... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

एटैचमेंट

      ‘-रहने दो माँ, ये सब तेरी समझ में नहीं आयेगा.’

माँ मुझे असमंजस भरी निगाहों से देखती रही. उसकी व्याकुलता को रोकने के लिए मैंने बात आगे चलाई, ‘अच्छा हुआ माँ तुम आ गई, वरना यहाँ तो मैं बिलकुल अकेली पड़ गई हूँ.’ जितना हो सकता था उतनी सहजता से मैंने कहा.

‘अरे, तुम्हें तो मजे ही मजे है. इतने बड़े शहर में इतना बड़ा बंगला किसे मिलता है भला?’ अपने शरीर को सोफे पर टिकाते हुए पूरे बंगले में नजर कर के खुशियों की चमक-दमक देखकर माँ बोली, ‘इतनी बादशाहियत तो किसी को सपने में भी नहीं मिलती, निशु, तुम वाकई बड़ी खुशकिस्मत हो.’

हँसकर मैं माँ के करीब आ गई. वो बोली, ‘तेरे बच्चे अच्छे-से स्कूल में पढ़ते है, मनीष कुमार तेरा इतना खयाल रखते हैं, किसी बात की कोई जिम्मेदारी तुम पर नहीं, ना ही कोई कमी, तू अकेली कहाँ हुई? निशु तेरे पास जीवन के कितने सारे सुख हैं!’

‘अब छोड़ो न माँ, तुम भी ये कैसी बातें लेकर बैठ गई? रहने दो, ये सब तेरी समझ में नहीं आयेगा.’ माँ के सामने बैठते हुए चहेरे पर पड़ी निःश्वास की लकीरों को छुपाकर मेरे मुँह से फिर वही बात निकल गई.

बहुत साल बाद माँ आज मेरे घर आई है. मनीष तो हमेशा बिज़ी ही रहता है, सुबह जल्दी ही ऑफिस के लिए निकल गया था. जाते वक्त कहता गया था, ‘ड्राईवर को तुरंत वापिस भेजता हूँ. वो तेरी मम्मी को ले के आ जायेगा. तुम फिकर मत करना.’

कंपनी ने बंगले के साथ गाड़ी भी दे रखी है. ड्राईवर माँ को ले आया था और बाद में बच्चों को स्कूल छोड़ने गया. मेरे लिए वाकई फिकर करने की कोई बात ही नहीं थी. जरूरत से पहले ही सारी चीजें मिल जाती है. घर का कोई काम करना भी नहीं होता. दिन भर फुरसत ही फुरसत! वक्त बिताने मैं खुद ही कोई-न-कोई काम हाथ में लेकर बैठ जाती थी.

कॉफी के दो मग टेबल पर आ गये. कॉफी पीते-पीते माँ ने पूछा, ‘तुम खुश तो हो न? मनीष कुमार तुम्हें ठीक से रखते तो है न?’ माँ की आँखों में चिंता की हलकी-सी चिंगारी पैदा हो गई थी.

‘शादी के इतने साल बाद तुम ये कैसा सवाल पूछ रही हो माँ? देख तो रही हो, मैं कितनी सुखी हूँ! किसी बात की कमी नहीं मुझे. मनीष मेरी बहुत अच्छी तरह से देख-भाल करता है. हर तरफ सुख ही सुख है, माँ मैं तो सुख की सेज पे खुश हूँ.’

माँ के मन में जगी चिंगारी को बुझाने का मैं प्रयत्न करती हूँ. उसके दिल को मेरे जवाब से ठंडक पहुंची, ऐसा लगता है.

कपडे धोने मैंने वॉशिंग मशीन ऑन किया तो माँ बोली, ‘हमारे यहाँ तो आँगन की चौकडी में ही घर की महिलाएँ सब के कपडे धोने इकट्ठी होतीं थीं, निशु, वो दिन तुझे याद भी है क्या?’

‘क्यों नहीं? सब कुछ याद है. टंकी से पानी लेना, चौकडी के पत्थर पर कपड़े रगड़ना, और माँ पता है? पापा के कपडे से कभी बटवा निकलता तो कभी घड़ी, और उस बात को लेकर तेरे और पापा के बीच कैसी मीठी नोंक-झोंक.होती थी! आँगन से जुडी हमारी और रंजनमासी की दीवार से टँगी कपड़े सुखाने की डोरी पर कपड़े सुखाना भी कितना रोमांचकारी होता था, याद है? उस समय रोज ‘यकायक’ आ टपकती बातूनी पड़ोसन ... रंजनमासी से बातें करना, क्या मजे होते थे ... है न माँ?’ उत्साह में कितना कुछ मैं बोलती रही.

मानो ... एक पल में फिसलकर मैं दूर जाके गिरी अपने उस आँगन में! सब से पहले तो दौड़कर खुली टंकी में दोनों पैर डूबो दिये मैंने ... आह! क्या उसकी ठण्डक! पानी में छब-छब कर के पूरे पानी को सागर बना दिया. उस समंदर की लहरों से मेरा भीगा हुआ अल्हड बचपन भी मेरे साथ खेलने बाहर दौड आया. खुशियां छा गईं. दीवारों से बँधकर भी हवा में मुक्त उड़ रही कपड़े सुखाने की डोरी को पकड़ कर उस पर मैं झुला झुलने लगी. वो घर और पूरा का पूरा आँगन मानो मेरे साथ झूमने लगा. मैं झुलती हूँ या पूरा आँगन झुल रहा है ... क्या पता? आह ... कैसा जाना-पहचाना-सा आनंद! पापा ने देख लिया तो खैर नहीं, और रंजनमासी के विरु ने देख लिया तो वह तो हाथ में बैट लेकर ही दौड़ेगा ...
डोरी तो हाथ से छूट गई, मैं जमीन पर आ धमकी ...

पापा तो अब कहाँ ?

और, विरु तो ...

 

माँ ने मुझे थाम लिया और अगले पल में आ गिरी माँ की गोद में ... वापस. ऐसा लगा जैसे जल्दी में कुछ पीछे छूट गया हो.

माँ कहने लगी, ‘मजा? मजा तो अब तेरे जीवन में है निशु, देखो न, एक स्विच चालू करते ही ये वौशिंग मशीन चालू. कोई दिक्कत ही नहीं. जीवन के असली सुख तो अब तेरे पास आये हैं, मेरी बच्ची.’

‘इस मशीन में सबकुछ हो जाता है माँ, फुल्ली ऑटोमेटिक. कपड़े धुल जाए, रगड़ भी दे, सुखा भी दे, सब फंक्शन एटैच होते है. लेकिन इसमें हमारे उस आँगन का एटैचमेन्ट नहीं माँ.’ मैंने कहा.

‘मतलब?’ माँ का सवाल होता है, लेकिन मेरे पास उसके उत्तर कहाँ ?

‘रहने दो माँ, ये सब तेरी समझ में नहीं आयेगा.’ मैंने कहा और वौशिंग मशीन के बजर ने मेरे बाकी के शब्दों को बचा लिया.

दोपहर खाने के वक्त डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए माँ बोली, ‘मनीष कुमार नहीं आयेंगे खाने पे? सब साथ में बैठेंगे, बुला ले उन्हें भी.’

‘अरे माँ उसका कोई ठिकाना नहीं होता. लंच में तो शायद ही कभी वे घर आते है. टिफिन की भी उन्हें आदत नहीं. काम से फुरसत मिले तो कैन्टीन में खा लेते हैं. नहीं तो कॉफी और काम, ये दो ही उसकी खुराक है. अब क्या करूं? सबका अपना अपना एटैचमेन्ट.’ मैंने कहा.

‘ऐसी काम की क्या बला होती है भई जो खाने को भी भूला दे?’ माँ ने पूछा.

‘ये सब तेरी समझ में नहीं आने वाला माँ, तू खाना शुरु कर, मैं हूँ न तेरे साथ.’

मैंने माँ को बिठाया और परोंसने लगी, ‘ये चखो तुम, यहाँ का मशहूर आचार है. पसंद आयेगा. लजीज है. सारी रसोई मैंने खुद ही बनाई है, तुम खाओ, मैं पापड ले के आती हूँ.’

कुछ चखने के बाद माँ ने पूछा, ‘निशु, तुम सारे आचार मसाले बाहर से रेडीमेड मंगवाती हो? याद है, सीज़न में पास-पडौस की महिलाएँ भी हमारे ही आँगन में इकट्ठी होकर आचार, पापड़ और सारे मसाले खुद ही बनातीं! कितने दिनों तक वह खुशियाँ हमारे आँगन में महकती रहती थी न निशु!’

‘मैं कैसे भूल सकती हूँ? रंजनमासी भी आती थी. मैं तो अचार-मसाले के मौसम का ही इंतजार करती रहती. सारी महिलाओं से कोई-न-कोई नई बात सीखने-समझने को मिल ही जाती थी. पास-पडौस का वो अपनापन, वो सायुज्य, वो सौजन्य, वो निराला एटैचमेन्ट कैसे भूल सकता है कोई भला?’ मैंने कहा.

मेरी नजर के सामने मेरे उस आँगन का रंगीन दृश्य उभरने लगता है. आँगन की धूप में सुखाये हुए पापड़ को विरु हाथों से चेक करता है, कोई हरी हल्दी सुखाता है तो कोई सूखे धनिया-जीरु को साफ करता है. कोने में पड़े रहे कूटने के पुराने साधनों का स्थान तो अब मिक्ष्चरों ने ले लिया होगा.

बिखरे हुए सारे दृश्य भी बहुत तेज़ रफ्तार से उलट-सुलट होकर नजरों के सामने खडे हो रहे थे. पानवाले से मांग के लाये हुए सुपारी काटने वाले बडे-से सूडे से कच्चे आम को काटता हुआ विरु देखाई देता है. धूप में सूख रही हरी हल्दी को देखकर रंजनमासी माँ को प्यार से पूछती, ‘इस साल आपकी निशु के ब्याह लेना हो तो हल्दी जरा ज्यादा बनाते है, भले छोरी का रूप जरा और निखर जाए ... हां.’

शरमाना तो मैंने सीखा नहीं था सो मैं भी सब के साथ हँस पड़ती. रंजनमासी की बातों से और किसी को भी अगर नशा चढ़ जाये तो वो भी बोले, ‘अगर तय है तो जल्दी बताना जरा, मैं इस धनिये को साफ करती हूँ तो इसमें जीरु डालना है या गुड, - पता तो चले!’

फिर सब ठहाके लगाते, विरु को कुछ मजाक सूझता और वो ‘मैं गुड ले आऊँ,’ कहता दौड़ता, मैं उसका पीछा कर के उसे पकड के फिर कच्चे आम काटने बिठा देती. ऐसी ही किसी मस्ती में एक दिन उसके सूड़े में मेरी उंगली कट गई थी, और कच्चे आम के टुकड़े मेरे लहू से लालम-लाल हो गये थे!

उस समय विरुडा उतना ही बोला कि, ‘अब अचार में कोई मिर्ची मत डालना, मिर्ची का रंग और तीखापन – दोनों इस निशुडी ने कच्चे आम में मिला दिये है!’

 

-‘अचार कुछ फीका नहीं लग रहा निशु? तीखेपन में भी और रंग में भी?’ माँ ने पूछा और मैं फिर आँगन से फिसलकर वापस आ गई.

‘वो तो फीका लगेगा ही न ... लहू का कोई ‘एटैचमेन्ट’ ही कहाँ अब!’ मैं कहाँ बोली, मेरे मुँह से शब्द निकल पड़े.

‘मतलब?’ माँ का प्रश्न स्वाभाविक ही था.

‘रहने दो माँ, ये सब तेरी समझ में नहीं आयेगा.’ मैंने कहा, ‘तुम आराम से खाना खाओ न माँ, मुझे तो अब दाल-चावल चाहिए. तुम्हें पापड दूँ क्या?’

रह-रह के ऐसा बार-बार महसूस हो रहा है कि जैसे कुछ पीछे छूट गया हो.

यहाँ तो एटैचमेन्ट-सा कुछ नहीं. वौशिंग मशीन, मिक्ष्चर, फ्रीज़, ए.सी., ऑवन, ग्राईन्डर, वैक्युम क्लिनर, एक्वागार्ड, लेपटोप, स्मार्टफोन, गीज़र जैसे गेजेट्स ही सारे काम आसान कर देते. इन सारे मशीनों का जरूरत के हिसाब से आकर्षण रहता, पर वो निराला सायुज्य, वो अपना-सा संधान, वो पहचाना-सा एटैचमेन्ट कैसे मिले!

 

 

 

 

हमारे आँगन में होम-हवन या कोई शुभ अवसर होते तब पास-पडौस के खुशहाल चेहरों की आँगन में भीड़ लग जाती थी. सब मिल के काम करने लगते. उस मेले में सब के सुख-दुःख शेयर हो सकते, सुख हो या दुःख; बँट जाते. घरेलू स्किल्स सीखने को मिल जाते. अब माँ को ये कैसे समझाऊँ कि तूने जो घरेलू कौशल्य मुझे सिखाये हैं वे सब यहां मेरे किसी काम में आते ही नहीं!

यहाँ तो पडौस में भी सब लोग अपने आप में व्यस्त रहते है. दिन में तो पूरी सोसायटी के बंगलो में सिक्योरीटी मैन और पालतू कुत्ते ही रहते है. बाकी सब सुनसान रहता है. इसमें अपनेपन वाला सायुज्य कहाँ ढूँढे? ज़ीरो एटैचमेन्ट!

सोफे पर बैठी माँ को फिर से कुछ याद आया, ‘निशु, एक बार छुट्टियों में जब तुम घर आई थी तब कॉलेज के समय की तूने लिखी कोई डायरी ढूँढ रही थी न?’

‘अरे ... हाँ ... हाँ, माँ. तुम्हें याद है?’ मैंने पूछा. मेरे दिल को भी याद आया. कॉलेज के समय मुझे कविता का शौक़ लगा था. थोड़ी बहुत कविताएँ उस डायरी में लिखी थी. मनीष को कभी जबरदस्ती सुनाती तो वह बोलता, ‘देखो निशु डार्लिंग, मैं एक पत्नीव्रत पुरुष हूँ. केवल तुम्हें ही प्यार कर सकता हूँ, तेरी इन हसीन कविताओं को नहीं.’

फिर तो मैं जो कुछ भी लिखती उसे सुनाने के बदले सोशियल साइट्स पर शेयर कर के मन को मना लेती. लेकिन कुछ ही दिनों में मनीष ने कहा, ‘निशु, तेरी कविता पर ‘वाह’वाही’ फेंकनेवालों के कर्सर तेरी कविता से भी ज्यादा तेरे प्रोफाईल पिक्चर पर मंडराते रहते है, उन सभी के प्रोफाइल मैंने देखें हैं. एक बार तेरी कोई उत्तम कविता मेरे नाम से शेयर कर के देख लेना जरा, अपने आप माजरा समझ में आ जायेगा. ये सारे ‘कमेन्टिये-मैन’ महज़ पहली बारिश के मेढ़क से ज्यादा कुछ नहीं होते. तू छोड़ ये सब शेरिंग-फेरिंग, सब फालतू है.’

उस दिन से शेरींग का ही नहीं बल्कि कविता से भी एटैचमेन्ट छूट गया. बाद में तो मायके भूल आई. कविता की मेरी वो डायरी मैं भूल चूकी थी.

‘माँ, कभी वो रद्दी सामान वाला ऊपर का बड़ा-सा कबाट साफ करो तो देखना जरूर. लाल रंग के टाइटल वाली बुक है. मिल जाये, तो मुझे भेज देना.‘ मैंने माँ को कहा.

‘अरे! मैं अपने साथ ले के ही आई हूँ तेरी वो डायरी.’ कहकर माँ ने फुर्ती से खड़े होकर अपने बैग से मेरी डायरी निकाल के मेरे हाथ में थमाई और बोली, ‘विरु आया था उस दिन, तो उसे ही कबाट पर चढाया था. पूछ भी रहा था कि लाल रंग के टाइटल वाली डायरी ही चाहिए ना? बेचारे ने दो घन्टे की मेहनत के बाद आखिर ढूँढ ही निकाली. नीचे आया तब उसका चेहरा भी पसीने से भीगा था. फिर बोला कि मैंने तो कबाट के ऊपर ही बैठकर पूरी डायरी पढ ली! बारकस अभी वो सुधरने वाला कहाँ!

मैं तरबतर हो उठी. ऐसा लगा जैसे पीछे कुछ छूट चुका है, और मैं उसे पकडने दौडने लगती हूँ. मैंने वो डायरी जल्दी से अपने हाथों में ले ली. भारी रोमांच के साथ मैं वो डायरी खोलती हूँ.

पहले ही पन्ने पर ... बसंत का गीत,

दूसरे पन्ने पर किशोरी का कलबल कलबल थनगनाट,

तीसरे पन्ने पर ... चातक की प्यास,

चौथे पन्ने पर ... मेघराजा का स्वागत,

पाँचवे पन्ने पर ... विरहिणि का अरण्यरुदन,

छठे पन्ने पर ... जीवन का सत्य,

और आहा! सातवें पन्ने पर ... एक तरोताजा गुलाब का फूल ... हा, बरसों से पन्नों के बीच दबा हुआ होते हुए भी अभी-अभी जैसे खिला हो ... ऐसे ताजगी सभर सायुज्य की खुश्बू उस फूल से आने लगती है.

मुझे एक और एटैचमेण्ट याद आ जाता है. मेरी भीग रही आँखों को पढ़ती हुई माँ फिर पूछ बैठती है, ‘निशु बेटा? क्या हुआ?’

मैं स्वस्थ होने की कोशिश करती हूँ, ‘माँ..’-

मुझे बीच में ही रोकती हुई माँ मेरे पास आती है, मेरी पीठ पर अपना हाथ रखती है, और हौले से बोलती है, ‘रहने दे निशु, ये सब मेरी समझ में नहीं आयेगा!’

 

 

-अजय ओझा का परिचय यहाँ पढ़ें

सेल-०९८२५२५२८११

oza_103@hotmail.com
 

५८, मिरा पार्क, ‘आस्था’,

अखिलेश सर्कल, घोघा रोड,

भावनगर-३६४००१(गुजरात

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