... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

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क्षमा के बारे में मुझे पहले ही इतना कुछ बता दिया गया था कि मैं भीतर ही भीतर कुछ डरा हुआ सा था. यदि आपकी टीम में कोई ऐसा सदस्य हो जिसके बारे में कोई भी अच्छा न बोलता हो तो मन में अजीब-अजीब से ख्याल आना स्वाभाविक ही है. मैंने इस ऑफिस में ज्वाइन करने के साथ ही सबसे पहले अपने मन का डर निकालने का निश्चय किया और क्षमा को बुला भेजा. थोड़ी देर में केबिन के दरवाजे पर ठक-ठक हुई तो मैंने उधर बिना देखे ही कहा – “अंदर आ जाओ.“

मैं जानबूझ कर फाइल पलट रहा था. वह अंदर आकर मेरी टेबल के सामने खड़ी हो गई. कुछ क्षण यही स्थिति बनी रही तो वह बोली - “अगर आप व्यस्त हैं तो मैं बाद में आ जाती हूं. वैसे आपने ही बुलाया था मुझे” - उसके स्वर में चिड़चिड़ाहट थी.

मैंने तुरंत ही अपने हाथ की फाइल मेज पर रखते हुए कहा था – “हां, मैंने ही बुलाया है आपको. बस जरा यह अर्जेंट फाइल देख रहा था. आप खड़ी क्यों हैं, बैठिए.“

उसने सामने पड़ी कुर्सी खींची और उस पर बैठते हुए बोली – “बताइये, क्या काम है?”

मैंने एक भरपूर नजर उस पर डाली. यही कोई तीस-बत्तीस की उम्र की साधारण कद-काठी और सामान्य शक्ल-सूरत वाली एक महिला मेरे सामने बैठी सीधे मेरी आंखों में झांक रही थी. उसके बारे में कही गई सारी बातें मेरे जेहन में घूम गईं. मैंने अपने स्वर को यथासंभव मुलायम रखते हुए कहा – “नया आया हूं यहां. आपसे परिचय करने और आपके काम के बारे में पूछने के लिए बुलाया है आपको.“

उसने अजीब सी नजरों से मुझे देखा था और कहा था – “इस ऑफिस में बाईस-तेईस लोग काम करते हैं. आपने किसी और को क्यों नहीं बुलाया परिचय करने या  काम पूछने के लिए? मैं तो यहां सबसे छोटे ग्रेड की ऑफीसर हूं, मुझे ही क्यों यह सम्मान दे रहे हैं आप?”

उसके सवाल का एकाएक कोई जवाब नहीं सूझा था मुझे. मैंने अपनी झेंप छुपाते हुए कहा था – “किसी न किसी से तो शुरूआत करनी ही थी ना. जिस किसी को भी बुलाता उस के मन में शायद यही सवाल उठता.“

उसने असहमति में सिर हिलाया और कहा – “खैर, इस बात को जाने दीजिए. मेरा नाम तो आपको पता ही है. कुछ लोगों ने मेरे बारे में पहले ही आपको बहुत कुछ बता ही दिया होगा. फिर वह अपनी डेस्क के काम के बारे में विस्तार से जानकारी देती रही. उसने यह भी बताया कि कौन सा काम पेंडिंग पड़ा है और क्यों तथा वह उसे निपटाने के लिए क्या कर रही है.

अपने काम के बारे में उसकी गहरी समझ और उसे निपटाने के लिए उसकी प्रतिबद्धता देख कर मैं बहुत प्रभावित हुआ. मैंने इसके लिए उसकी तारीफ करते हुए उसे ‘थैंक्स’ कहा. वह भी ‘वेलकम’ कह कर चली गई.

उसने जिस आक्रामक ढ़ंग से बात की थी, उससे मैं उन बातों पर विश्वास करने के लिए बाध्य हो गया जो लोग उसके बारे में करते थे. लोग कहते थे कि वह महिला होने का जम कर लाभ उठाती है. वह हर मामले को महिलाओं के अपमान से जोड़ देती है. उससे कोई मजाक में भी कुछ कह देता है तो वह उसका माजना झाड़ने में जरा भी संकोच नहीं करती. वह जरा-जरा सी बात पर किसी से भी लड़ने-मरने को तैयार हो जाती है.

खुद के लिए ही नहीं, किसी भी महिला के बचाव में वह खुल कर खड़ी हो जाती है और फिर किसी भी हद तक जा सकती है. उसने कई बार हंगामा खड़ा किया है, महिलाओं की अगुवाई करते हुए धरने दिए हैं. जरा-जरा सी बात पर ऊपर तक शिकायत की है. पुलिस तक भी मामले लेकर पहुंच जाती है. लोग बताते हैं कि  वह कई बार लोगों पर हाथ भी उठा चुकी है.

एक बार उससे किसी ने यूं ही पूछ लिया था – “क्षमा, अभी तक तुमने शादी क्यों नहीं की?” उसने पलट कर उससे पूछा था – “मेरी शादी को लेकर इतना क्यों परेशान है? तू करेगा मुझसे शादी? अपनी बीबी से पूछ कर आया है या मैं बताऊं जाकर?” वह आदमी इतना डर गया था कि उसने उससे माफी मांग कर निकल जाने में ही भलाई समझी थी. उसके बाद फिर किसी ने भी उससे यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की थी. मैंने भी सोच लिया कि इस औरत से जितना हो सकेगा, दूर रहूंगा. पता नहीं, बेकार में कब कोई इल्जाम लगा दे और इज्जत का कचरा करने के साथ नौकरी को भी खतरे में डाल दे.

कुछ ही समय में पूरे स्टाफ के साथ मेरा परिवार जैसा रिश्ता बन गया था. ज्यादातर लोग मेहनत और ईमानदारी से अपना काम करते थे. क्षमा भी उनमें से एक थी. उससे काम के सिलसिले में ही बात होती. पर, उस दिन वह दनदनाती हुई मेरे केबिन में आई और ऊंची आवाज में बोली – “वह जो नई लड़की आई है ना उमा, उसे हर्षद जी बहुत परेशान कर रहे हैं. वह बहुत परेशान हो चुकी है. या तो आप उन्हें समझा दें या फिर मैं अपने स्टाइल में उन्हें अच्छी तरह समझा दूंगी.“

मैंने उसे शांत करते हुए कहा – “क्षमा जी, मुझे भी कोई बदतमीजी मंजूर नहीं है. आप यहीं बैठिए, आपके सामने ही इस मामले को खत्म कर देते हैं. मैंने चपरासी के मार्फत उमा और हर्षद दोनों को बुला भेजा. उमा आते ही रोने लगी थी. हर्षद आया तो केबिन में उमा और क्षमा दोनों को देख कर सहम गया और चुपचाप खड़ा हो गया. मैंने उमा से पूरा मामला पूछा तो उसने बताया कि हर्षद जी कई बार कह चुके हैं कि नई आई हो, काम सीखने के लिए मेरे घर आ जाया करो. आज तो हद हो गई जब मैं इन्हें फाइल देने गई तो इन्होंने फाइल लेते समय मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं बहुत डर गई थी. मुझे रोता देख कर क्षमा जी ने जब मुझसे पूछा तो मैंने इन्हें सबकुछ बता दिया.

मैंने हर्षद की ओर देखा वह सिर झुकाए खड़ा था. साफ था कि ऐसा जरूर कुछ हुआ था जिसकी वजह से वह किसी से भी आंखें नहीं मिला पा रहा था. तभी क्षमा यह कहते हुए क्रोध में भर कर उठी कि – “ऐसे आदमी के तो जूते पड़ने चाहिए.“ वह पैर से चप्पल निकालने लगी. मैंने बड़ी मुश्कल से उसे शांत किया. मेरे कहने पर हर्षद ने उमा से हाथ जोड़ कर माफी मांगी और मामला वहीं समाप्त हो गया.

कुछ दिन बाद क्षमा किसी काम से मेरे पास आई तो बोली – “सर, उस दिन जिस तरह आपने मामले को सुलझाया, मुझे बहुत अच्छा लगा. नहीं तो, हमेशा ही ऐसे मामलों पर ज्यादातर चुप रहने, मामले को लंबा खींचने, कागजी कार्रवाई करने और लड़कियों को ही परेशान करने की नीति अपनाई जाती है. आपके इस एक्शन से सभी को बहुत अच्छा मैसेज गया है.“  मेरे चेहरे पर संतोष की एक छोटी सी मुस्कान उभर आई थी.

कई दिन से क्षमा ऑफिस नहीं आ रही थी. छुट्टी के लिए उसकी कोई अर्जी भी मेरी जानकारी में नहीं आई थी. मैंने उसके सेक्शन में पूछताछ की तो पता चला कि क्षमा की तबीयत ठीक नहीं थी. उसके साथ काम करने वाली मिसेज़ शीतल ने बताया कि अपने क्वार्टर में क्षमा अकेली ही रहती है. उसकी मां करीब सात साल पहले गुजर गई थीं. उसके पिता अपनी सबसे बड़ी बेटी के साथ यूएस में रह रहे थे. क्षमा के कोई भाई नहीं था, तीन बहनों में वह सबसे छोटी थी. दोनों बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी और उसने खुद शादी नहीं की थी, इसलिए वह अकेली ही रहती थी. मैंने पूछा था – “तो बीमारी में उसे कोई देखने वाला नहीं है?”

“ऐसी बात नहीं है सर, हम में से कोई न कोई उसके घर बारी-बारी से जाता रहता है. फिर, उमा तो ऑफिस छूटने के बाद सीधे क्षमा के घर जाती है और रात भर उसके पास रहती है, वह भी तो यहां अकेली ही है ना.“

“मिसेज़ शीतल आप क्षमा से पूछ लो, अगर उसे कोई ऐतराज न हो तो मैं भी उसका हालचाल पूछने उसके घर जाना चाहूंगा. इंचार्ज के नाते मेरा फर्ज बनता है, यह.“

“इसमें पूछने की क्या बात है, सर. आज उसे देखने जाने की मेरी बारी है. आप ऑफिस के बाद मेरे साथ चल सकते हैं. फिर उमा भी वहां होगी.“

हम जब शाम को क्षमा के घर पहुंचे तो मुझे देख कर उसे जरा भी हैरानी नहीं हुईं. शायद उसे किसी ने बता दिया था कि मैं उसे देखने आ रहा हूं. उसकी तबीयत बेहतर नजर आ रही थी. वह पलंग पर तकिए के सहारे बैठी हुई थी. मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए उसने कहा – “आपको तकलीफ करने की क्या जरूरत थी. मैं अब पहले से बहुत ठीक हूं. पता नहीं बुखार उतर ही नहीं रहा था. अब दो दिन से बुखार नहीं है. थोड़ी कमजोरी है, वह भी ठीक हो जाएगी. मैं सोचती हूं सोमवार से ऑफिस आने लगूं.“

“देखिए, तकलीफ की कोई बात नहीं है. हम साथ काम करते हैं और एक परिवार की तरह हैं. मैं इस परिवार का मुखिया हूं. मुझे तो सबके सुख-दु:ख का ख्याल रखना ही चाहिए. मिसेज़ शीतल यहां आ रही थीं, मैं भी उनके साथ चला आया. कुछ गलत किया क्या मैंने?”

“नहीं, नहीं सर, मैं यह नहीं कह रही. पहली बार आप घर आए हैं और मैं आपकी कुछ खातिरदारी भी नहीं कर पा रही.“

“क्यों चिंता कर रही हो खातिरदारी की.“ चाय और नाश्ता मेज पर रखते हुए मिसेज़ शीतल ने कहा था.  पता नहीं वह कब चाय बनाने किचन में चली गई थीं.

चाय पीते हुए मैंने कमरे में इधर-उधर नजर दौड़ाई. एक आलमारी में बहुत से शील्ड और कप सजा कर रखे हुए थे. मैंने उनकी ओर इशारा किया और पूछा कि ये किसके हैं तो पता चला कि कई स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर क्षमा ने उन्हें जीता था. फोटोग्राफी और पेंटिंग उसके खास शौक थे. उसकी बनाई पेंटिंग देख कर  मैं दंग रह गया. वे इतनी लाजवाब थीं कि लगता था किसी म्यूजियम से लाकर वहां रख दी गई हों. फोटोग्राफी की एलबम भी हैरान कर देने वाली थीं. उसकी इस असाधारण प्रतिभा को देख कर मैं स्तंभित रह गया था. मेरे मुंह से अनायास निकल गया था – “क्षमा जी, अगर मैं यहां नहीं आता तो आपके इस अद्भुत टेलेंट का तो पता ही नहीं चलता.“

“आप भी सर,...... ये तो बस मेरा शौक है और खाली समय गुजारने का साधन” – एक फीकी मुस्कराहट उसके होंठों पर खेल गई थी.

अगले सोमवार से उसने ऑफिस आना शुरू कर दिया था. उसी दिन मैंने स्टाफ की एक अर्जेंट बैठक बुलाई हुई थी. हैडऑफिस से आए एक आदेश के अनुसार हमें अपने इलाके के किसी एक गांव की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर पन्द्रह दिन के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट भेजनी थी. चर्चा के दौरान क्षमा ने कहा कि उसका छोटा सा गांव इसके लिए ठीक रहेगा. सड़क के रास्ते वह केवल एक घंटे की दूरी पर था और वहां ज्यादातर समाज के कमजोर और पिछड़े वर्ग के लोग रहते थे. उसके प्रस्ताव पर सभी ने सहमति जताई और यह तय हुआ कि मेरे सहित पांच स्टाफ सदस्यों की एक टीम क्षमा के गांव जाएगी और दो दिन वहां रुक कर वापस लौट आएगी.

फिल्मों में जैसा देखते आए हैं, वैसा ही गांव था वह. कुछ पक्के मकानों को छोड़कर ज्यादातर कच्चे झोंपड़े थे. गांव से लग कर एक बरसाती नदी बहती थी. छोटे-छोटे खेत चारों ओर फैले हुए थे. सहकारी बैंक की एक शाखा भी थी और पांचवीं तक का तीन कमरों वाला स्कूल भी था. पंचायत भवन और गांव की चौपाल भी थी. रास्तों की कीचड़ और गोबर में चलते लोग, मवेशी और खेलते बच्चे थे, जोहड़ के पानी में कमर तक डूबी सुस्ताती भैंसे थीं. गरीबी के बोझ से झुके कंधे थे और फटेहाल लोगों के मायूस चेहरे थे.

क्षमा का परिवार गांव के संपन्न परिवारों में से एक था. उनका हवेली जैसा मकान बंद पड़ा था. उसकी साफ-सफाई करा कर उसने हम लोगों के ठहरने का इंतजाम कर दिया था. गांव की कुछ औरतों ने खाना बनाने का काम संभाल लिया था और बहुत सी छोटी बच्चियों ने क्षमा दीदी को घेर लिया था. क्षमा उनसे उनकी पढ़ाई के बारे में, उनकी जरूरतों के बारे में पूछताछ कर रही थी. वे सारी बच्चियां क्षमा के बताने पर कोई भी काम करने के लिए उसके आगे-पीछे घूम रही थीं. मैंने उससे कहा था – “वाह क्षमा जी, आप तो यहां बहुत लोकप्रिय हो, क्या जादू कर रखा है इन सब पर?” वह हंस कर बोली थी – “मेरे अपने गांव के लोग हैं, बस मुझे मान देते हैं, और क्या?”

हमारे काम के सिलसिले में इंतजाम करने जब क्षमा घर से बाहर गई हुई थी तब मेरी बात उन औरतों और बच्चियों से हुई थी. जो कुछ उन्होंने बताया वह मुझे हैरान करने के लिए काफी था. क्षमा गांव के उन कुछ गरीब घरों की बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई और उनकी जरूरतों का पूरा खर्च उठा रही थी जो यह खर्च नहीं उठा सकते थे. उनके लिए क्षमा देवी जैसी थी. उसकी सहायता से गांव की कुछ लड़कियां पांचवी से आगे की पढ़ाई भी पास के कस्बे में जाकर कर रही थीं. क्या है क्षमा, मैं उसे समझ नहीं पा रहा था.

हमारा काम खत्म हो चुका था. अगले दिन सुबह ही हमें वापस लौट जाना था. सभी थके-मांदे बिस्तरों पर पड़े थे. लेकिन, मैं मन ही मन क्षमा के इस रूप को लेकर उलझा हुआ था. तभी क्षमा ने कमरे में झांक कर पूछा था – “सर, चाय बनवाऊं आपके लिए?”

“नहीं चाय पीने का बिलकुल मन नहीं है. हां, सोच रहा हूं गांव का एक चक्कर लगा आऊं. कल सुबह तो यहां से निकल ही जाना है.“

“मालती, सोम और हरीश तो थक कर बिस्तरों में लुढ़के पड़े हैं. चलिए, मैं आपको गांव की सबसे अच्छी और रिफ्रेशिंग जगह ले चलती हूं.“

थोड़ी ही देर में हम उस पतली सी नदी के किनारे खड़े थे जहां सचमुच अद्भुत शांति थी और दूर तक फैली हरी-भरी पहाड़ियां आंखों और मन दोनों को तृप्त कर रही थीं. उस नजारे को थोड़ी देर निहारने के बाद हम नदी किनारे पड़े बड़े पत्थरों पर जाकर बैठ गए. मेरे मन में न जाने कब से जो कुछ घुमड़ रहा था, वह अवसर  पाकर बाहर निकल आया – “क्षमा जी, मेरी उन औरतों और बच्चियों से बात हुई थी. वे सभी आपको देवी क्यों मानते हैं, यह भी पता चला. आपका एक दूसरा ही रूप उभर कर आया है, मेरे सामने. समझ नहीं पा रहा हूं कि यह सही है या फिर वह जिसे ज्यादातर लोग जानते हैं. आपको तो झगड़ालू, हृदयहीन और महिलामुक्ति मोर्चे की झंडावरदार के तौर पर ही जाना जाता है. क्या मुझे इसकी वजह बता सकती हैं आप?”

क्षमा ने विस्मय से मेरी ओर देखा था  और उठते हुए कहा था – “चलिए, चलते हैं.“

“नहीं क्षमा जी, मैं आपका जवाब सुन कर ही उठूंगा यहां से.“

“देखिए सर, आप एक अच्छे इंसान हैं इसलिए यहां तक मैं अकेली आपके साथ चली आई हूं. पर, मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में झांकने का अधिकार किसी को भी नहीं दिया है. फिर आप भी तो पुरुष हैं, मेरी बात समझ नहीं सकेंगे आप.“

“देखिए क्षमा जी, आप मेरे लिए मेरी छोटी बहन जैसी हैं. मैं सचमुच आपको सही रूप में समझना चाहता हूं. क्यों दिखती है क्षमा वैसी, जैसी वह है नहीं.“

क्षमा वापस उस पत्थर पर बैठ गई थी. बहुत देर तक वह चुपचाप बैठी रही, फिर उसने कहना शुरू किया – “मुझे अंदर से नफरत है उन पुरुषों से जिन्होंने स्त्री को इतना मजबूर और हेय बना दिया है. यह नफरत तो उसी दिन पैदा हो गई थी, जब मेरी मां ने मुझे बताया था कि पहली बेटी होने पर मेरे बाप ने प्रायश्चित के तौर पर एक रोटी कम खाई थी, दूसरी बेटी होने पर उन्होंने दो रोटियां कम खाई थीं और तीसरी बेटी याने कि मेरे पैदा होने पर उन्होंने पूरे दिन खाना नहीं खाया था. मेरी मां उन्हें बेटा न दे पाने के गम में अपनी पूरी जिंदगी नहीं जी पाई. बेटियां क्या इंसान नहीं होतीं? क्या वे अपने मां-बाप से प्यार नहीं करतीं? क्या वे उनकी देखभाल नहीं करतीं? क्या बेटी पैदा होना गुनाह है, जिसका प्रायश्चित किया जाना चाहिए?”

“मां के असमय गुजर जाने के बाद हम तीनों बहनें घर में अकेले रह गए थे. बाबूजी ने वैसे तो पिता के सभी कर्तव्य निभाए, हमें पढ़ाया-लिखाया और किसी चीज की कमी नहीं होने दी. पर, हम उनका प्यार पाने के लिए तरसते रहे, सिर्फ इसलिए कि हम बेटे नहीं बेटियां थीं.

थोड़ी बड़ी हुई तो पुरुष का एक और घिनौना चेहरा सामने आया. हमारे घर का नौकर एक रात मेरी खाट पर आकर सो गया. उसकी हरकतों से मैं जाग गई. मैंने हल्ला मचा दिया तो वह भाग गया और फिर कभी वापस नहीं लौटा. बाद में मेरी  बहनों ने बताया कि उसने उनके साथ भी वैसी ही हरकत करने की कोशिश की थी. पर वह सफल नहीं हो पाया था. और सुनना चाहेंगे आप?  मैं कुछ दिन के लिए अपनी बुआ के घर गई थी. जिन्हें मैं फूफाजी कहती थी और जो मुझसे उम्र में बीस वर्ष बड़े थे, उन्होंने भी मुझे अपनी बच्ची नहीं, बल्कि बस एक मादा ही समझा. जब मैंने बुआ को सबकुछ बताने की धमकी दी तो वे मेरे पैरों पर गिर कर माफी मांगने लगे. उनके मुंह पर थूक कर मैं सुबह होते ही वहां से चली आई.

इस सबके बावजूद कॉलेज के दिनों में मैं कब हेमंत को चाहने लगी थी, मुझे पता ही नहीं चला. प्यार तो पवित्र होता है ना? यही सोच कर मैंने पूरी तरह उस व्यक्ति से अपने को बांध लिया था जो मुझे प्यार करने, शादी करने और जीवन भर साथ निभाने के सुखद सपने दिखाता रहा था. लेकिन, कॉलेज छोड़कर जाने के बाद उसने कभी पलट कर भी नहीं देखा. मैं बहुत रोई थी. फिर मैंने सोचा, ऐसे लोगों के लिए क्या रोना. मुझे मजबूत बनना होगा. पुरुषों की इस दुनिया से डरने की जगह उससे लोहा लेना होगा.

शादी करने का तो कोई सवाल ही नहीं था. लेकिन, अकेले रहना भी कोई आसान काम नहीं है. जाना-अनजाना हर कोई पुरुष यह मानता है कि अकेली रहने वाली स्त्री उसके लिए उपलब्ध है. क्या आप मेरी इस बात पर विश्वास करेंगे कि कंपनी की कॉलोनी में कंपनी के क्वार्टर में रहते हुए भी लोग आधी रात में मेरे घर की घंटी बजा जाते थे. बस वहीं से मैंने चंडी रूप धर लिया. अपने लिए ही नहीं, उन सभी महिलाओं के लिए भी जिन्हें पुरुष अपनी हैवानियत दिखाने से बाज नहीं आते. सच कहूं यह झगड़ालू रूप अपनाने के बाद मुझे बहुत सुकून मिला है. लोग मुझसे दूर रहने में ही अपना भला समझने लगे हैं. अब रात में कोई मेरे घर की घंटी नहीं बजाता. किसी की भी हिम्मत नहीं होती कि वे मेरे साथ या मेरे आसपास की महिलाओं को बेजा रूप से तंग कर सकें.

रही मेरे गांव की इन बच्चियों की बात. आप उनकी दुर्दशा का अंदाजा भी नहीं लगा सकते. उन्हें जिंदा रहने दिया जाता है, यही उनके लिए बहुत बड़ी बात है. मैं जानती हूं, थोड़ा पढ़-लिख जाने पर उनमें एक चेतना आएगी और वे अपने प्रति  दुर्व्यवहार का प्रतिकार करने की सोच सकेंगी. मुझे यह भी पता है कि मैं अपनी सीमित क्षमता के दायरे में उनके लिए जो कुछ कर रही हूं, वह सागर में एक बूंद के बराबर है. पर थोड़ा ही सही, कुछ तो कर पा रही हूं, इससे मुझे संतोष मिलता है. मुझे देवी कहलाने का कोई शौक नहीं है, बस मैं उनमें समाज की इस विकृति से लड़ने की ताकत जगाना चाहती हूं. एक सांस में यह सब बताने के बाद वह कुछ क्षण के लिए रुकी थी और फिर बोली थी - और कुछ जानना चाहते हैं आप?”

मैं कुछ भी नहीं बोल पा रहा था. सोच रहा था, काश सिक्के का दूसरा पहलू भी मैं  लोगों के सामने ला पाता.

 

डॉ रमाकांत शर्मा का परिचय

मेरा जन्म 10 मई 1950 को भरतपुर, राजस्थान में हुआ था. लेकिन, पिताजी की सर्विस के कारण बचपन अलवर में गुजरा. घर में पढ़ने पढ़ाने का महौल था. मेरी दादी को पढ़ने का इतना शौक था कि वे दिन में दो-दो किताबें/पत्रिकाएं खत्म कर देती थीं. इस शौक के कारण उन्हें इतनी कहानियां याद थीं कि वे हर बार हमें नई कहानियां सुनातीं. उन्हीं से मुझे पढ़ने का चस्का लगा. बहुत छोटी उम्र में ही मैंने प्रेमचंद, शरत चंद्र आदि का साहित्य पढ़ डाला था. पिताजी भी सरकारी नौकरी की व्यस्तता में से समय निकाल कर कहानी, कविता, गज़ल, आदि लिखते रहते थे.

ग्यारह वर्ष की उम्र में मैंने पहली कहानी घर का अखबार  लिखी जो उस समय की बच्चों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका पराग  में छपी. इसने मुझे मेरे अंदर के लेखक से परिचय कराया. बहुत समय तक मैं बच्चों के लिए लिखता और छपता रहा. लेकिन, कुछ घटनाओं और बातों ने अंदर तक इस प्रकार छुआ कि मैं बड़ों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों  जैसा कुछ लिखने लगा. पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं और कुछ पुरस्कार भी मिले तो लिखने का उत्साह बना रहा. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का भी पुरस्कार मिला. कहानियां लिखने का यह सिलसिला जारी है. अब तक दो कहानी संग्रह – नया लिहाफा और अचानक कुछ नहीं होता  प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरा संग्रह भीतर दबा सच  प्रकाशनाधीन है. कहानियां लिखने के अलावा व्यंग्य लेख और कविताएं भी लिखता रहता हूं.

हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने मन की बात करता है, अपने अनुभवों, अपने सुख-दु:ख को बांटता है. कहानी इसके लिए सशक्त माध्यम है. रोजमर्रा की कोई भी बात जो दिल को छू जाती है, कहानी बन जाती है. मेरा यह मानना है कि जब तक कोई कहानी आपके दिल को नहीं छूती और मानवीय संवेदनाएं नहीं जगा पाती, उसका आकार लेना निरर्थक हो जाता है. जब कोई मेरी कहानी पढ़कर मुझे सिर्फ यह बताने के लिए फोन करता है या अपना कीमती समय निकाल कर ढ़ूंढ़ता हुआ मिलने चला आता है कि कहानी ने उसे भीतर तक छुआ है तो मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती है. यही बात मुझे और लिखने के लिए प्रेरणा देती है और आगे भी देती रहेगी.

नौकरी के नौ वर्ष जयपुर में और 31 वर्ष मुंबई में निकले. भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय कार्यालय, मुंबई से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद अब मैं पूरी तरह से लेखन के प्रति समर्पित हूं.

ई-मेल  – rks.mun@gmail.com

मोबाइल 9833443274

402-श्रीरामनिवास, टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी, पेस्तम सागर रोड नं.3, चेम्बूर, मुंबई – 400089

 

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