... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

"कौन थे वे जो ऐसा लिखते थे ..."

 

हम अपने अस्तित्व को कितने संकीर्ण नज़रिये से देखते हैं! ये बात हमारी बातचीतों में तो झलकती ही है, मैं देखती हूँ कहानियों में उतर आती है. जो मामले हमारे भीतर संग्राम मचाते हैं, तुरंत-के-तुरंत उछल कर बाहर आ जाते हैं. वो मामले लगभग हर बार हमारे "हियर ऐंड नाओ" में ही सीमित हैं. 

 

लेकिन हमारा अस्तित्व हमसे ज़्यादा पुराना है. हमारी कहानी तो हमारे पैदा होने से पहले से मौजूद थी. हमारे दादा-परदादा ने शुरू कर दी थी. हमारे जाने के बाद चलती जाएगी. अपने अस्तित्व की प्रचुरता का पूरा आभास हमें कभी हो ही नहीं पाता है क्योंकि हम अपने आज से कुछ पल के लिये भी नहीं निकलना चाहते हैं.

 

इसी सोच ने हमें इस साल से ई-कल्पना में एक नया फ़ीचर शुरू करने को प्रेरित किया था. कौन थे वे जो ऐसा लिखते थे!

 

 

भैरवप्रसाद गुप्त के सती मैया का चौरा  के सुंदर विवरण पढ़ते-पढ़ते लगा कि अरे! ये दो नौजवान मन्ने और मुन्नी तो एकदम मेरे नाना की तरह ही होंगे. वही गाँव! वही दौर! लेकिन अपने नाना को मैंने नौजवान के रूप में कल्पना करने की कभी कोशिश ही नहीं की थी. हमारे लिये तो वो एक थके से, शिकायत करने वाले परिवार के बुज़ुर्ग थे. बस. कौन से स्कूल में गए थे, उनका बचपन कैसा था, उनके किस तरह के दोस्त थे, किन अरमानों ने उन्हें ग्रस्त कर रखा था, वगैरह वगैरह. कभी उनसे नहीं पूछा. अब उपन्यास पढ़ने पर अंदाज़ा मिल रहा है. अपनी बेपरवाही पर दुख भी हो रहा है.

 

ऐसी ही बात हमारे चाचा जी के साथ भी थी. वो कहते थे, आजकल की फ़िल्में एकदम बेकार हैं, अच्छी फ़िल्में तो हमारे समय में बनती थीं. या फिर पहनावे के ढंगों को देख कर कहते थे, सब वही फ़ैशन लौट-लौट कर आ रहे हैं. हम कुछ नहीं कहते थे. उनकी बातों से खींझ से जाते थे. अब देखती हूँ, दिल्ली में बड़े होने के बावजूद जब अंग्रेज़ी में बातचीत नहीं कर रही होती हूँ तो मुँह से चाचाजी की पश्चिमी यूपी वाली उर्दू-मिली खड़ी-हिन्दी ही निकलती है. सरशार की आज़ाद-कथा  पढ़कर समझ आता है कि हमारे चाचाजी बाँकों के ट्रैडीशन में बड़े हुए थे, जो यूपी में तब भी काफ़ी पनप रहा था. हमारे दौर में ऐसा कुछ हुआ जो वो परम्परा अचानक गायब ही हो गई. अब कहाँ दिखते हैं बाँके!  आज के बाँके हमें इम्पोर्ट करने पड़ते हैं, क्योंकि होम-ग्रोन बाँकों को हमने कब का बैकवर्ड मान कर ऐक्सटिंक्ट कर दिया.

 

बेशक जीना आज में ज़रूरी है, लेकिन हमारी कल्पनाएँ भी आज में बंधी रहें, ये आवश्यक नहीं है. सौन्दर्य और जीवन की कुंठाएँ नज़रें घुमाने पर आसपास दिख ही जाती हैं. नज़रें आगे-पीछे भी दौड़ाएँ, तो जज़्बातों, सौन्दर्य और बुझे-पनपे अरमानों के भंडार मिलेंगे. चाचा-दादाओं के संघर्ष व खुशियाँ समझकर कुछ अपने जीवन के संघर्षों को भी भेद पाने के सुराग मिलेंगे.

 

अंत में, पिकासो कह गए हैं - Everything that you can imagine is real.

इसी सिद्धांत पर अमल करते हुए, पश्चिमी  कथाकारों ने अपनी कल्पना के पंख महज़ अपने आज या निजी जीवन से बाँधे न रख कर, ऊँची उड़ानें भरी हैं, अनजान जगहों में घुस कर बहुआयामी कहानियाँ पेश की हैं.

 

-मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags
Please reload

Follow Us
  • Facebook Basic Square
  • Twitter Basic Square
  • Google+ Basic Square