिक घटनाओं से जुड़ी होती है । इसीलिये वर्षा, बाढ़, दावानल या आंधी और तुफ़ान जैसी प्राकृतिक घटनायें जो इनके जीवन का अभिन्न अंग हैं, इन्हे दैवी कृपा या प्रकोप के रूप मे देखा जाता है और इन्हे प्रसन्न रखना आवश्यक समझा जाता है । जिसके लिये अलौकिक शक्तियों को प्रसन्न करने के लिये कई पूजा विधान है जिनमे मुर्गा, बकरा, गाय-भैस आदि की बलि देने के अलावा दारू मुर्गा आदि का चढ़ावा भी दिया जाता है; तो वहीं जीव पूजा का भी विधान है । फ़िर मुर्ती पूजा तो है ही । ये मूर्तियाँ आम तौर पर पत्थर या लकड़ी की होती हैं तो कहीं लकड़ी या पत्थर की भी पूजा होती है; और कहीं-कहीं कहीं तो कपड़े के टुकड़े को पूजते भी पाया गया है । इस सबके बावजूद यहाँ कई देवी देवताओं को पूजा जाता है; जैसे- बूढ़ादेव, दूल्हादेव, भैंसासुर, रावदेवता, बगरूम, डोंगर, अगारमोती, डोकरादेव, सियानदेव, डाक्टरदेव, डालरदेव, पाटदेव, आंगापाटदेव, कुंअर, घुटाल आदि देवता और ठाकुरदाई, शीतला, मावली, केशरपालीन, तेलंगीन, कंकालीन, परदेसीन, दुलारदाई, दन्तेश्वरी आदि प्रमुख देवियाँ हैं । यह सूची तो और बहुत लम्बी है । कारण कि, यहां हर प्रजाति, यहां तक कि हर गांव के अपने अपने आराध्य हैं ।

जीवन और उत्पत्ति सम्बन्धित अवधारणा- एक और रोचक बात इनकी जीवन प्रारम्भ सम्बन्धित अवधारणा है । इस बारे मे एक तो टोटम सम्बन्धित अवधारणा है । यानि इनके समाज के हर समुदाय अथवा परिवार या वंश का सम्बन्ध किसी टोटम से होता है । ये टोटम कोई जीव यानि कोई पेड़, पशु, या पक्षी भी हो सकता है; जो इनकी उत्पत्ति का आधार होता है और स्वाभाविक है कि वे इस टोटम पर अगाध श्रद्धा रखते और इसकी विशेष पूजा करते हैं । और अपने इस टोटम पर कोई विपत्ती आने पर वे अपने ऊपर विपत्ती की सम्भावना समझते हैं । इसी प्रकार बैगा जनजाति की भी उत्पत्ति सम्बन्धित अपनी अवधारणा है कि ईश्वर ने पृथ्वि पर सबसे पहले मानव के रूप मे नंगा-बैगा और नंगी-बैगिन को बनाया जिनकी दो सन्ताने हुई, एक बैगा और दूसरी गोंड । इन दोनो ही जनजातियों के आराध्य बूढ़ा देव का साजा के वृक्ष पर निवास माना जाता है । और उल्लेखनीय है कि छत्तिसगढ़िया मे झाड़-फ़ूंक और जादू-टोना से इलाज करने वालो के लिये भी बैगा शब्द उपयोग मे लाया जाता है ।

 

जीवन यापन के उपाय- सीमित खेती किसानी के बावजूद ये मुख्यत: वनोपज पर ही आश्रित होते हैं । यहाँ आम तौर पर धान, कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा आदि की फ़सल होती है और वे साल मे एक फ़सली खेती ही करते हैं । ये जिस जगह खेती करते हैं आम तौर पर वहीं घर बनाकर रहते हैं और उस घर मे किसी की मृत्यु हो जाने पर थोड़ा हटकर दूसरा घर बनाते हैं । जंगलों से इमली, महुआ, लाख, गोंद और चिरौंजी आदि इकट्ठा करते हैं । जिसे शहरों के व्यापारी और ठेकेदार औने पौने दामो मे इनसे खरीद कर खूब मुनाफ़ा कमाते हैं । वैसे भी पैसों का इनके जीवन मे बहुत महत्व नही होता क्योंकि अभी भी यहां वस्तु विनिमय चलता है । अपनी आवश्यकता के लिये वे मुर्गी और जानवर भी पालते है नशे के लिये घर-घर मे महुये की शराब उतारी जाती है और ताड़ के पेड़ से सल्फी या ताड़ी भी उतारी जाती है । जिसके साथ चखने मे आम तौर पर आम के पेड़ पर पाई जाने वाली चीटियों को भूनकर चटनी बनाई जाती है जो चीटियां अम्लीय होने के कारण खट्टी लगती है । इस चटनी को चिपोड़ा कहते हैं । इनके भोजन मे अधिकतर उबाला हुआ चावल जिसे भात कहते हैं, उबाले गये चांवल का निथारा हुआ पानी जिसे पसिया कहते हैं, सब्ज़ियों की करी के अलावा सूखी मछली, पुटु यानि मशरूम और चपड़ा इत्यादि होते हैं । वैसे मैने एक जनजातीय व्यक्ति को एक झपट्टे मे बड़े से एक चूहे को मार गिराते और उसे दुम से उठाकर झोले मे रखते देखा । मैने पूछा इसका क्या करोगे? तो उसने जवाब दिया- “खाहूं ।“ यानि खाऊंगा । वैसे तीज त्योहार के अवसर पर आखेट किया जाता है और फ़िर सामूहिक भोजन, मदिरा-पान और नृत्य आदि की परम्परा भी है ।

खाना पकाने के लिये मिट्टी के बर्तन और खाने के लिये पत्तों के बर्तन यानि दोना-पत्तल अर्थात् खाने के लिये हर बार नया बर्तन । बर्तन वे खुद ही बना लेते हैं; वैसे यह हाट बाज़ार मे भी उपलब्ध होता है ।

यहां के साप्ताहिक हाट बाज़ार इनकी अर्थ व्यवस्था की रीढ़ होते हैं । या बाहरी दुनिया से इनका यहीं सम्पर्क होता है । यहां बाहरी जगत के अल्प पूंजी वाले व्यापारी सस्ती और लुभावनी चीज़ें बेचने आते हैं । वहीं बड़े व्यापारियों के दलाल भी आते हैं जो लाख, गोंद, हर्रा, बहेड़ा, इमली और चिरौंजी आदि को नमक और अन्य सस्ती चीज़ों से बदलकर शहर के बाज़ारों से खूब मुनाफ़ा कमाते हैं ।  

वेशभूषा- पुरुष आम तौर पर लंगोट या छोटा सा गमछा कमर मे बांधते हैं; जिसे वे लुंगी या धोती कहते हैं । सिर पर पगड़ी का भी चलन है और तीर-कमान या फ़रसा(चौड़े फ़ाल वाली कुल्हाड़ी) धारण करते हैं । स्त्रियां गाथि मारकर साड़ी लपेटती हैं । बालों को जूड़ा बांधकर मोतियों और फ़ूलों से सजाती हैं ।

संस्कार-

मृत्यु संस्कार- किसी की मृत्यु होजाने पर एक विशेष लय मे ढोल नगाड़े बजाकर संदेश भेजा जाता है जिसे सुनकर आस पास के लोग मृतक के घर जमा हो जाते हैं । यहाँ किसी वृद्ध की मृत्यु को शादी विवाह समझा जाता है और उसी तरह बाजे गाजे के साथ झूमते गाते शव यात्रा निकाली जाती है । मठ मे दारू मुर्गा, नाच-गाना, हास्य-व्यंग आदि के साथ आनंदोत्सव आयोजित होता है । पांच छ: दिन पश्चात् बड़े काम यानि विशेश क्रिया कर्म का आयोजन होता है जिसमे मृतक के लिये शराब तथा भोजन, फ़ल, कांदा, चावल, बर्तन कपड़ा आदि रखाजाता है । तालाब मे कलश रखकर तेल हल्दी चढ़ाते हैं । तत्पश्चात् परिवार के सभी लोग मिलकर मृतक की आत्मा को ढूंढते हैं । तालाब का जो जीव सबसे पहले मिलता है उसे ही मृतक की आत्मा माना जाता है और जिसे सबसे पहले मिलता है उसे ही मृतक से सबसे अधिक प्रेम करने वाला माना जाता है । इस जीव को डूमा देव कहा जाता है । अब डूमा देव की शादी का मंडप गड़ाकर मदिरापान, नाच-गाना तथा मृतक की जीवन के बारे मे गायन होता है । मृतक की याद मे पेड़ लगाने की भी प्रथा है । यहाँ शव को जलाने या दफ़नाने दोनो प्रथाओं का चलन है ।

जन्म सम्बन्धित संस्कार- यहां गर्भवती महिला को घर से बाहर डेरा बनाकर रखने की प्रथा है; जहां वह अकेली ही रहती है और गर्म पानी से नहाती है । प्रसव पीढ़ा होने पर ये मानसिक और शारीरिक रूप से सुदृड़ महिलायें बिना किसी की सहायता के, अकेले अपने ही दम पर सन्तान को जन्म देती हैं । बच्चा पैदा होने के बाद वह स्वयम् नहा धोकर कपड़े पहनकर आ जाती । शिशु जनम के दौरान पुरुष वर्ग चावल लेकर देवों का आव्हान करते रहते है । जनम देने के पश्चात् महिला को आग के पास सुलाया जाता है । प्रसूता महिला की सास तथा जेठानी मिलकर बच्चे के नाल को एक दोना पत्तल मे लपेटकर आग के पास रख देते हैं जहाँ वह धीरे-धीरे जलकर खत्म हो जाता है । प्रसूता को अरहर की दाल का पानी या आटे का हरीला पीने को दिया जाता है । इसके पश्चात् पन्द्रह दिनो तक हांडी छुपाने आदि के नेग दस्तूर होते हैं जिसमे एक महिला पुजारन जिसे गायतिन कहते हैं, मां बच्चे को नहला धुलाकर तेल लगाकर और कलश जलाकर आशिर्वाद की रस्म अदा कराती है । घर मे महुये की शराब उतारी जाती है । देवों को इस शराब का भोग लगाकर पीने पिलाने, नाचने गाने तथा भोजन का दौर चलता है ।

महिलाओं से सम्बन्धित अन्य संस्कार- यहां घरों मे विशेष रूप से देव कमरा होता है जहां जाना महिलाओं के लिये वर्जित होता है । लड़की के प्रथम मासिक धर्म पर लड़की स्वयं जंगल मे जाकर गड्ढा खोदकर प्रथम बार का फ़ूल धरती माता को अर्पित कर आती है । तीन दिनो के बाद लड़की को पीढ़े पर बैठाकर हल्दी के पानी से नहलाकर हल्दी चावल का टीका लगाते तथा भेंट उपहार देते हैं ।

विवाह संस्कार- आम तौर पर रिश्ते के अंदर यानि ममेरे-फ़ुफ़ेरे भाई बहनो मे विवाह को प्राथमिकता रहती है । ऐसा सम्भव न होने पर समुदाय अथवा गांव के अंदर विवाह को ही उचित माना जाता है । इसके अलावा भी विवाह के कई रूप और विधान मौजूद हैं……

पैठुल विवाह- लड़की अपने पसंद के लड़के के घर मे पैठ जाती या घुस जाती है । अब यदि लड़का भी सहमत हो जाये तो, परिवार के एतराज़ के बावजूद इनके विवाह को समुदाय की अनुमति प्राप्त हो जाती है । यह बैगा और कई अन्य जनजातियों मे प्रचलित है; और पैठुल बिहाव या पैठुल विवाह के नाम से जाना जाता है ।

भगेली विवाह- भगेली बिहाव या भगेली विवाह मे लड़का लड़की दोनो की आपसी सहमति होती है । जब लड़की के माता पिता रिश्ते के विरोध मे हों तो लड़की रात मे अपने घर से भागकर अपने प्रेमी के घर के छप्पर के नीचे शरण लेती है । लड़का एक लोटा पानी अपने छप्पर पर बहाता है जिसे लड़की अपने सिर पर लेती है; तब लड़के की माँ लड़की को अपने घर के भीतर ले जाती है । गांव का मुखिया या प्रधान तब लड़की को अपनी शरण मे लेता है और लड़की के भगेली होने की सूचना उसके परिवार को देता है । रात मे मड़वा गड़ाकर विवाह कर दिया जाता है और लड़की के परिवार को भी किसी न किसी तरह भेंट आदि देकर मना लिया जाता है ।

उढ़रिया विवाह- यह साधारण प्रकार का प्रेम विवाह ही है । जब परिवार या समुदाय सहमत न हों तब लड़का लड़की किसी मेले-मढ़ई(साप्ताहिक या वार्षिक हाट-बाज़ार) मे मित्रों की सहायता से मिलकर भाग जाते हैं । फ़िर किसी दूसरे गांव मे कोई परीचित अथवा रिश्तेदार के घर जाकर विवाह रचा लेते हैं । परिवार वाले उन्हें ढूंढकर वापस लाते है । अगर विवाह समुदाय से बाहर हुआ हो तो बहिष्कार का सामना करना पड़ता है लेकिन अंतत: कुछ दण्ड आदि के बाद मान्यता प्राप्त हो ही जाती है ।

चढ़ विवाह- इसमे लड़का बारात लेकर लड़की के घर जाता है और विधि विधान पूर्वक विवाह रचाकर वधु को अपने घर ले आता है ।

पठोनी विवाह- इस विवाह मे लड़की बारात लेकर, लड़के के घर जाती है और विधि-विधान पूर्वक विवाह रचाकर वर को विदा कराकर अपने घर ले आती है ।

लमसेना विवाह- इस पद्धति मे शादी के इच्छुक युवक को कन्या के घर जाकर एक-दो वर्ष या इससे अधिक अवधि तक रहना और स्वयम् को खेती बाड़ी तथा परिवार के हर कार्य के योग्य सिद्ध करना होता है । युवक को लड़की के साथ पति की तरह ही रहने की अनुमति तो होती है किंतु लड़की के परिवार की सन्तुष्टि के पश्चात ही विवाह की अनुमति मिलती है । बहुदा विवाह की अनुमति मिलने तक एक दो सन्ताने भी हो चुकी होती है ।

घोटुल- उपरोक्त विवाह पद्धतियों और संस्कारों के अलावा एक बड़ी ही महत्वपूर्ण प्रथा है घोटुल । वैसे प्रथा से ज़्यादा यह संस्था होती है, जिसका अपना भौतिक स्वरूप होता है । जहा से यह संस्था संचालित होती है उस गृह को भी घोटुल कहा जाता है । यह गांव से बाहर एक घर होता है । विशेष बात कि यह सिर्फ़ जीवन साथी चुनने की जगह या विधान ही नही; जैसा कि आम तौर पर समझा जाता है और न ही स्वच्छन्द यौन क्रीड़ाओं या मौज-मस्ती की जगह है, जैसा कि बहुत से सभ्य जगत के लोग समझते हैं और जिस कारण से यहां घुसपैठ करने के लिये लार टपकाते फ़िरते है । बाहरी जगत की इसी धारणा ने आज इस प्रथा और संस्था पर अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया है ।

वास्तव मे बाल्यकाल और गृहस्थ जीवन के बीच की एक मह्त्वपूर्ण कड़ी है यह घोटुल । हर अविवाहित युवक और युतियाँ इसकी अनिवार्य सदस्य होते हैं । इसके सदस्य युवक ‘चेलिक’ तथा युवतियां ‘मोटियारिन” कहलाती हैं । यहां के मुखिया को सिलेदार या सिरदार कहते हैं । अविवाहित युवक और युवतियों को रात मे अपने माता पिता का घर छोड़ यहां आना अनिवार्य होता है । यहां से बिना कारण के अनुपस्थित रहना अपमान या उपहास का कारण हो सकता है । वे यहां न सिर्फ़ यौन शिक्षा ही प्राप्त करते और नाचते गाते हैं बल्कि सामाजिक जीवन और सामाजिक सम्बंधों के बारे मे सीखते हैं और समाज के साथ अपने सम्बंध तथा दायित्व के प्रति सजग होते है । और भविष्य के समाज के साथ अपने सम्बन्ध विकसित करते हैं । देखा जाये तो घोटुल मे भविष्य का एक पूरा एक जनजातीय समाज अपनी विकासशील अवस्था मे विद्यमान होता है।   

 कोई भी सामाजिक कार्य होने पर घोटुल के सदस्यों की सक्रियता देखते ही बनती है । हां यहीं वे अपने जीवन साथी का भी चुनाव कर लेते हैं । जो कि इस अवस्था मे बिल्कुल स्वाभाविक बात है ।

सामाजिक ताना-बाना- यह समाज सामुहिक जीवन की चेतना से लैस और सामुहिक उत्तरदायित्व की भावना से भरा होता है । ये समाज के भीतर परस्पर भावनात्मक और रागात्मक रूप से जुड़ा हुआ होता है । यही कारण है कि ये आपस मे स्वाभाविक रूप से निस्वार्थ भाव से एक दूसरे की मदद करते हैं । इनके बीच किसी प्रकार के व्यापारिक सम्बन्ध नहीं होते । ब्याज या साहुकारी के लिये यहां कोई स्थान नही है । जैसे किसी को खेती के लिये बीज की ज़रूरत हो तो सब मिलकर उसे पूरा करेंगे और जब फ़सल आजायेगी वह उन्हे लौटा देगा । और यह सब इतनी स्वाभाविक प्रक्रिया है कि इसमे कोई कृतज्ञता या उपकार जैसी भावनाओं का कोई स्थान ही नहीं । यहां आने वाला मेहमान भी किसी एक परिवार का मेहमान नहीं होता बल्कि सारा गांव मिलकर उसका आदर सत्कार करते हैं । गांव मे मेहमान के ठहरने के लिये ‘थानागुड़ी’ का प्रबंध होता है; जिसे आप मेहमानखाना या अतिथिगृह अथवा गेस्ट-हाऊस कह लें ।

एक बात और, शिक्षा के बारे मे यहां एक कहावत है- ‘जो थोड़ा पढ़ा वह गांव से गया, जो ज़्यादा पढ़ा वह देश से गया ।‘ यह बात शायद अपने समाज और संस्कृति से जुड़ाव की अभिव्यक्ति हो किन्तु इनकी संस्कृति को खतरा शिक्षा से नहीं बल्कि विकास और शिक्षा के नाम पर इन्हे इनकी ज़मीन और जड़ों से दूर करने के षड्यंत्रों से है । बहुत सम्भव है कि, भविष्य मे हम शहरों मे नुमाईशों और प्रायोजित किये जारहे कार्यक्रम को ही इनकी जनजातीय संस्कृति मानने को मजबूर हो जायें । क्योंकि, हमारी सभ्यता, हमारी सोंच, सत्ता की भूख, बेशकीमती सम्पदा को हड़पने और मुनाफ़ा कमाने की हवस इनकी मौलिकता और अस्तित्व को निगलती जारही है ।

 

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- मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग

 

अपने बारे मे. . .

अपने बारे मे मै क्या लिखूं? मैं कभी समझ नही पाता हूँ, और शायद इसी लिए मै कहानियाँ लिखता हूँ ; और इन्हीं मे अपने आप को तलाशता हूं । मै इनसे अलग हूं भी नही, फिर अलग से क्या कहूँ. . . .
यह उन दिनों की बातें हैं, जब दिन सुनहरे हुआ करते और आसमान नीला । बिल्कुल साफ शफ्फाक । मै एक विशिष्ट शहर भिलाई का रहने वाला हूं; और भिलाई के ऊपर उन दिनो आसमान बिलकुल खुला खुला सा हुआ करता, और इसके दक्षिण में क्षितिज पर एक तसवीर थी बहुत सारी चिमनियों और कुछ विचित्र आकृतियों की । वे रहस्यमयी चिमनियां , अकसर बहुत सारा गाढ़ा गाढ़ा धुआँ उगलती । कभी दूध सा उजला सफेद, कभी गेरुआ लाल जिसके बारे मे मुझे लगता कि उस सफेद धुयें मे ही ईट पीसकर मिला देते होंगे और कभी काला धुआँ, जो मै सोचता कि ज़रूर, चिमनी के नीचे डामर(कोलतार) जलाया जारहा होगा जैसे सङक पर बिछाने के लिए जलाते हैं ।
"वो क्या है?" मै पूछता ।
"वो कारखाना है ।" दादा दादी बताया करते "तेरे अब्बा वहीं काम करते हैं ।"
मेरे अब्बा एक विशिष्ट इनसान थे, वे अथक संघर्षशील, मृदुभाषी और मुस्कुराकर बात करने वाले थे । उन जैसा दूसरा इनसान मैने दूसरा नही देखा । वे जहाँ जाते लोग उनसे प्यार करने लगते । उनके व्यक्तित्व मे जादू था ।
जादू तो उन रातों का भी कम न था, जब अंधेरे के दामन पर जगह पुराने दौर के बिजली के लैम्प पोस्ट के नीचे धुंधली पीली रौशनी के धब्बे पङ जाते । जब कोई चीज उन धब्बों से होकर गुज़रती तो नज़र आने लगती और बाहर होती तो गायब होजाती । एक और जादू आवाज़ का होता । रात की खामोशी पर कुछ रहस्यमयी आवाज़ें तैरती . . . . जैसे - ए विविध भारती है. . . या हवा महल. . . . और बिनाका गीतमाला की सिग्नेचर ट्यून या अमीन सयानी की खनकती शानदार आवाज़ ।
ये आवाज़ें रेडियो से निकलती और हर खास ओ आम के ज़हन पर तारी हो जाती । मेरे खयाल से उन बङे बङे डिब्बों  (रेडियो) मे छोटे छोटे लोग कैद थे जो बिजली का करंट लगने पर बोलने और गाने लगते । और उन्हें देखने के लिये मै रेडियो मे झांकता और डाट खाता कि- करंट लग जायेगा । अब्बा जब रेडियो को पीछे से खोलकर सफाई या और कोई काम करते तो मै उसमे अपना सिर घुसाकर जानने की कोशिश करता कि वे छोटे छोटे लोग किस जगह होंगे , एकाध बार मै रहस्योदघाटन के बिलकुल करीब पहुँच भी गया लेकिन हर बार अब्बा डाटकर भगा देते । क्या अब्बा को यह राज़ मालूम था ? मै अब तक नही जान पाया ।
किसी रात जब हम बाहर सोते तो आसमान पर अनगिनत तारों को मै गिनने की कोशिश करता । ठीक है वे अनगिनत हैं , फिर भी इनकी कोई तादाद तो होगी । मै उन्हे गिनकर दुनिया को उनकी तादाद बता दूंगा, फिर कोई नही कहेगा कि आसमान मे अनगिनत तारे होते हैं । अफसोस !! हर बार मुझे नींद आ जाती और मै यह काम अब तक पूरा नही कर पाया और अब तो शहर के आसमान पर गिनती के तारे होते हैँ, जिन्हें ढूँढ ढूँढ कर गिनना पङता है ; लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं कि आसमान में अनगिनत तारे हैं । खैर!
रातें जब सर्दी की होतीं, हम दादा दादी के साथ अपनी बाङी मे छोटी सी आग जलाकर आग तापते आस पङोस के और बच्चे भी आ जाते और दादा दादी की कहानियों का दौर शुरू हो जाता । दादी के पास उमर अय्यार की जम्बिल के नाम से कहानियों का खजाना था और उमर अय्यार मेरा पसंदीदा कैरेक्टर था । कई बार वो मोहम्मद हनीफ की कहानियां भी सुनाती । दादा की कहानियाँ मुख्तलिफ होती और वे मुझे अब भी याद हैं, उन्हें मैने अपने बच्चों को उनके बचपन मे सुनाई ।
हम बी एस पी के क्वार्टर में रहते जहां हमारे क्वार्टर के पीछे ही गणेशोत्सव होता । जिसमे नाटक, आरकेस्ट्रा जैसे कई आयोजन होते । बस यहीं से नाटक का शौक पैदा हुआ और इसके लिए मैने एक नाटक(एकांकी-प्रहसन) लिखा 'कर्ज़' इसका मंचन हुआ तब मै कक्षा छठवीं मे था । इसके बाद ज़िंदगी मे कई अकस्मिक मोड़ आये जिन्हे बताने के लिये बहुत वक्त और बहुत जगह की दरकार है । तो मुख्तसर मे यही कि नवमी कक्षा मे मै एक साप्ताहिक मे संवाददाता बन गया । दसवीं मे था तब पहली कहानी ‘क ख ग घ …’ प्रकाशित हुई जो जलेस की बैठक मे खूब चर्चा मे आई । तभी रेडिओ से एक कहानी प्रसारित हुई जिसके लिये पहली बार मानदेय प्राप्त हुआ । लेकिन लेखक बनने और दुनिया भर मे घुमते रहने के मेरे सपने ने मेरे घर मे मुझे भारी संकट मे डाल दिया । मेरे अब्बा से मेरे रिश्ते बिगड़ गये, वे चाहते थे कि मै अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाऊं, खूब तालीम हासिल करूं और उसके बाद बी एस पी मे नौकरी करूं । वे मुझसे बहुत ज़्यादह उम्मीद रखते थे और अपने टूटे हुये ख्वाबों को मेरी ज़िंदगी मे साकार होते देखना चाहते थे, तो वे कुछ गलत नही चाहते थे, क्योंकि बेटे की कहानी तो बाप की कहानी का ही विस्तार होती है । लेकिन मेरे अपने अब्बा से रिश्ते बिगड़ गये और यह हाल तब तक रहा जब उस दिन सुबह – सुबह मेरी अम्मी बद हवास सी मुझे जगा रही थी । नींद से जागते ही पता चला मेरे सर से आसमान छिन गया है; सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई । तीन बहन और तीन भाईयों मे सबसे बड़ा बेटा था मै । अब्बा, जो हमेशा मेरी फ़िक्र मे रहते थे और मै यह बात अच्छी तरह जानते हुये भी कभी उनसे कहता नही, उस रात ट्रक एक्सिडेंट मे दुनियां से रुख्सत हुये तो हम दोनो के बीच बातचीत तक बंद थी । मै अपने दिल की बात उन्हे बताना चाहता था लेकिन …… वह हादसा मेरी ज़िंदगी का बड़ा सबक बन गया । अफ़सोस ! ज़िंदगी सबक तो देती है लेकिन उसपर अमल करने के लिये दूसरा मौका नही देती ।

अब मेरे सामने दूसरा विकल्प नहीं था, नौकरी के सिवाय । फ़िर वह वक्त भी आया जब लेखन और नौकरी के बीच एक को चुनना था और निश्चित रूप से मैने चुना नौकरी को । मैने अपना लिखा सारा साहित्य रद्दी मे बेच दिया, अपनी सारी पसंदीदा किताबों का संग्रह भी । मैने अपने अंदर के लेखक की हत्या की और अपने अंदर ही कहीं गहराइयों मे दफ़न कर दिया । मै मुतमईन था कि उस लेखक से पीछा छूटा लेकिन करीबन चौथाई सदी बाद किसीने मुझसे मेरे ही नाम के एक पुराने लेखक का ज़िक्र किया और मै चुप रहा । किस मुंह से कहता कि वह मै ही था । वह दिन बड़ी तड़प के साथ गुज़रा और रात को जनम हुआ एक कहानी का ‘एक लेखक की मौत’ । दरअसल वह एक लेखक के पुनर्जनम की कहानी थी ।

वह लेखक जो आज आपसे रू-ब-रू है …

 

लेखक से सम्पर्क : zifahazrim@gmail.com

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