पुनर्नवा

 

हाथ में भरी मेथी की अधकटी गड्डी और चाकू थाली में एकदम से छोड़ सुमन जी भागीं दफ्तर जाते पतिदेव देवेंद्र जी के पीछे. नाश्ते के बाद किचन से ही निकल कर गेट की ओर जाते देवेंद्र जी ने अपने पीछे कुछ हलचल महसूस की तो प्रश्नवाचक नजरों से मुड़ कर देखा?

सुमन जी तुरंत नीचे झुक कर कुछ उठाने का उपक्रम करने लगीं. जैसे कोई बात ही न हो बस यूँ ही.

देवेंद्र जी ने भी सुमन को व्यस्त जान ध्यान नहीं दिया. वैसे भी दफ्तर जाते समय जल्दी में ही होते है. सो धीरे से गेट खोला और बाहर निकल कर उसी तरह बंद करके अपने दफ्तर की ओर चल पड़े.

सुमन जी भी अब तेजी से चलती हुई आईं और गेट पर खड़े हो कर उन्हें जाते हुए देखती रहीं तब तक जब तक कि देवेंद्र जी दिखते रहे. कार्यालय परिसर में ही उनका रहवास था तो कार्यालय के अंदर जाते ही सुमन फिर वापस चलीं अपने रसोई घर की ओर. अब तक तो उन्हें ध्यान ही नहीं रहता था गृह कार्य निपटाते हुए कि देवेंद्र जी कब दफ्तर गए और कब वापस लौटे? वे तो उसी तरह जुटी रहती थीं सारे समय कोल्हू के बैल की तरह घर गृहस्थी के कार्य निपटाते हुए. लेकिन आज से ऐसा नहीं करेंगी वे, अब देवेंद्र जी को दफ्तर आते–जाते निहारा करेंगी वो. जैसे कि जब नई–नई शादी हुई थी तो करती थीं वैसे ही, जो कि जीवन की आपाधापी में गुम, भूल–सी चुकीं थी. उन्होंने निश्चय किया, अब कुछ गिने–चुने दिन ही तो बचे है फिर कहाँ होगा यह सब देखने को? रिटायरमेण्ट जो करीब है देवेंद्र जी का. तो फिर यह नजारा कहाँ? न यह विशाल सरकारी बंगला और न वह कार्यालय भवन उनका. हाँ इसी महीने तो रिटायर्ड होंगे वे, सरकारी नौकरी से. फिर कहाँ होंगे ये नजारे - ये जलवे? तो क्यों न संजो लें इन्हें स्मृतियों में!

पिछले महीने राघवन जी के रिटायरमेण्ट की पार्टी में गए थे. तब उद्बोधन देते समय राघवन जी का गला भर आया था. आश्चर्य से उन्होने देवेंद्र जी से पूछा – “वे रोने क्यों लगे? “

 “आखिर इतने दिनों का साथ जो छूटता है मन भर आता है, उदास हो कर छ्लकता ही है न.” – देवेंद्र जी ने समझाया.

 “यानी आप भी रोते हुए ही रिटायर्ड होंगे?” – सुमन जी पूछना चहती थीं मगर पूछा नहीं. उन्हें अब भी आश्चर्य था क्योंकि उन्होंने देवेंद्र जी को कभी रोते हुए नहीं देखा था. ना ही देखना चाहती थीं.

खैर! समय अपनी गति से चलता रहा. जब दशक के दशक बीत गए यूँ ही आते–जाते तो  इन कुछ बेचारे दिनों की क्या बिसात भला! वे भी उड़ गए फुर्र से जैसे. और वह दिन भी आ पहुँचा जब देवेंद्र जी को सेवानिवृत्त होना था. रोज की तरह ही वे तैयार हो कर निकले कार्यालय के लिए. सुमन जी ने मोबाइल फोन से विडिओ ही बना लिया उनका. दोपहर को जब वे लौटे तो विशेष रूप से तैयार हुई. सुमन जी ने पुष्पाहार – पुष्प गुच्छ से स्वागत किया. रोलि– अक्षत–आरती के साथ मुँह भी मीठा कराया. चमचमाते–बेदाग केरियर के लिए बधाई देते हुए कि उन्होंने अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से पूर्ण किए. देवेंद्र जी के चेहरे पर भी असीम शांति और संतोष दिखाई दे रहा था जो कि अपने कार्य को पूर्णता से पूर्ण करने पर होता है. एक महा समर या रण जीत कर सकुशल घर लौटे सफल योद्धा की तरह.

शाम को देवेंद्र जी के सम्मान में उनके सहकर्मियों द्वारा एक भव्य विदाई पार्टी रखी गई. पार्टी इतनी भव्य थी, शहर के इतने गणमान्य लोग आमंत्रित थे. ऐसी विदाई पार्टी उन्होंने अपने जीवन काल में – अपने कार्यकाल में नहीं देखी थी कभी किसी की. इतना गर्व महसूस हुआ, इतनी खुशी महसूस हुई दोनों को कि रोने-बिसुरने का ख्याल ही नहीं फटका पास में. गर्व और खुशी से उन्होंने महसूस किया कि – बस यही था जो वे पाना चाहते थे. जीवन भर की साधना का फल मिल गया हो जैसे. अपने कर्तव्य अच्छी तरह से करने का सुख और संतोष तो था ही उस पर यह सभी का अपार स्नेह – सम्मान मानो सोने पर सुहागा!

जब लौटे तो फूलों के हार और गुलदस्तों से भरा ट्रक उनके द्वार पर था, जिनसे उनका स्वागत-सम्मान किया गया था. अब सारा घर फूलों से भरा हुआ था. दूसरे दिन सुबह उन्होंने सभी फूलों से घर अंदर–बाहर से सजा दिया था. फूल-मालाएं टांग कर घर बाहर से पूरा सज उठा था और अंदर घर में जगह–जगह गुलदस्ते सजे हुए थे.

अगले दिन देवेंद्र जी ने भी अपने सभी सहकर्मियों–मित्रों–परिचितों के लिए पार्टी रखी.

महीना भर यूँ ही निकल गया, पार्टियां करते–कराते. इसी बीच वे अपने स्वयं के घर में भी शिफ्ट कर गए. विशाल सरकारी बंगला छोड़ कर आना थोड़ा उदास कर रहा था सुमन जी को विशेषकर बगीचा वहाँ का जो उन्होने पूरे जतन से सजाया–संवारा–सींचा था. खैर!  अपना घर फिर अपना ही होता है भले ही छोटा हुआ तो क्या? यहाँ आप जैसे चाहो रह सकते हो. कोई आपको नहीं कहने वाला जाने को. वहाँ की तरह नहीं कि जैसे खो–खो का खेल, कि कब कोई आ कर “खो” कह दे. और बांधते फिरो पेटी–बिस्तर स्थानांतरण होने पर.

कुछ दिन यूँ ही बीते हंसी–खुशी, बीते दिनों की यादें – बातें करते, घर व्यवस्थित करते. स्थान परिवर्तन भी नया उत्साह–उमंग भर देता है मनुष्य में. अब उन्होंने सबसे पहले तो अपनी दिनचर्या व्यवस्थित की जैसा कि पहले से ही तय था, मूड बना कर रखा था जीवन में आने वाले बड़े परिवर्तन का. सोना–उठना, खाना–पीना, सुबह–शाम घूमने जाना, पौधों की, पालतू डॉगी की देखभाल करना वगैरह.

इधर सुमन जी को तो कोई फर्क ही नहीं पड़ा था, उनकी दिनचर्या वैसी ही थी, घर–गृहस्थी वे उसी तरह संभाल रहीं थी. हाँ थोड़ा आराम जरूर था उन्हें. क्योंकि अब सुबह से ही कोई हाय–तौबा, भागमभाग नहीं मचती थी दफ्तर जाते पतिदेव के लिए. अब उनकी सुबहें शांत–शीतल हो गईं थीं. बल्कि कुछ अपनी स्वयं की यानी सुहानी–सी हो गई थी.

कुछ दिन और बीते, अब घर में आवक–जावक कम हो गई थी. और कईयों ने तो बाकायदा नजरें फेर ली थीं, तोता चश्म की तरह. क्योंकि पद के साथ उनके लिए व्यक्ति की उपयोगिता तो चली ही गई थी और उन्हें लगता भी हो शायद कि सेवानिवृत्त आदमी है यानी उन्हें तो कोई काम है नहीं, समय ही समय है उनके पास तो कहीं हमारा समय ही न खाने लगे. गोया कि एक बार जो आ कर बैठ गए तो जाने का नाम ही न लें क्योंकि उन्हें तो कोई काम ही नहीं है न तो समय ही समय है उनके पास, तो उन्हें समय की क्या चिंता. और फिर बातें भी वही करेंगे अपने अतीत की कि उन्होंने क्या–क्या , कैसे–कैसे तीर मारे, अपने कार्यकाल में वगैरह–वगैरह.

हालांकि देवेंद्र जी को इसका एहसास पहले से ही था, जैसा कि होता है हर कामकाजी, कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति को, जब वे अपने कार्य के साथ दूसरों के कार्य–समय का सम्मान करते हैं पूर्ण रूप से. वे कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं करते जिससे किसी अन्य को अपने कार्य–कर्तव्य पूरे करने में असुविधा हो. यूँ भी जीवन भर व्यस्त रहे थे वे तो बेकार में ही कहीं आने–जाने–बतियाने की आदत भी नहीं रही थी. बस घर से कार्यालय और कार्यालय से घर, अपने में ही मगन. तो अब भी वे किसी को डिस्टर्ब नहीं करते थे.

फिर भी घर में अकेले बैठे–बैठे बोर तो होते ही थे. उन्हें याद आता गुजरा जमाना! जब चन्हु ओर से लोग–बाग उन्हें घेरे रहते थे. वो सुबह तैयार हो कर निकलते ही पत्नी का चटपट नाश्ता लगा देना, दवाइयाँ वगैरह रख देना, उसके पहले भी उनके कपड़े–जूते–मोजे–रूमाल–मोबाइल–पर्स वगैरह सब व्यवस्थित जगह पर मिलते थे. फिर जब कार्यालय पहुंचते तो सब चौकन्ने–सजग, सर–सर करते. जबकि अब वे सब नजारे गायब थे. और उन्हें शिद्दत से महसूस होता कि सच में, अपने काम से ज्यादा सगा अपना कोई नहीं. काम सिर्फ जीविकोपार्जन ही नहीं होता है उससे कहीं आगे अपना सबसे अपना–सगा होता है. जो व्यक्तित्व निखरता है, आप में उमंग–उत्साह का संचार करते हुए आत्मविश्वास से भर देता है.

लेकिन ये सेवानिवृत्ती भी क्या चीज है! आसमान से सीधे गिरते है जमीन पर!! बिना खजूर में अटके!!! एकदम धड़ाम से, परचखे उड़ गए हो जैसे, अब बीनते–बटोरते रहो एक–एक अस्थि पंजर. थोड़ा खजूर में अटके होते तो कुछ समय मिल जाता जमीन पर आने की जुगत लगाने को और सही सलामत उतरते जमीन पर, बिना टूटे–फूटे, स्मूथ लैंडिंग होती तब. खैर! शास्वत सत्य है यह कि जो आया है वह जाएगा भी यहाँ से, फिर चाहे दुनिया हो या सरकारी नौकरी. 

यूँ तो कई रुचियाँ थी उनकी छात्र जीवन में – गाना–बजाना–चित्रकारी वगैरह. लेकिन जीवन की आपाधापी में वे भी पता नहीं कब-कहाँ पीछे छूट गई? कहीं बहुत पीछे कि जहाँ से उनका कोई सिरा भी पकड़ में नहीं आ रहा था. कोई नामोनिशान ही नहीं दिखाई दे रहा था.

सुमन जी भी उन्हें इस तरह एकाकी–उदास बैठे देखती तो चिंतित होतीं. उनका कुछ समय बंटाने की कोशिश भी करती, अपने तरीके से – अपने स्तर पर. लेकिन यह भी ठीक से नहीं हो पाता था. बल्कि कभी–कभी तो वे ही झुंझला उठतीं देवेंद्र जी पर. आखिर उन्हें तो उसी तरह घर–गृहस्थी संभालनी पड़ रही थी न अभी भी! इस उम्र में भी! तो वे या तो व्यस्त रहती या फिर थकी हुई. हालांकि देवेंद्र जी भी मानसिक रूप से तैयार थे इस स्थिति से निपटने को और वे भी गृहकार्य में सुमन जी का हाथ बंटाने की कोशिश करते. मगर सब उल्टा–पुल्टा हो जाता, आदत में जो नहीं था, कभी किया ही नहीं तो. 

ऐसे ही दिन बीत रहे थे उठते–गिरते, सैंसेक्स की तरह. उस दिन सुमन जी दोपहर से ही गई हुई थी कॉलोनी के ही शर्मा जी के पौत्र के मुंडन संस्कार कार्यक्रम में. शाम को जब वे लौटी तो मधुर संगीत लहरी कानों में पड़ी, तो वे चौंकी! सीढ़ियाँ चढ़ कर जब वे ऊपर आईं तो देखा टैरेस गार्डन के बीच घास पर बैठे देवेंद्र जी तन्मयता से माउथ ऑर्गन बजाने में तल्लीन है --- “ है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पे आएगा ----------टिंगडिंग – डिंग – डिंग – डिंग - डिंग --------------- टिंगडिंग – डिंग – डिंग – डिंग - डिंग -------" वे खड़ी देखती ही रह गईं, मंत्रमुग्ध कि तभी देवेंद्र जी कि नजर उन पर पड़ी और वे मुस्कुरा दिए.

सुमन जी को महसूस हुआ कि जैसे वे उन्हीं देवेंद्र जी को देख रही हैं जिनसे वे छत्तीस वर्ष पूर्व मिली थीं.

 

चेतना भाटी से सम्पर्क - chetanabhati11@gmail.com

संक्षिप्त वर्णन - दो दशकों से अधिक समय से सतत साहित्य साधनारत चेतना भाटी की साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे - व्यंग , लघुकथा , कहानी , उपन्यास , में अब तक आठ कृतियाँ प्रकाशित । तीन प्रकाशकाधीन । बी . एस - सी . एम . ए. एल - एल . बी . तक शिक्षित , म . प्र . लेखक संघ भोपाल द्वारा काशी बाई मेहता सम्मान प्राप्त ।

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