... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

शेखपूरा

भाँय-भाँय करते स्‍टेशन पर उतर कर यू.डी. का मन नाना प्रकार की दुश्चिन्‍ताओं से घिर गया। कहाँ शहर में प्‍लेटफार्म पर पाँव रखने की जगह नहीं मिलती है और यहाँ चिरई का एक पूत तक नहीं नजर आ रहा हे। तेज धूप चुभ रही थी। गाँव यहाँ से तीस-चालीस किलोमीटर दूर तो होगा ही। न कोई सवारी न साधन। कैसे पहॅुँचेगा। एक ऑटो को देखकर वह उधर बढ़ा।

"नौबतपुर जाना है।" उसने गंतव्‍य का नाम बताया।

कंजी आँखों वाले मुस्‍तण्‍डे से ड्राइवर ने उसे घूरते हुए कहा, "आठ सौ रुपया किराया लगेगा। रास्‍ते की जिम्‍मेवारी मेरी नहीं है।’’ बेहद बेरुखी और अभद्रता से दिए गए जवाब के आघात से  यू.डी. उसे एक मतिमंद बालक सद्दश्‍य देखता रहा गया। मार्ग में किसी अनहोनी की आशंका ने उसे ग्रस्‍त कर दिया। रास्‍ते में साक्ष्‍य विहीन वारदात होगी और चूँकि ऑटो वाला स्‍वयं मिला हुआ होगा इसलिए ऐसे साक्षी विहीन अपराधों पर पुलिस लीपापोती के सिवा और क्‍या करेगी।

 

       यू.डी. यानि योगेश्‍वर दत्‍त। जान-पहचान वालों से लेकर शहर में स्थित संबंधी भी उसे इसी संक्षिप्‍त नाम से संबोधित करते। वह भी इस संबोधन को पसंद करने लगा था। गाँव-देहात में योगी के नाम से पुकारा जाना एक बीती बात हो चुकी थी।

 

"आखिर आपके अंदर अचानक उधर जाने का विचार कैसे बन गया।’’ यू.डी. के सम्‍पन्‍न एवं होशियार साले साहब किचिंत व्‍यंग्‍य से उससे पूछ रहे थे।

वह उनकी द्दष्टि के पैनेपन और शब्‍दों की आरी सरीखी धार से ऑखें बचाकर बोला, "बस अपना मकान-खेत है। रखवाली के लिए कभी-कभार जाना बनता है।’’

साले साहब का लड़का विदेश में व्‍यवस्थित था। बेटी के लिए एन.आर.आई. दूल्‍हा हासिल करने के उपक्रम में रत थे। "शर्माइए नहीं मैं भी इसी बैंकग्राउण्‍ड का हूँ। वहाँ घर के दरवाजे से सत्‍तू खिलाकर कह देगे कि पास में गंगा नदी है वहाँ जाकर पानी पी लीजिए। बिना किसी रहने-ठहरने के इंतजाम के कहाँ जाएगें? बुरा मत मानिएगा मेरा भी बहुत कुछ अपने गाँव में था। अगर उसके मोह में फँसता तो न खुद कामयाब हो पाता और नही बच्‍चों को सही लाइन दिला पाता।"

जरा रुककर वे पुन: शुरु हुए।

"माफ कीजिएगा गाँव के लोग बड़े सीधे और नेकदिल होते हैं वाली बात पुराने जमाने की दास्‍तान है। अब गाँव की दुल्‍हन की डोली लुटेरे नहीं बल्कि कहार लूट लेते हैं।"

 

       वक्‍तृव्‍य कला में निपुण साले साहब ने निष्‍कर्ष के तौर पर जो कहा उसका सार यह था कि आपके जैसा नगरीय सभ्‍यता में पला-बढ़ा स्‍तरधारी इन दूसरे ग्रह के एलियन सद्दश्‍य प्राणियों के मध्‍य क्‍यों फँसने जा रहा है।

न जाने किस घड़ी में इधर आने की सूझी। घरवालों ने समझाया था कि खेती में हिस्‍सा मिले चाहे न मिले, गाँव-देहात जाकर हैरान-परेशान होने की कोई जरुरत नहीं है। लेकिन अपनी ही मति मारी गयी थी। फिर वहाँ जाकर बातचीत या समझाने-बुझाने से मामला सुलझ जाए यह जरुरी नहीं है। रिश्‍तेदार हैं तो क्‍या हुआ आखिर हैं तो जाहिल लोग‍। कॅुँए के मेढ़क वाली छोटी सोच और बेकार का श्रेष्‍ठतामूलक भ्रम। नाहक बड़े लोग बनते हैं। भोज में पंगत में बैठेगें तो दो-चार पूड़ी-पूए अपनी जांघ के नीचे जरुर छिपाएगे। वह यहाँ आने की निस्‍सारता गाँव पहॅुचने से पहले ही महसूस करने लगा। यूँ कहिए कि बिना दो-दो हाथ किए ही कोई हार मान ले। सब कुछ तो उसने जिन्‍दगी में पा लिया है। एक ऊॅचाई के बाद गुरुत्‍वाकर्षण का नियम भी कारगर नहीं होता। यहॉ से जमीन नही बल्कि आसमान बुलाता है।

 

       उसने अनुभव किया कि ऑटो वाला अभी भी उसे घूर रहा है। शक्‍ल—सूरत से छॅटा हुआ लग रहा है। क्‍या पता राहजनों से मिला हुआ हो। माना कि उसका बचपन इधर ही बीता है लेकिन तबसे गंगा-जमुना में काफी पानी बह चुका है। तब का जमाना अलग था। उसे कौटुम्बिक कूट-कपट से कोई सरोकार नहीं था। आज रिश्‍तेदार-पट्टीदारों की अगली पीढ़ी आ चुकी है। पुराना सौहार्द्र व नाता कहॉ बचा है। आज गॉव कहॉ गॉव रहा। निपट देहाती भी नगरोन्‍मुखता प्रदर्शित करते हैं।

 

       खैर यहाँ तक पहुँच गया तो जाना तो है ही। वह शहरी मध्‍यमवर्गीय चालाकी पर उतर आया। अपनी वाणी में देशज उच्‍चारण का पुट लाकर उसने ऑटो वाले से कहा, "जाना तो लगा रहेगा लेकिन अगर आप पान खाते हैं तो चलिए एक-एक खिल्‍ली हो जाए।’’

 

       ऑटो वाला जरा हैरानी से उसे देखता हुआ नीचे उतरा। करीब छह फुट लम्‍बा वह एक हट्ठा-कट्ठा व्‍यक्ति था। स्‍याह रंग और बेतरतीब ढंग से उगे दाढ़ी-मॅूछ उसके व्‍यक्तित्‍व को भयावह रुप दे रहे थे। गहरे लाल रंग की कमीज और गंदी सी पैंट के साथ गले में बँधा रुमाल इसी छवि को अधिक संघनित कर रहे थे। बदन इतना गठीला कि सर्दी में चार गर्म कपड़े पहन ले तो भी कंधे और बाजुओं का उभार नहीं छिपेगा।

 

यू.डी. ने उससे ऑखें न मिलाकर पान की दूकान की ओर रुख किया, "दो पान दीजिएगा।’’

"बाबूजी आप किधर के हैं?’’ ऑटो वाले ने तनिक नरमी से पूछा।     

"भई रोजी-रोटी के लिए आदमी कहीं भी निकल जाए लेकिन अपना घर-बार छूटता थोड़े न है। मैं शेखपूरा का हॅँ,’’ बोलते हुए मानो वह पुलिस थाने में सरकारी गवाह बनकर गिरफ्तारी से बचने की कोशिश कर रहा था।

"वहॉ के श्‍यामनन्‍दन बाबू को चिन्‍ह्ते हैं आप?’’ ऑटो वाले की आवाज में और तरलता घुल आयी।

"अरे पहचानेगे क्‍यों नहीं। मेरे बाबूजी और श्‍यामनन्‍दन बाबू मैट्रिक तक नौबतपुर के स्‍कूल में साथ-साथ पढ़े थे।’’

उसे राहत मिली कि यह तथ्‍य अभी तक याद है। हालाँकि सुना था कि श्‍यामनन्‍दन बाबू अब वृद्धावस्‍था के कारण बेहद शिथिल हो गए हैं और यहाँ तक कि उठने-बैठने में भी परिजनों की मदद लेनी पड़ती है। 

 

"बाबूजी यही न बेजा बात किए आप...!!’’ ऑटो वाले ने उसके हाथ से अटैची ले ली। पान वाले को इशारा करके ऊँची स्‍वर में कहा। "खबरदार बाबूजी से एक पैसा मत लेना। पान हमारी तरफ से...। अरे पहले बताना चाहिए था कि आप शेखपूरा के हैं। हम सब आपके बच्‍चे हैं। आपके कुल-खानदान की धाक इतनी है कि जिधर मुँह कर ले जनता उसी दिशा को पूरब मान लेती है।’’

उसके मारक तेवर पहले ही कुंद हो चुके थे। अब वह मुँहलगे घरेलू सेवक समान पेश आ रहा था। यू.डी. बरबस मुस्‍कराया। हालाँकि अब इस बात को वर्तमान काल की बजाए भूतकाल के वाक्‍य में कहना चाहिए। वे दिन अब कहाँ रहे।

पान वाले को देशज बोली में दो-चार गालियॉ देकर ऑटो चालक अपने रोब-दाब और जनपदीय आत्‍मीयता का सम्मिश्रण प्रस्‍तुत कर रहा था। यू.डी. को यह सोचकर राहत मिली कि पान खाने जैसे पुराने शौक वह अभी तक यदा-कदा फरमा लेता था। हालाँकि इस बात को लेकर घरवाले ही नहीं बल्कि यार-दोस्‍त भी कह देते थे कि भई अब तो अच्‍छे शहरी बन जाओ। पान खाओगे तो जाहिर है कि जहाँ मर्जी वहाँ पीक भी फेकोगें।

 

ऑटोचालक ने बेहद सहेज कर उसकी अटैची गाड़ी में रखी।

"बैठा जाए।" वह विनम्रता से बोला। नौबतपुर तो वह जगह थी जहाँ तक पक्‍की सड़क जाती थी। उसके बाद भी तीन-चार किलोमीटर तक कच्‍ची सड़क नापने के बाद वह अपने गंतव्‍य शेखपूरा पहुँचता। पक्‍की सड़क ही कौन सी अच्‍छी थी। जगह-जगह गड्ढ़े थे। लेकिन ऑटो वाला युक्तिचालन के सहारे वाहन को खूबसूरती से गड़ढ़ों से बचाता हुआ बढ़ा रहा था। देहाती इलाका काफी दूर तक किसी के न दिखने पर भी बियाबान नहीं लग रहा था। पतली सड़कें शहर के चौड़े मार्गो की भॉति सदैव ज्‍वरतप्‍त व कोलाहल से परिपूर्ण नहीं थी। लेकिन बीच-बीच में एकाध राहगीर के गुजरने या किसी छोटी टोली को देखने से परिचय बोध मन को सहला जाता। यू.डी. कुछ सोचकर बरबस मुस्‍करा उठा। शहरों की भीड़भाड़ से चकरा कर ही सन्‍तजन वनाश्रित जीवन को श्रेष्‍ठ मानने को बाध्‍य हुए होगें।

 

"बाबूजी हमलोग सही समय पर स्‍टेशन से निकल गए। ज्‍यादा देरी करते तो पहुँचते-पहुँचते अंधेरा हो जाता। वैसे डरने की कोई बात नहीं है। शेखपूरा से नब्‍भी तक मेरे जानकार हैं। कोई मिल जाए तो भी हमें देखकर कुछ नहीं कहेगा।’’

गाड़ी की गति उसने तेज कर दी।

"आपको शहरी  ठाट-बाट कुछ हद तक नौबतपुर में मिल जाएगा। नहीं तो शेखपूरा आप लोग जैसा छोड़ के गए थे अभी तक बिल्‍कुल वैसा ही है। बाबूजी रास्‍ता पार करते-करते काफी बखत बीत जाएगा। बीच में हमलोग नाश्‍ता-पानी के लिए एक जगह रुकेगें।’’

"अरे ना-ना...’’ वह हठात् बोल पड़ा। "क्‍या जरुरत है सीधे गाँव पहुँचा दीजिए, वहीं सब कर लेगें। बीच में क्‍या जरुरत है।’’ यू.डी. के अनायास प्रस्‍फुटित उत्‍तर में अपरिचित का संकोच और व्‍यक्तिगत सुरक्षा जैसे प्रश्‍न घुले-मिले थे।

 

"आप काहे चिन्‍ता–फ्रिक करते हैं? मैं साथ में हूँ ना।’’ ऑटो चालक आत्‍मविश्‍वास से बोला। एक नाले के ऊपर बने पुल पर चढ़ते वक्‍त सामने से बैलगाड़ी आ गयी। उसने बैलगाड़ी वाले को कसकर घुड़का, "दिखता नहीं है...? जरा सा ठहरने में क्‍या दिक्‍कत है?’’ फिर जाते हुए बोला, "खूब ऊख लाद रखा है। लड़के-बच्‍चे दो-चार तोड़ ले तो गुस्‍साईगा नहीं।’’  

 

जरा आगे जाकर ऑटो वाले ने अपने मिजाज का परिचय देते हुए कहा, "हमारा उसूल है कि मायके-ससुराल जाती कनिया और बीमार-बुजुर्गो को छोड़कर किसी को रास्‍ता नहीं देते हैं।’’

यातायात के इस स्‍वचरित नियम पर उँगली उठाने के लिए यू.डी. को न तो यह यह उचित समय लगा और न ही स्‍थान।

 

सड़क के किनारे बने एक दूकान के आगे ऑटो रुकी।

"आइए ना हाथ-गोड़ धोकर कुछ जलपान कर लेते हैं।’’

ऑटो वाला ऐसे बिछ गया जैसे यू.डी. उसके घर पधारा हो। चलो थोड़ा खा ले। यह सोचकर उसने हाथ-मुँह धोने के लिए हैंडपम्‍प की ओर रुख किया।

"बच्‍चा जरा चापा कल चलाओ।’’ ऑटो चालक ने दूकान के लड़के को रोबीली आवाज में कहा।

 

आसमान में बिना बारिश वाले बादल छाए हुए थे, जिसके कारण धूप सॅवर कर अर्धश्‍यामल बन गयी।

"बदरौटी घाम है।’’ ऑटो वाला बेहद सहज था।

 

"क्‍या लीजिएगा आप लोग?’’ दूकानदार की आत्‍मीयता भरी वाणी सुनकर यू.डी. समझ गया कि वह ऑटो चालक का पूर्वपरिचित है। "खिलाइए जोकि बढि़या और ताजा हो।’’

उँगलियों से काउण्‍टर पर तबला बजाते हुए ऑटो वाला बोला। फिर शीशे में रखी मिठाईयों को देखकर मॅँह बिचकाकर कहा, "ई पेड़ा खाकर बाबूजी का पेट खराब हो जाएगा। चलिए गर्म-गर्म पूड़ी छानिए और आलू की सब्‍जी दीजिएगा। बगल से पीला केला ले आइए।’’  

 

सारी सामग्री आने पर ऑटो वाले ने उससे आग्रह किया, "बाबूजी खाना शुरु किया जाए।’’

यू.डी. सचमुच भूख महसूस कर रहा था। ताजी पूड़ी और आलू की रसेदार सब्‍जी का स्‍वाद बुरा नहीं था। कुछ पल बाद दूकान वाला लड़का प्‍लेट में कुछ लेकर आया।

"बताओ क्‍या लाए हो।’’ ऑटो चालक उससे मुखातिब हुआ।

 

"मिठाई है भईया।’’

"कैसी मिठाई? मथुरा का पेड़ा है या मनेर का लडडू? तुम सबके यहाँ खाजा छोड़कर कुछ मिलता भी है कि नहीं?’’

ऑटो वाला यह सोचकर चिन्तित था कि बाबूजी को यह सब पसंद भी आएगा कि नहीं।

"नहीं...आज की बनी बूँदी है। खाकर देखिए। अच्‍छी न बनी हो तो कहिएगा।’’

ताजी बूँदी हल्‍की गीली थी। खाकर सचमुच मजा आ गया।

"और कुछ स्‍पेशल हो तो खिला दीजिए।’’ ऑटो वाला वास्‍तव में तृप्‍त होकर मजाक में बोला। जरा सी देर में पीले पके केले के गुच्‍छे मेज पर आ गए।

"साधन नहीं है नहीं तो चीनिया केले हाजिर करता। ये भी बुरे नहीं हैं।" दूकान वाला अतिथि के सम्‍मुख प्रकट की जाने वाली विनम्रता से कह रहा था।

 

काउण्‍टर में दो देहाती जोर से बातें करने लगे। यू.डी; का ध्‍यान आकृष्‍ट हुआ। उसने पूछा। "उधर क्‍या हो रहा है।"

ऑटो वाला हँसा। "गॉव-देहात में बर्तन खड़कने या मामूली शोर पर कोई ध्‍यान नहीं देता है। यह शहर में होता है कि लोगबाग हिफाजत के लिए जगह-जगह गेट लगवाकर गार्ड खड़ा करते हैं। यहॉ के जवानों के पास कुदरती कसरती बदन होता है। इधर जिम-विम में बॉडी नहीं बनाते हैं।’’

 

"गाँव के लोग सीधे होते हैं।’’

यू.डी. ने एक सामान्‍य टिप्‍पणी की। ऑटो वाला हँसा।

"इंसान-इंसान का फर्क होता है। सीधे के साथ टेढे़ भी मिलते हैं। अगर पूछेगें कि कितनी बकरियाँ हैं तो पहले उनकी टाँगें गिनेगें फिर कहेगें कि इतने से भाग दे दीजिए। गिनती मालूम हो जाएगी। बाबूजी आपके पिताजी श्‍यामनंदन बाबू के खास थे इसलिए बता देता हूँ कि कुछ लोग सूरतहराम होते हैं। ऊपर से मीठे आम जैसे दिखेगें बाद में पता लगेगा कि अंदर का हाल कुछ और है।’’

 

पैसा चुकाते वक्‍त ऑटो चालक ने यू.डी. से लगभग दोस्‍ताना झगड़ा कर लिया। "आप हमारे यहाँ आए हैं। जब आपके शहर में चक्‍कर लगाऊँगा तो आपकी चलेगी।’’ पैसा देकर वह ड्राइवर की सीट पर विराजमान हो गया।

 

नौबतपुर पहुँचकर ही ऑटो वाले ने दम लिया।

"बाबूजी इसके आगे हमारी गाड़ी नहीं जाएगी। लेकिन यहाँ से आपको इक्‍का करवा दूँगा। अपने जान-पहचान का है। ठीक डेरे पर आपको छोड़ देगा।’’

यू.डी. ने किराया देने के लिए जेब में हाथ डाला। "अब चॅूकि हम बोल चुके हैं इसलिए किराया तो लेगें लेकिन आप तीन सौ रुपए दे दीजिए।’’

वह हतप्रभ रह गया। "अरे ऐसे कैसे चलेगा। हर जगह आपकी चलेगी। लीजिए पकडि़ए हजार रुपए। रास्‍ते भर आपने सारा खर्च खुद किया, एक धेला नहीं देने दिया।’’

वह घरेलू सदस्‍य की तरह हुज्‍जत कर रहा था। लेकिन ऑटो वाला टस से मस नहीं हुआ। "बाबूजी बस तीन सौ लूँगा...वह भी इसलिए क्‍योंकि बोल चुका हूँ। नहीं तो आपसे एक आना लेना भी ठीक नहीं है।’’

 

इक्‍के पर अटैची रखकर वह इक्‍के वाले को घुड़ककर बोला,"बाबूजी को सीधे शेखपूरा में श्‍यामनन्‍दन बाबू के डेरे के नजदीक उतारना। जरा गड़ढ़ा-पोखरा देखकर हाँकना। आगे कच्‍ची सड़क है। और हाँ कल इसी जगह मिलूगॉ तो तेरे लिए हाजीपुर के केले लाऊँगा। घर के बच्‍चों के लिए। भौजाई को मेरा सादर प्रणाम कहना।’’

ऑटो वाले के उज्‍जड़ लहजे में क्षणार्द्ध के लिए आदर उमड़ आया।

 

 

 

इक्‍के वाला यू.डी को लेकर रवाना हो गया। वह रास्‍ते भर ऑटो वाले के बारे में सोचता रहा। यह भी याद आया कि उसने नाम तक उसका नहीं पूछा। शायद आखिर तक उसे ऑटो वाला ही समझता रहा। इक्‍के पर बैठकर वह शेखपूरा की ओर चला जा रहा था। जैसे-जैसे गंतव्‍य निकट आ रहा था उसे पगडंडियों पर साइकिल लेकर फरफराते हुए गुजरना याद आ रहा था। एक घंटा नहीं तो डेढ़ घंटे में जरुर पहुँच जाएगा। पारिवारिक रिश्‍तों में आए कालजन्‍य परिवर्तनों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है न ही यह पक्‍का है कि खेत-खलिहान और गाँव के मकान के बँटवारे का क्‍या होगा। लेकिन इतना जरुर था कि किनारा टूटी प्‍याली में खूब चीनी वाली चाय पीने को मिलेगी। लस्‍सी या छाछ भी परोसा जा सकता है। रात के खाने में क्‍या मिलेगा यह मेजबान के ऊपर है। बिस्‍तर पर मच्‍छर भी काटेगे लेकिन सुबह उठने पर बाल सूर्य के मनोरम रुप का दर्शन होगा। कुटुम्‍ब के किसी लड़के को लेकर खेतों के बीच लहराती पगडंडी पर दूर तक सैर को निकला जाए तो रास्‍ते में ठंडी हवा अपनेपन से गालों को सहलाएगी। 

 

यू.डी. को लगा कि अगर यहॉ से कोई उसके फ्लैट में पहॅँचता तो वह ड्राइंग रुम में बैठता लेकिन उससे आगे नहीं बढ़ता। पर यहाँ लोग उसे अपने अनाज रखने वाला कोठार तक दिखाएगे बिना नहीं मानेगें। वह समझ नहीं पा रहा था कि मूल विषय पर एकाग्र होने की बजाए शताधिक विषयांतरों में क्‍यों उलझ रहा है।     

मनीष कुमार सिंह

एफ-2, 4/273, वैशाली, गाजियाबाद,

उत्‍तर प्रदेश, पिन-201010

08700066981

ईमेल:manishkumarsingh513@gmail.com

मनीष कुमार सिंह का विस्तृत परिचय यहाँ पढ़िये.

 

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