... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

एक लेखक की मौत

वह भयानक वितृष्णा का क्षण था. एक अजीब गन्ध यकायक मेरे नथुनो से टकराई और मेरे सारे अस्तित्व पर छा गई. वह गन्ध नही दुर्गन्ध थी ; भयानक सड़ान्ध. सड़ान्ध, जैसे कोई लाश सड़ रही हो. यह कहीं और से नहीं मेरे अन्दर से ही आरही थी, जो रफ़्ता-रफ़्ता मेरे दिलोदिमाग पर छाने लगी थी. मुझे अहसास होने लगा था कि यह सड़ान्ध शायद पूरे कमरे मे भरने लगी है. मै डर गया कि यह कहीं उसकी नाक तक न पहुंच जाये. इस तरह तो उसे पता चल जायेगा. उसका संदेह और पुख्ता हो जायेगा. यही तो वह चाहता है. उसे तो बस, कोई सुराग ही चाहिये. उसकी नज़र मे वैसे भी मेरे लिये विश्वास नहीं था. और मुझे इसकी परवाह भी न थी. वह मेरा कौन था. उसका मुझसे क्या लेना देना. वह विश्वास करे न करे मुझे क्या ? लेकिन अब मै डर गया था. मुझे उससे कोई डर नही था. फ़िर मै किस बात से डर रहा था ? क्या यह सच्चाई का डर था ? क्या मै सच से डर रहा था ?

वह मुझे घूर रहा था. यकायक मै बेचैन हो उठा. लगा जैसे कोई मेरे अन्दर छटपटा रहा था. यह कैसे हो सकता है ? मुर्दे कैसे छटपटा सकते हैं ? क्या वह उसका भूत था ? क्या भूतों का अस्तित्व सम्भव है ? मेरे पास कोई जवाब नही था. सिर्फ़ सवाल ही सवाल थे. मै क्या करूं ? मै अपने अंदर की छटपटाहट को रोकने की कोशिश कर रहा था. मै अपनी छटपटाहट को अपने चेहरे पर नहीं आने देना चाहता था. और मै अपनी घबराहट को भी छिपाना चाहता था. इस संघर्ष ने मेरे माथे पर पसीना ला दिया. अब यह पसीना मेरे घबराहट भरे चेहरे पर बिल्कुल साफ़ नज़र आने लगा. यह बड़ी अजीब बात थी. क्योंकि कमरे मे ठंडक और सीलन थी. मै रुमाल से अपना पसीना पोंछ रहा था और वह मेरी हालत पर बराबर नज़र गड़ाये हुये था.

वह ! जो मेरी इस हालत का स्वयम ज़िम्मेदार था. उसे लग रहा होगा कि अब पकड़ा, कि अब पकड़ा. लेकिन उसे ऐसा नहीं करना चाहिये था. उसे क्या अधिकार था ऐसा करने का ? किसी की ज़िंदगी मे किसी अवांछित की तरह घुसपैठ करने का किसी को कोई अधीकार नहीं. एक, मुश्किल से, भर चुके घाव को कुरेद कर हरा करने का उसे कोई अधिकार नही था. उसे ऐसा नही करना चाहिये था. उसे वह नाम नहीं लेना चाहिये था…

मै अपने घर के बंद दरवाज़ो और खिड़कियों के बीच आराम और सुकून से था, जब उसने आकर मेरे घर के बंद दरवाज़े पर दस्तक दी. मैने दरवाज़ा खोला तो वह सामने खड़ा था. धूल उसके सिर और पलकों के बालों पर अटी हुई थी. चेहरा थकान से चूर था. स्सुखे पसीने की एक मोटी परत उसके चेहरे पर जमी हुई थी. साफ़ था वह लम्बा सफ़र तै करके आया था. और मेरे घर तक का घाटियों और पहाड़ियों से भरा दुर्गम रस्ता उसने पैदल ही पार किया था.

मै उसे देखकर खुश हुआ था. कितने बरसों के बाद मै किसी आगंतुक को अपने दरवाज़े पर खड़ा देख रहा था. मैने कितनी खुशी से उसे अंदर बुलाया था. कितने सम्मान से बैठाया था. मैने तो उससे बस आने का कारण पूछा था, और उसने जवाब मे वह नाम उछाल दिया.

वह नाम जो सफ़े हस्ति से मिट चुका था. वह नाम जिसे मैने खुद अर्ज़े दुनिया से रुखसत कर दिया था. वह नाम आज मेरे सामने यूं अचानक उछल कर खड़ा हो गया था.

“आपको कोई गलतफ़हमी हुई है…” मैने कहा- “वे यहां नही रहते.“

“लेकिन… “ उसने कहा- “मुझे अपने सूत्रों से जो जानकारी मिली…”

“बिल्कुल गलत !” मैने उसकी बात बीच मे ही काटकर कहा “आपको बिल्कुल गलत जानकारी मिली है. “

“ऐसा नहीं हो सकता…”

“ऐसा ही है. “

“मेरे सूत्र गलत नहीं हो सकते…”

“यह आपकी परेशानी है. “ मैने टका सा जवाब दिया. जवाब मे वह रक्षात्मक भूमिका मे आ गया …

“देखिये आप भी जानते हैं कि मै सही हूं. “

मै कोई जवाब दे पाता इससे पहले उसने अपनी तेज़ निगाहें मेरे चेहरे पर गड़ा दी. उसकी यह नज़र बेचैन करने वाली थी. उसकी इस नज़र ने मेरे प्याज़ जैसे व्यक्तित्व की कई परतों को भेद दिया और मेरे अन्दर छिपि हुई सड़ान्ध को बाहर ला दिया. अब मेरा दम घुटने लगा था और वह अपनी नज़रों से मेरे व्यक्तित्व को भेदने लगा. मै घबरा गया. अब मै रक्षात्मक मुद्रा मे आ गया.

“वह तो बहुत पुरानी बात है…” मैने कहा.

“हां ! शायद पच्चीस बरस्…” उसने जोड़ा.

“फ़िर आप क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे है ?”

“आप तो बस मुझे उसका पता देदें. “

“वह तो मर गया. “

“क्या ?” वह यूं उछल पड़ा जैसे उसे किसी ने करंट लगा दिया हो “कैसे ? ऐसा कैसे हो सकता है ?”

“क्यों ? क्या वह मर नहीं सकता ?”

जवाब मे वह चुप्पी लगा गया. शायद वह कुछ कहना चाह रहा था, लेकिन उसने इतना ही पूछा- “कैसे ?”

“लेखक था, लिखना बंद कर दिया, मर गया. “

“मतलब आत्महत्या…?”

अब मै कैसे बताता कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला है. और हत्यारा कौन है, यह कैसे बताऊंगा.

“क्यों ?”

“क्योंकि, उसके सामने एक सवाल था ; रोज़ी रोटी या लेखन. एक दिन उसने यह सवाल हल कर दिया. नौकरी का तनाव और सृजन के तकाज़े, दोनो एक साथ नही निभा पा रहा था. एक दिन उसने अपनी सारी रचनायें और वह सारी किताबें जिन्हे पढ़ने से ज़्यादा प्रेम करता था, उसने रद्दी मे बेच दी. अपनी कलम तोड़ दी और …”

इसके आगे मै कुछ नहीं कह सका. मै कुछ कह भी नही सकता था. मै रोने लगा. कितने बरसों के रुके आंसू आज बांध तोड़ कर बह निकले थे. ये आंसू मेरे रोके नही रुकने वाले …

“वह आपका क्या लगता था ?”

“पता नहीं…,”

मैं कैसे इस रिश्ते को परिभाषित कर सकता हूँ……

वह सहमा सा मेरी ओर देखने लगा. स्पष्ट है, उसे इस बात की कोई आशा न थी. वह काफ़ी देर किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा. अखिरकार उसने डरते डरते इतना पूछा- “उसकी कब्र कहां है … ?”

मै क्या कहता ? क्या बताता ? और क्या वह यकीन करता कि उसकी कब्र मेरे अंदर ही है. लेकिन यह सच है. हां, यह सच है कि उसकी कब्र मेरे अंदर ही है. और यह भी सच है कि वह अत्महत्या नही हत्या थी. और वह हत्यारा भी मै ही था. और्… और मरने वाला भी मै ही था. हां वह मै ही था जिसने अपनी ही हत्या करके अपनी लाश को अपने अंदर्… अपने दिल की गहराईयों मे कहीं दफ़न कर रखा था. और मै सोचता था यह राज़ हमेशा राज़ ही रहेगा. लेकिन आज उसने आकर ऐसे मुझे झकझोर के रख दिया कि… कि आज वह लाश बाहर आना चाहती है. आज वह अपनी हत्या की कहानी स्वयं बयान करना चाहती है.

मै अन्दर की उथल पुथल और घुटन से मरा जा रहा हूं. मै चीखना चाहता हूं. चीख चीख कर अपना अपराध स्वीकार करना चाहता हूं. लेकिन कौन विश्वास करेगा ? कौन इस अविश्वसनीय बात पर विश्वास कर सकता है … …

सहसा वह मुझे इस हाल मे छोड़ चलने को उद्यत होता है. वह अविश्वसनीय नज़रों से मुझे देखता है और दरवाज़ा खोल कार बाहर निकल जाता है. मै एक अच्छे मेज़बान की तरह उसे बिदा करने बाहर आता हूं.

ताज़ा हवा का एक झोंका मेरी रूह को सहलाता हुआ गुज़र जाता है. ओह! कितनी मुद्दत के बाद मैं बाहर निकला हूं? मेरी आंखे जैसे पहली बार संसार को देख रही है. पहली बार संसार मुझे इतना आकर्षक लगने लगता है. सामने ऊंचे-ऊंचे सुंदर पहाड़ खड़े हैं. पहाड़ों पर ऊंचे सुंदर पेड़ों की श्रृंखला. उसके ऊपर नीला साफ़ आसमान और आसमान पर तैरते सफ़ेद साफ़ सुथरे बादलों की टोलियां. आसमान का सीना चीरकर परवाज़ करते परिंदे. मेरे कदमो के पास से गुज़रती हुई पगडंडी नीचे दूर तक लहराती चलती हुई फ़ूलों से भरी घाटियों मे खो जाती है, जिस पर चलता हुआ वह दूर तक चला गया है, और एक तिनके की तरह नज़र आरहा है. दूर नीचे एक साफ़ पानी की नदी कल-कल करती बहती जारही है. पेड़ों पर पक्षियों का कलरव कितना साफ़ सुनाई दे रहा है. सब कुछ कितना सुंदर है ? कितना मनमोहक ? कितना सुखद ? कितना सजीव ?

मै यह साब अपने अंदर समेट लेना चाहता हूं. मै अपने फ़ेफ़ड़े फ़ुला कर गहरी सांस लेने लगता हूं. इस ताज़ी हावा को अपने अंदर भर लेता हूं, इस तरह अपने अंदर की बदबू पर काबू पाना चाहता हूं…

 

मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग  

 

 

अपने बारे मे. . .

अपने बारे मे मै क्या लिखूं? मैं कभी समझ नही पाता हूँ, और शायद इसी लिए मै कहानियाँ लिखता हूँ ; और इन्हीं मे अपने आप को तलाशता हूं । मै इनसे अलग हूं भी नही, फिर अलग से क्या कहूँ. . . .
यह उन दिनों की बातें हैं, जब दिन सुनहरे हुआ करते और आसमान नीला । बिल्कुल साफ शफ्फाक । मै एक विशिष्ट शहर भिलाई का रहने वाला हूं; और भिलाई के ऊपर उन दिनो आसमान बिलकुल खुला खुला सा हुआ करता, और इसके दक्षिण में क्षितिज पर एक तसवीर थी बहुत सारी चिमनियों और कुछ विचित्र आकृतियों की । वे रहस्यमयी चिमनियां , अकसर बहुत सारा गाढ़ा गाढ़ा धुआँ उगलती । कभी दूध सा उजला सफेद, कभी गेरुआ लाल जिसके बारे मे मुझे लगता कि उस सफेद धुयें मे ही ईट पीसकर मिला देते होंगे और कभी काला धुआँ, जो मै सोचता कि ज़रूर, चिमनी के नीचे डामर(कोलतार) जलाया जारहा होगा जैसे सङक पर बिछाने के लिए जलाते हैं ।
"वो क्या है?" मै पूछता ।
"वो कारखाना है ।" दादा दादी बताया करते "तेरे अब्बा वहीं काम करते हैं ।"
मेरे अब्बा एक विशिष्ट इनसान थे, वे अथक संघर्षशील, मृदुभाषी और मुस्कुराकर बात करने वाले थे । उन जैसा दूसरा इनसान मैने दूसरा नही देखा । वे जहाँ जाते लोग उनसे प्यार करने लगते । उनके व्यक्तित्व मे जादू था ।
जादू तो उन रातों का भी कम न था, जब अंधेरे के दामन पर जगह पुराने दौर के बिजली के लैम्प पोस्ट के नीचे धुंधली पीली रौशनी के धब्बे पङ जाते । जब कोई चीज उन धब्बों से होकर गुज़रती तो नज़र आने लगती और बाहर होती तो गायब होजाती । एक और जादू आवाज़ का होता । रात की खामोशी पर कुछ रहस्यमयी आवाज़ें तैरती . . . . जैसे - ए विविध भारती है. . . या हवा महल. . . . और बिनाका गीतमाला की सिग्नेचर ट्यून या अमीन सयानी की खनकती शानदार आवाज़ ।
ये आवाज़ें रेडियो से निकलती और हर खास ओ आम के ज़हन पर तारी हो जाती । मेरे खयाल से उन बङे बङे डिब्बों  (रेडियो) मे छोटे छोटे लोग कैद थे जो बिजली का करंट लगने पर बोलने और गाने लगते । और उन्हें देखने के लिये मै रेडियो मे झांकता और डाट खाता कि- करंट लग जायेगा । अब्बा जब रेडियो को पीछे से खोलकर सफाई या और कोई काम करते तो मै उसमे अपना सिर घुसाकर जानने की कोशिश करता कि वे छोटे छोटे लोग किस जगह होंगे , एकाध बार मै रहस्योदघाटन के बिलकुल करीब पहुँच भी गया लेकिन हर बार अब्बा डाटकर भगा देते । क्या अब्बा को यह राज़ मालूम था ? मै अब तक नही जान पाया ।
किसी रात जब हम बाहर सोते तो आसमान पर अनगिनत तारों को मै गिनने की कोशिश करता । ठीक है वे अनगिनत हैं , फिर भी इनकी कोई तादाद तो होगी । मै उन्हे गिनकर दुनिया को उनकी तादाद बता दूंगा, फिर कोई नही कहेगा कि आसमान मे अनगिनत तारे होते हैं । अफसोस !! हर बार मुझे नींद आ जाती और मै यह काम अब तक पूरा नही कर पाया और अब तो शहर के आसमान पर गिनती के तारे होते हैँ, जिन्हें ढूँढ ढूँढ कर गिनना पङता है ; लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं कि आसमान में अनगिनत तारे हैं । खैर!
रातें जब सर्दी की होतीं, हम दादा दादी के साथ अपनी बाङी मे छोटी सी आग जलाकर आग तापते आस पङोस के और बच्चे भी आ जाते और दादा दादी की कहानियों का दौर शुरू हो जाता । दादी के पास उमर अय्यार की जम्बिल के नाम से कहानियों का खजाना था और उमर अय्यार मेरा पसंदीदा कैरेक्टर था । कई बार वो मोहम्मद हनीफ की कहानियां भी सुनाती । दादा की कहानियाँ मुख्तलिफ होती और वे मुझे अब भी याद हैं, उन्हें मैने अपने बच्चों को उनके बचपन मे सुनाई ।
हम बी एस पी के क्वार्टर में रहते जहां हमारे क्वार्टर के पीछे ही गणेशोत्सव होता । जिसमे नाटक, आरकेस्ट्रा जैसे कई आयोजन होते । बस यहीं से नाटक का शौक पैदा हुआ और इसके लिए मैने एक नाटक(एकांकी-प्रहसन) लिखा 'कर्ज़' इसका मंचन हुआ तब मै कक्षा छठवीं मे था । इसके बाद ज़िंदगी मे कई अकस्मिक मोड़ आये जिन्हे बताने के लिये बहुत वक्त और बहुत जगह की दरकार है । तो मुख्तसर मे यही कि नवमी कक्षा मे मै एक साप्ताहिक मे संवाददाता बन गया । दसवीं मे था तब पहली कहानी ‘क ख ग घ …’ प्रकाशित हुई जो जलेस की बैठक मे खूब चर्चा मे आई । तभी रेडिओ से एक कहानी प्रसारित हुई जिसके लिये पहली बार मानदेय प्राप्त हुआ । लेकिन लेखक बनने और दुनिया भर मे घुमते रहने के मेरे सपने ने मेरे घर मे मुझे भारी संकट मे डाल दिया । मेरे अब्बा से मेरे रिश्ते बिगड़ गये, वे चाहते थे कि मै अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाऊं, खूब तालीम हासिल करूं और उसके बाद बी एस पी मे नौकरी करूं । वे मुझसे बहुत ज़्यादह उम्मीद रखते थे और अपने टूटे हुये ख्वाबों को मेरी ज़िंदगी मे साकार होते देखना चाहते थे, तो वे कुछ गलत नही चाहते थे, क्योंकि बेटे की कहानी तो बाप की कहानी का ही विस्तार होती है । लेकिन मेरे अपने अब्बा से रिश्ते बिगड़ गये और यह हाल तब तक रहा जब उस दिन सुबह – सुबह मेरी अम्मी बद हवास सी मुझे जगा रही थी । नींद से जागते ही पता चला मेरे सर से आसमान छिन गया है; सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई । तीन बहन और तीन भाईयों मे सबसे बड़ा बेटा था मै । अब्बा, जो हमेशा मेरी फ़िक्र मे रहते थे और मै यह बात अच्छी तरह जानते हुये भी कभी उनसे कहता नही, उस रात ट्रक एक्सिडेंट मे दुनियां से रुख्सत हुये तो हम दोनो के बीच बातचीत तक बंद थी । मै अपने दिल की बात उन्हे बताना चाहता था लेकिन …… वह हादसा मेरी ज़िंदगी का बड़ा सबक बन गया । अफ़सोस ! ज़िंदगी सबक तो देती है लेकिन उसपर अमल करने के लिये दूसरा मौका नही देती ।

अब मेरे सामने दूसरा विकल्प नहीं था, नौकरी के सिवाय । फ़िर वह वक्त भी आया जब लेखन और नौकरी के बीच एक को चुनना था और निश्चित रूप से मैने चुना नौकरी को । मैने अपना लिखा सारा साहित्य रद्दी मे बेच दिया, अपनी सारी पसंदीदा किताबों का संग्रह भी । मैने अपने अंदर के लेखक की हत्या की और अपने अंदर ही कहीं गहराइयों मे दफ़न कर दिया । मै मुतमईन था कि उस लेखक से पीछा छूटा लेकिन करीबन चौथाई सदी बाद किसीने मुझसे मेरे ही नाम के एक पुराने लेखक का ज़िक्र किया और मै चुप रहा । किस मुंह से कहता कि वह मै ही था । वह दिन बड़ी तड़प के साथ गुज़रा और रात को जनम हुआ एक कहानी का ‘एक लेखक की मौत’ । दरअसल वह एक लेखक के पुनर्जनम की कहानी थी ।

वह लेखक जो आज आपसे रू-ब-रू है …

 

लेखक से सम्पर्क : zifahazrim@gmail.com

 

 

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