... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

डरावनी फ़िल्म

October 3, 2017

डॉ श्रीवास्तव बहुत दुविधा में थे |क्या उन्हें इस फिल्म को बीच में ही छोड़कर घर चले जाना चाहिए  ?यदि वह चले गये तो श्रीमतीजी क्या सोचेंगी ? फिल्म देखने के लिए श्रीमतीजी को  अकेला भी तो नहीं छोड़ा जा सकता ?इसी  उत्सुकता के वशीभूत कि थियेटरों में अब  व्यवस्थाएं बहुत अच्छी हो गई होंगी वर्षों बाद वे दोनों बालकनी में सबसे महंगा टिकिट लेकर बैठे हैं |लेकिन उन्हें बेचैनी इस बात की है कि जिन्हें  वह प्रतिदिन पढ़ाते हैं, ऐसे अंतिम वर्ष इन्जिनीयरिंग के लड़के लड़कियां भी इसी बालकनी क्लास में बैठे हैं |

 

डॉ श्रीवास्तव अन्दर ही अन्दर कुनमुना  रहे थे ,”सच्चाई तो यह है कि इस समय उन्हें मेरी बालकनी वाली  क्लास में नहीं ,औद्योगिक प्रबंधन विषय की क्लास में होना चाहिए था |मैंने खुद यहाँ आकर सारा प्रबंधन ही चौपट कर दिया | ब्वायफ्रेंड्स और गर्लफ्रेंड्स का यह छोटा झुण्ड नहीं है ,शायद पूरी की पूरी क्लास रोमांटिक फिल्म देखने आ धमकी है |उन्होंने तय कर लिया होगा कि आज दोपहर बाद कालेज बंक करना है |मैं क्लास में जाता तो भी ,कक्षा में छात्र छात्रा नहें मिलते |चलो विद्यार्थी तो तड़ी मारकर फिल्म देखने जा सकते हैं ,उससे भी बड़ा मजाक यह है कि उनका सीनियर  प्रोफेसर भी साथ में बैठा हैं ? यदि यह बात उज्जैन की बस्ती के लोगों को पता चल गई  तो वे क्या सोचेंगे ?क्या यह सन्देश नहीं जायेगा कि इन्जिनीयरिंग कॉलेज में सभी तड़ी मारते हैं ,क्या छात्र और क्या अध्यापक ?”

उन्होंने पत्नी से राय ली  ” मेरी दिली इच्छा तो है, हम घर चलें ?”

 

इतना  सुनते ही पत्नी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया ,”साल भर से कह रही थी उज्जैन आ गए हैं, मुझे यहाँ के थियेटर में एक अच्छी फिल्म तो दिखा दो ?दिसंबर का महीना ख़तम हो रहा है |सारी की सारी केजुअल लीव बाकी पड़ी हैं  ,पूरे साल में  एक भी छुट्टी नहीं ली |यही पहली छुट्टी ली है ?इसे भी बिगाड़ देने पर तुले हो ?फिल्म उतरने ही वाली है इसीलिये उसके आख़िरी दिन के मेटिनी शो में आये हैं |फ्री गंज की इस बढ़िया टाकीज़ में भी पहली बार इसलिये  आये कि यही थियेटर  यहाँ का सर्वश्रेष्ठ है | टिकिट के पूरे पैसे चुकाये हैं, और आप कह रहे हैं ,पैसे पानी में फेंककर घर चल दो ?”

 

“धीमी आवाज़ में बोलो मेडम |तुम समझोगी नहीं, आसपास कॉलेज के वही लड़के लड़कियां बैठे हैं जिन्हें मैं रोजाना पढ़ाता हूँ, उनके मन में मेरे बारे में क्या विचार उठेंगे ? अभी तो फिल्म शुरू नहीं हुई है |देख लेना वे पूरे समय फिल्म न देखकर, मुझे ही  देखते रहेंगे |वे भले ही अभी कुछ कह नहीं रहे हैं पर देख रही हो उनकी आँखें जो प्रश्नवाचक मुद्रा लिए हैं,अरे सर आप ? उन्हें देखकर मैं चौकन्ना हो गया हूँ |”

 

“आप उनकी ओर देखते ही क्यों हैं ?आपकी निगाह स्क्रीन पर होनी चाहिए |”

 

“हाँ तुम्हें देखते देखते तो बरसों हो गए ,फिल्म में ही कुछ नए चेहरे देखने को मिल सकते हैं |” डॉ श्रीवास्तव बोले

 

पत्नी से आँख चुराकर ,छात्र छात्राओं पर निगाह डाली फिर  फुसफुसाकर डॉ श्रीवास्तव ने पत्नी से पुनः कहा “उनकी स्वतंत्रता में हम बाधक बन रहे हैं|हमें आज नहीं आना चाहिए था|किसी और दिन आते तो अच्छा रहता ?”

 

“अब आ गए हैं तो पूरी फिल्म ही देखकर चलेंगे |देखिये डॉ. साहब ,आप ऐसे पहलवान तो हैं नहीं कि  फिल्म लगने वाले दिन ही आप टिकिट पा जाते ? धक्कामुक्की करते हुए क्या  आप हाल में घुस सकते थे  ?क्या कतार के सिर पर चढ़कर टिकिट विंडो तक पहुँच सकते थे ?पहले  दिन तो लौंडे लपाड़े ही टिकिट ले सकते हैं ?उस दिन तो वरिष्ठ नागरिकों को जाना ही नहीं चाहिए |हाथ पाँव होने का भय बना रहता है |बीच के दिनों में जोर शोर से फिल्म का विज्ञापन नहीं किया जाता , इसलिए अपनी  निगाह उसपर नहीं पड़ती |फिर आपका तो कहना ही क्या ?कभी पीएच.डी. स्कॉलर , गाइडेंस लेने बैठे हुए हैं, तो कभी इन्जिनीयरिंग के छात्र अपनी प्रोब्लेम्स लिए हुए आपका सिर खा रहे हैं | आपको फुर्सत ही कब मिलती है ?दिन भर खुजलाये बन्दर की तरह इधर उधर भागते रहते हो , मुझसे बात करने की तक फुर्सत नहीं मिलती |हाँ यदि पूछने के लिए लड़कियों का झुण्ड आ जाये फिर तो कहना ही क्या ?उनके साथ घंटों खोये रह सकते हो | सैकड़ों बार मेरे  कहने पर बड़ी मुश्किल से आज मुहूर्त निकला  है ?और यहाँ आने के बाद आप कह रहे हैं कि घर चलो ?यानी मैं घर से बाहर कहीं निकलूँ ही नहीं ?”

 

“तुम  ठीक कह रही हो , लेकिन मेरी बनी बनाई छवि तो धूल में मिल रही है न ?विद्यार्थी क्या सोच रहे होंगे ? मैं कक्षा में  न पढ़ाकर फिल्म देख रहा  हूँ |”

 

अपने पड़ोस वाले वर्मा जी तो फिल्मों के कितने शौक़ीन हैं ?नियम से हर हफ्ते , पति पत्नी दोनों फिल्म देखने जाते ही हैं |उन्हें इतनी छुट्टियाँ कैसे मिल जाती हैं ?कहा जाता है वे पढ़ाते लिखाते भी नहीं फिर भी लड़के लड़कियों में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं | कई बार जब उनकी श्रीमती मायके चली जाती हैं और  अकेले रहते हैं, तब तो वे साक्षात स्वर्ग में जीते हैं |फिर तो बेरोकटोक  लड़कियों के गले में हाथ डालकर घूमते रहते हैं |क्लास की कभी चिंता उन्हें नहीं रहती  ?और एक आप हैं |एकदम डरपोंक |हमेशा ही भीगी बिल्ली बने हुए ? “

 

इसी बीच एक छात्र डॉ श्रीवास्तव के सामने से निकला और अभिवादन करते हुए बोला  “सर गुड आफ्टरनून”

 

डॉ श्रीवास्तव ने भी अनमने मन से  सिर हिलाकर उत्तर दे दिया |आगे वही छात्र बोला “सर आज तो वर्माजी भी फिल्म देखने आये हैं ,वह देखिये आपसे पीछे की सीट पर पहले से बैठे हैं |आप तो अभी अभी आये हैं |”

 

डॉ श्रीवास्तव ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा सचमुच तीन पंक्तियाँ  दूर ,वर्माजी दोनों ओर छात्राओं से घिरे हुए , आधुनिक कृष्ण कन्हैया बने हुए बैठे हैं |वह तो खुले आम कहते हैं भगवान् कृष्ण ने बचपन में सांदीपनी आश्रम में अध्ययन किया होगा  ,मैं आधुनिक कृष्ण कन्हैया हूँ , उत्तरप्रदेश से यहाँ पढ़ाने आया हूँ |

 

ऐसे आनंद के समय वर्माजी  कॉलेज और सहकर्मियों को पूरी तरह भूल जाते हैं |खीर में किसी तरह का कंकर उन्हें पसंद नहीं| डॉ श्रीवास्तव होंगे वरिष्ठ प्राध्यापक , उन्हें क्या ?उस ओर वह क्यों देखने चले ?

 

“अब बताइए एक आप हैं और एक वह ?सुना तो यह भी है कि जब विद्यार्थियों से सत्र समाप्त होने के बाद विद्यार्थियों से फीडबैक लिया जाता है कि पूरे साल कौन सबसे अच्छा प्रोफेसर रहा है,जिसने तन्मय होकर पढ़ाया है|तब भी वर्माजी सबसे बाजी मार ले जाते हैं |सुना है छात्राओं के साथ तो उनकी तन्मयता देखते ही बनती है ?”श्रीमती श्रीवास्तव बोली

 

“और जब लड़के लड़कियों को नौकरी में सेलेक्शन के लिए कंपनी आती हैं तब ?”

 

“तब क्या ?”

 

“तब तो मेरे विद्यार्थियों का ही सर्वाधिक चयन होता है ?” डॉ श्रीवास्तव ने उत्तर दिया

 

“लेकिन प्राचार्य तो ,विद्यार्थियों के फीडबैक के आधार पर ही वार्षिक गोपनीय चरित्रावली लिखते हैं इसीलिये वर्माजी की वार्षिक गोपनीय चरित्रावली प्रतिवर्ष उत्कृष्ट लिखी जाती होंगी ?”

 

“यह भी सच है |”

 

“और पदोन्नति भी तो वार्षिक गोपनीय चरित्रावली के आधार पर ही होती है |वह आपसे पहले प्रिंसिपल बन जायेंगे |आप ईमानदारी की पूंछ पकड़कर सिर्फ डूब सकते हैं ? ”

 

 पति पत्नी की खुसुर फुसुर  चल ही रही थी कि फिल्म शुरू हो गई

 

“चलो अब कोई बातचीत नहीं ,जिस काम के लिए कई महीनों बाद आये हैं ,फिल्म देख लें |” श्रीमती श्रीवास्तव बोली

 

फिल्म चलती रही |डॉ श्रीवास्तव भले ही कुर्सी पर पीठ टिकाये बैठे थे,उनका ध्यान फिल्म में कम अपनी छवि और विद्यार्थियों की भावी टीका टिप्पणियों पर पूरे समय टिका रहा |कोई फुसफुसाकर भी कुछ बोलता तो डॉ श्रीवास्तव सुनने की कोशिश करते ,कोई छात्र उनके बारे में ही तो कुछ नहीं कह रहा ?

 

पूरी फिल्म में दर्शक कभी जोर से हँसते तो कभी ताली बजाते रहे |बीच बीच में  सीटियाँ बजाकर उल्लास का प्रदर्शन भी करते रहे, किन्तु डॉ श्रीवास्तव पूरे समय मौनी बाबा ही बने रहे | श्रीमती श्रीवास्तव भी फिल्म का पूरा आनंद कहाँ ले सकीं  ?मन ही मन कह रही थी , किस मनहूस के पास बैठ गई हूँ ,खुल कर हंस या खिलखिला भी तो नहीं सकती ?

 

फिल्म ख़त्म हो गई |भीड़ थियेटर से बाहर निकलने लगी |दर्शक फिल्म की तारीफ़ कर रहे थे | श्रीमती श्रीवास्तव भी प्रशंसकों में से एक थी , किन्तु डॉ श्रीवास्तव के सामने वह प्रशंसा करने से रहीं ?गूंगे आदमी से कोई क्या बात करे ?

 

बात आयी  गई हो गई |एक दिन डॉ श्रीवास्तव ने प्रोफेसर वर्मा से सहज ही पूछ लिया ,” आप तो उस दिन फिल्म देखने  गए थे ?”

 

“आपको भ्रम हुआ होगा , मैं कभी फिल्म देखने नहीं जाता |विशेषतः कॉलेज के समय तो जाता ही नहीं  ?ऐसा तो संभव ही नहीं है |उस दिन मेरी क्लास थी , और मैं तो पढ़ा रहा होऊंगा |जो मक्कारी करते हैं वही  क्लास के समयफिल्म देखने जा सकते हैं | ”

 

डॉ श्रीवास्तव ने बात को आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा |”गीले गोबर में पत्थर फेंक कर छींटे क्यों उड़ाना ?”

 

कुछ दिन बाद प्राचार्य पद हेतु जब पदोन्नति हुई तो सूची में प्रोफेसर वर्मा का नाम देखकर , न सिर्फ डॉ श्रीवास्तव , बल्कि समूचा कॉलेज सन्न रह गया |अरे यह तो चमत्कार हो गया ?

 

“यह कैसे हुआ होगा ?”जब  खोज बीन चली |तो पता चला कि लगातार पांच उत्कृष्ट वार्षिक गोपनीय चरित्रावलियां वर्मा जी ने अर्जित की हैं |इसीलिए अनेक वरिष्ठ प्राध्यापकों को रौंदते हुए वह प्रिंसिपल बन गए |

 

वह सिर्फ प्राचार्य ही नहीं बने उन्होंने भोपाल जाकर उच्चाधिकारियों से मिलकर आपनी पोस्टिंग भी उज्जैन में ही करा ली |

 

अब डॉ श्रीवास्तव चिंतित हैं कि वर्मा जी उनकी आगामी वर्ष की गोपनीय चरित्रावली कहीं बिगाड़ न दें क्योंकि वह ईमानदारी के दुश्मन हैं  | डॉ वर्मा कई बार डॉ श्रीवास्तव को लदा फंदा ,गधा कहते हैं  |सिर्फ पढना पढ़ाना ही काफी नहीं होता | विभागाध्यक्ष होने के बावजूद भी डॉ श्रीवास्तव ,प्रोफेसर वर्मा की स्वेच्छा चारिता पर मौन रहते थे | उस दिन फिल्म पर भी थोड़ी नोक झोंक हुई  थी |वे भयभीत हैं इस वर्ष उनकी फिल्म न खिंच जाये ? गोपनीय चरित्रावली बिगड़ते ही उनकी नौकरी की फिल्म भी अधूरी और पशोपेशमय हो जायेगी |आगे उसे देखते रहना संभव नहीं होगा |सोचना पड़ेगा, उसे देखते रहें या नहीं ? वह जानते हैं, ऊपर चढ़ने के लिये वर्माजी की शैली,  जीवन में कभी अपना नहीं पायेंगे | पूजा पाठ करने के बावजूद वह आश्चर्यचकित थे ,प्रोफेसर वर्मा सरीखा उनका भाग्य भगवान ने क्यों नहीं लिखा  ?वह अपने भावी काल की  नौकरी वाली  डरावनी फिल्म से चिंतित थे |

 

                     

डॉ हरि जोशी

 

 ३/३२ छत्रसाल नगर ,फेज़ -२

जे.के.रोड , भोपाल -- ४६२०२२

 मोबाइल -०९८२६४२६२३२ 

 

 

जन्म : 17 नवंबर, 1943, खूदिया(सिराली), जिला –हरदा (मध्य प्रदेश )

शिक्षा–एम.टेक.,पीएच.डी.(मेकेनिकल इन्जीनियरिंग),सम्प्रति –सेवा निवृत्त प्राध्यापक.(मेकेनिकल इन्जी.)शासकीय इन्जीनियरिंग कॉलेज, उज्जैन(म.प्र.)

हिंदीकीलगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में साहित्यिक रचनाएँ प्रकशित |अमेरिका की इंटरनेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोएट्री में १० अंग्रेज़ी कवितायेँ संग्रहीत|

प्रकाशित पुस्तकें-कुल २४

कविता संग्रह- ३ –पंखुरियां(६९),यंत्रयुग (७५)और हरि जोशी-६७(२०११)(अंग्रेज़ी में भी अनूदित कवितायेँ )

व्यंग्य संग्रह -१५-अखाड़ों का देश (१९८०)रिहर्सलजारी है (१९८४)व्यंग्य के रंग (१९९२)भेड की नियति (१९९३)आशा है,सानंद हैं (१९९५)पैसे को कैसे लुढका लें (१९९७)आदमीअठन्नी  रह गया (२०००)सारी बातें कांटे की (२००३)किस्से रईसों नवाबों के (२००६)मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ(२००४)इक्यावन श्रेष्ठव्यंग्यरचनाएँ(२००९)नेता निर्माण उद्योग (२०११)अमेरिका ऐसा भी है (२०१५)हमने खाये, तू भी खा (२०१६) My Sweet Seventeen, published from Outskirts Press Publication Colorado (US) (2006)

प्रकाशितव्यंग्यउपन्यास-६ –पगडंडियाँ(१९९३)महागुरु(१९९५)वर्दी(१९९८)टोपी टाइम्स (२०००)तकनीकी शिक्षा के माल(२०१३) घुसपैठिये(२०१५)

प्रकाशनाधीन उपन्यास-४-१.भारत का राग- अमेरिका के रंग,२.पन्हैयानर्तन, ३.नारी चिंगारी और ४.दादी देसी- पोता बिदेसी

अत्यंतदुर्लभसम्मान-दैनिक भास्कर में १७ सितम्बर १९८२ को“रिहर्सल जारी है “ रचना के प्रकाशनपर मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री द्वारा सरकारी सेवा से निलंबन,कुछ महीनों बाद लेखकों पत्रकारों के विरोध के बाद बहाली |२४ दिसंबर १९८२ को नई  दुनिया इंदौर में “दांव पर लगी रोटी लिखने पर मंत्री द्वारा चेतावनी |“१७ जून१९९७ को नवभारत टाइम्स केदिल्ली- मुंबई संस्करणों में रचना“श्मशान और हाउसिंग बोर्ड का मकान“प्रकाशित होने पर सम्बंधित मंत्री द्वारा शासन की ओर से मानहानि का नोटिस और विभाग को कड़ी कार्रवाई करने हेतुपत्र| पुनः लेखकों पत्रकारों द्वारा विरोध |प्रकरण नस्तीबद्ध |

अन्य सम्मान-व्यंग्यश्री (हिंदी भवन ,दिल्ली)२०१३,गोयनका सारस्वत सम्मान(मुंबई)२०१४,अट्टहास शिखर सम्मान (लखनऊ) २०१६,वागीश्वरी सम्मान (भोपाल) १९९५,अंग्रेज़ी कविता के लिए अमेरिका का एडिटर’स चॉइस अवार्ड २००६, एवं अन्य कुछ सम्मान|

विदेश यात्रायें-एक बार लन्दन कीतथा छः बार अमेरिका की यात्राएं|दो शोधर्थियों को “हरि जोशीके व्यंग्य लेखन” पर पीएच.डी. प्रदत्त|पता३/३२ छत्रसाल नगर,फेज़-२,जे.के.रोड,भोपाल-४६२०२२(म.प्र.)/दूरभाष निवास-०७५५-२६८९५४१चलितदूरभाष -०९८२६४-२६२३२ E mail –harijoshi2001@yahoo.com

 

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