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निन्दास्तुति का मज़ा , भगवतभक्ति में कहाँ

October 25, 2017

जीवन का जो मज़ा  निन्दास्तुति में है, वैसा भगवत भक्ति में कहाँ ?  निन्दास्तुति वह नौका है जो   अठखेलियाँ करती हुई, रसवर्षा से सराबोर करती हुई ,मनोरंजक हिचकोले खाती हुई ,किसी भी उद्यमी व्यक्ति की ज़िंदगी की नदी को खुशी खुशी पार करा देती है |निन्दास्तुति से प्रतिदिन प्रतिपल अमृत निकलता रहता है |अविराम रसपान करते रहिये और जीवन को सार्थकता दीजिये |जीवन के सञ्चालन की यह सबसे सस्ती सुंदर और टिकाऊ विधि है|इसका व्यसन सारे व्यसनों की तुलना में अधिक आनंददायी होता है|इसमें किसीसे दीक्षा लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती |करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान | स्वप्रेरणा से ही व्यक्ति इस कला में पारंगत हो जाता है |उठते बैठते, ट्रेन में, बस में ,कहीं भी हृदयंगम करने वाली इस क्रिया की साधना आसानी से की जा सकती है|आसपास के परिवेश में जितनी दृष्टि दौड़ाओगे, मैदान में खेलने को उतने ही खिलाड़ी तथा उतने ही अवसर मिल जायेंगे |कभी इन पर केन्द्रित हुए,कभी उन पर |

 

सोचिये  भगवत स्तुति में कितनी मेहनत करनी पड़ती है ? वैसी कष्ट साध्य आदत से भगवान ही बचा सकता है |पहले किसी को गुरु बनाओ |उनके सान्निध्य में कई दिन स्वाहा करो , तब मुश्किल से एकाध सूत्र मिलता है |बहुधा वह कान में एक मन्त्र दे देते हैं |कहते हैं नियम से,बिना नागा इस मन्त्र का जाप होना चाहिए |मन्त्र सिद्धि के लिए भगवतभक्ति लगती है ,और उसमें भी पक्का  नहीं कि वह अलौकिक सिद्धि मिल ही जायेगी ? जबकि  मंत्री पद की सिद्धि के लिए मात्र निंदा स्तुति का जाप लगता है | इसमें भले ही देश या प्रदेशस्तरीय  पद मिले या न मिले ,ग्राम  पंचायत मंत्री की कुर्सी तो कहीं नहीं गई  |प्रतिपक्ष के सदस्य बार बार लगातार एक ही काम तो करते हैं ?और देखिये चुनकर आ जाते हैं |सामने वाले की निंदा करने का ही यह लाभ होता है कि निंदक को कुर्सी मिल जाती है |मंत्री पद की सिद्धि में ऐशो आराम होता  है जबकि मन्त्र की सिद्धि कष्ट ही कष्ट |इसलिए जिसे सरलता से प्राप्त किया जा सकता है वही क्यों न किया जाये ? मन्त्र सिद्ध करने के लिए एक जगह बैठना पड़ता है , जबकि मंत्री पद सिद्ध करने में निर्द्वन्द्व होकर यत्र तत्र घूमा जा सकता है |भ्रमणशील होकर दुनिया को तो समझा और पाया जा सकता है , एकल कूड़े रहकर भगवान को पा ही लेंगे क्या यह सुनिश्चित है ? 

गुरु का आदेश  होता है , प्रतिदिन निश्चित समय ,नियत स्थान पर बैठो |तभी  भगवतभक्ति का पुण्य मिलेगा |कई बार तो आदेश होता है , स्नान करके ,गीले वस्त्र पहिन कर , पूजाघर में एक बार नहीं ,  त्रिकाल संध्या में बैठो ,आँख बंद करो ,ध्यान लगाओ |दुनिया में इतनी सारी आकर्षक वस्तुएं हैं, उन सबसे ध्यान  हटाकर एक जगह केन्द्रित करना कष्ट साध्य काम है ? कभी कभी भगवत स्तुति में सुंदर चित्र या मूर्ति के के सामने भक्तों को बस गाते रहना होता है |श्रोता सुनते रहते हैं और अकारण ही प्रसन्न होकर चले जाते हैं |क्या कभी किसी  देवी स्तुति ने, आसानी से  शत्रु के शत्रु को  अपना मित्र बनाया है ?जी हाँ निन्दास्तुति न सिर्फ घनिष्ट मित्र बनाती बल्कि बड़ा मित्र समूह या दल खड़ा कर सकती है|देश में शासन करने को जो बड़े बड़े दल एक पांव पर खड़े हुए हैं क्या वे भक्ति के लिए तत्पर हैं ?वे तो शक्ति बढ़ाकर और सर्वोच्च पदों पर काबिज होने के लिए जी जान लगाते  हैं |निंदा स्तुति इन सीढ़ियों को तेज़ी से चढ़ने की अचूक जुगत है | प्रभु की प्रार्थना क्षणिक आनंद तो दे सकती है किन्तु दुनिया की भौतिक प्रगति  में उसकी वह उपयोगिता कहाँ जो किसी की निंदा करने में है | ऑफिस में बैठे हैं तो अपने दुष्ट बॉस के “सद्गुणों” की चर्चा शुरू कर दीजिये , अनेक कर्मचारी आपके हितैषी बन जायेंगे |यदि आप लगातार उच्चाधिकारियों के विरुद्ध “ अमृतवर्षा” करते रहेंगे तो एक दिन कार्यालय के समस्त कर्मचारी एकजुट होकर आपको अपने संगठन का समग्र नेतृत्व सौंप देंगे |देवी स्तुति में कई मूढ़ भक्त अपनी ज़बान काट सकते हैं जबकि  निन्दास्तुति में तो  जिव्हा डेढ़ फुट की स्वतः ही  हो जाती हैं| निन्दास्तुति सिर्फ रसवर्षा ही नहीं करती रसमलाई काजू या बादाम का  स्वाद भी दिलाती रहती है |इसमें न किसी प्रसाद का खर्च न किसी को भोग लगाना |निंदा स्वयं ही  भोगविलास की वस्तु है | बिना किसी व्यय  के सर्वत्र उपलब्ध रहती है |पुरातन काल के निंदक अनपढ़ अविकसित तथा असभ्य होते थे ,सिर्फ परस्पर चर्चा कर लेते थे आज तो ऐसी चर्चाएँ “वाइरल “हो जाती हैं ,जो दुनिया भर  की निगाह में ,जन जन  के कान में पहुँच जाती हैं |उच्च स्तरीय निंदक, बड़ा हाईटेक होता है |पहले के निंदकों को तो सुविधाएँ देते हुए आँगन में कुटी छवाकर तक दे दी जाती थी ताकि वे भरपूर  निंदा कर सकें |आजकल समझदारी बढ़ गई है, कोई कुटी  बनवाकर या छवाकर नहीं देता क्योंकि निंदक ही  इतने सामर्थ्यवान हो गए हैं कि वे स्वयं ही अपने  महल खड़े कर लेते हैं |

 

                                     निन्दास्तुति सबसे  सरल विधि का नाम  है |न एकाकीपन ,न अध्ययन या पूर्व  चिंतन करने की ज़रुरत |चुप बैठने का तो सवाल ही नहीं ?इसके प्रताप से मित्रों की संख्या लगातार बढ़ती  चली जाती है | निन्दास्तुति एक से अनेक होने की तपस्या है |इसके शुरू होते ही जाति भेद , वर्ण भेद ,रंग भेद सब समाप्त हो जाते हैं |यह एक अचूक आराधना  है |इसमें और कुछ मिले न मिले आनंद बहुत मिलता है |खून भी बढ़ जाता है और  सबसे बढ़िया टाइम पास है |” निंदक नियरे राखिये”को ध्यान में रखकर ही इस एक विधि से घोर निंदक भी नीयर हो जाते हैं | विधान सभा हो या लोक सभा ,निंदक को और नीयर करने के लिए समवेत स्वर से सबके वेतन भत्ते बढ़ जाते हैं |जो आज प्रतिपक्ष में है ,कल वही सत्ता में आ जायेगा |निन्दास्तुति में मिली भगत और निकटता दोनों का समावेश रहता है |अब तक तो आप समझ ही चुके  होंगे जो  आत्मिक शान्ति निन्दास्तुति में मिलती है ,वह भगवतभक्ति में कभी नहीं  मिल सकती |

 

डॉ हरि जोशी                                          

३/३२ छत्रसाल नगर ,फेज-२, जे.के.रोड , भोपाल- ४६२०२२ (म.प्र.)

 

मोबाइल -०९८२६४२६२३२ 

जन्म : 17 नवंबर, 1943, खूदिया(सिराली), जिला –हरदा (मध्य प्रदेश )

शिक्षा–एम.टेक.,पीएच.डी.(मेकेनिकल इन्जीनियरिंग),सम्प्रति –सेवा निवृत्त प्राध्यापक.(मेकेनिकल इन्जी.)शासकीय इन्जीनियरिंग कॉलेज, उज्जैन(म.प्र.)

हिंदीकीलगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में साहित्यिक रचनाएँ प्रकशित |अमेरिका की इंटरनेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोएट्री में १० अंग्रेज़ी कवितायेँ संग्रहीत|

प्रकाशित पुस्तकें-कुल २४

कविता संग्रह- ३ –पंखुरियां(६९),यंत्रयुग (७५)और हरि जोशी-६७(२०११)(अंग्रेज़ी में भी अनूदित कवितायेँ )

व्यंग्य संग्रह -१५-अखाड़ों का देश (१९८०)रिहर्सलजारी है (१९८४)व्यंग्य के रंग (१९९२)भेड की नियति (१९९३)आशा है,सानंद हैं (१९९५)पैसे को कैसे लुढका लें (१९९७)आदमीअठन्नी  रह गया (२०००)सारी बातें कांटे की (२००३)किस्से रईसों नवाबों के (२००६)मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ(२००४)इक्यावन श्रेष्ठव्यंग्यरचनाएँ(२००९)नेता निर्माण उद्योग (२०११)अमेरिका ऐसा भी है (२०१५)हमने खाये, तू भी खा (२०१६) My Sweet Seventeen, published from Outskirts Press Publication Colorado (US) (2006)

प्रकाशितव्यंग्यउपन्यास-६ –पगडंडियाँ(१९९३)महागुरु(१९९५)वर्दी(१९९८)टोपी टाइम्स (२०००)तकनीकी शिक्षा के माल(२०१३) घुसपैठिये(२०१५)

प्रकाशनाधीन उपन्यास-४-१.भारत का राग- अमेरिका के रंग,२.पन्हैयानर्तन, ३.नारी चिंगारी और ४.दादी देसी- पोता बिदेसी

अत्यंतदुर्लभसम्मान-दैनिक भास्कर में १७ सितम्बर १९८२ को“रिहर्सल जारी है “ रचना के प्रकाशनपर मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री द्वारा सरकारी सेवा से निलंबन,कुछ महीनों बाद लेखकों पत्रकारों के विरोध के बाद बहाली |२४ दिसंबर १९८२ को नई  दुनिया इंदौर में “दांव पर लगी रोटी लिखने पर मंत्री द्वारा चेतावनी |“१७ जून१९९७ को नवभारत टाइम्स केदिल्ली- मुंबई संस्करणों में रचना“श्मशान और हाउसिंग बोर्ड का मकान“प्रकाशित होने पर सम्बंधित मंत्री द्वारा शासन की ओर से मानहानि का नोटिस और विभाग को कड़ी कार्रवाई करने हेतुपत्र| पुनः लेखकों पत्रकारों द्वारा विरोध |प्रकरण नस्तीबद्ध |

अन्य सम्मान-व्यंग्यश्री (हिंदी भवन ,दिल्ली)२०१३,गोयनका सारस्वत सम्मान(मुंबई)२०१४,अट्टहास शिखर सम्मान (लखनऊ) २०१६,वागीश्वरी सम्मान (भोपाल) १९९५,अंग्रेज़ी कविता के लिए अमेरिका का एडिटर’स चॉइस अवार्ड २००६, एवं अन्य कुछ सम्मान|

विदेश यात्रायें-एक बार लन्दन कीतथा छः बार अमेरिका की यात्राएं|दो शोधर्थियों को “हरि जोशीके व्यंग्य लेखन” पर पीएच.डी. प्रदत्त|पता३/३२ छत्रसाल नगर,फेज़-२,जे.के.रोड,भोपाल-४६२०२२(म.प्र.)/दूरभाष निवास-०७५५-२६८९५४१चलितदूरभाष -०९८२६४-२६२३२ E mail –harijoshi2001@yahoo.com

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