... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

कनखजूरे : व्यंग लेख

एक बार पुनः उनकी दया से नया- नया साहब बन कृतार्थ हुआ था।

 

इतिहास गवाह है कि आदमी अपनी लियाकत से कम, किसीकी दया से ही अधिक ऊपर उठता है। और कई बार तो इतना ऊपर उठ जाता है कि फिर नीचे मुड़कर नहीं देखता।  अगर फुर्सत में जरा गौर से सोचा जाए तो मालूम हो जाएगा कि  मेहनत पर दया हर युग में हावी होती रही है।  मेहनत और दया के बीच बहुधा जीती दया ही है। क्या हुआ जो कभी कभार हाथ पांव मार कर मेहनत भी जीत गई हो।

 

आनन -फानन में साहब होने के चलते साहब बनने की प्रॉपर तैयारी न कर सका ,किसीसे गंभीर कोचिंग तो छोड़िए, कहीं से हफ्ते-दस दिन का क्रेश कोर्स तक न कर सका । जबकि आज तो कोचिंग का प्रचलन समाज में इतना हो गया है कि लोगबाग चोरी चकारी तक की एक से बढ़कर एक कोचिंग सेंटरों में बाकायदा कोचिंग ले रहे हैं ,क्रैश कोर्स कर रहे हैं। गोया, चोरी चकारी की कोचिंग, क्रेश कोर्स न  किया तो लाख ज्ञानी होने के बाद भी ज्यों कुछ  चोरा ही न जाए।

 

वैसे दिल पर हाथ रख कर कहूं तो मैं साहब बनने के काबिल तो छोड़िए आदमी बनने के कतई काबिल कभी भी न रहा। पर भगवान ने आदमी बना दिया तो बना दिया। उन्होंने साहब बना दिया तो बना दिया। मुझमें और तो सब कुछ है पर आदमी बनने की एक भी क्वालिटि नहीं। 

 

पिछले दिनों यों ही जब दोस्त ने मुझे साहब बनाने का इरादा जाहिर किया तो अपने दोस्त को इनकार न कर सका। मेरे ये दोस्त राजनीति में हैं। उन्हें तो छोड़िए , भगवान तक को भी याद न होगा कि वे कितनी बार जिन्हें शरीफ लोग गलत काम कहते हैं उन कामों को लेकर जेल में नहीं गए होंगे। उनके बारे में मैं कहां तक क्या बताऊं साहब!  बड़े धाकड़ किस्म के नेता हैं वे। शहर के पूरे असामाजिक उनकी जेब में। एक जेब उल्टी करें तो सौ  असामाजिक उसमें से पल भर में नीचे गिरें। आधे से अधिक बहुमत उनकी जेब में। जब चाहें किसीको गिरा दें, जब चाहें किसीको कुर्सी पर बैठा दें। दूसरे शब्दों में कहें तो किंग मेकर। आज के दौर में वैसे भी उत्ती मौज किंग होने में नहीं जितनी किंग मेकर होने में है क्योंकि आज हर गीदड़ किंग होने के फिराक में घूम रहा है। क्या पता किस किंग मेकर की कृपा  हो जाए और वह किंग हो जा विराजे गद्दी पर। ऐसे में किंग होने में वह कमाई नहीं जो किंग मेकर होने में है। उनकी कृपा हो गई बस!  उन्होंने उस दिन बस यों ही बातों बातों में ठिठोली करते पूछ लिया,‘  और कुछ बनना चाहते हो गुरू?’

‘अब मुझसे और नहीं बना जाता मित्र! सरकार में रहकर जनता की खूब सेवा कर ली।  अब और  क्या बनूं? क्या न बनूं? सारी उम्र अपनी नजरों में पता नहीं क्या- क्या बनते रहा। दूसरे बन कर कौन सा पहाड़ खोद लिया। बस, जनता को खाया ही तो । अब खाने की और इच्छा नहीं। नकली दांतों से खाया तो बड़ा जाता है पर वह टेस्ट कहां जो असली दांतों से खाने में है ? सच कहूं , अब तो खाकर बदहजमी सी भी  रहने लगी है।’

 

‘सोच लो! मौका है अभी, मैं सरकार में हूं। रही बात बदहजमी की ,तो बाजार में आज ऐसे एक से एक उम्दा बदहजमी सफा चूर्ण बिक रहे हैं कि.....  असल में जब तक बंदा सरकार मे होता है, वह कुछ भी सीना ठोंक कर कर सकता है। इन दिनों मेरे हाथ में वह जादू है कि मैं गधे को साहब तो साहब को गधा चुटकी  बजने से पहले बना सकता हूं। मैं जब- जब पावर में रहा हूं , मैंने गधों के अफसर और अफसरों के गधे मत पूछो कितने बनाए हैं,’ उन्होंने एक सच कहा ,पर उनके इस सच के बारे में मुझे तो बहुत पहले से ही पता था।

 ‘ सब जानता हूं मित्र सब जानता हूं! तुम्हारी दया से आज कई कुर्सियों पर गधे अफसर हो लत्तिया रहे हैं तो कई कुर्सियों पर अफसर गधे हो  पल- पल ढेंचू- ढेंचू धकिया रहे हैं। जनता इनके पास, उनके पास जो अपना रोना लेकर जाएं तो दोनों ही ऐसी दुलत्ती मारते हैं कि .....’

‘देखिए गुरु! हम गधे को साहब तो बना सकते हैं पर उसको बेसिक तो नहीं सीखा सकते न? उसके बेसिक तो नहीं बदल सकते न? बेसिक चीजें खून में रहती ही रहती हैं। उसे कितना ही क्यों न शोध लो।  अब संभलना तो जनता को ही है। हम तो केवल उसे साहब दे सकते हैं।  अमां यार! छोड़ो गधे आदमी की बातें। अपनी कहो? क्या खयाल है तुम्हारा? मेरे होते हुए लगा  लो बहती गंगा में एक और डुबकी?’ और मैंने उनका मन रखने को हां कह दी। उसके बाद वे अलग तो मैं अलग।  बात आई गई हो गई।

पर तब मेरी खुशी की हद न रही जब पता चला कि मैं साहब हो रहा हूं कल से। पूरा ऑफिस हतप्रभ! किसीको पता ही न था कि मैं साहब भी हो सकता हूं। अब कृपा बरस गई तो बरस गई। ऑफिस वाले कभी मुझे देखते तो कभी मेरे साहब होने के आदेश को। 

अगले ही दिन मैं साहब का लबादा ओढ़े दूसरे ब्रांच ऑफिस में साहब की मुद्रा में जा पहुंचा।

नए ऑफिस में साहब की कुर्सी पर बैठा मैं अपने को अनकमफ्र्टेबल फील कर रहा था कि अचानक मेरे कमरे का दरवाजा खोलते शर्मा जी ने हाथ में चश्मा लिए सिर झुकाए अभिवादन की मुद्रा में पूछा,‘ मे आई कम इन सर? ’

 

‘ कम इन। कहिए क्या काम है?’ मैंने उसके गाल बजाते पूछा तो वह दोनों हाथ जोड़े बोला,‘ सर!बुरा न मानें तो आपको कनखजूरों की लिस्ट भेंट करना चाहता हूं।’

 

‘ कनखजूरे??? इस ऑफिस में कनखजूरे? ’ मैंने पेन से अपने कान में खारिश करते पूछा। कनखजूरे का नाम सुनकर ही मुझे लगा जैसे कोई कनखजूरा मेरे कान में घुस गया हो।

 

‘ साहब! हर ऑफिस में काम करने वाले हों या न पर कनखजूरे जरूर होते हैं। ऑफिस के और साहब के प्रति समर्पित हों या न पर ये कनखजूरे साहब के प्रति तन-मन से पूरी तरह समर्पित रहते हैं।’

 

‘ अरे यार शर्मा! कनखजूरों से अब कान फुड़वाओगे क्या?’ मैंने अपने दोनों कानों पर दोनों हाथ रखे तो वह मेरे कानों पर से मेरे हाथ हटाते हुए अपनी जुबान में मिसरी घोलता हुआ बोला,‘ सर! कनखजूरे हर साहब के लिए बहुत जरूरी होते  हैं सर। जिस तरह से जादूगर के प्राण पिंजड़े में कैद तोते में होते हैं उसी तरह से हर साहब के प्राण कनखजूरों में बसते हैं। ऑफिस काम करने वालों से नहीं, कनखजूरों से ही चलता है। जिस साहब के पास जितने अधिक कनखजूरे , वह साहब उतना ही रिच। सर! ऑफिस के कनखजूरे कान का पर्दा नहीं खाते, वे तो साहब  के कान चैबीसों घंटे खड़े रखते हैं, रिच रखते हैं।’

 

‘ कान रिच बोले तो??’

‘साहब!  जिस तरह से भगवान के लिए भक्त जरूरी है वैसे ही साहब के लिए कनखजूरे,’इससे आगे और कनखजूरों की तारीफ करने को कुछ बचता भी नहीं था।

‘अरे साफ- साफ कहो,’ मेरी उनमें दिलचस्पी बढ़ी तो उन्होंने कुछ देर तक बाहर की ओर कुछ देखने के बाद कहा,‘ सर! कनखजूरे मतलब खबरिए। खबरिए बोले तो इनर्फामर।’

‘इनफार्मर??’

 ‘हां साहब! साहब का काम ऑफिस चलाना ही नहीं होता, ऑफिस की पल- पल की खबर भी रखना होता है। और साहब के लिए यह काम कनखजूरों से बेहतर और कोई कर ही नहीं सकता।’

 ‘तो इसके लिए आॅफिस में पीउन हैं न!’

 ‘सर! पीउन की अपनी लिमिटेशन होती है। पर परफेक्ट कनखजूरे आपके कान तक चैबीस गुणा तीन सौ पैंसठ ऑफिस की हर हरकत पहुंचाने का पूरी शिद्दत से माद्दा रखते हैं। उसके बाद आप कुछ भी पूरे दुःसाहस के साथ कर सकते हैं,’ उन्होंने फिर बाहर की ओर देखा।

 ‘मतलब??’

‘ सिलेक्टिड कनखजूरों की लिस्ट दे रहा हूं आपको। इनके पास कान में घुसे रहने का एक लंबा, शानदार अनुभव है सर! मुझे पूरा विश्वास है कि ये आपके बहुत काम आएंगे। आपको ऑफिस की हर छोटी बड़ी पुख्ता खबर चैबीसों घंटे लाएंगे।’

‘ पर जो मेरे कान में जख्म कर गए तो??? मैंने यों ही शंकित होते पूछा तो वे बोले,‘ सर! भगवान आपको धोखा दे सकते हैं, पर ये कनखजूरे नहीं। ये हर कान को अपना ही कान समझते हैं। बदले में बस थोड़ी लिबर्टी चाहते हैं।  दिनरात काम करने वाले को इतना की तो मिलना भी चाहिए।  अपने पेट पर भी भला कोई लात मारता है क्या? लिस्ट को आप एक बार गौर से देख लीजिए,’ कह उन्होंने जेब से लिस्ट निकाली और टेबुल पर छोड़ मंद- मंद मुस्कुराते , जेब में चश्मा डाल, दोनों हाथ जोड़े कमरे से बाहर हो लिए। कमीने कहीं के!

 

- अशोक गौतम मो. 9418070089

ashokgautam001@gmail.com

 

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