... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

वह क्यों रोई -

 

वह रात भर ठीक से सो नहीं पाई थी। एक तो दिन भर के काम की थकान और दूसरे पूरी रात बीमार सास की तीमारदारी। जरा सी आंख लगते ही उसके कराहने की आवाज सुनकर उसे उठना पड़ता। बार-बार की इस नींद उचटने की प्रक्रिया ने उसकी नींद पूरी तरह से उड़ा दी थी। उसने लेटे-लेटे ही एक बार फिर दीवार घड़ी की ओर देखा, सुबह के साढ़े चार बजने वाले थे। उसने पूरा मुंह खोल कर जम्हाई ली, आंखें मलीं और फिर जमीन पर बिछे बिछौने पर दीवार से पीठ टिका कर बैठ गई।

सामने की दीवार से सटा कर एक और बिस्तर लगा था। उसी पर वह बीमार कृशकाय देह पड़ी थी। इस देह से उसका दोहरा रिश्ता था। वह उसकी सगी बुआ थी और सास भी। जब वह बहुत छोटी थी और गांव में उसकी बुआ आती थी तो वह खुशी से उछल पड़ती थी। बुआ मुंबई जैसे बड़े शहर में रहती थी और एक मिल में नौकरी भी करती थी। जब भी वह आती उसके सजने-संवरने के लिए ऐसी चीजें लाती जो उसके गांव में तो क्या आसपास के छत्तीस गांवों और तहसील में भी नहीं मिलती।

उसे बुआ का आना बहुत अच्छा लगता। बुआ उसे बहुत प्यार करती। रात को वह उसे अपने पास ही सुलाती। उसके गुदगुदे शरीर से चिपक कर सोना और अपने बालों में बुआ का हाथ फिराना उसे अनोखे अहसास से भर देता। कई बार जब बुआ उसके गाल पर अपने स्नेह की मोहर लगाती तो वह भी बुआ के गालों को अपने प्यार से भर देती।

बुआ का एक लड़का था दीना जो उससे पांच साल बड़ा था। छुट्टियों में दीना भी बुआ के साथ आ जाता, वह उसके साथ खेलती और शहर के किस्सों को मुंह बाये सुनती। उसका मन करता कि वह भी बुआ के पास शहर जाकर रहे। बुआ ने कई बार उसके बाबा और मां से उसे अपने साथ ले जाने के लिए कहा भी, पर वे तैयार नहीं हुए। वह अभी बहुत छोटी थी। सचमुच आठ-नौ साल की उम्र इतनी नहीं थी कि वे उसे अपने से अलग करते। मां-बाबा को गांव से निकलने की फुरसत ही नहीं थी। घर चलाने के लिए उन्हें अपने छोटे से खेत की देखभाल करने के अलावा दूसरों के खेतों में मजदूरी भी करनी होती थी।

उसके गांव में पांचवीं तक का स्कूल था। वह भी अपना बस्ता कंधे पर लटकाए स्कूल जाती और जो कुछ वहां सीखती घर आकर अपनी मां को सिखाने की कोशिश करती। हर साल पास होकर वह तीसरी कक्षा में आ गई थी। स्कूल के बाद मां उससे घर का काम कराती, जिसमें उसका मन कम ही लगता था। मौका पाकर वह खिसक लेती और पूरे गांव का चक्कर लगा आती। अपनी सहेलियों के साथ किसी के भी खेत में घुस जाती और अपने हाथों से तोड़कर ताजी सब्जियां खाती। उन बच्चियों को इसके लिए कोई टोकता भी नहीं था और वे अपना ही खेत समझ कर वहां उछल-कूद मचाती रहतीं।

गांव की बाहरी सीमा के पास ही एक टूटा-फूटा मंदिर था। मंदिर के ठीक पीछे से छोटी सी पहाड़ी नदी बहती थी। कभी-कभी वे वहां चली जातीं और नदी की ओर मुंह कर बैठ जातीं। यह वह जगह थी जहां वे हम उम्र लड़कियां बैठ कर अपने सीक्रेट बांटतीं। कैसे उनका भाई उन्हें चिढ़ाता था, मां उनसे कितना काम कराती थी, बाबा से वो कितना डरती थीं, कौन मेहमान उनके घर आया था, स्कूल की कौनसी टीचर बहुत अच्छी थी और कौनसी बहुत बुरी। यहीं बैठकर वह अपनी बुआ की लायी चीजें अपनी सहेलियों को दिखाती और शहर के किस्से कहानियां उन्हें सुनाती, जिन्हें वे मुंह खोले और पलकें झपकाए बिना सुनतीं। उस समय उसे ऐसा लगता जैसे वह कोई विशेष व्यक्ति हो। उसके अलावा किसी और का कोई रिश्तदार ऐसा था भी नहीं जो मुंबई जैसे बड़े शहर में रहता हो।

ज्यादातर बुआ और दीना ही गांव आते, फूफाजी कभी-कभार ही उनके साथ होते। इस बार वह भी उनके साथ आए थे। उनके आने का मकसद उसे बाद में पता चला। वह अंदर बैठी पढ़ रही थी और घर के बाहर बिछी खाटों पर सभी लोग बैठ कर बतिया रहे थे। तभी उसके कानों में वह बात पड़ी। बुआ कह रही थी – “कम्मो तेरह साल की हो गई है। उसके हाथ पीले करने की कोई सुध है या नहीं?  हमारा दीना भी अठारह का हो गया है। पढ़ाई में तो उसका कोई मन नहीं है, पर अभी से कमाने लगा है। हम तो यही सोच कर आए थे कि दीना के लिए कम्मो का हाथ मांग लें। बोलो, क्या कहते हो तुम?”

कुछ देर चुप्पी छाई रही फिर उसकी मां की आवाज आई – “ये तो कम्मो के बापू को सोचना है, बहन-भाई के बीच बोलने वाली मैं कौन?”

वह पढ़ाई छोड़कर दरवाजे के पीछे छुप कर खड़ी हो गई। उसके दोनों कान बाबा की आवाज पर लगे थे – “देखो जी, कम्मो की शादी तो करनी है। हमारी बिरादरी में तो बहन-भाई के बच्चों में ब्याह होना अच्छा ही माना जाता है, घर की बेटी घर में ही रहती है न? मेरी कम्मो मेरी बहन के घर जाए तो मैं निश्चिंत रह लूंगा। क्यों ठीक कह रहा हूं न कम्मो की अम्मा?”

“जैसा तुम ठीक समझो” - कह कर उसकी मां चुप हो गई थी। तभी फूफा जी की आवाज आई थी – “रामलुभाया जी, तो फिर इसे पक्का समझें?”

“ठीक है जी” – उसके बाबा ने अपनी जेब से एक बीड़ी निकाल कर फूफा जी को पकड़ाते हुए कहा था।

यह सुन कर वह खुशी से भर गई थी। दीना के साथ उसकी शादी होगी और वह बुआ के घर मुंबई में जाकर रहेगी, यह सोच कर ही चमकीले सपने उसके आस-पास उड़ने लगे थे। शाम होते ही अपनी सहेलियों को यह बताने के लिए भागती चली गई थी। उसकी सहेलियां उसकी किस्मत से भौंचक होकर रह गई थीं – “वाह, कम्मो तेरी किस्मत तो बहुत अच्छी है, दीना जैसा लड़का, बुआ का घर ससुराल और फिर मुंबई में रहना”। यह सुन कर उसे बहुत अच्छा लगा था और मन ही मन वह खुद के भाग्य पर इठला उठी थी।

एक माह के भीतर ही उसकी शादी हो गई। बस में लगभग एक घंटे के सफर के बाद वे रेलवे स्टेशन पहुंचे जहां से रेलगाड़ी उन्हें मुंबई तक ले जाने वाली थी। उसे अपनी शादी की खुशी से ज्यादा मुंबई पहुंचने की खुशी रोमांचित कर रही थी। रेलगाड़ी का वह उसका पहला सफर था। पूरे रास्ते वह गाड़ी की सवारी से प्रफुल्लित रही और चमचमाती मुंबई के सपने लेती रही।

जब वह बुआ, फूफा और दीना के साथ मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरी तो उसकी सफर की सारी थकान उड़नछू हो गई। सामान को टैक्सी में लादने में उसने पूरी मदद की और टैक्सी चलते ही मुंबई के रास्तों, सजी-धजी दुकानों, ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों और सड़क पर भागती भीड़ और इतनी सारी मोटर-गाड़ियों को हैरत से देखती रही।

लगभग चालीस मिनट के सफर के बाद टैक्सी रुकी। उन्होंने सामान उतारा और एक पतली गली में घुस गए जिसमें दो आदमी भी साथ नहीं चल सकते थे। उस संकरी गली के दोनों ओर छोटे-छोटे पक्के मकान बने हुए थे, जिनकी छतें टीन-खपरैल की बनी हुई थीं। ऐसे ही एक मकान के सामने रुककर बुआ ने ताला खोला। अंदर एक कमरा था, जिसके एक कोने में रसोई बनाने के लिए ऊंची सी जगह बनी हुई थी। उसके बगल में काठ की एक सीढ़ी रखी थी, जिससे ऊपर बने एक और छोटे से कमरे में जाया जा सकता था। गली में एक ओर पांच शौचालय बने हुए थे जिनका उपयोग उस गली में रहने वाले सभी लोग करते थे। कमरे में बहुत ज्यादा रोशनी नहीं थी। कम्मो ने बुआ से पूछा था – “बुआ, तुम इस घर में रहती हो?” बुआ ने उसे घर के अंदर धकेलते हुए   कहा था – “क्या बुराई है इस घर में? यह तेरा गांव नहीं है। यहां लोग सड़क पर या इससे भी छोटी किराए की जगह में पूरी जिंदगी बिता देते हैं। फिर यह जगह तो हमारी खुद की है और शहर के बीचों-बीच है, मिल से कर्ज लेकर बनाया है मैंने”। बुआ की आवाज में गर्व और संतोष दोनों छलके पड़ रहे थे। लेकिन, कम्मो की उमंगों को तब पहला और जोर का झटका लगा था।

बाद में तो उसे झटके पर झटके लगते रहे। पता चला फूफा जी कहीं चौकीदारी  करते थे। खुद बुआ किसी मिल में मजदूरी करती थी। दीना आवारा लड़कों की संगत में पड़कर अपनी जिंदगी खराब करने का पूरा प्रबंध कर चुका था। शादी के बाद शुरू-शुरू में तो वह घर में ही बना रहा, पर, बाद में कब घर से निकल जाता और कब लौटता, इसका पता ही नहीं चलता था। वह क्या काम करता था और कितना कमाता था, यह कम्मो को कौन बताता। फूफा जी पूरे दिन घर में पड़े सोते रहते और रात को चौकीदारी के लिए निकल जाते। कम्मो का वहां दम घुटने लगा था। वह अपने गांव वापस जाने के लिए फड़फड़ाने लगी।

उस दिन उसने जब बुआ से कहा कि वह गांव जाना चाहती है तो उसे पहली बार अहसास हुआ कि बुआ तो कब की सास बन चुकी है। बुआ ने उसे घूरते हुए कहा था – “ये क्या बुआ-बुआ लगा रखी है, मां जी कहते शर्म आती है तुझे? दीना की मां हूं और तेरी सास। समझ गई? गांव भी भेजूंगी तुझे, दीना के साथ जाना और दो-तीन दिन रह कर उसी के साथ लौट आना”।

वह गांव गई तो वहां किसी को भी कुछ नहीं बता पाई, किस मुंह से बताती। सभी तो उसके बड़े भाग्य से खुश थे। फिर तीन दिनों में ही दीना उसे अपने साथ वापस लिवा लाया था।

उसे यह अहसास हो गया था कि उसकी सास बनी बुआ को बहू की नहीं, ऐसी नौकरानी की जरूरत थी जो उसके पीछे से घर में झाड़ू-बुहारी कर दे, दोनों टाइम का खाना बना दे, कपड़े धो दे और दो रोटी खाकर चुपचाप घर में पड़ी रहे। दीना को घर में बांधे नहीं रख पाने पर भी उसे आए दिन सास से ताने मिलने शुरू हो गए थे।

उस छोटी सी उम्र में घर का पूरा काम करने के बाद वह बुरी तरह थक जाती। कई बार उसे समय-असमय नींद आ जाती। काम से लौटने पर सास उस पर बुरी तरह चिल्लाती – “सारे दिन पड़े-पड़े सोती रहती है, काम की न काज की दो मन अनाज की”। वह अपनी सास को पहले वाली बुआ समझ कर कई बार उससे उलझ जाती। पर, उसका उग्र रूप देख कर सहम जाती।

धीरे-धीरे बुआ और चिड़चिड़ी होती जा रही थी क्योंकि फूफा जी नौकरी छोड़कर घर बैठ गये थे। उन दोनों में जम कर झगड़ा होता रहता। फिर एक दिन रात को वह घर छोड़कर ऐसे गये कि फिर उन्होंने पलट कर कभी घर की ओर नहीं देखा। कुछ फुसफुसाहटों ने उसे बताया था कि फूफाजी ने एक दूसरी औरत भी रखी हुई थी। बुआ कुछ दिन रोई-धोई फिर उसने भी उनकी खोजबीन बंद कर दी। उनका नाम आते ही वह उन्हें गाली देने लगती और कहती – “अगर उस मरदुए ने घर की तरफ देखा भी तो उसकी आंखें निकाल लूंगी। मजदूरी करके मैंने यह घर बनाया है। देखती हूं कौन इसमें कदम रखता है”।

इधर दीना ने शराब पीकर घर आना शुरू कर दिया था। कम्मो की जब उसे जरूरत होती तभी वह उससे ढ़ंग से बात करता फिर वह उसकी बिलकुल भी परवाह नहीं करता था। बुआ सारा दोष कम्मो के सिर ही मढ़ती। उस दिन तो हद ही हो गई जब कम्मो ने अपना दु:ख बुआ के साथ बांटना चाहा तो वह उल्टे उसी को दोष देने लगी। उससे भी सहन नहीं हुआ और उसने पलट कर जवाब दिया तो पहली बार बुआ ने उसकी पिटाई की। बाद में तो जब भी उसे अपनी खीज उतारनी होती, वह कम्मो पर हाथ उठाकर ही उसे उतारती। कभी-कभी तो वह ऊपर वाले कमरे में उसे बंद कर देती, जिसमें वह घंटों पड़ी रोती रहती। बुआ का जब मन करता तब गाली देती हुई उसे कमरे से बाहर निकालती।

अंदर ही अंदर घुट कर और छुप कर आंसू बहाते दिन निकालने को विवश कम्मो कभी-कभी घर छोड़कर भागने की सोचने लगती। पर, कुछ करने का साहस नहीं जुटा पाती थी। कहां जाएगी, अम्मा-बाबा को दु:खी करने के अलावा इसका कोई और नतीजा नहीं निकलने वाला था।

दिन निकलता और ढल जाता। अपने साथ खुशियां लाने के बजाय उसे और दु:खी कर जाता। बुआ का सास वाला रूप देख कर वह सहम जाती। पिटाई के डर से वह अपनी जुबान नहीं खोलती और आंसू पीकर रह जाती। अब वह सतरह साल की हो चली थी। जिंदगी को बोझ की तरह ढोते रहने की उसे आदत हो चली थी।

तभी वह हादसा हुआ, बुआ मिल में काम करते समय सीढ़ियों से गिर गई और उसकी कई हड्डियां टूट गईं। मिल मालिक ने उसका इलाज कराया पर वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई। इलाज के बाद जब वह घर लौटी तो बहुत कमजोर हो चुकी थी। उसे चलने में दिक्कत होती थी। कम्मो ही उसे पकड़ कर चलाती। धीरे-धीरे उसका चलना भी कम होता गया और फिर वह ज्यादातर सिर्फ बैठी या लेटी रहने लगी। कुछ देर बैठने से ही उसकी टूटी हुई हड्डियों में बेतहाशा दर्द होने लगता और वह कराह कर लेट जाती।

मिल मालिक ने उसे एक लाख रुपये का हर्जाना दे कर काम से निकाल दिया था। दीना जो कुछ भी थोड़ा-बहुत कमाता, उसे शराब में उड़ा देता था। मां की तीमारदारी की बात तो अलग, वह उसे बहला-फुसलाकर हर्जाने की रकम में से  पैसे मांग कर ले जाता।

दो-तीन महीनों में ही कुबेर का वह खजाना खत्म हो गया। घर में दोनों समय का खाना बनना मुश्किल होता गया। सास की तीमारदारी, दीना की बेपरवाही और घर की माली हालत से कम्मो की जिंदगी मुहाल हुई जा रही थी। ऐसे समय में उसने आस-पास के दो-तीन फ्लैटों में बर्तन मांजने और झाड़ू-बुहारी का काम शुरू करने का फैसला लिया।

उसकी सास उसके फैसले से अंदर ही अंदर बहुत खुश थी क्योंकि घर चलाने के लिए इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। पर, वह उसकी अनुपस्थिति से परेशान भी रहती क्योंकि जब तक वह नहीं लौटती, उसके सारे काम रुके रहते। इसका गुस्सा वह उसके आने पर जम कर उतारती। कहती – “इतनी देर क्यों लगा दी। जल्दी-जल्दी काम निपटाया कर। मेरी तो तुझे जरा भी परवाह नहीं है। तुझे पता है, तेरे बिना मैं असहाय सी पड़ी रहती हूं, इसलिए तू जानबूझ कर ऐसा करती है”।

कम्मो उसकी बात का बिना कोई जबाव दिए काम में लग जाती। गंदी पड़ी सास को साफ करती, उसे बाथरूम तक पकड़ कर ले जाती। उसे अपने हाथों से खाना खिलाती। उसे ठीक तरह से लिटाने के बाद, सुबह का बनाया खाना अपने लिए गर्म करती। कभी-कभी दीना भी घर में होता तो उसे भी खाना देती। ऐसे समय वह सोचती - काश दीना को अच्छे-बुरे की समझ होती और वह घर का और उसका ख्याल रखता तो उसे यह सब नहीं करना पड़ता। यह सब करते-करते वह इतनी थक चुकी होती कि कहीं भी पड़ कर सो जाती।

अभी ठीक से उसकी आंख भी नहीं लगती कि सास की कराहट या उसकी आवाज से उसकी आंख खुल जाती। बड़ी मुश्किल से वह उठ पाती और बदन तोड़कर उठ ही रही होती कि उसकी सास की धीमी लेकिन कठोर आवाज उसके कानों तक पहुंच जाती – “कहां मर गई तू कम्मो। आराम से जी भर गया हो तो जरा मुझे भी देख जा। पानी पिला दे, एक कप चाय भी बना दे महारानी। सास को मार कर ही दम लेगी क्या”।

वह भीतर तक तनतना जाती, इतना सब करने पर भी उसे सिर्फ सुनना ही पड़ता था। वह भुनभुनाती हुई उठती, मटके से गिलास में पानी भर कर सास के मुंह से लगाती, उसे करवट लेकर या सीधा लिटाती और फिर चाय बनाने में लग जाती।

पिछली कई रातों से बुआ की तबीयत ज्यादा ही खराब रहने लगी थी। कम्मो सब काम करने के बाद थक कर चूर होकर लेटती कि बुआ को दवा देने का समय हो जाता। थोड़ी नींद की झपकी लगती कि बुआ का कराहना या किसी काम के लिए आवाज देना उसे उठने को मजबूर कर देता। उसकी नींद जरा भी नहीं भरती थी, बड़ी मुश्किल से सुबह उठ कर घर के काम निपटाती, बुआ के काम निपटाती, उसे दवा देकर तीनों घरों में झाड़ू-पौंछे का काम करने चली जाती।

आज मेहता आंटी के घर मेहमान आए हुए थे। बर्तन इतने ज्यादा हो गए कि उन्हें मांजने में काफी देर हो गई। बुआ की दवा लेने के लिए वह भागते-भागते डाक्टर के क्लिनिक पहुंची। वह क्लिनिक बंद करने ही जा रहा था, उससे मिन्नतें करके और बूढ़ी सास का हवाला देकर उसने दवा ली और उल्टे पैरों तेज-तेज चल कर घर पहुंची। जाली के दरवाजे में से ही बुआ ने उसे ताला खोलते देख लिया था और उस बीमारी की हालत में भी तंज करते हुए कहा था – “इतनी देर से इंतजार कर रही हूं। कहां गुलछर्रे उड़ा रही थी?”

बुआ की बात ने उसके तन-बदन में आग लगा दी थी। उसके भीतर का गुस्सा फट पड़ा, वह बड़बड़ाती हुई तेजी से बुआ के पास पहुंची और उसके मुंह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। बुआ की बोलती बंद हो गई और वह अपने पर झुकी कम्मो को हैरत से देखने लगी। वह बुरी तरह सहम गई थी।

गुस्से में भरी कम्मो बिना खाए-पिये सामने के बिछावन पर जाकर लेट गई। कुछ समय बाद उसका आक्रोश धीरे-धीरे उतरने लगा। बुआ उसके बाद से ही चुप थी। थकी कम्मो कब नींद के आगोश में जा समाई उसे पता ही नहीं चला।

बहुत देर से चुप पड़ी बुआ की कराहट से उसकी आंख खुली। वह हड़बड़ा कर उठ बैठी। उसे याद आया गुस्से में उसने बुआ को न तो दवा दी थी और न ही उसे कुछ खिलाया-पिलाया था। रात काफी बीत चुकी थी। उसने दवा की बोतल उठाई और एक कप में पानी भर कर और उसमें दवा मिला कर वह बुआ के पास पहुंची। उसे अपने पास खड़े देख कर बुआ ने कराहना बंद कर दिया और उसके चेहरे पर भय की लकीरें उतर आईं। कम्मो ने उन आंखों से नजर हटाते हुए बुआ की कमर के नीचे हाथ डाल कर उसे थोड़ा उठाया और उसके मुंह में दवा उंडेल दी। वहां से वह सीधे रसोई में पहुंची और अपने और बुआ के लिए खिचड़ी चढ़ा दी।

वह खिचड़ी लेकर बुआ के पास पहुंची। बुआ सहमी सिकुड़ी सी पड़ी थी। उसने धीरे से उसे उठाया और गर्म खिचड़ी चम्मच में भर कर फूंक मार-मार कर उसके मुंह में डालने लगी। तभी उसने महसूस किया कि हमेशा बड़बड़ करने वाली बुआ चुपचाप खिचड़ी खाती जा रही थी और उसकी दोनों आंखों से आंसू टपाटप गिर रहे थे। पता नहीं उसे क्या हुआ, उसने हाथ में पकड़ी खिचड़ी की कटोरी और चम्मच जमीन पर रख दिए और बुआ को अपने अंक में भर कर हिचकियां भर-भर कर रोने लगी। बुआ ने भी अपनी बूढ़ी कमजोर बांहों में उसे कस कर पकड़ लिया।

बुआ को अच्छी तरह से लिटा कर और चादर उढ़ा कर वह अपनी खिचड़ी खाने बैठी थी। सामने ही वह कृशकाय देह अब निश्चिंत सो रही थी। वह एकाएक फिर फफक पड़ी। उसे ठीक तरह समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्यों रो रही थी।

 

 

मेरा जन्म 10 मई 1950 को भरतपुर, राजस्थान में हुआ था. लेकिन, पिताजी की सर्विस के कारण बचपन अलवर में गुजरा. घर में पढ़ने पढ़ाने का महौल था. मेरी दादी को पढ़ने का इतना शौक था कि वे दिन में दो-दो किताबें/पत्रिकाएं खत्म कर देती थीं. इस शौक के कारण उन्हें इतनी कहानियां याद थीं कि वे हर बार हमें नई कहानियां सुनातीं. उन्हीं से मुझे पढ़ने का चस्का लगा. बहुत छोटी उम्र में ही मैंने प्रेमचंद, शरत चंद्र आदि का साहित्य पढ़ डाला था. पिताजी भी सरकारी नौकरी की व्यस्तता में से समय निकाल कर कहानी, कविता, गज़ल, आदि लिखते रहते थे.

ग्यारह वर्ष की उम्र में मैंने पहली कहानी घर का अखबार  लिखी जो उस समय की बच्चों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका पराग  में छपी. इसने मुझे मेरे अंदर के लेखक से परिचय कराया. बहुत समय तक मैं बच्चों के लिए लिखता और छपता रहा. लेकिन, कुछ घटनाओं और बातों ने अंदर तक इस प्रकार छुआ कि मैं बड़ों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों  जैसा कुछ लिखने लगा. पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं और कुछ पुरस्कार भी मिले तो लिखने का उत्साह बना रहा. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का भी पुरस्कार मिला. कहानियां लिखने का यह सिलसिला जारी है. अब तक दो कहानी संग्रह – नया लिहाफा और अचानक कुछ नहीं होता  प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरा संग्रह भीतर दबा सच  प्रकाशनाधीन है. कहानियां लिखने के अलावा व्यंग्य लेख और कविताएं भी लिखता रहता हूं.

हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने मन की बात करता है, अपने अनुभवों, अपने सुख-दु:ख को बांटता है. कहानी इसके लिए सशक्त माध्यम है. रोजमर्रा की कोई भी बात जो दिल को छू जाती है, कहानी बन जाती है. मेरा यह मानना है कि जब तक कोई कहानी आपके दिल को नहीं छूती और मानवीय संवेदनाएं नहीं जगा पाती, उसका आकार लेना निरर्थक हो जाता है. जब कोई मेरी कहानी पढ़कर मुझे सिर्फ यह बताने के लिए फोन करता है या अपना कीमती समय निकाल कर ढ़ूंढ़ता हुआ मिलने चला आता है कि कहानी ने उसे भीतर तक छुआ है तो मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती है. यही बात मुझे और लिखने के लिए प्रेरणा देती है और आगे भी देती रहेगी.

नौकरी के नौ वर्ष जयपुर में और 31 वर्ष मुंबई में निकले. भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय कार्यालय, मुंबई से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद अब मैं पूरी तरह से लेखन के प्रति समर्पित हूं.

ई-मेल  – rks.mun@gmail.com

मोबाइल 9833443274

 

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags
Please reload

Follow Us