... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

सफ़रनामा : याद-ए-कालापानी - भाग 2

शेर अली वहाबी की शहादत और सेलयूलर जेल का निर्माण:

यहां के बारे मे मैं उन बातों को बताने से परहेज़ करूंगा जो कुछ आप नेट से जान सकते हैं । यहीं से मुझे पता चला कि सज़ा-ए-कालापानी दरअसल सेल्यूलर जेल की सजा का नाम भर नही था । सज़ा-ए-कालापानी यह शब्द तो सेल्यूलर जेल से पहले का था । पहले तो यह द्वीप एक खुली जेल था । यहां लाये जाने वाले कैदी यहां से फ़रार अख़्तियार करने की सोंच भी नहीं सकते थे । यहां लाये जाने वाले क़ैदियों के सामने अंग्रेज़ों की दासता स्वीकर करने के लिये कोई राह नहीं थी । यह जगह दर असल इनसान के अंदर के आत्मसम्मान को कुचलने का कारखाना था । वे क़ैदी यहां पर अंग्रेज़ो के महल बनाते और उनकी हर ख्वाहिशों के लिये अपनी हड्डियाँ गलाते । और इसपर भी बात बे बात कोढ़ों की मार खाते । उन्हे यहां औरतों और मर्दों के जोड़ों मे या अकेले भी रखा जाता । इसके पीछे शायद एक गुलाम नस्ल तैयार करने की सोंच रही हो ।

 

फ़िर जेल के निर्माण की ज़रूरत क्यों पड़ी ? इस एतिहासिक सवाल का जवाब नेट पर कहीं नहीं मिलता लेकिन यहां पर मिलता है ।

 

इन क़ैदियों मे एक थे शेर अली । उन्हे यहां का स्थानीय हीरो कहें तो अतिशयोक्ति न होगी । उनका पूरा नाम शेर अली वहाबी है और वे यहां के पहले शहीद का दर्जा रखते हैं । शेर अली को अपने क़ैदी भाईयों के साथ अंग्रेज़ों का गैर इनसानी बर्ताव बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता । एक दिन एक भारतीय को अंगेर्ज़ के हाथ बिना बात पिटाई खाते देख वे आपे से बाहर हो गये और तुरंत उस अंग्रेज़ को मार डाला । लेकिन उनका यह एक अकेला विद्रोह तुरंत कुचल दिया गया; उन्हे फ़ांसी देकर ।

 

इसके बाद अंग्रेज़ो को महसूस हुआ कि अगर इन्हे यूं खुला रखा गया तो और भी शेर अली पैदा हो सकते है । तब इस जेल की योजना बनाई गई ।

 

एक बात और - - - यहां जब हम गांधी पार्क मे सैर कर रहे थे उस दर्मियान मुझे एक-दो मानव निर्मित गुफ़ाओं जैसी संरचनायें दिखी और ठीक इसी प्रकार की संरचना बाद मे मैने रॉस आईलैंड मे भी देखी थी । पता करने पर ज्ञात हुआ कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहां और आस पास के द्वीपों पर जापानियों का कब्ज़ा हो गया था; ये बंकर उन्ही जापानी फ़ौज ने बनाये थे । वे इन्हीं बंकरों मे रहते और ताकि मित्र देशों की हवाई सेना की नज़र मे न आयें, और यहां से अमरीकी फ़ौजी ठिकानो पर हमलों का संचालन करते थे । और वक्त का फ़ेर देखिये उन दिनो इस जेल के स्वम्भू भगवान वे अंग्रेज़, इसी जेल मे रखे गये ।

 

जब हम सेलुलर जेल से, लाईट ऐन्ड साउन्ड शो देखकर निकले तो अच्छा खासा अंधेरा हो चुका था । बाहर आते ही मेरी नज़र इस जेल से सीधे सामने काफ़ी दूर पर स्थित एक बड़ी इमारत पर पड़ी । मैने पूछा वह क्या है ? ड्राईवर ने बताया – पंत हॉस्पिटल ।

तो, रात हो चुकी थी और हम लोग काफ़ी थकान महसूस कर रहे थे । बड़ा टाइम लग गया पता ही नही चला । आठ या नौ बजते होंगे सोंचते हुये मैने घड़ी देखी, छ: बज रहे थे । सो हमने तय किया पहले अपने ठिकाने पर चलकर नहा धो कर फ़्रेश हो ले फ़िर खाने के बारे मे सोचेंगे । हम लोग अपने रूम पर पहुंचकर दूसरे दिन के कार्यक्रम की रूपरेखा बना रहे थे तभी किसी बात पर हमारे टूर ऑप्रेटर्स मे से एक ने किसी बात पर मुझसे पूछा- “आप लोग मुहम्मडन हैं ?”

 

“हां ।“ मैने कहा ।

दूसरे ने आश्चर्य के साथ वही सवाल दुहराया । मैने जवाब दुहराया । तीसरे ने फ़िर वही सवाल साश्चर्य दुहराया तब मैने सवाल किया- “क्यों ?” तो वे बोले “नहीं कुछ नहीं ऐसे ही ।“ मैने बहुत बार पूछा लेकिन वे लो यही जवाब देते रहे “ऐसे ही ।“ इस तरह उस हैरानी का राज़ और ‘ऐसे ही’ का राज़ मेरे लिये राज़ ही रह गया ।

 

यह तय पाया गया कि दूसरे दिन हम लोग बाराटांग जायेंगे । बाराटांग की यात्रा यहां की दो प्रमुख यात्राओं मे से एक थी । टूरिस्ट को आमतौर पर बाराटांग और हेवलॉक बीच मे से एक स्पॉट चुनना होता; क्योंकि यह दोनो यात्राये बहुत लम्बी और थकाने वाली होती लेकिन मैने अपना पैकेज खुद बनाया था जिसमे दोनो यात्रायें मुख्य तौर पर थीं और हेवलॉक बीच की यात्रा 24 मार्च को तय की गयी क्योंकि उस दिन मेरे बेटे का दसवां जनमदिन मनाना था ।

“कल सुबह बाराटांग जाने के लिये बस सुबह साढ़े चार बजे निकलेगी ।“ राजेश ने बताया तो मुझे बड़ा अटपटा लगा और बेज़ारी भी महसूस हुई ।

“यह भी कोई वक़्त हुआ, इतनी सुबह कौनसी बस जाती है यार ।“ मैने बेज़ारगी से कहा ।

“सर, बस तो इतनी सुबह ही निकलती है: तब कहीं रात तक लौट पायेंगे । वैसे अभी तो बहुत समाय है । ड्राईवर आप लोगो को जल्दी खाना खिला कर ले आयेगा । ज़रा जल्दी सो जाईयेगा ।“ तभी मुझे ख़्याल आया यहां के साढ़े चार बजे और हमारे यहां के साढ़े चार बजे मे बड़ा फ़र्क है ।

“नही अब कहीं नहीं जाना है,” मैने कहा “अब हम ज़रा टहलने निकलेंगे तो यहीं नीचे मेन रोड पर खाना खा लेंगे । और लोकल एरिया भी देखने मिल जायेगा ।“

“हां, यहां तो अच्छी अच्छी होटलें और रेस्टॉरेन्ट्स है ।“ और उसने आस-पास के अच्छे रेस्टॉरेन्ट्स गिना दिये और लोकेशन भी बता दी ।

 

तैयार होकर जब हम लोग पैदल घूमने निकले, बस आधा एक फ़र्लांग नीचे उतरते ही मुख्य सड़क थी । लेकिन यहां कोई भीड़भाड़ नहीं थी । सुकून था । दुकाने और रेस्टॉरेन्ट्स ज़रूर थे । हमारे सामने जो पहला रेस्टोरेन्ट पड़ा उसका कोई इस्लामी नाम था और कुछ बिरयानी वगैरह के मेनू देखकर बच्चों ने बिरयानी की ज़िद कर दी । हालंकि हमने तय किया हुआ था कि सफ़र मे हम सादा भोजन ही करेंगे लेकिन बच्चों के आगे झुकना पड़ा । हमने बिरयानी ऑर्डर की तो पता चला कि बिरयानी तो यहां दोपहर मे ही मिलती है । हालान्कि हमने मछली ऑर्डर कर दी थी लेकिन बच्चे मायूस थे । तब मैने वेटर से पूछा कि हम लोग दोपहर मे तो आ नही सकते क्या कल दोपहर की बिरयानी आप रात तक रख सकेंगे ? थोड़ी देर मे रेस्टॉरेन्ट का मालिक मेरे पास आ गया । दुआ सलाम के बाद बोला आप लोग मुस्लिम हैं न ! मेरे इकरार पर वह मुस्कुराया और बोला- टूरिस्ट हैं न ? फ़िर हां कहने पर वह बोला “मै समझ गया था । हमलोग भी कभी जाते हैं घूमने, हैदराबाद, दिल्ली या अजमेर वगैरह तो हमारे भी बच्चे इसी तरह बिरयानी की फ़रमाईश करते हैं । और भी बातें हुईं लेकिन बिरयानी नहीं मिली । हां लेकिन इसके बाद रेस्टॉरेन्ट मे जितनी भी डिशेज़ मौजूद थी थोड़ी थोड़ी हमारे सामने आ गई । हमारी खूराक तो इतनी सी थी कि, हम दोनो मियां-बीबी और दो बच्चे मिलाकर भी दो लोगों की खुराक़ खा पाते । और यह हमारे साथ पहली बार नहीं हुआ था, बल्कि ठीक एक दिन पहले चेन्नई मे एक उत्तर भारतीय शाकाहारी रेस्टॉरेन्ट मे खाना खाते हुये वहां के भोजन की तारीफ़ करने पर वहां के मालिक ने वेटर को बुलाकर पूछा कि क्या कह रहे हैं और इसके बाद हमारे टेबल पर तमाम डिशेज़ सज गईं और रेस्टॉरेन्ट के मालिक ने मैसेज भिजवाया कि यह हमारी तरफ़ से । मजबूरन हमे रात का खाना भी दिन मे ही खाना पड़ा था । यहां भी हमारे माफ़ी मांगने पर मालिक ने आकर इसरार किया, “आप हमारे मेहमान हैं और हम आपकी फ़र्माइश पूरी नही कर सके - - -“

=====

बाराटांग का सफ़र और जरवा आदिवासी :

 

बाराटांग एक छोटा सा टापू है । यहां के सफ़र का मुख्य आकर्षण है, जरवा आदिवासियों के इलाके से होकर गुज़रना । ये आदिवासी जंगलों मे बिल्कुल प्राकृतिक अवस्था मे रहते है । बिल्कुल निर्वस्त्र । इनका बाहर की दुनिया से कोई तअल्लुक नहीं होता है । और इनकी तादाद बड़ी शोचनीय रूप से कम थी । लगभग दो-ढ़ाई सौ । यह तादाद उस समय की मेरी जानकारी और याददाश्त के अनुसार है । यह रास्ता करीब सौ- सवा सौ किलोमीटर का होगा जो ट्रंक रोड कहलाता है ।

 

दूसरे दिन सवेरे हम लोग साढ़े चार बजे तक तैयार होकर मुख्य सड़क पर आ गये । बस ठीक हमारे पास आकर ठहरी । हमारी टिकटें पहले से हो चुकी थी और हमारी टिकिट कराने वाला आदमी बस मे साथ आया था फ़िर उसने बस के कंडक्टर से हमे मिला दिया और चला गया । रास्ते मे हमे बताया गया कि रास्ते मे अगर जरवा आदिवासी दिखाई दें तो उनका वीडियो या फोटो नहीं लेना है । उन्हें देखकर हसना नहीं । यदि वे बस रुकवाकर बस मे चढ़ भी जायें तो उनसे कोई चीज़ लेना या उन्हे कोई चीज़ देना नहीं है । इसका कारण मुझे ट्रंक रोड के दूसरे सिरे पर पहुंचकर पता चला; जहां एक गोवर्नमेंट की तरफ़ से एक नोटिस-बोर्ड लगा था । उस नोटिस-बोर्ड के हिसाब से जरवा आदिवासियों का तकरीबन तीन सौ वर्ग किलोमीटर का इलाका एक तरह से जरवा का स्वायत्तशासी क्षेत्र था जहां सरकार या पुलिस का कोई दख़ल नहीं होता । उस क्षेत्र के अन्दर अगर वे आपको पकड़ते हैं, आपको कोई सज़ा देते हैं या कोई व्यव्हार करते हैं तो सरकार या पुलिस, इसमे दखल नहीं देगी ।

 

तो सुबह साढ़े चार बजे हम जंगलीघाट से बस मे सवार हुये । मुख़्तसर सा शहर पोर्ट्ब्लेयर कहां रहगया पता ही न चला । रास्ते मे सड़क के दोनो ओर हरियाली ही हरियाली आती थी । बीच-बीच मे इक्का-दुक्का गांव भी नज़र आये जो दक्षिण भारतीय गांवो की तरह लगते थे । बहुत सी जगहों पर सागर-तट पर मरम्मत के काम ज़ारी थे जो शायद सुनामी की वजह से तबाह हुये होंगे ।

 

 

जिरगाटांग पहुंचकर बस रुक गयी और यहां काफ़ी देर रुकना था । वजह थी चेकपोस्ट । यह गैर आदिवासी इलाके की आखरी बस्ती है । इसके बाद जरवा आदिवासियों का इलाका शुरु होता है । यह एक छोटी सी बस्ती थी जहां खपरैल वाली छतों की भरमार थी । एक छोटा सा झोपड़ी नुमा चर्च था । वह भी कच्चा और पुराना । इससे मुझे यह अंदाज़ हुआ कि यह इसाई इलाका होगा और हो सकता है यहां पर इसाई मिशनरीयों का काम चलता हो जो उन दिनो भारत मे आम बात थी । लेकिन थोड़ा आगे ठीक मुख्य सड़क पर एक मंदिर दिखाई दिया जो इस इलाके के हिसाब से सम्पन्न सा लगता था ।

 

औपचारिकताओं की पूर्ती के बाद वहां खड़ी सारी गाड़ियां एक काफ़िले की शक्ल मे आगे बढ़ीं, जिसके आगे और पीछे एक एक मिलिट्री वाहन थे । सड़क की दोनो तरफ़ हरियाली से ढके पहाड़ या घाटियों और हरे हरे जंगल के सिवा कहीं कुछ नज़र न आता । मीलों इसी तरह के एकरस सफ़र से उकताहट होने लगी । रफ़्ता-रफ़्ता सभी लोग ऊंघने लगे ।

 

“जरवा ! जरवा !!” एक आवाज़ से तुरन्त चैतन्यता आ गई । बस का कंडक्टर चिल्ला रहा था और पीछे की ओर इशारा कर रहा था । लेकिन मुड़कर देखने पर कुछ नज़र नहीं आया । फ़िर उदासीनता छाने लगी थी कि वह फ़िर चीखा । इस बार खिड़की से बाहर की तरफ़ एक काली सी परछाई तेजी से गुज़र गयी । अब हम लोग अलर्ट हो गये । इसके बाद तो रास्ते मे कई जगह सड़क के किनारे जरवा दिखाई दिये । वे बिल्कुल काले और आफ़्रिकियों की तरह के बालों वाले थे । वे छोटे कद के और देखने मे बिलकुल आफ़्रीकी लगते थे । कईयों के सर और जिस्म ख़ाक आलूदा थे । इमानदारी से कहूं तो सच मे सभी लोग पूरी तरह निर्वस्त्र नहीं थे जैसा कि हर किसी के ज़ेहन मे इनकी तस्वीर होती है । जितने जरवा रास्ते मे मिले उनमे से दो चार ने तो एक जैसा ही एक ही रंग का कपड़ा कमर मे लपेट रखा था, बाकी जिस्म खुला था । एक ने बहुत बड़ी गन्दी सी खाक आलूदा एक सैन्डो बनियान पहन रखी थी, बाकी जिस्म खुला था ।

 

ट्रन्क रोड के अन्तिम छोर पर एक ट्रक मे भरे हुये कुछ आदिवासी जैसे नौजवान नज़र आये जो ठीक वही कपड़ा सिर पर लपेटे हुये थे जो जरवाओं की कमर मे दिखा था । ट्रक से उनके जिस्म का ऊपरी हिस्सा नज़र आरहा था जो खुला था । कंधों पर तीर-कमान, और वे हम टूरिस्टों की तरफ़ देखकर बड़ी उत्तेजना मे चिल्ला रहे थे । हम सिर झुकाये आगे बढ़ गये और ट्रक जंगल की ओर । इस समय हम बस से उतरकर फ़ेरी पर चढ़ने जेट्टी की ओर पैदल जा रहे थे । यह सब आज भी एक पहेली सा लगता है; लेकिन एक बात मुझे आज भी महसूस होती है कि, इनका बाहरी दुनियाँ से कोइ सम्पर्क न होने वाली बात मे कोई दम नहीं है और न ही इस बात मे कि तादाद सिर्फ़ ढाई सौ । और यह विश्वास मेरा लगातार दृढ़ होता गया ।

 

चलिये जरवा की बात पूरी करने से पहले, जो कुछ थोड़ी सी जानकारी इनके बारे मे हुई वह आपसे शेअर करता चलूं । मुझे जो जानकारी हासिल हुई उसके मुताबिक ये लोग इस जंगल के मूल निवासी नहीं बल्कि आफ़्रिका से यहां आकर बसे हैं और उन्हे देखकर यह बात सौ फ़ीसदी सही भी लगती है । फ़िर भी एक शंका है कि, आफ़्रीका यहां से बहुत दूर है और आस-पास की मूल प्रजातियों से वे बिल्कुल अलग लगते हैं । यहां आस-पास मे बर्मा से आसकने की सम्भावना है या सबसे अधिक सम्भावना निकोबार द्वीप की है जोकि यहां की आदिवासी प्रजातियों से बिल्कुल ही अलग हैं । हद से हद आस्ट्रेलिया या इन्डोनेशिया से भी होते तो भी एक दम भिन्न होते । इन तर्कों के आधार पर इनका आफ़्रीकी होना ज़्यादह सही लगता है लेकिन आफ़्रीका से इतने दूर का सफ़र करने मे सफ़ल होने वाली कौम होना अपने आपमे कोई मामूली बात नहीं । जो कौम वस्को-डी-गामा या कोलम्बस के अभियानो की बराबरी करती है वह उस दौर की काफ़ी विकसित कौम होना चाहिये ? अगर वे विकसित कौमे थीं तो यहां आने के बाद अपने तकनीकी ज्ञान और परम्पराओं के अनुसार बस्तियाँ क्यों नही बसाई । फ़िर इनकी भाषा जरवा भाषा है जो कि यहीं की एक अन्य प्राचीन भाषा, ओन्गी भाषा के परिवार की मानी जाती है न कि किसी आफ़्रीकी भाषा के परिवार की । ज़रा उलझन है न ? ऐसा नही लगता कि इतिहास का कोई तार हमसे छुट रहा है ? शायद कोई एतिहासिक घटना या मानव विज्ञान का कोई सूत्र ? बहरहाल ! जरवा लोग अपनी नस्ल की शुद्धता के प्रति बड़े संवेदनशील है । इनकी नज़र मे इनका धुर काला रंग ही इनकी नस्लीय शुद्धता का प्रतीक है; इसीलिये किसी बच्चे का रंग ज़रा सा भी कम काला हो तो उसे किसी बाहरी प्रजाति का होने की सम्भावना के कारण मार दिया जाता है और इसके लिये इनके समाज मे कोई दण्ड नहीं है । अगर यह बात सही है तो इस सम्भावना पर विश्वास का कोई आधार तो होगा । बिना आग के कोई धुआं तो नही होता । क्या बाहरी नस्लों की मिलावट की सम्भावना है ?

 

चलिये जरवा का ज़िक्र बंद करें; अभी बाराटांग का पूरा सफ़र बाकी है ।

यहाँ से फ़ेरी पर सवार हो हम लोग बाराटांग द्वीप पर पहुंच गये । यहां सफ़र का सारा इन्तेज़ाम पहले से ही था । मोटर से चलने वाली छोटी-छोटी नावें या डोंगियां कहना ज़्यादह सही रहेगा, तैयार थीं । हमने पानी, जूस और चिप्स वगैरह खरीदा और एक डोंगी पर सवार हो गये । यहां सागर विस्तृत नही था । दोनो टापुओं के बीच इतनी कम दूरी थी कि यहां समुद्र संकरी सी नदी की तरह मालूम होता था । एक यात्री ने इसे नदी कहा भी था तो टूर ऑप्रेटरों मे से एक ने कहा- “समुन्दर है । यहाँ नदियाँ नहीं होती ।“

 

बहरहाल, डोंगी चल पड़ी, फ़ट्-फ़ट् फ़ट्-फ़ट् फ़ट्-फ़ट् - - - । दोनो ओर हरे भरे टापुओं के बीच से होती हुई - - - । सूरज की किरने लहराती जलराशि से अठखेलियाँ करने लगी थी, जिसकी वजह से नीले नीले पानी पर बड़ी चकाचौंध पैदा हो रही थी । मेरा बेटा मेरे बाज़ू मे बैठा था और मेरे सामने मेरी बीवी और बेटी । सूरज मेरी पीठ की तरफ़ था और उसकी किरने ठीक मेरे सामने बैठी, मेरे घर की दोनो ख़वातीनो के चेहरों को रौशन किये हुये था । पानी पर झिलमिलाती चमक भी उनके चेहरो पर अठखेलियां कर जाती । दोनो की आखें मिचमिचा रही थीं । उन्हें देखने मे तकलीफ़ हो रही थी लेकिन मुझे सब कुछ बड़ा खुशनुमा, बड़ा मज़ेदार लग रहा था । मैं उस वक्त की कैफ़ियत कैसे बयां करूँ ? शायद इन लाईनो से कुछ बयां हो जाये- इस वक़्त हमारी नज़रों मे क्या चीज़ है जन्नत क्या कहिये - - -

एक लम्बा फ़ासला तै करने के बाद सामने पानी पर तैरता जंगल नज़र आने लगा । पानी मे जंगल ? हां, समन्दरी जंगल, जिसे मैंग्रोव कहते हैं । शायद अंग्रेज़ी मे । हिन्दी या उर्दू मे क्या कहते हैं मुझे पता नहीं । यह बिन मांगी मुराद थी । इसस पहले इन्हे मैने सिर्फ़ टीवी पर ही देखा था । ज़ाहिर मे देखने की हसरत ज़रूर थी लेकिन उम्मीद नही थी कि कभी अपनी आंखों से कुदरत का यह आजूबा देखूंगा । इसमे सफ़र करूंगा । इसकी छांव मेरे सिर पर होगी । यहां पनपने वाली प्रजातियां मेरी निगाहों के सामने होगी । तो, उम्मीदें यूँ बर आती हैं । सपने यूं साकार होते हैं । ऐसी ही है ज़िंदगी । ज़िंदगी को हम जाने पहचाने रास्तों पर चलाने की जद्दोजहद करते रहते हैं और यह नज़र बचाकर नामालूम रास्तों पर निकल पड़ती है । और हम हैरान रह जाते हैं कि यहां यह भी देखना नसीब था । गाह वह अच्छा होता है या बुरा लेकिन होता है नागहा - - - जैसे मेरे लिये यह मैंग्रोव ! इन जंगल-झाड़ियों के बीच एक संकरा सा रास्ता बना हुआ था । हमारी डोंगी उसी रास्ते मे दाख़िल हो गई । इंजन बंद कर दिये गये । डोंगी के नाविक खड़े हो गये । लम्बे लम्बे बांस हाथ मे लेकर नाव खेने लगे । यहां हमारी डोंगी अकेली नही थी । एक हुजूम था; यत्रीयों को ढोती हुई डोंगियों का । सभी एक दूसरे से सटकर गुज़र रहीं थीं । कुछ आ रही थीं कुछ जा रही थीं । एक दूसरी डोंगीयों के नाविक आपस मे बात करते हसी मज़ाक करते जा रहे थे । हमे चेतावनी दे दी गयी थी- खड़े नहीं होना, हाथ बाहर नहीं निकालना । एक यात्री ने कहा- “यहां मगरमच्छ हैं ।“ वल्लाह आलम बिस्सवाब । लेकिन मुझे तो कहीं नज़र नहीं आये; अलबत्ता लौटते वक्त हमारे सामने ही एक व्यक्ति जो खड़ा हुआ था और सम्भवत: नाविक ही था, पेड़ की एक शाख से टकराकर पानी मे जा गिरा और तैरकर निकल आया ।

 

एक रास्ता पर करके हम लोग ज़मीन तक पहुंचे । यहाँ किनारा बड़ा कच्चा सा था । लकड़ी के तख़्तों से एक प्लेटफ़ार्म बना हुआ था । बारी बारी से एक एक नाव यहां लगती और यात्रियों को उतारती । यहां का इन्तेज़ाम यहां की पुलिस देख रही थी । यहाँ से एक सिलसिला चला था पद-यात्रियों का सब एक पगडंडी पर एक के पीछे एक चले जारहे थे । तीर्थ यात्रियों की तरह । अब हम भी इसमे शामिल थे । चले जारहे थे, एक नामालूम रास्ते पर, एक नामालूम मंज़िल की ओर । किससे पूछें ? वहां कौन था, जो बताता । सब मुसाफ़िर थे । सब अन्जान थे । हमारी तरह । कोई रहनुमा नहीं था । कोई गाईड नहीं था । होगा भी, भीड़ मे, तो पता नहीं । हम लोग तो बस एक दूसरे के पीछे चले जारहे थे; खेतों की मेढ़ों के किनारे किनारे चलती हुई पगडंडियों के सहारे । ग़नीमत थी कि मेढ़ों पर दर्ख़्त थे वर्ना इतने लम्बे रास्ते पर चलते हुये, खुले आसमान और तपते सूरज के साये तले तो हम जल भुन कर कबाब हो जाते । गनीमत है, हमने पर्याप्त पानी रख लिया था वर्ना तो इस रास्ते पर तो कहीं पानी या किसी और राहत देने वालीचीज़ का कोई इन्तेज़ाम नहीं था । ऐसा लगता था, हम लोग कालापानी की सज़ा पाने वाले क़ैदी थे । यह रास्ता कही बियाबानो से, मैदानो से, और सूने खेतों से होकर, तो कही चट्टानो के बीच से होकर गुज़रता है । मुझे हैरानी थी कि इस सुनसान बियाबान वीराने मे खेती कौन करता होगा । यहां तो आसपास कोई बस्ती या बस्ती का नामोनिशां तक न था । हो सकता है वे नावों मे आते होंगे और फ़िर चले जाते होंगे । लेकिन फ़िर एक दो जगह खेतों के बीच इक्का दुक्का, ज़्यादह नही बस दो तीन कच्चे मकान या झोपड़ियाँ और इक्का दुक्का मवेशी नज़र आये । बस और कुछ नहीं ।

 

काफ़ी लम्बा रास्ता तै करने के बाद एक जगह कुछ भीड़ नज़र आई । यहाँ एक बुज़ुर्ग औरत डाब और कुछ फ़ल वगैरह लिये बैठी थी । बस यहाँ यह सफ़र खत्म होना था; क्योंकि यहाँ एक गुफ़ा का मुहाना नज़र आ रहा था । यहाँ गुफ़ा के अन्दर घुप अन्धेरा था । कुछ लोग हाथों मे टॉर्च लिये रास्ता बता रहे थे और एक गाईड गुफ़ा के बारे मे बताता जा रहा था । यह चूना पत्थर की चट्टानो मे बनी गुफ़ा थी । देखते ही समझ मे आता था कि यह कोरल की बस्ती रही होगी, जो कभी किसी ज़माने मे समुद्र के अन्दर रही होगी । तितलियों से ज़्यादह दिलकश रंगीन मछलियों की सैरगाह रही होगी । हो सकता है लम्बी-लम्बी ईल मछलियों की पनाहगाह रही हों या शिकारी ऑक्टोपस की शिकारगाह । आज यह ज़मीन से ऊपर है; हमारी सैरगाह बनी हुई । कितने लोगों की रोज़ी-रोटी बनी हुई । कितनी अजीब बात है ? वैसे भी यह सारा ही द्वीप समूह मूंगा चट्टानो की ही श्रृंखला है । इन टापुओं का ज़मीनी पानी भी चूने का स्वाद देता है । मैने पोर्ट्ब्लेयर मे यह पानी चखा था जब एक इलाके से गुज़रते हुये, सड़क किनारे एक चाय दुकान के सामने गाड़ी रुकवाकर मैने यहां की चाय पी और एक या दो घूंट यहां का पानी पिया था; जबकि लोगों से चेतावनी भी मिलि थी कि यहां का पानी बिलकुल न पीना । लेकिन आप कहीं जायें और वहां के आम जनजीवन को न जाने न समझें तो आपका सफ़र तो अधूरा ही समझो । खैर !

 

यहां से हम उसी रास्ते वापस जेट्टी पर वापस लौटे । यहां हमने एक स्थानीय होटल मे दोपहर का भोजन किया । दरअसल यह कोई नियमित होटल नहीं थी बल्कि किसी परिवार का झोपड़ीनुमा छोटा सा घर था, जिसमे कुछ टेबल और बेंच वगैरह थे और घर के लोग मेहमानो के आने पर उनके लिये खाना पका देते थे । हमारे खाने का यहीं इन्तेज़ाम हो गया । खाना एकदम सादा था और मेरे परिवार को बड़ा पसन्द आया । मेरे लिये ? ठीक ठाक था ।

यहां से खाना खाने के बाद हमे जीप से आगे जंगल की ओर जाना था; मड वाल्केनो देखने । ज्वालामुखी तो मै जानता था, वह जब फ़टता है तो लावा उगलता है । उर्दू मे भी उसका नाम वही होता है आतिशफ़िशां । दोनो नाम सार्थक है । फ़िर यह कौनसा ज्वालामुखी है जो कीचड़ उगलता है । फ़िर उसे ज्वालामुखी तो नही कहा जा सकता । जैसे कीचड़ वाला ज्वालामुखी । पता नहीं यह कैसा होगा । जो भी हो हम लोग जीप से वहां पहूंचे । यह एक वीरान जंगल था जहां आदम न आदमज़ाद कोई । बस एक सुनसान सकरी सड़क थी जो जंगल के बीच से चुपचाप खामोशी से रेंगती हुई गुज़र रही थी । रास्ते भर हमारी गाड़ी के सिवा दो जीप ही और दिखाई दी थी जो टूरिस्टों को लेकर वापस आ रही थी । हम जहां उतरे वहां हमारी बांई ओर हरे जंगल की चादर ओढ़े एक पहाड़ खड़ा था । एक पगडंडी थी जो पहाड़ से नीचे उतर रही थी; जिससे होकर कुछ टूरिस्ट नीचे की तरफ़ आ रहे थे । पगडंडी के मुहाने पर एक आदमी ज़मीन पर एक मटका रखे बैठा था । कुछ टूरिस्ट बच्चे उसके पास से कुल्फ़ी खरीदकर खा रहे थे । अच्छा तो यह मटका कुल्फ़ी बेच रहा है । लेकिन यह आया कहां से होगा ? दूर-दूर तक तो जंगल ही जंगल है । खैर ! हम लोग यहां से पैदल ऊपर की तरफ़ चले । बहुत ज़्यादह नहीं चढ़ना पड़ा । कुछेक बांस गाड़कर एक हल्का सा घेरा खीच दिया गया था । बीच मे बुड़-बुड़ करते हुये बुलबुलों की तरह हौले-हौले कीचड़ निकल कर आस-पास फ़ैल रहा था । जैसे जिस्म पर कोई फ़ोड़ा हो और अभी बस मवाद निकल रहा हो, खून निकलना अभी बाकी हो । यहां कीचड़ ही क्योंकर निकलता था इस किस्म के सवाल तो ज़ेहन मे उठ रहे थे, जिनके जवाब की तफ़सीर की यहां गुंजाइश नहीं यह अंदाज़े लगाने का काम वैज्ञानिकों पर छोड़ देना बेहतर समझता हूं; लेकिन सचमुच वहां कीचड़ उगलने वाला ज्वालामुखी मौजूद था । लेकिन बाद मे पता चला यहां आस-पास के किसी द्वीप पर ज़िन्दा ज्वालामुखी भी है । हमारी यात्रा के कुछ साल बाद किसी द्वीप पर ज्वालामुखी फ़टने की खबर भी आई थी । वैसे बताया जाता है कि यह सारा द्वीपसमूह ज्वसलामुखी पट्टी मे ही आता है । और वैसे भी यहां समुद्रतल मे ज्वालामुखी फ़टने का ही परिणाम ही था; सूनामी ।

 

आस-पास भी जंगल के सिवा और देखने के लिये कुछ नहीं था । हर तरफ़ सन्नाटा था । ज़्यादह देर रुकने की कोई वजह थी नही । सो थोड़ी देर मे नीचे का रुख किया । अभी हम पूरी तरह नीचे उतरे भी नहीं थे कि विपरीत दिशा से एक बस आई और वह मटका कुल्फ़ी वाला जल्दी से अपना मटका लेकर बस मे चढ़ गया । बस चल दी । वैसे समय इतना भी ज़्यादह नही हुआ था । दुकान समेटने का समय तो बिल्कुल भी नहीं । हो सकता है इस रूट की यह आखरी बस हो । यह मेरा अंदाज़ ही है सिर्फ़ । हमारा भी यह आज का आखरी स्पॉट था । यहां से बस वापसी का सफ़र शुरू होता है - - -

 

वापसी मे कई बार बारिश और कई बार धूप मिली । लोगों ने बताया यहां बारिश का कोई भरोसा नहीं होता कभी भी बरस जाती है और कभी भी खुला मौसम । जब हम जिरगाटांग वापस पहुंचे तो मौसम खुशनुमा था । बारिश होकर थम चुकी थी और मुलायम सी धूप जहां को रौशन किये थी । यहां चेकपोस्ट की औपचारिकता पूरी करने मे वक्त लगता है । हम लोग बस से नीचे उतर कर टहलने लगे । धीरे धीरे शाम होने लगी पास ही सड़क के किनारे के मंदिर की घंटियाँ बजने लगी और फ़िर आरती की आवाज़ से सारा समा खुशगवार लगने लगा ।

अपने स्टॉप पर उतरे तो रात हो चुकी थी । दिलो दिमाग पर थकान हावी होने लगी थी । हम लोगो ने वहीं मार्केट से कुछ केक और खाने के सूखे आईटम खरीद लिये और तय किया कि यही खाकर आराम करेंगे ।

हम आराम कर रहे थे । सामने के टैरेस मे कुर्सियों पर पसर कर, सामंदर की तरफ़ मुंह किये पड़े थे । अंधेरे मे समंदर पर कुछेक चिराग से तैरते नज़र आ रहे थे । वे नावें होंगी जो अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रही होंगी । ऐसे मे ही वे लोग आ पहुंचे । हमारे टूर ऑप्रेटर्स । ऐसे मे उनका आना मौत के फ़रिश्तों की आमद की तरह नागवार लगा । लेकिन कल का प्रोग्राम जो डिस्कस करना था । बातचीत के दर्मियान किसी तरफ़ से पप्पू भाई का ज़िक्र निकल आया । याद नहीं किसकी तरफ़ से लेकिन वे लोग पूछने लगे “आप जानते हैं - - - ?”

“हाँ,” मैने कहा “हम लोग पड़ोसी हैं ।“

 

पप्पू भाई वही एजेंट जिससे मैने टिकटें करवाई थीं । वे न सिर्फ़ उस समय मेरे पड़ोसी थे बल्कि हम दोनो यहां से पहले सेक्टर-1 मे रहते थे ।

मेरे जवाब पर वे लोग एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे । फ़िर राजेश ने जो उनका मुखिया था दुबारा मुझसे पूछा- “आप पप्पू भाई को जानते हैं ?” इसमे हैरानी की क्या बात थी, मै समझ नही पा रहा था । तभी उसने फ़ोन लगाया और पप्पू भाई से बात करवाई । मुझसे बात करने के बाद उसने फ़िर राजेश से बात की । पता नहीं उनके दर्मियान क्या बातें हो रही थीं लेकिन राजेश के चेहरे का रंग उड़ने लगा । फ़िर वे सामन्य हो गये, लेकिन इस बातचीत का नतीजा दूसरे दिन मेरे सामने आया ।

 

-- भाग 3 पढ़ें 18 अक्टूबर को

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags