... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

द्वार से परे

कुछ दिनों से शीतला के हृदय में रह रह कर जनक ,जननी और जन्मभूमि के लिए प्रेम टपकने लगा था. एक लौटी संतान होने का आभास जब से हुआ ,मन की असीम छटपटाहट से परेशान होकर, उन जाने पहचाने रास्तों, पेड़ों, तालाबों की और घर की करुण पुकार पर, आज पंद्रह वर्ष बाद वह अपने मायका जा रही थी. मुंबई से तीन दिन के ट्रेन यात्रा  से थका उसका शरीर मन को साथ नहीं दे रहा था. सोच रही थी, जल्दी से जल्दी पंख लगा कर, उड़ कर वह धड़धड़ाती हुई, अपने घर के आँगन में पहुँच जाय. सिर पर बड़े बड़े बिखरे बाल, कमर से ऊपर नग्न शरीर कंधे पर मैला सा अंगोछा रखे रिक्शा वाला अपनी मोटी और फटे प्लास्टिक के चप्पल वाले पैर को पैडिल पर  पूरे रफ्तार से चल रहा था. जगह-जगह टूटी सड़कें, कई बार रिक्शे को उलटने से बचाने के लिए रिक्शे वाले  को खुद नीचे उतर कर खींचना पड़ा था. पति  चुपचाप उसके साथ बैठा, सामान के ढेर को हाथ से पकड़े हुए था, कहीं फिसल कर गिर न जाए, कितना कुछ लाई है वह अपने माता पिता के लिए, माँ को चँदेरी साड़ी कितनी पसंद थी, और बाबूजी को पार्कर पेन, हमेशा लिखते पढ़ते रहते थे. उनके जूते, उनके चप्पल, सुनहरे फ्रेम वाला चश्मा, और भी बहुत कुछ. चश्मा की याद में उसकी आंखे भर आई थी.

पिता उसे अपनी कुर्सी पर बैठा कर उनके आँखों पर अपना चश्मा लगा देते थे, ‘मेरी बेटी एकदम जज लग रही है. मैं इसे जज ही बनाऊँगा.’

बचपन की अनेक यादों से पीछा छुड़ाती हुई , अपने आप में मगन शीतला इधर उधर किसी परिचित चेहरे की तलाश में व्याकुल होकर देख रही थी, मानो जिस पर नजर नहीं गई, कहीं वही तो उसका सगा, उसका जानकार नहीं था.  मगर वहाँ, सारे के सारे चेहरे ऐसे थे जिन पर पंद्रह वर्ष पहले तक के, उसके अतीत का कोई पहचान या उल्लेख नहीं था.

पक्की सड़क छोड़, रिक्शा जब कच्ची सड़क की ओर धीरे धीरे लुढ़कती हुई आई, तो उसका चेहरा अचानक पश्चिम  में तकरीबन अस्त होते सूरज की लालिमा से रक्ताभ हो उठा, पसीना-पसीना ,शरीर. अभी धूप में गरमी बाकी थी. चारों ओर लहलहाते खेतों और मेड़ों पर कतार में खड़े ताड़ के पेड़ों को देखती,  जेठ के भास्कर के रश्मियों की परवाह किए बिना रिक्शे से उतरने के लिए उताहुल हो उठी, “ मैं पैदल ही चल रही हूँ, घर तो आ ही गया मेरा, इस मंदिर के तनिक पीछे.”

“नहीं ! ऐसा मत करो, तुम अब पहली बार जा रही हो, रिक्शा पर ही चलना चाहिए, वरना, इस तरह भागते हुए आते देख कर, लोग क्या-क्या नहीं सोच लेंगे.” पति के अर्थपूर्ण बात पर उसके बढ़े हुए पाँव वहीं के वहीं ठमक गए थे. उसके चेहरे की चमक ने शायद पति को यह बता दिया था कि "चलो, तुम्हारी यह बात मान लेती हूँ मात्र दो मिनट में तो मेरा घर आयेगा  ही. ”

रिक्शे के  घंटी की आवाज सुनकर आस पास के घरों के कुछ बच्चे अवश्य जमा हो गए थे, मगर वह किसी हो कहाँ पहचान रही थी, और न  उसे अपने घर का थाह ही लग रहा था. गाँव में अनेक पक्के मकान बन गए थे. किसी ने खलिहान में घर बना लिया था, तो कोई बाड़ी में, कहीं-कहीं सड़क का कुछ हिस्सा घेर कर पशु बांध दिया गया था, कुछ दुकानें भी खुल गई थी. यहाँ कोई पोखर हुआ करता था, वह भी नहीं है, शायद कोई दूसरे गाँव में तो नहीं आ गए .

"हरिश्चंद्र बाबू का घर कौन सा है?” उसके पति के पूछने पर किसी राह चलते नौजवान ने उन्हें अंदर जाती गोहाली के पीछे का रास्ता दिखा दिया.

“अच्छा !तो अब यहाँ गौशाला भी बन गया !" शीतला को बेहद आश्चर्य हुआ था.

अधीर शीतल जब अपने घर के समक्ष पहुंची, तो कुछ पल के लिए वह जड़वत रह गई. उसका घर गाँव का ही नहीं, बल्कि अनेक गांवों में सबसे प्रमुख और विशाल एवं खुशहाल हुआ करता था. उसके बड़े दो-मंजिले मकान की चुहचुही दूर से ही देखने वालों की आँखों में बस जाया करती थी. कितनी कीर्ति पताकाएँ ,ध्वजा उसके पूर्वजों की फहराया करती थी. अभी भी महामहो का नाम पट्ट दरवाजे के शिला लेख में सुशोभित था. विशाल दरवाजे के सामने दो गरजते हुए शेर खड़े थे, प्रस्तर मूर्ति बनकर. यह सिंघ  दरवाजा अतीत में  कितने विशिष्ट जनों के, वहाँ  आगमन का साक्षी बना था. चारदीवारी से घिरे उस इमारत के कैंपस में आगे पीछे अनेक फलदार पेड़ लगे हुए थे, जिसमें यह मालदह आम का पेड़ तो उसने खुद ही लगाया था. हमेशा यहाँ दो चार आगंतुक रहते ही थे, मेहमान नमाज़ी के लिए भी यह घर प्रसिद्ध था.

अतीत की याद ने उसे भौचक कर दिया था. सिंह दरवाजा के  शेर पर कालिख पुते हुए थे. आगे का दरवाजा उखड़ कर मुंह के बल वहीं दंडवत करता, लेटा हुआ था, कुछ पेडों का निशान ही नहीं था, कुछ एकदम सूख चुके थे. घर खंडहर बना हुआ, वीरान सा दिख रहा था, दीवारों पर कितने जगह पीपल के, नीम के पेड़ निकल गए थे, जंगली झाड़, काँटे, भांति भांति के पौधे वहाँ लगता था, वर्षों से अपना अड्डा जमाए हुए थे : एक दम भुतहा हवेली.  एक बड़ा सा पीपल का पेड़, ठीक रास्ता रोक कर अलसाए हुए ऐसे खड़ा था मानो यह जागीर अब उसकी ही निगहबानी में तड़प रही है। पता नहीं यहाँ कोई रहता भी है या नहीं, मगर पूछे तो पूछे किससे? कहीं कोई दिखाई भी नहीं दे रहा था, हाँ एक काली मोटी बिल्ली अपनी चमकती आँखों से उसे गहरे अंदाज में देखती हुई बिलकुल करीब से गुजर गई थी. धड़कते हृदय से शीतला दरवाजे पार करती हुई, घर के खुले आँगन तक आई. ओसारे पर पटिया बिछा कर अपनी पुरानी पहचान खोकर, दीन हीन सी, मलिन साड़ी में माँ लेटी हुई थी. आहट पर उसने भी अपना सिर उठाया था, व्यग्र शीतला दौड़ती हुई बिछड़े बछड़ी की तरह अपनी माँ से लिपट कर फूट-फूट कर रो पड़ी थी. माँ भीअपनी उस एकलौती संतान को  बरसों बाद  अपने कलेजे से छह मास की शिशु की भांति अधीरता से भींचे हुए रिरियाती जा रही थी.

अचानक पास की कोठरी से  झुकी हुई कमरऔर असमय बेहद वृद्ध एवं बीमार से दिखते पिता चौखट पर पाँव रखते ही चिहुक उठे. उनकी झुकी कमर तुरंत सीधी हो गई थी, पिचके हुए गाल पर त्वरित वेग से क्रोध का लेप चढ़ गया, सूखी, सूनी आँखों में क्रूरता की चिंगारी भड़क उठी, और वे पल भर के लिए वहीं ठिठक गए थे. शायद उन्हें इस दिन का इंतजार था. तब तक शीतला अपनी माँ से अलग होकर, आगे बढ़ कर उनका पाँव छूने के लिए अपना दोनों हाथ बढ़ाया ही था, कि पूरी ताकत लगा कर उन्होने उसे परे धकेल दिया, और अपनी पत्नी को कमरे के अंदर खींचते हुए भयानक नफरत से अपने भारी भारी आवाज में बस इतना ही कहा था, “ जानकी ! कह दो इसे  कि, बाप की  पगड़ी उछाल कर घर से भागी हुई बेटियों का कभी, कहीं भी, किसी भी समय वा समाज में  कोई मायका नहीं होता.”

और वे दोनों धीरे धीरे अंदर वाले कमरे में जाकर भीतर से चिटकनी लगाकर बैठ गए थे. 

घोर निराश और भग्नोत्साहित शीतला पल भर में बीमार और अशक्त रोगी की भांति, रिक्शे से समान उतारते पति के सामने खड़ी हो गई.

“ वापस चलो यहाँ अब कोई नहीं रहता है.”।

 

जैसा कि सभी संवेदन शील प्राणी के साथ होता रहा है । जो बात मुझे सही नहीं लगती थी ,बचपन से ही मैं उसके विरोध में मुंह खोलने लगी थी । मेरे पढ़ने की आदत ने मेरे विचार को और भी परिमार्जित करना प्रारम्भ कर दिया था । घर परिवार , ,विद्यालय ,विश्वविद्यालय तक कहीं भी कभी भी मैंने अपने लिए दोहरे मापदंड नहीं गढ़े। जैसी हूँ जो हूँ ,वो हूँ । ,सुकरात ,मार्क्स ,हीगेल ,सिगमंड फ्रायड से विशेष रूप से प्रभावित रही । फीडेल कास्त्रों,ज्यां पाल सात्र,जैसी विचार धारा अच्छी लगी ,और अच्छा लगा साहित्य के लिए प्रस्तुत विशाल क्षितिज पर उड़ान भरते हुए नव नव पाखियों का कलरव गान । हर कंठ में एक नवीन ध्वनि  है ,एक नई नई चेतना ,एक नई ऊर्जा से भरा समाज हमेशा एक प्रबल और प्रबुद्ध साहित्य को जन्म देता रहेगा ।

 

 आकाशवाणी दिल्ली से लंबे समय तक संबद्ध ,अनेकों पत्र पत्रिकाओं मे आलेख प्रकाशित ,इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदुइजम मे योगदान , कुछ पुस्तकें प्रकाशित । अनेक देशों की यात्रा ,संस्मरण प्रकाशन के कगार पर ।

 प्रकाशन

·       1 भारतीय जीवन मूल्य ,प्रभात प्रकाशन दिल्ली

2 प्रत्यंचा {हिन्दी काव्य संग्रह ,अनुराधा प्रकाशन दिल्ली

3 उपालंभ {मैथिली काव्य ,अनुराधा प्रकाशन दिल्ली

4 कबीर काने क {मैथिली कहानी संग्रह ,अनुराधा प्रकाशन दिल्ली

5 लाल काकी  {मैथिली कहानी संग्रह ,अनुराधा प्रकाशन दिल्ली

6 लखिमा ठकुराइन मैथिली

सम्पर्क - jk_kamayani@yahoo.in

 

 

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