... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

गुड्डी

दरवाजा खोला तो वे तीनों सामने खड़े थे। उनका पहनावा देखते ही मैं समझ गई थी कि वे वही लोग होंगे जिनके बारे में डा. कुंतल ने जिक्र किया था। फिर भी, प्रश्नभरी नजरों से देखते हुए मैंने पूछा – डा. कुंतल ने भेजा है तुम्हें? आदमी ने ‘हां’ में गर्दन हिलाई और उसकी बीबी ने सिर के पल्लू को सरकने से रोकते हुए कहा – ‘हां जी, बीबी जी’।

चार-पांच साल के उसके बच्चे ने उसका पल्लू कस कर पकड़ा हुआ था और वह एकटक मुझे देखे जा रहा था।

‘अंदर आ जाओ, बैठ कर बात करते हैं’ – यह कहते हुए मैं दरवाजे से हट गई।

वे तीनों अंदर आकर कुछ सकुचाए से जमीन पर बैठ गए।

मैंने बात शुरू करते हुए पूछा – ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

आदमी ने जवाब दिया – ‘जी मेरा नाम हरकिशन है, ये रामदेई है-मेरी बीबी और यह हमारा बेटा है जगदीश’।

‘रामदेई तो हमें कोई बुलाता नहीं बीबी जी, सब हमें गुड्डी ही कह कर बुलाते हैं। आप भी हमें गुड्डी ही कह कर आवाज देना’- उसकी बीबी ने टोका था।

मैंने नजर भर कर उसे देखा – बीस-इक्कीस साल से ज्यादा की उम्र नहीं होगी उसकी। छरहरी काया और सांवली सूरत में एक अलग सा आकर्षण था। उसकी आंखों से भोलापन टपक रहा था। सूती सस्ती धोती उसने बेतरतीब सी बांधी हुई थी। गहरे सांवले रंग का बच्चा अभी भी उसका पल्लू पकड़े खामोश बैठा था, पर उसकी हैरत भरी नजरें कमरे में रखी हर चीज पर दौड़ रही थीं। पाजामा-कुर्ता पहने और सिर पर बड़ी सी पगड़ी बांधे उसका मरद अपनी बीबी की बात सुनकर घनी मूछों में मुस्करा रहा था।

‘चलो, ठीक है मैं तुम्हें गुड्डी ही कह कर बुलाउंगी। अब यह बताओ, तुमने कभी पन्द्रह-बीस लोगों के लिए खाना बनाने का काम किया भी है? मेरे घर में अगले हफ्ते करीब इतने ही रिश्तेदार इकट्ठे होंगे। उनके लिए चाय-नाश्ते से लेकर दोनों टाइम का खाना बनाना है? कर लोगे तुम?’

‘क्यों नहीं, बीबी जी। पिछले दो बरस से घरों में खाना बनाने का ही काम कर रहे हैं। कुछ भी बनवा लेना आप। बस एक बार समझा देना, फिर आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा’।

‘वो तो बताना ही पड़ेगा, किस स्वाद का खाना-पीना चाहिए हमें। पर, एक बात मैं साफ बोल देती हूं, घर में झाडू-पोंछा लगाने और बर्तन मांजने का काम भी तुम्हें ही करना होगा। इसलिए अगले हफ्ते मंगलवार से रविवार तक तुम यहीं रहोगे। मैं एक कमरा तुम्हारे लिए खोल दूंगी, समझे। खाना जो घर में बनेगा वही तुम भी खा लेना’।

‘ये तो नेकी और पूछ-पूछ वाली बात कर दी आपने बीबी जी। हम यहां से दस-पंद्रह किलोमीटर दूर पुरानी बस्ती में रहते हैं। ये ही सोच रहे थे कि रोज आना-जाना कैसे करेंगे और इतने लोगों का काम कैसे निपटाएंगे’।

‘ये सब काम करने का क्या लोगे तुम?’

‘जो ठीक समझो, दे देना बीबी जी’।

‘नहीं, मुझे बाद में कोई झंझट नहीं चाहिए। तुम्हें क्या चाहिए मुझे साफ-साफ बता दो’।

‘अब बीबी जी इतने काम हैं तो कुल मिला कर पांच हजार रुपये दे देना। ठीक है, इससे कम में तो नहीं चलेगा’।

मैं जो सोच रही थी, उससे तो बहुत कम मांगा था उन्होंने। सिर्फ खाना बनाने के लिए ही महाराज हर दिन का पन्द्रह सौ रुपये मांगते थे। साफ था कि वे पेशेवर तिकड़मों से अभी काफी दूर थे। मैंने तुरंत हां कर दी और पांच सौ रुपये की बयाना राशि उन्हें पकड़ा दी। अगले हफ्ते सोमवार की रात को आने का वादा करके वे चले गए। मैं भी बहुत निश्चिंत हो गई। सुबह से शाम तक के सारे काम निपटाने के लिए काम वाले जो मिल गए थे।

सोमवार की शाम से ही मैं उनका बेसब्री से इंतजार करने लगी। मंगलवार की सुबह से रिश्तेदारों का आना शुरू हो जाना था। मेरी बेटी की फ्लाइट तो सुबह पांच बजे ही आ जाने वाली थी। मेरे पास तो गुड्डी का कोई फोन नं. भी नहीं था। अगर वे लोग नहीं आए तो क्या होगा, यह सोच कर ही मुझे घबराहट होने लगी।

लेकिन, मेरी सारी आशंकाओं को झुठलाते हुए वे ठीक समय पर आ पहुंचे। मुझे यह देख कर हैरानी हुई कि गुड्डी और उसके बच्चे के साथ जो आदमी था, वह  हरकिशन नहीं था। एक बार फिर से मैं कुशंका के जाल में घिर गई। पता नहीं यह किस आदमी को और क्यों ले लाई है। यह नया आदमी गुड्डी की उम्र का ही लग रहा था, या फिर उससे एक-दो वर्ष बड़ा होगा। इस-उस बहाने घर में अजनबियों के घुस आने और मौका देख कर सब कुछ साफ कर भाग जाने के मैंने बहुत से किस्से सुन रखे थे। फिर उन्हें तो हफ्ता भर दिन-रात मेरे घर में ही रहना था। मैंने बिना लाग-लपेट के गुड्डी से पूछा – ‘ये तुम्हारे साथ कौन है? तुम्हारा मरद तो नहीं दिखता’।

‘नहीं मेरा मरद नहीं है यह। यह हमारा पड़ोसी है पीतांबर। उन्हें तो दो दिन पहले कार ने टक्कर मार दी, घर में खटिया पर पड़े हैं। अब बीबी जी आपसे तो साई ले ली थी, इसलिए आना तो था ही। उन्होंने ही इसे मेरे साथ भेजा है। यह भी खाना बनाने का काम करता है। आप बिलकुल चिंता मत करो, बहुत मेहनती है पीतांबर’।

उसके कह देने भर से मन की चिंता दूर नहीं हुई। दूसरे कमरे में जाकर मैंने डा. कुंतल को फोन लगाया। फोन उनकी नौकरानी ने उठाया और बताया कि वे तो पन्द्रह दिन के लिए अपनी बेटी के पास विदेश चले गए हैं और वहां का नंबर उसके पास नहीं है। उसके फोन रख देने के बाद भी मैं कुछ क्षण रिसीवर हाथ में लिए ही बैठी रही। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। उन्हें घर में रहने देने के अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं था मेरे पास। उन पर बराबर नजर रखूंगी मैं। यह सोच कर खुद को आश्वस्त किया और कमरे से बाहर निकल आई।

उन्हें सब काम समझाने के बाद मैंने उनके लिए वह छोटा कमरा खोल दिया जिसमें अंदर ही बाथरूम बना हुआ था। दो गद्दे, चादर और तकिए निकाल कर उन्हें दिए और पूछा – ‘खाना-वाना खाया है या नहीं? बच्चा भूखा तो नहीं है’।

‘खा कर आए हैं, बीबी जी। जगदीश ने भी खा लिया है’।

‘तो ठीक है, कल सुबह पांच बजे उठना है तुम्हें। अब सो जाओ’।

मैंने उस कमरे से सटे हॉल में रखे बड़े से सोफे पर ही सोने का निर्णय लिया। मन तमाम आशंकाओं से भरा था। इतने बड़े घर में अकेली रहती थी। उन अजनबियों पर नजर रखना जरूरी था।

अभी लेटी ही थी कि पीतांबर अपना गद्दा उठाए कमरे से बाहर आता दिखाई दिया। मैं उठ कर बैठ गई और पूछा – ‘यहां क्या कर रहे हो?’

‘कुछ नहीं बीबी जी। गुड्डी नहीं चाहती कि मैं उसके साथ एक कमरे में सोऊं। आप कहें तो यहीं एक तरफ जमीन पर अपना बिस्तर डाल लूं’।

मेरे हां कहने पर उसने हॉल में खाली जगह देख कर अपना बिस्तर लगाया और थोड़ी देर में ही खर्राटे भरने लगा।

मुझे नींद नहीं आ रही थी। यह तो पता चल गया था कि गुड्डी कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं थी। पर, यह पता चलना बाकी था कि उस छोटे से बच्चे के साथ वह घर का सारा काम कैसे निपटाएगी। सोचते-सोचते पता नहीं मुझे कब नींद आ गई।

सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी जोर से बजने की आवाज से मेरी नींद खुली। देखा पीतांबर और गुड्डी पहले ही उठ कर तैयार हो गए थे। दरवाजा गुड्डी ने ही खोला। मेरी बेटी, दामाद और उनकी पांच साल की छोटी बच्ची घर में घुसे और दीवानों की तरह मुझसे लिपट गए।

गुड्डी ने पूरे घर में झाडू-पौंछा लगाना शुरू कर दिया था। उसका बच्चा अभी तक सो रहा था। पीतांबर ने मुझसे पूछा – ‘नाश्ता क्या बनेगा बीबी जी’ और मेरे बताने पर वह चाय-नाश्ता बनाने में जुट गया। थोड़ी ही देर में उसने चाय-नाश्ता और बच्ची के लिए दूध मेज पर लगा दिया।

उन दोनों को भी मैंने चाय-नाश्ता करने के लिए कह दिया और कहा कि जगदीश उठ जाए तो उसे भी दूध पिला देना। गुड्डी बोली – ‘नहीं बीबी जी, जगदीश को मैं चाय ही दूंगी। कुछ दिन दूध पिला कर उसकी आदत नहीं बिगाड़नी है। यहां तो उसे दूध मिल जाएगा, घर जाकर भी रोज दूध मांगेगा तो उसे कहां से लाकर दूंगी’। मैं कुछ कहती इससे पहले ही वह किचन में चली गई।

शाम तक एक-एक कर सभी मेहमान आ जाने वाले थे। दोपहर में तो बस हम छह-सात लोगों का ही खाना बनना था। मैंने उन्हें मीनू बता दिया था। समय से पहले ही पीताबंर और गुड्डी ने मिल कर सारा खाना तैयार कर दिया। खाना मेरी उम्मीद से बेहतर बना था। मेरी बेटी और दामाद ने भी कहा था – ‘मम्मी, वाकई बहुत लकी हो जो ऐसे लोग मिल गए हैं’।

मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा था कि गुड्डी का बेटा जगदीश जरा सा भी दंगा नहीं मचा रहा था। उसकी मां जब काम कर रही होती तो वह उसे बिलकुल तंग नहीं करता था। मेरी नातिन सोम्या उसकी हमउम्र थी, जल्दी ही उन दोनों में दोस्ती हो गई। सोम्या टीवी के सामने पड़े सोफे पर बैठी काटूर्न फिल्म देख रही थी। उसने जगदीश को भी अपने पास बैठने को कहा। वह कुछ संकोच करने लगा तो सोम्या ने उसका हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर बैठा लिया। गुड्डी ने यह देखा तो वह भाग कर उसके पास पहुंची और उसे गोद में उठाकर नीचे जमीन पर बैठा दिया। मैं यह सब दूर से देख रही थी, मुझे अच्छा नहीं लगा। सोम्या भी थोड़ी सकपका गई थी। मैंने वहीं से चिल्लाकर कहा – ‘गुड्डी, यह क्या कर रही हो, बच्चा है उसे वहीं सोम्या के पास बैठकर टीवी देखने दो। गुड्डी ने हैरानी से मेरी ओर देखा और फिर बिना कोई जवाब दिए किचन में चली गई। उसके जाने के बाद सोम्या ने जगदीश को फिर से अपने पास सोफे पर बैठा लिया। मैंने देखा दोनों हंसते-हंसते लोटपोट  होते हुए कार्टून फिल्म का मजा ले रहे थे।

शाम तक मेहमानों से घर भर गया था। मेहमान क्या थे, सभी रिश्तेदार थे। पूरे घर में चहल-पहल का माहौल बन गया था। हंसी-ठिठोली और गप्पों में समय का पता ही नहीं चल रहा था। रोजाना तो मुझे अकेले ही रहना होता था। सच कहूं समय काटे नहीं कटता था। शिरीष की याद बेतरह आती थी। जिंदगी उनका साथ इतनी जल्दी छोड़ देगी, यह कभी सोचा भी नहीं था। खूब वकालत चलती थी उनकी। इतना बड़ा मकान और ढ़ेर सा पैसा छोड़ गए, वे मेरे लिए। पर, मैं अकेली क्या करती उसका। अगर ईशा मेरे पास नहीं होती तो शायद मैं टूट ही जाती। उसे पालने-पोसने और उसकी शादी तक का समय उसी व्यस्तता में गुजर गया था। घर का अकेलापन काटता था मुझे। इसीलिए गर्मियों की छुट्टियों में अपने सभी निकट के रिश्तेदारों को मैंने एकसाथ बुला लिया था। मैं यही तो चाहती थी कि सब मिल बैठें, हंसे-बोलें, कुछ दिन के लिए ही सही घर में उत्सव का सा माहौल बन जाए। जैसा मैं चाहती थी, वही हो रहा था। मैं सचमुच बहुत खुश थी।

पीतांबर और गुड्डी ने सारा काम बहुत अच्छी तरह से संभाल लिया था। इतने लोगों के होते हुए भी घर हमेशा साफ रहता, दोनों वक्त का चाय-नाश्ता और खाना हमेशा टाइम पर तैयार रहता। इन कामों में उन दोनों को जरा भी फुरसत नहीं मिलती। लोगों की दूसरी फरमाइशें भी उन्हें पूरी करनी होतीं। इस भागमभाग में गुड्डी अपने बच्चे के लिए भी समय नहीं निकाल पाती थी। उसने कुछ खाया-पिया है या नहीं, यह देखने का टाइम भी उसके पास नहीं था। जब सब खा लेते तब वे खाने बैठते और बच्चे को भी तभी खाना मिलता। सोचती इस जरा सी उम्र में कितनी समझदारी भरी है इस बच्चे में जो अपनी मां को काम करते समय जरा भी परेशान नहीं करता। भूखा बच्चा चुपचाप बैठा रहता है और किसी भी चीज के लिए नहीं मचलता। अपनी मां के काम में हाथ बंटाने का शायद यह उसका अपना तरीका था।

मैंने कई बार गुड्डी से कहा कि वह जगदीश को भी सोम्या के साथ ही नाश्ता और खाना दे दिया करे, पर शायद उसे यह ठीक नहीं लगता था। बच्चे का इतनी देर तक बिना खाये-पिये खामोशी से बैठे रहना मुझमें भीतर तक बेचैनी भरे दे रहा था, इसलिए मैं खुद उसे सोम्या के साथ ही खाने को बैठा देती। सोम्या जब भी कोई चीज खाने के लिए मचलती, उसे वह चीज देते समय मैं जगदीश को भी देना नहीं भूलती। उसकी शुरूआती झिझक खत्म हो गई थी और वह मुझे देखकर मुस्कराने लगा था। 

पीतांबर और गुड्डी का दिन उषा की पहली किरण के साथ शुरू होता और रात के ग्यारह-बारह बजे समाप्त होता। उन्हें खाना भी सबके खाने के बाद ही मिलता। कभी-कभी ऐसा होता कि खाना तैयार है, पर खाने वाले तैयार नहीं हैं। वे इंतजार में बैठे रहते कि कब हम सब खाएं और उनका काम निपटे। उस दिन तो कई लोग बाजार घूमने चले गए थे। खाने का समय निकल गया था, पर वे अभी तक वापस नहीं लौटे थे। मैंने गुड्डी से कहा – ‘तुम लोग कब तक भूखे रहोगे। ऐसा करो तुम लोग खा लो’।

‘ऐसा कैसे हो सकता है बीबी जी, मेहमानों से पहले हम कैसे खा लें’ – गुड्डी ने कहा था।

जब मेरे बार-बार कहने पर भी वह अपनी जगह से नहीं उठी तो मैं खुद ही उनके लिए खाना परोस कर ले आई। वे संकोच से भर उठे, पर शायद अब उनके पास कोई चारा नहीं बचा था। वे नीची निगाह किए खाना खाने लगे।

अच्छे दिन पलक झपकते गुजर जाते हैं। आज सभी मेहमान चले गए हैं। घर फिर से खाने को दौड़ रहा है। पीतांबर और गुड्डी की भाग-दौड़ थम गई है। पीतांबर को कहीं और काम पर जाना है, इसलिए वह आज शाम को ही चला जाएगा। गुड्डी कल सुबह नौ बजे तक जाएगी। उसके पति की चोट अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। इसलिए उनकी जान-पहचान का और पुरानी बस्ती में ही रहने वाला ऑटोरिक्शा ड्राइवर उन्हें लेने आएगा।

पीतांबर कल शाम को ही चला गया था। गुड्डी का काम भी कल रात को समाप्त हो गया था। उससे हुई बात के हिसाब से आज से उसे कोई भी काम नहीं करना था। पर, वह सुबह से उठ कर उसी तरह काम में लगी हुई थी। झाडू-पौंछे का काम निपटाकर वह मेरे लिए चाय-नाश्ता भी बना लाई और पूछने लगी – ‘क्या खाना बना दूं बीबी जी आपके लिए?’

मैंने कहा -  ‘देख गुड्डी, हिसाब से तो तेरा काम कल रात को ही खत्म हो गया। तूने तो आज भी झाडू-पोंछा सब लगा दिया। मेरी अकेली का खाना बनाने में कितना समय लगेगा। मैं अपना खाना खुद बना लूंगी’।

‘आज के काम के पैसे नहीं मांगूगी बीबी जी, वह रुआंसी हो आई थी’।

‘क्या हुआ गुड्डी? इधर आ मेरे पास बैठ’।

वह मेरे पास आकर जमीन पर बैठ गई। मैंने देखा उसकी पलकों पर आंसू टिके थे।

मैं समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा क्या हुआ है। जरूर अनजाने में मैंने या फिर किसी मेहमान ने उसे चोट पहुंचाई होगी। मैं बार-बार उससे पूछने लगी – ‘क्या हुआ, मुझे बता तो सही। तू बताएगी नहीं तो मैं कैसे समझूंगी। बता, हममें से किसी से कोई गलती हुई है क्या’।

‘नहीं, बीबी जी ऐसी कोई बात नहीं है’।

‘फिर क्या बात है, तू रो क्यों रही है?’

तब तक वह कुछ संयत हो चुकी थी। अपनी धोती के पल्लू से उसने अपनी आंखें पौंछी और फिर बोली – ‘मुझे पैदा करने के कुछ घंटे बाद ही मेरी मां मर गई थी। शुरू में चाची ने और फिर बाद में सौतेली मां ने पाला। बात-बात में झिड़कियां और मार खाते बचपन गुजरा। मैं सोचती मेरी सब सहेलियों के पास मां थी, मेरे पास क्यों नहीं थी। अगर होती तो अपनी सहेलियों की तरह मैं भी उससे प्यार कर सकती थी, लड़-झगड़ सकती थी और पेट भर के खाना खा सकती थी। घर के सारे काम शायद मुझे नहीं करने पड़ते। पर, बस मैं सिर्फ सोच ही तो सकती थी।

ग्यारह साल की उम्र में ही मेरी शादी हो गई। मेरा मरद मुझसे आठ साल बड़ा है। उसका भी कोई नहीं है। वह सड़क बनाने वाले ठेकेदार के पास मजदूरी करके जो कुछ कमा कर लाता था, उसी में हम गुजर-बसर करते। बाद में मैं भी उसके साथ मजदूरी करने जाने लगी। पन्द्रह की थी जब जगदीश पैदा हुआ। कुछ महीने काम पर नहीं जा पाई। जब जाने लायक हुई तो जगदीश को अपने साथ ले जाती। उसे वहीं किसी पेड़ के नीचे कपड़ा बिछा कर लिटा देती और सारे दिन गिट्टियां उठाती। एक दिन चक्कर खाकर गिर पड़ी तो ठेकेदार ने खूब गालियां निकालीं और कहा – ‘ रोज अपने बच्चे को साथ लेकर आ जाती है और काम करने से ज्यादा उसे संभालने में लगी रहती है। अब चक्कर खाकर गिरने का नाटक भी करने लगी। देख हरकिशन तू इतने सालों से हमारे साथ काम कर रहा है, इसलिए मैं कुछ कहता नहीं हूं। पर, कल से तू अपनी लुगाई को काम पर मत लाना’।

दूसरे दिन से मेरे साथ-साथ मेरा मरद भी काम पर नहीं गया। गांठ के पैसे दो-तीन दिन में ही खत्म होने लगे और वहां कोई काम नहीं मिला तो हमने अपनी गठरी उठाई और बस में बैठ कर यहां शहर चले आए। ये भूखे-प्यासे काम ढूंढ़ते रहते और मैं और जगदीश पुरानी बस्ती की उस धर्मशाला में भूखे-प्यासे उनकी राह देखते रहते। धर्मशाला का मैनेजर कई बार मेरे चक्कर लगा गया था। उसने मुझे लालच भी दिया पर अपना काम बनते न देख कर वह भी गालियों पर उतर आया और उसने साफ कह दिया कि बस अगले दिन ही हमें वहां से निकल जाना होगा।

उसी दिन एक दुकान पर चाय पीते समय उन्हें पीतांबर भैया मिले। उनसे पहले कोई जान-पहचान नहीं थी। पर, जब उन्हें हमारी हालत का पता चला तो वे उन्हें उस ढाबे पर ले गए जहां खुद काम करते थे। उन्हें साफ-सफाई के लिए एक आदमी चाहिए था, इसलिए तुरंत ही उन्हें नौकरी मिल गई। पीतांबर भैया ने ही अपने पास की एक झोंपड़ी में हमारे रहने का इंतजाम भी कर दिया। बहुत अहसान हैं उनके हमारे ऊपर। शायद इस जन्म में तो चुका नहीं पाएंगे।

जब भी जरूरत पड़ती, ढाबे का मालिक इनसे दूसरे काम भी कराने लगा। ये खाना बनाने में भी सहायता करने लगे और वहीं इन्होंने खाना बनाना सीखा। जो कुछ भी सीख कर आते, मुझे भी सिखाते और फिर मैंने आसपास के घरों में झाडू-पौंछा लगाने के साथ खाना बनाने का काम भी शुरू कर दिया। जगदीश को मैं कहीं छोड़ नहीं सकती थी, इसलिए वह हमेशा मेरे साथ रहता। बच्चा ही तो था, इसलिए घरों में इधर-उधर घूमता, जरा भी किसी चीज को हाथ लगा देता तो घर के मालिक-मालकिन उसे बुरी तरह से फटकार देते। मुझे भी उनकी बात-बेबात की खरी-खोटी सुननी पड़ती। ऐसा लगता हम इंसान नहीं जानवर से भी बदतर हैं क्योंकि घर के पालतू कुत्ते तो घर में कहीं भी आ-जा सकते थे, कहीं भी बैठ सकते थे और उनकी गलतियों पर भी उन्हें दुतकार नहीं, दुलार मिलता था। कभी-कभी मैं तिलमिला जाती जब कुत्तों के बच्चों के साथ खेलने वाले मालिकों के बच्चों को जगदीश के पास भी फटकने नहीं दिया जाता था।

जगदीश भी धीरे-धीरे सब समझता जा रहा था। जब तक मैं काम में लगी रहती, वह उसी जगह चुपचाप बैठा रहता जहां मैं उसे बैठा देती। एक दिन मैं काम में लगी थी, पास ही के कमरे में मालिक के बच्चे टीवी देख रहे थे। जगदीश भी उठ कर टीवी देखने चला गया और वहीं पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गया। उसी समय मालकिन वहां आई और उसने जगदीश को गाली देते हुए कुर्सी से नीचे खींच लिया। वह वहीं से चिल्लाई – ‘गुड्डी, अपने बेटे को या तो घर छोड़कर आया कर या उसे संभाल कर रखा कर। इसकी हिम्मत तो देख लाट साहब बन कर कुर्सी पर बैठा टीवी देख रहा है’। मैं क्या बोलती, रोते हुए जगदीश को एक जोर का थप्पड़ जड़ा और उसे फिर से उसी कोने में बैठा आई।

बाद में हमने ऐसे काम पकड़ने शुरू किए जहां मैं और ये साथ जाकर काम कर सकें। हम घरों में छोटी-मोटी पार्टियों में खाना बनाने और दूसरे काम करने के लिए जाने लगे। लोग पैसे देते हैं तो चाहते हैं, हम मशीनों की तरह काम करें। मशीनों की तरह ही काम करते रहे हैं बीबी जी। शायद हम कमनसीबों को भगवान ने इसीलिए पैदा किया है कि हम जीतोड़ मेहनत करते हुए भी डांट-फटकार खाते रहें। हम हैं भी क्या, क्यों किसी को दोष दें। दो वक्त की रोटी खाने के लिए दूसरों की रोटियां बनाना ही तो हमारे भाग्य में लिखा है।

बीबी जी, सच कहूं आपके घर में पहली बार ऐसा लगा जैसे हम भी इंसान हैं। जगदीश के समय पर खाने-पीने की चिंता करते आपको देखा तो विश्वास ही नहीं हुआ। वो आपकी नातिन के साथ खेल रहा था, उसके साथ सोफे पर बैठ कर टीवी देख रहा था और वही सब खा-पी रहा था जो सोम्या बीबी खा-पी रही थीं। आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। हमारे उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने और आराम करने की फिक्र जब आपको और आपके मेहमानों को करते देखा तो बड़ा अजीब सा लगा। इस तरह के बर्ताव के हम आदी जो नहीं हैं। उस दिन जब आप खुद हमारे लिए थाली परोस कर ले आईं तो सच कहूं मेरे भीतर कहीं कुछ ऐसा उमड़ा था, जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मन कर रहा था, उठूं और आपके पांव छू लूं’। बोलते-बोलते गुड्डी चुप हो गई। शायद उससे और कुछ बोला नहीं जा रहा था।

मैं बिना कुछ बोले सिर्फ उसकी बातें सुनने और समझने में लगी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हमारे स्वाभाविक बर्ताव में ऐसा क्या था जिसने उसे भीतर तक छू लिया था। खुद गुड्डी बहुत अच्छी लड़की थी। जिस तरह उसने और पीतांबर ने काम संभाला था, उसने मेरा मन खुश कर दिया था।

गुड्डी ने मेरा खाना तैयार कर दिया था और अपना सामान बांधने कमरे में चली गई थी। कुछ ही समय बाद बाहर ऑटोरिक्शा के रुकने की आवाज आई तो गुड्डी ने तुरंत ही दरवाजा खोला और ‘भैया, बस अभी आई’ कह कर अपना सामान उठाने अंदर चली आई।

चलते समय मैंने उसे पहले दिए पांच सौ रुपये काट कर चार हजार पांच सौ रुपये पकड़ाए जिन्हें उसने माथे से लगा कर अपनी धोती के पल्ले में बांध लिया। जगदीश उसके साथ वैसे ही लगा खड़ा था जैसे आते समय खड़ा हुआ था। वह सामान उठाने लगी तो मैंने उसे रोका – ‘ले ये पांच सौ रुपये मेरी तरफ से और रख और यह एक साड़ी भी है तेरे लिए’।

उसने मेरा बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया और बोली – ‘मैंने अपनी मजदूरी के साथ-साथ आपसे प्यार, इज्जत और अपनापन सभी कुछ तो ले लिया है बीबी जी। अब मैं आपसे और कुछ नहीं लूंगी। अगली बार जब आप अपने रिश्तेदारों को बुलाएं तो मुझे बुलाना न भूलें बीबी जी’।

 

‘चल जगदीश बीबी जी के पैर छू’। वह खुद भी मेरे पैरों पर झुक गई। मैंने उन दोनों के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखा और वह बिना नजरें मिलाए बाहर निकल गई। मुझे पता था उसकी आंखों में पानी भरा होगा। हां, मेरी आंखें भी तो नम हो आई थीं।

 

डा रमाकांत शर्मा का परिचय

मेरा जन्म 10 मई 1950 को भरतपुर, राजस्थान में हुआ था. लेकिन, पिताजी की सर्विस के कारण बचपन अलवर में गुजरा. घर में पढ़ने पढ़ाने का महौल था. मेरी दादी को पढ़ने का इतना शौक था कि वे दिन में दो-दो किताबें/पत्रिकाएं खत्म कर देती थीं. इस शौक के कारण उन्हें इतनी कहानियां याद थीं कि वे हर बार हमें नई कहानियां सुनातीं. उन्हीं से मुझे पढ़ने का चस्का लगा. बहुत छोटी उम्र में ही मैंने प्रेमचंद, शरत चंद्र आदि का साहित्य पढ़ डाला था. पिताजी भी सरकारी नौकरी की व्यस्तता में से समय निकाल कर कहानी, कविता, गज़ल, आदि लिखते रहते थे.

ग्यारह वर्ष की उम्र में मैंने पहली कहानी घर का अखबार  लिखी जो उस समय की बच्चों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका पराग  में छपी. इसने मुझे मेरे अंदर के लेखक से परिचय कराया. बहुत समय तक मैं बच्चों के लिए लिखता और छपता रहा. लेकिन, कुछ घटनाओं और बातों ने अंदर तक इस प्रकार छुआ कि मैं बड़ों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों  जैसा कुछ लिखने लगा. पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं और कुछ पुरस्कार भी मिले तो लिखने का उत्साह बना रहा. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का भी पुरस्कार मिला. कहानियां लिखने का यह सिलसिला जारी है. अब तक दो कहानी संग्रह – नया लिहाफा और अचानक कुछ नहीं होता  प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरा संग्रह भीतर दबा सच  प्रकाशनाधीन है. कहानियां लिखने के अलावा व्यंग्य लेख और कविताएं भी लिखता रहता हूं.

हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने मन की बात करता है, अपने अनुभवों, अपने सुख-दु:ख को बांटता है. कहानी इसके लिए सशक्त माध्यम है. रोजमर्रा की कोई भी बात जो दिल को छू जाती है, कहानी बन जाती है. मेरा यह मानना है कि जब तक कोई कहानी आपके दिल को नहीं छूती और मानवीय संवेदनाएं नहीं जगा पाती, उसका आकार लेना निरर्थक हो जाता है. जब कोई मेरी कहानी पढ़कर मुझे सिर्फ यह बताने के लिए फोन करता है या अपना कीमती समय निकाल कर ढ़ूंढ़ता हुआ मिलने चला आता है कि कहानी ने उसे भीतर तक छुआ है तो मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती है. यही बात मुझे और लिखने के लिए प्रेरणा देती है और आगे भी देती रहेगी.

नौकरी के नौ वर्ष जयपुर में और 31 वर्ष मुंबई में निकले. भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय कार्यालय, मुंबई से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद अब मैं पूरी तरह से लेखन के प्रति समर्पित हूं.

ई-मेल  – rks.mun@gmail.com

मोबाइल 9833443274

डा.रमाकांत शर्मा, 402 – श्रीराम निवास, टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी,पेस्तम सागर रोड नं.3, चेम्बूर, मुंबई -400089

मोबाइल - 9833443274

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags