... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

किताब

 

दिव्या अपनी अलमारी में काफी देर से कुछ ढूंढ रही थी कि शिखा ने आवाज दी.

"सुबह से क्या ढूंढ रह हो? क्या खो गया है?

"माँ आपने मेरी हिस्ट्री की किताब देखी क्या?,काफी दिनों से ढूंढ रही हूँ, मिल नहीं रही है.”

"अरे तुमने ही रखी होगी ,मुझे तो तुम अपने कमरे में आने ही नहीं देती.”

दिव्या गुस्से से – “ओके थैंक्स! पूछ लिया तो क्या हुआ, आज के बाद नहीं पुछूँगी.”

दिव्या अकसर माँ पर बात-बात पर चिढ़ जाती थी. चाहे शिखा की गलती हो या ना हो. शिखा भी उसकी इस आदत से परेशान थी. कुछ बोले तो आफत, न बोले तो आफत. वह उसे समझ नहीं पाती थी. कि इन आजकल के टीन-एजर बच्चों से कैसे बात की जाए.

दिव्या ने माँ से कहा, “मुझे कालेज जाना है, टाइम नहीं है, आप मेरा कमरा साफ कर देना, बस मेरी किताबों वाली अलमारी को हाथ मत लगाना.”

इतना कहकर दिव्या नहा कर कालेज चली गई. शिखा ने किचन का काम निपटाकर दिव्या का कमरा व्यवस्थित जमा दिया. उसे कहीं भी उसकी हिस्ट्री की किताब नहीं मिली. उसका मन न जाने क्यूँ उलटे-सीधे विचारों से घिर गया. बुक्स की अलमारी को हाथ मत लगाना. बड़ा बुरा लगा जब दिव्या यह बोली थी. शिखा के मन में न जाने कितने सवाल थे. पता नहीं अलमारी में क्या रखा हैं! मुझे क्यों हाथ नहीं लगाने देती?

आज दिव्या अचानक जल्दी घर आ गई थी. उदास सी लग रही थी. शिखा का मन हुआ कि पूछ ले पर हिम्मत नहीं कर पाई. दिव्या फ्रिज से पानी की बोतल लेकर अपने कमरे में चली गई, तभी डोर बेल बजी. शिखा ने दरवाजा खोला. सामने राखी खड़ी थी.

"अरे राखी, आओ बेटा कैसी हो?”

“मैं ठीक हूँ, आंटी. दिव्या कहाँ है.”

“वह अपने कमरे में है.”

“थैंक्स आंटी,” कहते हुए राखी दिव्या के कमरे में चली गई. राखी दिव्या की पक्की सहेली थी. पाँचवीं कक्षा से एक ही स्कूल, एक ही कालेज, एक ही सब्जेक्ट - सब कुछ उनका बचपन से साथ-साथ रहा था.

राखी के घर के हालात ठीक नहीं थे. जब राखी आठवीं क्लास में पढ़ती थी तब ही उसके पापा की डेथ हो गई थी. उसकी माँ एक मामूली टीचर थी. इस शहर में उनका कोई भी नहीं था जो उनकी कुछ सहायता कर सके. दिव्या का परिवार ही हर तरह से उनकी मदद करता था. राखी पढ़ने में होशियार थी.

दिव्या और राखी काफी समय से कमरे में ही थीं. तभी दिव्या ने आवाज लगाई, “माँ, दो कप चाय बना दो प्लीज़.”

शिखा को उसका स्वभाव मालूम था. दूसरों के सामने वह बड़े प्यार और आदर से बात करती थी. शिखा ने भी बड़े स्नेह से जवाब दिया,"हाँ बेटी, बनाती हूँ.”

आज शिखा को थोड़ा सुकून मिला. उसने सोचा हमेशा ऐसी बात करें, तो मेरी बेटी किसी परी से कम नहीं. बड़ी मूडी है.

तभी डोर बेल बजी. सुबोध थे, आते ही शिखा को बैग पकड़ाते हुए बोले, “आज क्या बात है. मेरे आने से पहले ही चाय बन गई."

“नहीं, वह राखी और दिव्या के लिये बनाई है. आपकी बिना चीनी वाली बना देती हूं.” कहकर शिखा किचन मैं चली गई. दस मिनिट में राखी “बाय आंटी, बाय अंकल,” कहते हुए निकल गई.

शिखा चाय देते हुए सुबोध से बोली, “देखो जी, आजकल दिव्या का स्वभाव ज्यादा ही रूखा होता जा रहा है, आप तो सुबह से ही चले जाते है. मुझे ही देखना पड़ता हैं, ये सब."

“अरे क्या हुआ? क्यों मेरी लाड़ली को दोष देती हो?”

दिव्या ने जैसे ही पापा के ये शब्द सुने सीधे कमरे से बाहर आई. बोली, “माँ, और क्या-क्या कहकर आप पापा के कान भरती हो, मुझे भी तो पता चले. पापा माँ क्या कह रही थी. मेरे बारे में?”

सुबोध बोला, “कुछ नहीं बेटा थोड़ी नाराज हैं, तुम से और क्या.”

"अच्छा सुनो मुझे कल सुबह जल्दी निकलना हैं. मेरा बैग तैयार कर दो, कल एक अर्जेन्ट मीटिंग के लिये पूना जाना है.”

अगले दिन सुबोध जल्दी ही पूना के लिये निकल चुके थे. अभी तक दिव्या सो कर नहीं उठी थी. शिखा अकेले ही चाय के साथ अखबार पढ़ रही थी. दिव्या के कमरे से लगातार फोन की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं. सोचा जाकर देखूँ किसका फ़ोन है. लेकिन शिखा ऐसा नहीं कर पाई. काफी देर घंटी बजने के बाद भी दिव्या नहीं उठी. थोड़ी देर में दिव्या नीचे आई, बोली, “माँ, आज में थोड़ा लेट आऊँगी, आप मुझे जल्दी से नाश्ता बना दो.”

"बेटा तेरा फोन काफी देर से बज रहा था. किसका फोन था?”

"वो ... वो...  माँ मेरी फ्रेंड का था. आज उसका जन्मदिन हैं, मैं शाम को लेट  आऊँगी. आप चिंता मत करना.” कहते हुए तैयार होने चली गई.

शिखा ठगी-सी वहीं बैठी देखने लगी. उसका मन अखबार मैं नहीं लग रहा था. सोच रही थी कि मैं कैसे अपनी बेटी को समझ पाऊँगी? क्या वह मुझे सिर्फ माँ ही कहेगी या माँ  होने का एहसास भी करायेगी? यही सोच किचन में पराठे सेंकने चली गई. दिव्या ने माँ को आवाज दी, “माँ नाश्ता तैयार है क्या?”

दिव्या नाश्ता कर बोली, “माँ, कुछ रुपये दो, सहेली के लिए गिफ्ट लाना है.”

"कितने रुपये चाहिये?”

“एक हजार दे दो.”

“हजार रुपए! इतना महंगा गिफ्ट कोई देता हैं क्या?”

दिव्या चिल्लाकर, “माँ, आप भी न कभी भी अपनी खुशी से नहीं देती, हमेशा दस सवाल करके ही पैसे देती हो, पेट्रोल भी भरवाना है.”

शिखा ने पानसों-पांसों के दो नोट टेबल पर रख दिये. दिव्या जल्दी से पर्स और पैसे लेकर निकल गई.

हवा की तरह चीरता सन्नाटा शिखा के कानों में न जाने क्यूँ अनकही सी कहानियां कह रहा था. मन कह रहा था कि जाकर देखूँ वह कहाँ गई है, किसके साथ गई है. हजारों सवाल शिखा के मन मस्तिष्क में  हलचल मचा रहे थे.

आज शिखा ने पूरा मन बना लिया था कि वह दिव्या की किताबों वाली अलमारी खोलकर देखेगी कि आखिर उसमें है क्या जो वह मुझे उस अलमारी को हाथ तक नहीं लगाने देती?

वह जल्दी से सारे काम  निपटाकर दिव्या के कमरे में जाकर अलमारी की चाबी ढूंढने लगी. शायद वह चाबी लेकर चली गई थी. वह निराश होकर वापस आने लगी तो उसे उसका पुराना पर्स टेबल पर रखा दिखाई दिया. आज वह दूसरा पर्स लेकर गई थी. शिखा ने पर्स उठाकर देखा तो चाबी उसी में थी. वह जल्दबाज़ी में चाबी भूल गई थी.

उसने अलमारी खोलकर सारी कॉपी-किताबें खोल-खोल कर देखीं पर कहीं कुछ भी नहीं मिला.

उसने संतोष की साँस ली. जब कुछ भी नहीं तो ताला क्यों? घर में मेरे और सुबोध के अलावा है कौन?

सब कुछ सही ढंग से जमाकर चाबी पर्स में डाल दी. सोच रही थी कि शायद हिस्ट्री की किताब में कुछ हो. वह उसी किताब को ढूंढ रही थी. तभी डोर बेल बजी, देखा तो राखी की माँ सामने खड़ी  थी.

"आइये कैसी हैं आप?”

“काफी दिनों से आप लोगों से मुलाकात नहीं हुई, सोचा मिल आऊँ इसी लिए चली आई. दिव्या कहां है?”

"आपको दिव्या से कोई काम था क्या? आज दिव्या की किसी सहेली का बर्थडे हैं. वह थोड़ी देर में आ जायेगी. राखी भी उसके साथ गई है न?”

“नहीं, वह तो आज घर पर ही है.”

थोड़ी देर बैठ कर राखी की माँ चली गई.

शिखा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. सोच रही थी ऐसी कौन सी सहेली हैं, जिसकी दोस्ती राखी से नहीं. जिसने सिर्फ दिव्या को ही बुलाया है राखी को नहीं. दोनों एक ही कालेज में, एक ही सब्जेक्ट, तो फिर दोस्त भी एक ही होना चाहिए. राखी क्यों नहीं गई. अनेक सवाल शिखा के मस्तिष्क में हलचल कर रहे थे.

शाम के सात बज चुके थे. दिव्या अभी तक घर नहीं आई थी. सोचा राखी को फोन लगाकर पूछ लूँ, पर वह ऐसा नहीं कर पाई. आखिर उससे रहा नहीं गया. उसने राखी को फोन लगा ही लिया.

"हेलो राखी - बेटा आज किस सहेली की सालगिरह है? क्या तुम्हे मालूम है? आज तुम कालेज क्यों नहीं गई?” अचानक इतने सवाल सुनकर राखी घबरा गई.
"बोली आज मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. इसलिए नहीं गई.  तभी डोर बेल बजी शिखा फोन रख कर जल्दी से दरवाजा खोलने  चली गई.

अंदर आते ही, “माँ दरवाजा खोलने में इतनी देर क्यों लगा दी? फोन पर किससे बातें कर रही थी?”

तभी दिव्या के मोबाइल पर राखी ने फोन किया.

"अभी तक कहां हैं? घर क्यों नहीं पहुँची? माँ चिंता कर रही हैं.”

दिव्या समझ गई कि माँ ने राखी को फोन लगाया था. लेकिन वह कुछ नहीं बोली अपने कमरे में चली गई .

शिखा ने पूछा, "कुछ खाओगी क्या?”

कुछ जवाब नहीं दिया और दरवाजा बंद कर के सो गई.

आज पूरी रात शिखा को नींद नहीं आई. रह-रह कर सोच रही थी कि क्या हो गया है दिव्या को? वह इस तरह से क्यों व्यवहार करती है? सुबोध जल्दी घर आ गये थे. दिव्या अभी उठी ही नहीं थी. शिखा को लगा कि कल की सारी बातें सुबोध को बता दे. पर वह खामोश ही रही.

आज शनिवार था. करीब एक घंटे बाद दिव्या उठकर नीचे आई पापा के गले में बाहें डालकर बोली, "लव यू पापा.”

"क्या बात है, हमारी बेटी को हम पर आज बड़ा प्यार आ रहा हैं, कुछ चाहिए क्या?”

शिखा को इन दोनों का लाड़-प्यार बड़ा ही अच्छा लगा. उसे दिव्या एक मासूम गुड़िया की तरह लग रही थी. थोड़ी ही देर में वह माँ को भी पीछे से झप्पी देते हुए बोली, "मॉम आज क्या बना रही हो?”

“सैटरडे स्पेशल!” शिखा प्यार से पलटकर बोली. "आज तेरे पसंद के आलू के पराठे.”

सभी डायनिंग टेबल पर नाश्ता कर रहे थे. तभी शिखा ने सवाल किया, “दिव्या तुम्हारी हिस्ट्री की किताब खो गई थी मिली कि नहीं?”
"हाँ मिल गई तभी तो आज कूल मुड़ में हूँ.”

सुबोध ने पूछा, "ऐसा क्या था उस किताब में कि हमारी बिटिया कूल मूड में आ गई.”

तभी डोर बेल बजी. शिखा ने दरवाजा खोला तो राखी और उसकी माँ दरवाजे पर मिठाई का डिब्बा लेकर खड़े थे.

वह दोनों अंदर आ गईं. तभी राखी की माँ के आँखों में अचानक आँसू आ गये. वह दिव्या को बड़े प्यार से मिठाई का डिब्बा देते हुए बोली, "लो दिव्या सबसे पहले तुम अपना मुंह मीठा करो, तुम्हारी वजह से ही हमें ये खुशी मिली हैं.”

सुबोध और शिखा एक दूसरे का मुंह देखने लगे. उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. कि माजरा क्या है. तभी सुबोध ने पूछा, “भाभी जी क्या बात है? किस बात की मिठाई खिलाई जा रही है, हमें भी तो पता चले.”

राखी की माँ ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, "दिव्या ने बहुत मेहनत करके राखी को एस्कोलरशिप दिलवाई है. नहीं तो राखी आगे नहीं पढ़ सकती थी. अब इसका ग्रेजुएशन आराम से हो जाएगा, वरना राखी को तो पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती. लेकिन अब वह पूरी पढ़ाई आराम से कर सकती है.”

शिखा अचानक बोल पड़ी, “मगर ये बात दिव्या ने मुझे बताई ही नहीं.”

दिव्या उठकर माँ के पास आई, "माँ वो दो दिन से हिस्ट्री की किताब ढूंढ रही थी. उसी में वह फार्म रखा था. कल उसकी लास्ट डेट थी जमा करने की. सारा दिन इसी कार्यवाही में लगी थी. उसमें पांसों पचास रुपये फीस जमा करने थे. कल मेरे किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी नहीं थी. मैं तो सारा दिन राखी का फार्म जमा करने में ही लगी रही.”

“अरे, इतनी सी बात तू मुझे पहले बताती तो क्या मैं तुझे जाने नहीं देती?”

“नहीं माँ, वह सरप्राइज था, बता देती और यदि नहीं होता तो ... बस इसीलिए नहीं बताया. मैंने आप के साथ जो गलत व्यवहार किया उसके लिए माफी चाहती हूं.” यह कहते हुए वह माँ से लिपट गई.

शिखा मन ही मन सोच रही थी कि मैंने अपनी बेटी पर शक कर के अच्छा नहीं किया. आज उसे अपनी बेटी पर गर्व महसूस हो रहा था. वह "किताब" के बारे में सोचकर मन ही मन मुसकुरा उठी.

 

 

वन्दना पुणतांबेकर      
जन्मतिथि:5।9।1970


वर्तमान पता: वन्दना पुणतांबेकर रो हॉउस न0 63 सिल्वर स्प्रिंग बाय पास रोड फेज     1 इंदौर
राज्य,प्रदेश: मध्य प्रदेश

vandanapuntambekar250@gmail.com

मोबाईल न0 9826099662


शिक्षा: एम ए समाज शास्त्र,फेशन डिजाइनिंग, सितार आई म्यूज.

 

सामाजिक गतिविधियां:सेवा भारती से जुड़ी हु।

 

लेखन विधा:कहानियां, कविता,हाइकू कविता,लेख.

प्रकाशित रचनाये: भरोसा, सलाम, पसीने की बूंद,गौरैया जब मुझसे मिली,आस,आदि।
प्रकाशन हेतु गईं बड़ी कहानियां बिमला बुआ,प्रायश्चित, ढलती शाम ,परिवर्तन, साहस की आँधी आदि।
लेखनी का उद्देश्य:रचनात्मक लेखन कार्य मे रुचि एवं भवनात्मक कहानियों द्वारा महिला मन की व्यथा को कहानी के रूप में जन, जन तक पहुँचाना ।
अभिरुचि:लेखन,गायन।
प्रेरणा पुंज:मुंशी प्रेमचंद जी,महादेवी वर्मा जी।
                                                                                             
                                                                                                 

 

 

 

 

 

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