... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

भागने के रास्ते

भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित ये कहानी 15 जुलाई 2012 सरिता (दिल्ली प्रैस) में प्रकाशित हुई थी

 

1.उन दिनों हम ऊटी में रहते थे. एक शाम मेरे पति, राम, मेरी दस वर्षीय बेटी, प्रियम्वदा के साथ कहीं से वापस आए.

“ये देखो तो, हमारे साथ कौन आया है?”

प्रियम्वदा ने एक गत्ते का डिब्बा पकड़ा था, मेज़ पर रख दिया. ढक्कन को हल्के से खोला, तो अंदर बिना दुम वाला एक छोटा-सा चूहे-नुमा जानवर था.

“मम्मी, देखिये ये तारा है.”

हम उसे देख रहे थे, तारा हमें देख रही था. वो एक टशनदार हैम्स्टर थी. चौकस, उत्सुक और हद दर्ज़े की फ़ॉर्वर्ड. शर्मीलेपन का ‘श’ भी नहीं समझती था. घबरा बिल्कुल नहीं रही थी.

कुछ साल हुए मेरी पहली संतान, भीमसेन, ने एक जरबिल पाली थी. बड़ी प्यारी-सी. ऐलिस नाम था उसका. बेचारी का तो देहान्त हो चुका था. उसी का ति-मंज़िला पिंजड़ा अब भी पड़ा था घर में. सो पिंजड़ा साफ़ करके तारा के लिये तैयार कर लिया.

पिंजड़े में घुसते ही तारा की छानबीनें भी शुरू हो गईं. कुछ ही देर में उस ने पिंजड़े का कोना-कोना समझ लिया. अंदर रखी हर चीज़ को वो सूँघ चुकी थी, खाने की डिब्बी को छान चुकी थी, उसके मन-बहलाव के लिये अंदर जो लकड़ी के टुकड़े डाले थे, उन्हे वो दाँत से दबा कर देख चुकी थी, पानी की बोतल चूस चुकी थी.

सब जाँच-पड़ताल पूरी होने के बाद वो पिंजड़े में उसके खेलने के लिये रखा पहिया चढ़ कर दौड़ रही थी.

सिर्फ़ वो हैम्स्टर सीरियल बार अनछुआ छोड़ दिया जो पैट-शॉप से ये दोनों खरीद के लाए थे.

मुझे लगता है उस रात को बिस्तर में नींद का इन्तज़ार करते हुए हम सबों के चेहरों पर मुस्काने चिपकी हुई थीं. एक प्यारी-सी बढ़ोतरी हो गई थी हमारे परिवार में.

हमारे यहाँ सुबह राम ही सबसे पहले उठते हैं. अगली सुबह कॉफ़ी का पानी ऑन करके वे टॉयलेट चले गए. आँखों में नींद अब भी भरी थी. सीट पर बैठे वे नींद के कुछ आख़िरी पल चुरा रहे थे, जब उन्हें अपने दिन का पहला “गुड मॉर्निंग” मिला. देखा कि तारा उनके पाँव का अँगूठा कतर रही थी.

“आप इतनी सुबह उठ कर क्या कर रहीं हैं, मैडम? और वो भी अपने पिंजड़े के बाहर?” राम ने उसे सम्भाल के उठा लिया. टॉयलेट सीट के पीछे देखा, तो वहाँ उसका नया बसेरा पाया. जिस सीरियल बार में वो बिल्कुल रुचि नहीं दिखा रही थी, उसे वो रात भर कई टुकड़ों में तोड़ के एक-एक करके वहाँ ले आई थी. बार ने अब एक ढेर का रूप धारण कर लिया था.

“अरे मेरी बुद्धू चुहिया, तुम यहाँ कैसे रह सकती हो?” ये कहकर राम ने उसे वापस पिंजड़े में डाल दिया.

सब नाश्ता कर रहे थे, और तारा पिंजड़े में रखे अपने 'इग्लू' के अंदर मुँह फुलाए बैठी थी. बाहर निकलकर तब ही आई जब बच्चे स्कूल चले गए थे. बड़ी बग़ावती मूड में थी.

पिंजड़े की कड़ियाँ पास-पास ही थीं, मगर कोनों से बाहर निकलने की थोड़ी सी गुँजाइश थी. वहीं से, थोड़ा ऐंठ के, थोड़ा पिचक के, अपने को पतला करके, जैसे-तैसे वो फिर बाहर निकल आई और घर के दूसरे कोने में स्थित टॉयलेट की तरफ़ भागने लगी. राम फिर उसे वापस ले आए.

"अब इस आफ़त की पुड़िया के लिये नया पिंजड़ा लाना पड़ेगा," ऐसा सोचते-सोचते मैं कोनों की कड़ियों को कस के तारों से बाँधने में लग गई. और इस दौरान तारा ने फिर कड़ियों के बीच चौड़ा गैप ढूँढना शुरू कर दिया.

उसके नखरे तब जाकर शुरू हुए जब उसने भागने के सब रास्ते बन्द पाए. पागल हो गई वो. बेतहाशा पिंजड़े की सलाखों पर चढ़ने लगी. ज़ोर-ज़ोर से सिर पीटने लगी.

जब सब हार गई तब तीसरी मंज़िल चढ़ कर, कभी मेरी, कभी राम की आँखों में आँखें डाल कर पिंजड़े की दीवार पर सिर फोड़ने लगी.

गुस्से में पास रक्खे लकड़ी के टुकड़े को लात मार दी.

दोनों हाथों से सलाखें पकड़ कर ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगी.

इतनी छोटी-सी चुहिया का इतना बड़ा संग्राम!

हम दोनों को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. मुझे डर था उसका ये आवेग कहीं उसे बीमार न कर दे, सो पास पड़ी भीमसेन की कमीज़ से उसके पिजड़े को ढँक दिया. तब जाकर वो कुछ शान्त हो पाई.

2. कुछ सालों बाद, जब मैंने अपने 46 साल पूरे किये और मेरे दोनों बच्चे कॉलिज के लिये घर छोड़ कर चले गए थे, मुझे वही व्याकुलता महसूस होने लगी जो उस दिन तारा ने दिखाई थी. राम को छोड़कर और अपनी सालों की सफ़ल साईकाईटरी की प्रैक्टिस को डंप करके, अपनी जवानी के खोए हुए प्यार, ज़ुल्फ़ी, को ढूँढने के लिये मैं भोपाल निकल पड़ी.

3. पता नहीं कहाँ से स्कूल के आख़िरी सालों में ज़ुल्फ़िकार आकर भर्ती हो गया. आर्ट्स स्टूडेन्ट था. कुछ ही हफ़्तों में ऐसा लोकप्रिय हो गया, कि बच्चे तो बच्चे, शिक्षक भी उसके जादू में आ गए थे और ये जानते हुए भी कि स्कूल-कैप्टन के औहदे के लिये मैं सालों से कामना, तैयारी और इंतज़ार कर रही थी, उन्होंने ये पद उस बन्दर को दे दिया.

“तुमको तो इस साल अपने ऐन्ट्रैन्स-ऐग्ज़ामों के बारे में सोचना है, बेटा!” मैत्स के टीचर ने ये सादे ढाढस भरे शब्द कह कर मुझे किनारे खिसका दिया.

क्या मालुम लंगड़ा था या डरपोक, वो ज़ुल्फ़िकार का बच्चा, मैंने उसे कभी अकेले चलते हुए नहीं देखा. हमेशा उसके साथ अच्छा-ख़ासा झुंड चलता था. सब चमचे थे उसके. उसे देखते ही मुझे ऐसी ज़बरदस्त चिढ़ मचती थी, मेरा खून खौलने लगता था. मैं रास्ता बदल देती थी. उसकी तरफ़ देखती भी नहीं थी.

इसका मतलब ये नहीं कि मुझे ये जान के हैरानी हुई कि जनाब को इश्क़ हो गया था. मुझसे. मेरा मतलब है, ऐसे कम ही थे जो मुझ पर फ़िदा नहीं हुए थे.

रोज़ाना लंच में और स्कूल के अन्य ब्रेकों में, मैं और मेरी परमप्रिय सहेली, रत्ना, जाड़ों की गुलाबी धूप में, हाथों में हाथ डाल, स्कूल के ग्राऊँड में घूमा करते थे, गप मारते थे, अपने पसनदीदा गीत गुनगुनाते थे. बहुत घनिष्ठ थी हमारी मित्रता. अकसर यूँ टहलते-टहलते मेरी नज़र कक्षा पर पड़ती, और मैं हँस देती.

“वो देखो, वहाँ कौन खड़ा है. बेवकूफ़! तुम सब का हीरो!”

अर्ध-मूर्छित अवस्था में, अपने साथियों पर टिका, खिड़की से मुझे घूर-घूर कर देखता था वो पागल ज़ुल्फ़ी.

“लूज़र! हुँह्ह!” मैं कहती.

सीधी-सादी रत्ना, कभी किसी का बुरा न सोचने, न कहने वाली लड़की थी. चुप रहती.

रत्ना से मैं फिर तब मिली जब मैं मेडिकल कॉलिज के सैकन्ड यीअर में थी. स्कूल छोड़ने के बाद हमारे सम्पर्क एकदम टूट गए थे. अजीब बात थी, क्योंकि स्कूल में हम दोनों को अलग करना असम्भव ही था.

उसके पहले शब्दों ने मुझे हिला कर रख दिया.

“हम भागने की सोच रहे हैं. मुझे तुम्हारी राय चाहिये, मुनमुन.”

कुछ देर तक मैं ‘क्या क्या’ ही करती रही. ये भागने-वागने की बातें तो मैंने बस फिल्मों में ही सुनी थीं.

“भागने की सोच रही हो? किसके साथ?” बड़ी मुश्किल से पूछ पाई.

इन्ट्रोवर्ट थी मेरी रत्ना. उस वक्त मुझे अहसास हुआ कि हमेशा उसके कान मेरी बातों के लिये तैयार रहते थे. आज पहली बार गीयर उल्टा लगा था.

वो रोने लगी. “मैं उससे प्यार करती हूँ, मुनमुन. हम दोनों एक दूसरे को बेहद चाहते हैं.”

सिसकियों के बीच वो बोलती गई, “लेकिन, वो ... वो मुसलमान है, और मेरे मम्मी पापा को तो तुम जानती ही हो. कभी नहीं मानेंगे ... उफ़, कितनी दुखी हूँ मैं. अब तुम ही मुझे बताओ मैं क्या करूँ?”

उसने मुझे अब भी नहीं बताया था कि वो किस के साथ भागने का सोच रही थी. मैं उसे हैरानी से देख रही थी. सोच रही थी कि क्या ये सम्भव है कि मैं उसे जानती हूँ. मैंने उस वक्त ये महसूस किया कि अपने सम्पूर्ण जीवन में मैं किसी मुसलमान जनें को नहीं जानती. सिर्फ़ ...

अचानक मन में चौंकाने वाला विचार उठा. इसके पहले मैं कुछ कह पाती, वो बोली, “हम दोनों बहनें जैसी हैं, मुनमुन. जानती हो मुझे तुम पर हमेशा से कितना गर्व है. गर्व है अपनी दोस्ती पर भी. और तुम्हारा वो प्रशंसनीय आत्म-विश्वास! उसे मैं कभी टूटते हुए नहीं देख सकती. स्कूल में कितनी बार सोचा तुम्हें बताऊँ-”

मुझसे और रहा नहीं गया. मैंने उसे टोक के पूछा, “क्या वो ज़ुल्फ़ीकार है?”

उसने जवाब नहीं दिया. उल्टे दो मोटे-मोटे आँसु उसके गालों में लकीरें खींचने लगे. तो वो ज़ुल्फ़ीकार ही था.

मैं अपना स्वाभिमान पी के बोली, “पागल हो गई हो क्या?”

वो चुप रही, तो मैंने और थोड़ा बोल दिया. “भागने का सोच रही हो? वो भी ऐसे आवारा-निकम्मे लड़के के साथ. हैं कुछ उसके लाइफ़-प्लान्ज़. वैसे महाशय कर क्या रहे हैं आजकल? न! ऐसा हर्गिज़ मत करना. पछताओगी.”

वो चुपचाप ज़मीन पर आँखें गाढ़े सुनती जा रही थी और मैं भी बोलती चली जा रही थी, जैसे हमेशा होता था.

“मेरी बात सुनो, रत्ना. उसका तो कोई फ़्यूचर नहीं है. खुद गिरेगा, तुम्हे भी साथ ले जाएगा. अभी तुम 18 साल की ही तो हो. चलो, कॉलिज खत्म कर लो पहले, फिर ये भागने-वागने के बारे में सोचना.”

“मगर ...”

मेरा इतना समझाने पर भी वो अगर-मगर कर रही थी. मुझे उसे टोकना पड़ा. मेरे टर्मिनल इम्तहान आने वाले थे. बड़ा काम था. वैसे भी मैं कोई महात्मा तो थी नहीं कि ऐसी बातों को घंटों सुनती रहती. “भागने की बात भूल जाओ, मेरी भोली गाय.”

ऐसा कह कर मैं चली गई.

फ़ाइनल यीअर में उसका पत्र आया.

“पिछली बार जब मिले थे, कितने क्रूएल थे हम दोनों. लेकिन मुनमुन, सच्चे दोस्त एक दूसरे को चाहना बन्द कर ही नहीं सकते. चल, एक अच्छी ख़बर सुनाती हूँ, मेरी जान. अब हमारी एक बेटी है. नन्ही सी, प्यारी सी. ज़ुल्फ़ी और मैं, हम दोनों, उसे मुन्नी के नाम से बुलाते हैं. वैसे मुनमुन नाम रखा है. कहो कैसा लगा?”

कैसा लग सकता था मुझे? मेरा दिल डूब रहा था.

ख़त में और बहुत कुछ लिखा था.ये भोपाल में रहते थे. वहीं किसी गैराज में ज़ुल्फ़ी को काम मिल गया था. देर-देर तक काम करता था. मुश्किल ज़िन्दग़ी थी, कमियों से भरी - खाने की कमी, पैसे की कमी. कई दुर्घटनाएँ भी हो चुकी थीं, एक सीरियस हादसा. भगवान के भरोसे जी रहे थे वे, ऐसा लिखा था उसने. उसी का लाख शुक्र था, वो सब दिन अब बीत चुके थे. जो बीत गई सो बात गई. ‘अब बच्ची के आने से शायद सब कुछ सम्भल जाए. कम से कम हम दोनों एक साथ तो हैं.’

‘कैसे? कैसे सम्भलेगी ज़िन्दग़ी, रत्ना?’ मैंने फ़ौरन उसका पत्र मरोड़ के, गेंद बनाके फेंक दिया.

ऐसी अनिश्चित ज़िन्दग़ी को चुनने के लिये क्या वो मुझसे ये उम्मीद कर रही थी कि मैं तालियाँ पीटूँ, उसे वाह-वाही दूँ? ऊपर से ये बात कि किसी तरह के अमिट प्रेम ने ज़ुल्फ़ी को मेरी बेचारी रत्ना के साथ रखा था, इससे ज़्यादा औंधी बात की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी. असल बात क्या थी, मुझे साफ़ दिखाई दे रही थी. मुझसे सम्पर्क में रहने के चक्कर में वो कॉलिज में रत्ना से चिपका रहा. फिर रिश्तों में ऐसा फँसा कि अब देखो कैसे दयनीय हाल में पहुँच गया. साथ में बेचारी रत्ना की ज़िन्दग़ी भी बरबाद करके रख दी. ऐसी बातें अकसर होती हैं. मैं मनश्चिकित्सिका हूँ, आए दिन देखती हूँ. मुझे नहीं मालुम होगा, तो और किसे होगा?

4. ये लोग मुझे ये मनवाना चाहते हैं कि ज़ुल्फ़ी अब नहीं रहा. कि उसे मरे तो सालों बीत गए, और तो और, वो मेरी ही बाहों में मरा था. ये सब बातें मैं भूल भी कैसे गई, उन्हें यक़ीन नहीं होता.

सबसे कठोर तो मेरी माँ थीं.

“कैसी औरत हो? अच्छे-ख़ासे पति को छोड़ आई! उस भगवान राम  के अवतार को!” गुस्से में वो चिल्लाईं.

“और ये तुम्हें किसने बताया कि कॉलिज गए बच्चों को माँ की ज़रूरत नहीं होती?”

माँ के साथ दो दिन रहना दुश्वार हो गया था.

“हमने क्या तुम्हे अच्छी शिक्षा इसलिये दी थी कि एक दिन ऐसा आए जब हम शर्म से कहीं मुँह दिखाने लायक़ ही न रहें? अपनी उम्र देखी है? पचास की होने जा रहीं हैं आप. लेकिन पर तो देखो तितलियों वाले ही लगे हैं अब तक. हे भगवान, ये वाली पैदा होते ही क्यों नहीं मर गई?”

अतिशयोक्ति मेरी माँ की अपनी एक यूनीक़ प्रवृत्ति है.

लेकिन मैं माँ, पत्नी या बेटी के रूप में बस एक रोल भर ही नहीं, इन्सान भी हूँ. सीने में धड़कता दिल है मेरे और तन में ताकत. मन यदि कुछ करने की चाह रख रहा है, तो क्यों न करे. सालों से एक आदमी की परछाईं मुझ पर मँडरा रही थी. उस परछांई पर ध्यान मेरा अब जा के ही तो गया, न? माँ ये सब समझने को तैयार ही नहीं थीं. रोज़ वही रोना होता था. मैंने फिर बक्सा उठाया और चली गई अनुपम के यहाँ.

मैडिकल कॉलिज में अनुपम मेरा एक अच्छा दोस्त हुआ करता था. नैफ़्रोलौजिस्ट था. भोपाल में रहता था. वहीं पैदा हुआ, बड़ा हुआ. दिल्ली में 5 साल मैडिकल कॉलिज में पढ़ कर वापस अपने प्यारे भोपाल में ही सैटिल हो गया था.

“वैलकम बैक सरवाइवर!” मुस्कुराते हुए उसने मेरा स्वागत किया.

हाँ, हम दोनों सरवाइवर थे. 1984 में भोपाल के एक ही अस्पताल में रेसिडेन्सी कर रहे थे. हमारी दोस्ती में एक नया पहलू जुड़ गया था जब गैस लीक के उस हादसे में ख़ुद को बचाया था हमने और साथ में अनेकों सैकड़ों को. बड़ा अजीब, उन्मादी समय था वो, अब मेरे मानसिक-धर से अच्छी तरह ब्लॉक्ड. इसी में भला था.

दिल्ली-वासी होने के बावजूद, मैं भोपाल क्यों गई रैसिडैन्सी करने? ये एक असाधारण कदम था. सच तो ये है कि उन दिनों मेरी सोच कुछ नॉर्मल नहीं थी. होश-ओ-हवास उड़े हुए थे. ये मेरे पैर मुझे दिल्ली से वहाँ ले गए जहाँ ज़ुल्फ़ी, एक बीवी और बच्ची, जो मेरी ही हमनाम थी, के साथ बड़ी ग़रदिशी की गुज़र कर रहा था. वहाँ जाकर मैं क्या करूँगी, खुद को नहीं मालुम था.  

5. तो काफ़ी सालों के बाद मैं अनुपम से मिल रही थी. बहुत बदल गया था. बाल हलके और सफ़ेद हो गए थे, चश्मा मोटे काँच वाला था, चेहरे की जानी-पहचानी लकीरों से अब कई नई शिकनें चटक के निकल आईं थीं.

“जवानी तुम से डर के भाग गई है,” मैंने उससे कहा.

हँस के बोला, “मगर तुम वैसी की वैसी हो. कैसे आना हुआ?”

“किसी की तलाश में आई हूँ.  अनुपम, ज़ुल्फ़ी को ढूँढने में तुम्हें मेरी मदद करनी पड़ेगी.”

 

मेरी बात सुनकर उसके चेहरे की तो जैसे हवाइयाँ ही उड़ गईं. कहा कुछ नहीं. बस देखता रहा भौचक्की निगाहों से. पता नहीं क्यों, मेरे मन में एक चिन्ताजनक ख़्याल उठा कि कहीं रोने न लगे वो.

फ़ौरन आवाज़ कड़ी  की और बोली, “मैं चाहती हूँ कि तुरंत शुरू हो जाऊँ.”

वो हिला तक नहीं. सीधा खड़ा रहा. फिर एकाएक चेहरे पर खिन्न सी मुस्कान उभर आई.

“तुम्हे आराम की ज़रूरत है.” काफ़ी गहरी शान्ति के बाद वो बोला.

मैं तेज़ी से उठी. अपना सामान उठा कर दरवाज़े की तरफ़ जाने लगी. उसकी पत्नी ने फ़ौरन हट के मेरे लिये रास्ता भी खाली कर दिया. एक बात मुझे कभी समझ नहीं आ पाई. अनुपम और मेरी सालों पुरानी सच्ची दोस्ती के बावजूद, उसकी बीवी ने कभी मुझमें कोई उत्साह नहीं दिखाया.

“रुको मुनमुन. क्या ये मुमकिन है तुम सब कुछ भूल गई हो?”

दोनों कंधों को पकड़ के बड़े ध्यान से वो मुझे देखने लगा और मैं भी इन्तज़ार करती रही.

“ठीक है, चलते हैं ज़ुल्फ़ी को ढूँढने.”

6. “याद है वो दिसम्बर की रात, मुनमुन? हम दोनों कॉल पर थे, रैसपरेटोरी वॉर्ड में. क्या इस बात को 23 साल हो गए हैं? यक़ीन नहीं होता.”

गाड़ी चलाते-चलाते उसने मुझ पर एक निगाह फेंकी.

“और वो रात? वो रात तो अविस्मरणीय है. सेरेनेड कर रहा था मैं तुम्हे, हमेशा की तरह. क्या बुलाते थे सब मुझे? यूऔर्ज़ फ़ौरैवर? नहीं, नहीं, कोई दूसरा नाम था, फ़ौरऐवर लवर था शायद. क्यों?”

मैंने सिर हिला कर उससे कह दिया कि मुझे वो सब फ़िज़ूल की बातें नहीं याद हैं और वो दबी हँसी हँस दिया.

फिर बोलता चला गया. “लो, याद आ गया. साइलैन्ट सफ़रर.”

कार की खिड़कियाँ खुली थीं. हवा का बहाव अंदर घुस कर कभी आह भर रहा था, कभी बड़बड़ा रहा था. किन्तु अनुपम अपने शब्द सपाट आवाज़ में बोलता चला जा रहा था.

“उस वक्त क्या मालुम था कि बाहर गैस का सफ़ेद बादल शहर के अंधेरे रास्तों पर उतरकर कम्बलों के नीचे ठंड से थरथराते इन्सानों के कानों में कुछ ऐसा फुसफुसाकर चला जा रहा था कि वे ख़ुद-ब-ख़ुद मौत से समझौता करके लुढ़कते पड़ रहे थे? जब फ़टाक से दरवाज़ा खुला और बुलावा आया और हम वॉर्ड में बेतहाशा भागे-भागे गए, तब जाकर दिखे वो सैकड़ों कसमसाते-कराहते लोग, अपने बदन पर से काबू खोते हुए, हॉलवे में उकड़ू बैठे हुए, वेटिंग रूम में रोते-तड़पते हुए, प्रवेश-द्वार पर बैठे बिलबिलाते हुए, प्रवेश-द्वार की सीढ़ियों पर लोटते-बिलखते हुए – ऐसी कोई जगह बची थी क्या, जहाँ नज़र पड़ती और लोग न दिखते? लोगों की जलती आँखों को ब्राइन से धोकर, उनके फेफड़ों से ऐक्सैस फ़्लूईड निकाल कर काटी थी हम अस्पताल वालों ने वो रात. कई घंटों तक तो ये ही नहीं मालुम था कि सामना किस दुश्मन का कर रहे हैं. किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि आख़िर वो जानलेवा गैस थी क्या. बस जो दिख रहा था, वही मालुम था. लोगों की छातियों में आग लगी थी, मुँह से झाग निकल रहा था, टिशू जल रहा था, फिर कारबाईड वालों के यहाँ से खबर आई कि साईनाईड पौईज़निंग का इलाज करें. पागलों की तरह ऑर्डर दे रहे थे हम एक दूसरों को, रोबॉट की तरह इलाज कर रहे थे, अभी एक मरीज़ गया नहीं, दूसरा मुँह से झाग उगलते आ गया, जैसे कि हम किसी कार बनाने वाली फ़ैक्टरी की असैम्ब्ली लाइन पर खड़े मजदूर हों. फिर रात के तीन बजे जा कर हमें थोड़ी राहत मिली. और कई डॉक्टर और स्टाफ़ आ गए. लेकिन हज़ारों की तादाद में मरीज़ भी आ रहे थे.”

अब जा के कहीं अनुपम ने लम्बी साँस ली. मैंने मौका पकड़ा और बोली, “क्यों बिना वजह ये पुरानी बातें उठा रहे हो?”

“तुम्हारा मतलब है क्यों मैं गढ़े मुर्दे खोद रहा हूँ. क्योंकि आज मुझे लगता है कुछ मुर्दों को जगाना होगा.”

वो फिर शुरू हो गया.

“रात के 3 बजे तक हम दोनों ही थक गए थे. यकायक तुम धड़ाम से गिर पड़ी. मैं तुम्हारी मदद करने आया, तो देखा तुम कुछ और ही रट लगा रही थी. “ज़ुल्फ़ी वहाँ है ... उसे बचाना है.” अब अस्पताल में हमारे बिना काम चल सकता था. हमने दवाईयाँ उठाईं, मास्क पहने, और मेरे स्कूटर पर रवाना हो गए. वो पता जो तुम मेरे कानों में चिल्लाए जा रही थी मुझे अच्छी तरह मालुम था. फिर भी मैं तुमको चिल्लाने से रोक नहीं पा रहा था क्योंकि जो नज़ारा इतनी रात को हमारे चारों तरफ़ था, उसके लिये मैं तैयार न था.

अपनी आँखों को मींचे हुए, हज़ारों की तादाद में इन्सान – आदमी, औरत, बच्चे – इन्सानों के जंगल के जंगल, अस्पताल की तरफ़ चले जा रहे थे. पीछे-पीछे चल रहे थे उनके गाय, बैल, कुत्ते, बकरी – सभी. चारों तरफ़ था वो मनहूस धुँध जो अपनी क्रूर, धूली उँगलियों से हमें टटोल रहा था, जाँच रहा था, हौंले से दुलार रहा था और मौका मिलने पर बदन छेद रहा था. जो लुढ़क जाते, वो कुचले जाते, इन्तज़ार करते रह जाते मौत का. आख़िरकार वे कायामात्र थे – लहू, चमड़ी, हड्डी और मल – उस रात मल ज़्यादा था. ये सब क्या तुम सच में भूल गई, मुनमुन? हाँ, तुम्हे तो उस वक्त एक ही ऐड्रैस की फ़िक्र थी, खोली नम्बर 152, जे.पी. नगर! फिर हम उसके दरवाज़े तक भी पहुँच गए. बन्द था साला अन्दर से. दो धक्कों में खुल गया. अंदर धुँध में दो लोग सोते हुए दिखे. औरत तो ख़त्म हो गई थी, उसकी बग़ल में एक बच्ची भी थी, वो भी नहीं बची. तुम सीधे आदमी के पास पहुँची थी, उसकी साँसें बरकरार थीं. तुम उसे हिला रही थी, तमाचे मार रही थी और रोते-रोते उससे जगने को कह रही थी. तुमने उसे चारपाई में उठा कर बिठा दिया. जब वो जागा, तुम्हे हैरानी से देखने लगा. तुमने चिल्लाना शुरू कर दिया. “उठो ज़ुल्फ़ी, मैं हूँ, मुनमुन, देखो, मैं आ गई,” तुम बार-बार यही बोले जा रही थी. मुझे लगा वो हल्का सा मुस्कुराया भी. मैं तेज़ी से सोडियम-थियोसल्फ़ेट की शीशी ले कर पास पहुँच गया. वो आसपास देखने लगा और तुमने उसे गैस लीक के बारे में बताना शुरू कर दिया. उसकी नज़र अपनी पत्नी और बच्ची की तरफ़ पड़ी. वो उनकी तरफ़ बढ़ा, कुछ बड़बड़ाया. फँटी आँखों से उन्हें देखे जा रहा था. जैसे-तैसे खड़ा भी हो गया, सीरिन्ज हाथ की नाड़ी में लगी थी, तुम्हारे कंधों का सहारा ले कर जब वो ज़ोर से चिल्लाया, तब जा कर तुमने उसे बताया कि वो दोनो अब नहीं रहे. वो सीधा दोनों की ओर भागने को हुआ, ख़ुद देखने. मैं हवा में शीशी उठाए ये सब देख रहा था. तुम्हारे शब्द कान में पड़े. “मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगी. आई विल फ़ोर्स यू टु लिव.” तब जाके उसने मेरे हाथों से शीशी छीन ली और उसे ज़मीन पर फोड़ दिया. उसका संतुलन गड़बड़ा गया और वो फिर तुम पर गिर पड़ा. तुम उसे सहारा दे रही थी और सिसकियाँ भर-भर के कह रही थी कि अब तुम आ गई हो न, उसे छोड़ के कहीं नहीं जाओगी. तुमने उससे ये भी कहा कि तुम उससे हमेशा प्यार करती थी और करती रहोगी. उस वक्त जैसे मेरी रगों में बहता खून बहते बहते ठंडा हो गया. अब वो तुम्हे देख कर अजीब तरह से मुस्कुरा रहा था, जैसे कि उसे तुम पर हँसी आ रही हो. फिर एक झटके में वो सिकुड़ गया जैसे पेट में बल पड़ा हो. तुम्हारे हाथ उसके कमर में बँधे थे. फिर जब उसने सिर उठाया, लड़खड़ा रहा था, उसी में उसने सब उलट दिया. तुम्हें उसके लड़खड़ाते, गिरते बदन को छोड़ना पड़ा, क्योंकि तुम्हारी आँखें उसकी कै में जल रही थीं. उसने तुम्हारी बाहों ही में तो दम तोड़ा था. क्या तुम्हे ये भी याद नहीं?”

अनुपम ने गाड़ी रोक दी.

“क्या हुआ?” मैं चारों तरफ़ देखने लगी. लगा जैसे किसी ने सपने से उखाड़ दिया हो.

उसने जवाब नहीं दिया. कुछ देर के लिये सड़ी गर्मी में रुकी हुई कार से बाहर की सटर-पटर देखती रही. हम जिस इलाके में थे उसे एक अपमानजनक बवाल ने निगला हुआ था. वहीं खोली – उसकी खोली – के सामने कचड़े की अच्छी-खासी पहाड़ी सुसज्जित थी. उसके ऊपर एक निरीह दुबला कुत्ता गहरे चिंतन में डूबा था. कई सारी लड़कियाँ वहीं उछल-कूद कर रहीं थीं और एक छोटा सा लड़का अपने बूढ़े दादा के साथ खाट पर बैठा था. लड़का अपना जाँघिया पहनना भूल गया था और उसके दादा हाथ में जाँघिया पकड़े हुए थे. वो भी किसी चिंतन में डूबे हुए थे.

लेकिन मुझे बेचैनी हो रही थी तो अनुपम के वर्णन से. अपने सालों की प्रैक्टिस में मैंने कई कहानियाँ सुनी हैं, एक से एक विचित्र. मुझे लगा था मैं वो सब छोड़-छाड़ के आ गई हूँ. अपने अच्छे दोस्त की ओर एक उदास सरसराती नज़र फेंकते हुए मैं कार से निकल कर उस बूढ़े आदमी से मिलने चली गई. कुछ सवाल-जवाब के बाद वापस आ गई. पैसेन्जर सीट पर बैठ कर हँस दी.

“कैसी बेवक़ूफ़ हूँ मैं, अनुपम. ये कैसे सोच लिया कि 25 साल के बाद भी वो लोग इधर ही मिलेंगे. चलो घर चल के डाएरेक्टिरी में देखते हैं.”

 

 

मुक्ता सिंह-ज़ौक्की फ़िज़िक्स में पी.ऐच.डी. हैं. अनेकों साल कन्डैन्स्ड-मैटर फ़िज़िक्स में अनुसंधान करने के दौरान इनकी एक कहानी ने जब अवार्ड जीता, तब इन्होंने ज्यादा ज़ोरों में कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया.अब ये फ़ुल-टाईम लिखती हैं.

इनके तीन उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं - The Thugs & a Courtesan (2014), ठग (2018) व  Game of Big Numbers (2019)

दिल्ली प्रैस की सरिता प्रकाशन में हिन्दी में इनकी अनेकों कहानियाँ छप चुकी हैं.

प्रवासी भारतीय और अन्य विषयों पर इनके कॉलम अक्सर छपते रहते हैं. 

 

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