... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

 

शिकारी के नाम से कुख्यात पुलिस अधिकारी, ए एस पी पांडे की अनुभवी आंखें गाड़ी से बाहर सड़क के दोनों ओर का निरीक्षण करने में व्यस्त थी। साथ मे उनका चहेता, उनका खास चेला इब्राहीम एक अच्छे शिष्य की तरह उनका अनुसरण कर रहा था। वह पांडे सर जैसा ही बनना चाहता था। पांडे सर उसका आदर्श थे। और पांडे सर भी उसे अपने गुरुमंत्र देने में कोई कसर नही छोड़ते। पुलिस महकमे में हर कोई यही अनुमान रखता था, कि अगला शिकारी वही होगा, यानी कि इब्राहीम शेख। शिकारी के नाम से कुख्यात पांडे जी दर असल इंसान के शिकारी थे; यानि एनकाउंटर स्पेशियलिस्ट। साठ से ज़्यादा शिकार कर चुके पांडे जी आज भी शिकार पर थे। उनका शिकार गाड़ी में पीछे बैठा था। अक़बर नाम का उन्नीस बीस साल का एक कॉलेज स्टूडेंट जो एक बार किसी छोटी सी बात पर पांडे सर से उलझ गया था। यह उसकी बदनसीबी ही। वह पांडे सर से डरा नही था। उसने कानून और अधिकारों पर पांडे सर से बहस की। उसे यह नही करना चाहिये था। उसे कानून के डंदे से डरना चाहिये था। उसे डरना चाहिये था पांडे सर से।

पांडे सर से कौन नही डरता ? वे अपने काम से काम रखने वाले इंसान हैं। ज़्यादा किसी को मुंह नहीं लगाते, न मुंह लगना पसंद करते है। तभी तो इस पुलिस महकमे में इतनी तरक्की की है। कलीग्स की बात ही क्या है; पुलिस कमिशनर भी सोंच समझकर ही बात करते हैं, पांडे सर से। न,न, इसलिए नहीं कि पांडे सर एनकाउंटर स्पेशियलिस्ट हैं; बल्कि इसलिए कि उनकी पहुंच सीधे सीधे मंत्रालय तक होती है। कहते हैं जहाँ न रवि पहुंचे, कहते हैं वहां तक कवि पहुंचे; लेकिन पांडे जी की पहुंच तक, न रवि पहुंचे न कवि पहुंचे। कहते हैं, पांडे सर ने अपनी किस्मत भी ऊपर से खुद लिखवाकर लाई है। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं। सरकार किसी पार्टी की बने पांडे सर का कोई न कोई करीबी मिनिस्ट्री में ज़रूर होगा।

लेकिन पता नहीं यह इब्राहीम ने क्या जादू कर रखा है ? नया नवेला ऑफिसर भर्ती हुआ और सीधे पांडे सर की गोद मे जा बैठा। नहीं, ऐसी उपमा दी जाती है पूरे डिपार्ट में। अब लोगों को तो खुन्नस हो ही जाती है। फिर भी एक बात सबकी समझ से बाहर है। पांडे सर ठहरे खांटी ब्राम्हण। और कुछ ऐसे सिर्फ जात के ही ब्राम्हण नहीं, मन से भी शुद्ध ब्राम्हण। जाति व्यवस्था के प्रबल समर्थक। और मुस्लिमों से तो भारी बैर। हर मुस्लिम उनकी नज़र में चोर उचक्का या आतंकवादी और गौ हत्यारा। और ऐसा नही कि इब्राहिम को पांडे जी की इन बातों का इल्म नहीं। अरे, जलने वाले कभी चुप बैठते हैं ?

वैसे यहां भी एक बात थी कि पांडे सर को भड़काना आसान है, बनिस्बत इब्राहिम के। लेकिन यहां सवाल यह उठता है, बिल्ली के गले में घंटी बंधेगा कौन ? और इब्राहिम के बारे में क्या कहें ? वो तो पक्का घाघ है। सुनेगा सबकी, करेगा अपनी; और तो और, मजाल है जो किसी को उसके व्यवहार या उसकी बात चीत से कोई शिकायत हो जाये। कमबख्त दिल मे उतरने का हुनर जानता है। सबसे जूनियर है; एकदम यंग। इस उम्र के किसी लड़के को उकसाना कौनसी बड़ी बात है ? लेकिन वाह रे इब्राहिम, पता नही कैसे हर भड़काने वाली बात पर मुस्कुराकर रह जाता है। और मुस्कान तो कमबख्त की ऐसी दिलफरेब, किअपनी औलाद से ज़्यादा प्यार तो उसी पर उमड़ आये। जब कोई बात करे तो वह आपको पूरे सम्मान और धैर्य के साथ सुनेगा; फिर आप चाहे जितना उसे पका लो, मजाल है कि उसके चेहरे पर आप उकताहट के कोई चिन्ह या एक शिकन भी देख लें। आपने बड़े बड़े झेलू देखे होंगे पर इब्राहिम जैसा एक भी नहीं। आप कितना भी उसे सहमत करने का भरम पाल लें, और भले वह आपसे सहमति प्रकट करे लेकिन करेगा वही जो उसने सोंच रखा है।

अब बातें चाहे जो भी हों; एक बात तो तय है के इब्राहीम शेख, अगला एनकाउंटर स्पेशियलिस्ट बनने की तैयारी में है। अब वैसे भी ये काम हर किसी के बस का तो है नही। वह पांडे जी का पक्का चेला बन चुका है। पांडे जी उसे गुरुमंत्र दे रहे हैं; और वह बड़ी तेजी से सीख रहा है। यहाँ तक कि पांडे सर ने उसे खुले आम अपना वारिस घोषित करके, उन सारे लोगों के अंदर खलबली मचा दी है जो उन जैसा बनने का सपना संजोये थे। इब्राहीम से तो सभी सीनियर थे। हां, एक बात सभी तस्लीम करने लगे थे कि कुछ बात तो है इस लड़के में जो दूसरों में नहीं है। शायद यही बात है जो पांडे सर को भी आकर्षित कर रखी है। कुछ भी बोलो, ये लड़का बहुत आगे जाएगा। लम्बी रेस का घोड़ा है। ये बातें महकमे में होने लगी थीं। पूत के पैर तो पालने में ही दिख जाते हैं। यह भी सब खूब जानते हैं कि ऊपर इसका सरपरस्त कोई नहीं; और न भविष्य में दूर दूर तक इस बात की कोई उम्मीद है, फिर भी लगता है....

"कहानी क्या बनेगी सर।" इब्राहीम ने पूछा।

"वो मेरे ऊपर छोड़ दो। ऊपर सब सेट हो चुका है। बस मीडिया का ध्यान रखना। मीडिया में यही बताना है, आतंकवादी था; मुख्यमंत्री जी पर जानलेवा हमला करने आया था, और मुठभेड़ में मारा गया।"

"यस सर !" बड़े आज्ञाकारी ढंग से इब्राहीम शेख ने कहा।

"बस ज़्यादा मुंह मत खोलना। बाकी मैं देख लूंगा। यह कहना है कि पिछले छह महीने यह पाकिस्तान में ट्रेनिंग ले रहा था।"

"यह साबित कैसे करेंगे, सर।" इब्राहीम ने पूछा।

मुस्कुरा दिए पांडे सर; जैसे किसी मासूम बच्चे के सवाल पर....। उन्हें पता था, चेला यह सवाल करेगा।

"छः महीने से मिसिंग है।"

इब्राहीम आश्चर्य से उनकी ओर देखता रह गया। हैरानी से उसकी आवाज़ गले मे ही रह गई। उसे यूँ हैरान देखकर पांडे सर को बहुत संतुष्टि मिली। अपने कारनामो पर उसे यूँ हैरान होता देख उन्हें परम सुख की अनुभूति होती रही थी। वे इब्राहीम को और हैरान करने का मोह छोड़ नही पाए -

"यहीं कैद था; मेरे फार्महाउस पर। कोई केस डायरी नहीं। कोर्ट के सामने पेश ही नहीं किया।"

"क्यों सर।" इब्राहीम ने डरते डरते पूछा।

"बस, एक दिन उलझ गया था स्साला कॉलेज के मामले पर। पुलिस को कानून सिखाएगा ?" इसके साथ ही नफरत से थूक दिया पांडे सर ने।

"ऊपर पता नही ?"

"सबको पता है; पांडे से उलझने की हिम्मत किसमे है। शेर का कलेजा चाहिए; मुझसे उलझने के लिए।"

"सब करना पड़ता है। ऐसे नहीं मिलते मेडल। आपको कोई यूँ ही नहीं देता आउट ऑफ टर्म प्रमोशन।" थोड़ी देर बाद पांडे सर ने बड़े ही जज़्बाती अंदाज़ में अपने चेले को समझाया, "सबको लगता है, ऊपर मेरे रिश्तेदार सपोर्ट करते हैं। कोई कुछ नहीं करता स्साला। सब अपनी काबिलियत से हासिल करना पड़ता है। मुफ्त में कोई कुछ नही देता। खुश करना पड़ता है, सबको ...."

और भी बहुत कुछ कहते रहे। इब्राहीम उन्हें हैरानी से देखता रहा। पांडे सर को चढ़ गई है, उसने मन ही मन कहा। सच भी है, एनकाउंटर के पहले वे थोड़ी सी चढ़ा लिया करते थे।

एक उपयुक्त जगह देख पांडे सर ने गाड़ी रुकवा दी, इब्राहीम से कहा, "तैयार हो जाओ।"

इब्राहीम ने गन हाथ मे ले ली। लड़के को बाहर निकाल कर हथकड़ी खोलते हुए पांडे सर ने कहा, "यहाँ से तू भाग जा। तू आज़ाद है।"

लड़के को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसने बड़ी मासूमियत से दोनों की ओर देखा। आपने घर, अपने परिवार के बीच वापस पहुंचने की तो उसने आस ही छोड़ दी थी। उसकी आंखें भर आईं।

उससे नज़र मिलने की हिम्मत इब्राहीम में न थी। इतना मासूम, इतना बेगुनाह। फिर अभी उसकी उम्र ही क्या थी। उसे तो अपने अंजाम के बारे में भी कुछ पता नहीं। लेकिन यह सोचना हमारा काम नहीं। जब तक अदालत किसी को बेगुनाह करार न दे, हमारी नज़र में गुनाहगार ही है। यही सिखाया था उसके गुरु ने। इतना सोचने वाले कभी आगे नही बढ़ते। जो सोचता है वो सोचता ही रह जाता है।

"दस मिनट का टाइम है तेरे पास; उसके बाद मैं गोली चला दूंगा।" पांडे सर ने पिस्तौल निकालकर धमकाया। वह लड़का डर कर भागने लगा।

"शूट !" पांडे सर ने इब्राहीम से कहा। इब्राहीम ने अपनी पिस्तौल, भागते हुए लड़के की ओर तानी। लड़का भगा जा रहा था। उसकी पीठ सामने थी; लेकिन उसका मासूम चेहरा बार बार नज़र के सामने आने लगा। चेले ने एक बार फिर अपने गुरु की ओर देखा; वे चिल्ला रहे थे, "शूट हिम्, बेवकूफ ! वो भाग गया तो हम नहीं बचेंगे। शूट हिम् !"

इब्राहीम ने फिर उस लड़के की ओर देखा फिर पांडे सर की तरफ.…... फिर गोली दाग दी। आश्चर्य से पांडे सर की आंखे फट पड़ी। वे धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़े। सीने से खून का फव्वारा फूट पड़ा। गोली ठीक दिल पर लगी थी, बचने का कोई चांस ही नहीं।

इब्राहीम ने इत्मिनान के साथ गन जेब के हवाले की। जेब से मोबाइल निकालकर कमिश्नर सर को फोन लगाया- "सर, जिस आतंकवादी को हम पकड़ने गए थे; उसने पांडे सर पर गोली चला दी। वे बुरी तरह घायल हैं। जमना फारेस्ट रोड पर तुरंत एम्बुलेंस भेज दें। मैं उस आतंकवादी का पीछा कर रहा हूँ।"

इसके बाद उसने एनकाउंटर स्पेशियलिस्ट ए एस पी स्वर्गीय श्री पांडे जी की तरफ देखा। "सॉरी सर, लाश पर खड़े होकर तरक्की करना आपने ही सिखाया था।" फिर हल्की सी हँसी के साथ उसने कहा, "अफसोस, कि ज़माने का यही चलन है सर, गुरु गुड़ रह गया , चेला शक्कर निकल गया।"

लड़के ने भागते हुए अपने पीछे गोली चलने की आवाज़ सुनी, पीछे मुड़कर देखा। उसका दुश्मन, उसकी जिंदगी बर्बाद कर देने वाला, पांडे ज़मीन पर गिर रहा है। उसने खुदा का शुक्र अदा किया। वह एक पत्थर की ओट में बैठा इत्मीनान की सांस ले रहा था। उसकी सांस सांस इंस्पेक्टर इब्राहीम शेख के हक़ में दुआ कर रही थी। एक मुसलमान पर जुल्म होते देख एक मुसलमान का खून खौल उठा; और उसने अपने मुस्लिम भाई की जान बचाने के लिए इतना बड़ा कदम उठा लिया। अल्लाह जालिमो को सज़ा देने के लिए किसी न किसी को वसीला बना ही लेता है .... तभी एकाएक उसने इब्राहीम को अपने सामने पाया। वह झटके से उठ खड़ा हुआ। उसका रोम रोम, इब्राहिम शेख के हक़ मे दुआ कर रहा था।

“अस्सलामुअलैकुम …” उसने बड़ी ताज़ीम के साथ सलाम कहा।

धाँय …, जवाब मे इब्राहीम ने गोली चला दी।

"सॉरी, मैं तुम्हे छोड़ नहीं सकता।" इब्राहीम ने कहा, “तुम्हारी ज़िन्दगी मेरे लिये खतरा साबित होगी।“

एक गोली उसके सिर को भेदकर निकल गई। वह यानी अकबर जब लुढ़क कर ज़मीन पर गिरा, उसके चेहरे पर हैरत के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

दूसरे दिन मीडिया ने ए एस पी पांडे की शहादत और उनके चेले सब इंस्पेक्टर इब्राहीम शेख की बहादुरी के किस्से बयान किये। डिपार्ट्मेंट ने भी सर आंखों पर बिठाया। जनता का तो वह हीरो बन गया। कई इनाम और सम्मानों की घोषणाएं हुई।

उत्तरगाथा....

 

इस हादसे के बाद इब्राहीम शेख ने भी खूब तरक्की की; यहां तक कि उसकी हैसियत जंगल मे अकेले शेर जैसी हो गई। अपराधी तो नाम से ही थर-थर कांपते हैं। पुलिस महकमे के सीनियर्स का हाथ भी उनके सिर पे सदा बना रहा। आज महकमे मे उसे अपना गुरू मानने वाले कई नवजवान मौजूद हैं। एक दिन एक शागिर्द ने पूछा भी, “सर, एक मुस्लिम होकर भी आपने पुलिस डिपार्टमेंट मे इतनी कामियाबियाँ हासिल की। यह भी अपने आप मे बहुत बड़ी बात है।“

“क्यों? एक हिन्दु ही अच्छा पुलिसवाला हो सकता है क्या?”

इब्राहीम शेख ने उसे कनखियों से देखते हुये पूछा। बेचारा ज्यूनियर थोड़ा सा डर गया। ज़ाहिर है, , सर ने उसकी बात का गलत मतलब ले लिया है।

वह हकलाने लगा। बोल उसके मुख से निकल नही पा रहे थे, “नही सर, मेरा मतलब …”। इब्राहीम शेख अचानक ठठा कर हस पड़े। उन्हे अपने पुराने दिन याद आ गये। वे भी अपने सीनियर्स के सामने इसी तरह …

“घबराओ मत, मै तुम्हारा मतलब समझ रहा हूं,” इब्राहीम शेख ने हसते हुये, नौजवान अफ़सर से कहा, “आज के दौर मे नफ़रत कहां नही है। लोग एक दूसरे से नफ़रत करते हैं तो इसके लिये वजह भी ढूंढ लेते हैं और अपना मतलब निकालना हो तो भी वजह ढूंढ लेते हैं। सीधी सी बात है, कोई किसी धर्म से मुहब्बत और किसी धर्म से नफ़रत; ऐसा नही कर सकता। वह या तो धर्म से मुहब्बत करता है या अधर्म से। मुहब्बत धर्म है, तो नफ़रत अधर्म।“

“लेकिन सर दुनिया मे धर्म के नाम पर जो नफ़रत फ़ैली हुई है? वह तो यथार्थ है। हम उससे आंखे नही मूंद सकते।“ नौजवान अफ़सर ने असहमति सी जताई।

“यथार्थ नही है … आफ़िसर यथार्थ उसके पीछे छिपा है। आंखे खोलो और पहचानने की कोशिश करो। जो लोग किसी धर्म पर नही चल पाते वे अपनी असलियत छुपाने के लिये, बाकी सारे धर्मो से नफ़रत का मुजाहिरा करते है; सिर्फ़ यह जताने के लिये कि वे अपने धर्म से मुहब्बत करते है। तुम बताओ, नफ़रत और मुहब्बत एक ही चीज़ कैसे हो सकती है?”

“सर आपकी सोच भी इतनी गहरी है मुझे पता न था।“ जूनियर आफ़िसर ने प्रभावित होते हुये कहा।

“बहुत कुछ नही पता तुम्हे मेरे बारे मे। तुम्हे पता है, मेरे वालिद यू नो?… माई फ़ादर्… मेरे वालिद एक दीनदार मुसलमान थे। सफ़ेद लम्बी दाढ़ी, सफ़ेद कुर्ता पैजामा… और पंजगाना नमाज़ी। किसी के लेने मे न किसी के देने मे। बस नमाज़ रोज़ा और घर परिवार। बात करते तो मुंह से फ़ूल झड़ते, मिश्री टपकती। और उस नेक आदमी का बेटा मै … तुम देख ही रहे हो …। तुम्हे पता नही है, मेरी पत्नि की मौत कैसे हुई …”

“आइ नो सर, सुसाईड …”

“नो नो नो नो नो! तुम्हे नही पता। असल मे लोगों को गोली मारते मारते हमारी सम्वेदनायें मर जाती है। दिल मुर्दा हो जाता है। जैसे लगातार पाप करते करते …। हमारे लिये इन्सानी जान की क्या कीमत रह जाती है। कुछ नही। हमारे लिये हर इन्सान सिर्फ़ एक लक्ष्य है, सिर्फ़ एक टार्गेट। अपना परिवार भी। तुम भी। हां कोई सुपारी दे तो … तुम भी …”

“यानि, सर, …” वह घबराया।

“अरे नहीं, वो तो एक बार अंतरंग क्षणो मे उसे हसते हुये देख मन मे हूक उठी कि अगर इसी क्षण एक गोली इसके भेजे मे धस जाये तो?” इब्राहीम बड़बड़ाता रहा।

“किसी को पता नही चला?” नौजवान आफ़िसर ने हैरानी से पूछा।

“मेरे सीनियर है न। उन्हे मेरी ज़रूरत थी, मुझे उनकी। किसी ने एक बार भी यह नही सोचा कि वे किसी और धर्म के हैं और मै किसी और। दोस्त, सिर्फ़ किसी का धर्म या जाति उससे नफ़रत का आधार नही होते। आपका हर स्टैंड आपकी ज़रूरतों के हिसाब से तै होता है। हमने कितने एन्काउंटर किये क्या कभी किसी के धर्म का एक पल को भी ख्याल आया?… मै आज जो कुछ हूं अपने सीनियर्स के सपोर्ट और उनकी दी गई नसीहतो की वजह से हूं।“

“कौनसी नसीहतें सर?” ज्यूनियर ने पूछा।

“बहुत सी नसीहतें। बहुत सी बातें। खास तौर पर वह बात मैने हमेशा याद रखी; जो हमारे कमिश्नर सर ने, पांडे सर के फ़्यूनरल की शाम अपने घर मे, मुझे अपने हाथों से पैग थमाते हुये कही थी“

“क्या कहा था सर कमिश्नर सर ने?” इब्राहीम शेख के ज्यूनियर ने उत्सुकता से पूछा। उसे लग रहा था शायद मुझे भी इसमे कोई न कोई सीख मिल ही जायेगी; जिस नसीहत के कारण इब्राहीम सर आज इस पोज़ीशन पर पहूंचे हैं।

“कमिश्नर सर ने कहा था,…” इब्राहीम शेख कुछ कुछ होश और कुछ कुछ मदहोशी के आलम मे बड़बड़ाते बोलते रहे, “…पांडे का अफ़सोस मत करो। उसका यह अंजाम होना तय था। वह निरंकुश हो चला था। अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं था। सभी सीनियर्स की नाक में दम कर रखा था। मिनिस्ट्री की धौंस दिखता था .... अब दिखा ! ....हाँ, तुममे काबिलियत है, शेख। तुम बहुत तरक्की करोगे; बहुत ऊपर जाओगे। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना- सीनियर्स को कभी अंडर एस्टिमेट मत करना; वरना जैसे पांडे की सुपारी तुमको दी, वैसे ही तुम्हारी सुपारी भी दी जा सकती है ……"

इसके बाद इब्राहीम शेख वहीं टेबल पर लुड़क गया और बेसुध हो गया। वह अब भी कुछ बुदबुदा रहा था; जो समझ से परे था।

उसके गिलास मे शराब बाकी थी अभी।

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मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग का परिचय यहाँ पढ़ें

सम्पर्क - zifahazrim@gmail.com

 

 

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