... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

जीवन के आंचल में

रविवार की सुबह बालकनी में बैठकर झमाझम बारिश का लुत्फ़ उठाते हुए आंचल चाय की चुस्की ले ही रही थीं कि अचानक उन्हें अपने बाल आश्रम की सात वर्षीय रोशनी का आज जन्मदिन होने की बात याद आ गयी। यदि आॅफिस की कोई बात होती तो आंचल शायद ही संडे के इतने खूबसूरत नज़ारे को बीच में छोड़कर वहाँ से उठतीं, पर स्वभाव से अति संवेदनशील आंचल किसी के जन्मदिन को इस तरह दरकिनार कैसे कर सकती थीं। वह भी तब जब जन्मदिन उनके चिल्ड्रेन होम के किसी बच्चे का हो! वो तुरंत उठीं और तैयार होकर बाहर निकल ही रहीं थीं कि इतने में उनके घर की डोर बेल बज उठी।

 

'अरे, प्रतिमा! क्या बात है मैडम! इतने सालों बाद आज! कैसे याद किया?' आंचल अपने काॅलेज की सहेली को इतने सालों के पश्चात देखकर खुश होने के साथ-साथ थोड़ी हैरान भी हुईं।

'अब शहर की जानी-मानी हस्ती को कौन याद नहीं करेगा भला?' प्रतिमा ने गले मिलते हुए हँसकर जवाब दिया। आँचल भी हँस पड़ीं सुनकर।

'अच्छा मज़ाक है! जानी-मानी हस्ती और मैं!'

'और नहीं तो क्या? अब देखो, रविवार के दिन आम लोग छुट्टियां मनाते हैं पर तुम्हें देखकर ऐसा लग रहा है कि तुम आज भी काफ़ी व्यस्त हो। अब इतनी व्यस्तता तो किसी जानी-मानी हस्ती की ही हो सकती है!' प्रतिमा ने उतने ही उल्लास के साथ एक बार फिर जवाब दिया और आंचल उतनी ही बेतकल्लुफ़ी से एक बार फिर हँस पड़ीं।

'अरे नहीं, प्रतिमा। मैं आॅफिस नहीं जा रही थी। अपने चिल्ड्रेन होम जाने की तैयारी में लगी थी। वहाँ आज एक बच्ची का जन्मदिन है।'

 

उन्होंने कहा और फिर दोनों काॅलेज की सहेलियाँ सालों पहले की बातें बतियाने लगीं। निर्मला मैडम से मिलने वाली डाँट, काॅलेज जाने के नाम पर उन दोनों का चोरी-छुपे महीने में एक बार सिनेमा घर जाना, सतरंगी गैंग की नौटंकी देखकर उनपर कमेंट्स करके ठहाके लगाना और जाने क्या-क्या। जब स्कूल-काॅलेज की सहेलियाँ सालों बाद बातें करने बैठती हैं तो लगता है कि वक़्त अभी भी उसी जहग ठहरा हुआ है। उन दोनों को भी ऐसा ही लग रहा था। समय जैसे सचमुच 22 साल पीछे चला गया था। तभी आँचल के छोटे भाई अतुल की पत्नी वहाँ चाय और नाश्ता लेकर पहुँच गयी।  

 

'लेकिन आंचल, तुझे शादी कर लेनी चाहिए थी। पति, अपने बच्चे, अपना परिवार, इनकी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। ये चिल्ड्रेन होम खोलकर तूने भले ही महान काम किया हो पर सच तो ये है कि एक औरत की ज़िंदगी शादी के बिना अधूरी ही रहती है।' चाय की चुस्की लेते हुए प्रतिमा आत्मविश्वास से भरे स्वर में कहने लगी। आंचल ने कुछ क्षण उसे गौर से देखा पर बस मुस्कुराकर रह गयी। उसे लगा जैसे ये बात प्रतिमा नहीं, समाज की वह रूढ़िवादी मानसिकता कह रही है जो औरतों को सीमित दायरे में ही रखकर देखना चाहती है। विवाह, पुरुष और महिला, दोनों के लिए ही एक आवश्यक संस्था है, तो फिर क्यों केवल औरतों के जीवन की ही बात की जाती है? क्यों किसी पुरुष के चरित्र पर अंगुली नहीं उठती जब वह अपने शर्तों पर ज़िंदगी जीना चाहता है? क्यों कहा जाता है कि एक लड़की को अकेला जीवन शोभा नहीं देता?

 

प्रतिमा तो थोड़ी देर में वहाँ से चली गयी पर आंचल के अतीत के नब्ज़ को छूकर। वहीं सोफे पर बैठे-बैठे आंचल पुरानी बातों में खो गयीं.......

 

'देख बेटा, ये कह देना बहुत आसान है पर करना बहुत मुश्किल। तेरे लिए भले न हो पर मेरे लिए है। लोग क्या कहेंगे? कि मैंने अपने सुख के लिए अपनी बेटी का ब्याह नहीं किया?' अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुए, माँ ने तरह-तरह की दलीलें दी थीं आंचल के शादी न करने की बात के विरुद्ध। उन दिनों ट्यूमर से जूझ रहीं थीं माँ। पिता साल भर पहले ही सड़क हादसे में चल बसे थे। ऐसे में सारी ज़िम्मेदारी आंचल के कंधों पर आ गयी थी। बेपरवाह सी काॅलेज जाने वाली लड़की रातों रात कैसे इतनी शांत और गंभीर हो गयी, यह केवल वही समझ सकता है जिसने ज़िंदगी के तूफ़ान को अकेले पार किया हो। बिना किसी सहारे के।

'माँ, अभी जब तुम इतनी बीमार हो तो कितने लोग तुम्हें देखने के लिए आये? और तुम्हें अभी भी लोगों के कुछ कहने, ना कहने की पड़ी है?' माँ के कमज़ोर हाथ को अपने हाथों में लेते हुए आंचल ने जवाब दिया था।

'गाँव की ज़मीन बेचकर मेरी शादी करने की जो बात मौसा जी कर रहे हैं, उसे मैं नामंज़ूर करती हूँ। ज़मीन बिकेगी, पर तुम्हारे इलाज के लिए। और रही बात अतुल के पढ़ाई की तो उसकी सारी ज़िम्मेदारी मेरी।' आंचल ने दृढ़ स्वर में कहा था और जाने उसकी आवाज़ में ऐसा क्या था कि माँ की आधी परेशानियाँ जैसे समाप्त हो गयीं। काॅलेज ख़त्म होते ही आंचल ने एक नामी प्राइवेट फर्म में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी करनी शुरू कर दी  और अपने से 10 साल छोटे भाई की पढ़ाई के साथ-साथ बाकी सुविधाओं का भी ध्यान रखने लगी। जब व्यक्ति के पास संतोषजनक रूप से जीवन यापन करने के साधन कम हों या ना हों तो वह हर चीज़ की बहुत कद्र करने लगता है। फिर आंचल को तो ये नौकरी उस समय मिली थी जब वो और उसका छोटा सा परिवार अभाव में घिरे थे। वह दिन-रात अपने काम में मेहनत करती और उसकी मेहनत का फल जल्दी ही उसे अपनी पदोन्नति के रूप में मिला। वह फर्म की सीनियर मैनेजर बन चुकी थी। कुछ सालों बाद जब अतुल ने भी इंजीनियरिंग कर एक अच्छी नौकरी प्राप्त कर ली तो कभी-कभी फ़ुर्सत में आंचल को अपने संघर्ष के दिन याद आ जाते और वह अंदर-ही-अंदर मुस्कुरा उठती। सफ़लता प्राप्त कर लेने के पश्चात् व्यक्ति को अपने संघर्ष के दिन भी अच्छे लगने लगते हैं।

 

....... सोफ़े पर बैठीं आंचल के चेहरे में कोई गहरा भाव छुपा था। वो जैसे किसी सोच में डूब गयी थीं अचानक। ऐसा नहीं है कि कभी उन्होंने अपने लिए किसी साथी की कल्पना नहीं की। ऐसा नहीं है कि जीवन की काँटों से भरी राहों पर चलते हुए उनके मन में कभी यह ख़याल नहीं आया कि काश! कोई हमसफ़र होता। पर उन्हें कभी कोई ऐसा मिला नहीं जो उन्हें उनकी जिम्मेदारियों के साथ स्वीकार करे। तो क्या वह सचमुच अकेली रह गयीं? अधूरी? क्या जीवन को अपने अनुसार जीने पर एक स्त्री को केवल अपूर्णता ही प्राप्त होती है? आंचल जैसे आज व्याकुल हो उठी थीं। आँखों में आँसू भर आए थे। पर अगले ही क्षण बगल के कमरे से आती उनकी 63 वर्षीय माँ और अतुल के बेटे आश्रय की हँसी उनके कानों में गूँज उठी। अपने आँसू पोछते हुए आंचल अपने चिल्ड्रेन होम, 'आंचल: बाल आश्रम' जाने के लिए घर से निकल गयीं। आज उनके आंचल में बड़ी हो रही छोटी सी रोशनी का जन्मदिन जो था।

 

 

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