मौलिक रचना

आज तक समझ नहीं आया, ये मौलिक रचना क्या होती है!

     भाषा-संस्कृति विभाग में था तो सम्मेलन होने पर लेखक-कवियों को पत्र भेजे जातेः ‘‘कृपया अपनी अप्रकाशित, अप्रसारित और मौलिक रचना का पाठ करें.......आप समारोह में कवि के रूप में आमन्त्रित हैं।’’

    लगता, साहित्यकार बंधु अभी किसी और रूप में बैठे हें या किसी और रूप में रहते हैं। जब आयोजन में आना है तो अपना कवि रूप धर लें जैसे पुरोहिताई के लिए धोती पहन आना होता है। इस पर कठिनाई यह भी थी कि अधिकांश लेखक कविता, कहानी, निबंध, लेख सब कुछ लिख लेते थे। और कई तीन तीन भाषाओं में लिखते ; हिन्दी, संस्कृत, पहाड़ी और कुछ तो पंजाबी व अंग्रेजी में भी। सभी भाषाओं पर एक समान अधिकार। जैसा अवसर हो, वैसा ही रूप धर लेते।.......अरे! आ जाओ जिस भी विधा, जिस भी भाषा में आना है......की मुद्रा में रहने वाले आयोजन के अखाड़े में ताल ठोंकते।

     बहुत पहले यह भी लिखा जाता था कि रचना, सरकार की नीतियों के विरूद्ध नहीं होनी चाहिए। बाद में जब साहित्यकार समझदार हो गए तो इसे हटा दिया गया।

      ये अप्रसारित या अप्रकाशित का गतिरोध तो किसी को रोक नहीं पाता, ‘मौलिक’ तो न हम जानते थे, न वे समझते थे।

     उस समय पत्रिकाओं में भी ऐसी ही मांग की जाती थी। पत्रिकाओं ने अस्वीकृत रचना के लिए भेजे जाने वाले पत्र की तरह रचना भेजने के लिए भी बाकायदा प्रपत्र छपवा रखे थे। रचना भेजने के साथ एक प्रमाण पत्र देना होता था : ‘‘मेरी अमुक रचना अप्रकाशित, अप्रसारित और मौलिक है। ‘बगुला’ पत्रिका में छपने से पूर्व इसका प्रकाशन अन्यत्र नहीं करवाया जाएगा।’’

    ईमानदार लेखक एक पत्रिका को रचना भेजने के बाद इंतजार करते रहते। तब तक वह एक प्रकार से ब्लॉक हो जाती थी। यदि एक रचना दो पत्रिकाओं में छप जाए संपादक बुरा मान जाते और लेखक को छपास का भूखा या न जाने क्या क्या घोषित कर देते।

     भाषा विभाग में सेवक हुआ तो जाना, साहित्यकार ब्रह्मा होता है। ब्रह्मा के तीन सिर हैं। वह रचना करता है। वैसे ही साहित्यकार सर्जक है। सरकार के भाषा विभाग के सेवक उसके चारण हैं, भाट हैं। ऊपर ब्रह्मा रचना करता है तो मृत्युलोक में साहित्यकार। उसकी सेवा के लिए सरकारों ने भाषा विभाग पुलिंग में और अकादमी स्त्रीलिंग में खोल रखी हैं। सरकारी सेवक भी भैया कम नहीं होता, ऐसा घुमाएगा कि पता नहीं चलेगा सेवक कौन है और आका कौन। सरकारी सेवक तो बैठा रहेगा एक जगह सिंहासन पर; साहित्यकार बिना कार के चक्कर काटता जूते घिसाएगा। हां, मन्त्री, मुख्यमन्त्री का चहेता तो अड़ंगा डालता था, पर उसके भी कई तोड़ होते हैं।

     सेवाकाल के दौरान यह भी जाना कि कवि जैसा दमदार और दबंग प्राणी दूसरा नहीं। पहले सम्मेलन में ‘बेताब’ जी से एक कविता सुनी। ख़ूब वाहवाही लूटी। दो महीने बाद दूसरे सम्मेलन में भी वही कविता सुनी। लगातार कई सम्मेलन बदले, कवि बदले, वह कविता नहीं बदली। आलम यह कि रिटायर भी हो गया, ‘बेताब’ जी वही एक कविता सुनाते रहे।

 

     वैसे तो राष्ट्रीय स्तर के समारोहों में, टेलिविज़न पर बहुत नामी ग़िरामी कवि शायरों को एक ही कविता सुनाते सुना है। बरसों से एक ही पढ़ रहें हैं। भारत एक बड़ा और बड़े दिल वाला देश है अतः यहां ऐसा चल जाता है। एक जगह पढ़ी तो दूसरी जगह लोगों ने सुनी नहीं होती। बहुतेरे बता भी देते हैं, यह पढ़ी तो कई जगह है पर यहां के लोगों ने नहीं सुनी है, इसलिए। जहां कविता की प्रति जमा करवानी अनिवार्य होती है, वहां कोई दूसरी दे देते हैं।

   बहुत से स्थायी अध्यक्ष भी हर जगह एक ही भाषण देते हैं। मुख्य विषय कोई भी हो उसे अपने बने बनाए भाषण से जोड़ देते हैं।

    एक सज्जन तो सभागार में बैठे अपने चेलों को पहले ही पट कर देते। वे पढ़ने के लिए उठते ही तो कोई चिल्ला उठताः जनाब! वही सुनाइए ‘छलछल  करती.....थलथल करती....।’ धर्मसंकट में पड़े से वे हैरानी से सभागार में नज़र दौड़ाते....अरे आज तो बिल्कुल ताज़ा कविता लाया था, चलो आदेश हुए हैं तो वही सही। ऐसा कई करते हैं। अपने लोग यहां तहां बिठा देते हैं। जैसे साधु संत अपनी प्रवचन सभा में चेलों को बिठाए रखते हैं। चेले फुर्ती से उठ कर बोल उठते है : ‘बाबा! आपकी विभूति पत्नी के पेट में मली, कैंसर ठीक हो गया।.....बेटे को चटाई, क्लास में फर्स्ट आया।’ बाबा पूछते हैं :‘कितना वजन कम हुआ!’ ‘बाबा! दो दिन में अढ़ाई किलो।’ ‘अढ़ाई किलो....देखो अढ़ाई किलो कम हो गया।’ बाबा हंसते हैं।

      विषयांतर की तरह बात कहीं और चली गई। मुद्दा तो मौलिक होने का था। मौलिक पता नहीं हिन्दी का मूल शब्द है या अंग्रेजी के किसी शब्द का अनुवाद है। हिन्दी शब्दकोष देखा तो कई अर्थ दिये थेः आदिम, आधारभूत, चरित्रीय, प्रधान लक्षणयुक्त, मुख्यकोटीय, पाठसंगत। एक जगह अर्थ दिए बिना ही ‘मौलिक रचना’ लिखा था। एक जगह ‘मौलिक’ के अर्थ में अकृत्रिम, अननूदित से ले कर असंशोधित कृति भी लिख डाला है। इन अर्थों में कोई भी मौलिक रचना पर फिट नहीं बैठता था। अंत में एक अर्थ स्वरचित भी दिया था। ये कुछ कुछ करीब का प्रतीत होता है। किंतु यह अर्थ सब अर्थों के अंत में फालतू सा लिखा था। खैर स्वरचित ही होती होगी मौलिक रचना। वैसे तो लेखक की हर रचना स्वरचित ही होती है। कोई दूसरा थोड़े ही लिखता है लेखक के लिए। दूसरे की लिखी स्कूल कॉलेज में विद्यार्थी पढ़ जाते हैं। वाद विवाद प्रतियोगिता, कविता कहानी प्रतियोगिता; सब में अध्यापक लिख कर देते हैं। ये तो अंडरस्टुड ही है कोई बड़ा आदमी जो अपने को लेखक मानता है, अपने द्वारा रचित रचना ही तो पढ़ेगा। किंतु बड़ों का भी क्या पता! भरोसा तो रहा नहीं किसी पर.....शायद इसीलिए यह शर्त रखी गई हो।

    मौलिक का समझाबूझा अर्थ ‘मौलिक अधिकार’ से पता चलता जो अब एक आमफ़हम शब्द है। जो जन्मजात हैं, जो होने चाहिएं वही मौलिक अधिकार हैं। इस अर्थ में नवीनता का बोध नहीं होता। स्वरचित होने का भाव भी कहीं नहीं है।

    मौलिक रचना से तो ‘मौलसिरी रचना’ कहा जाता तो रस के साथ सुगन्ध भी आती।

    आयोजनों में सब से आसान है कवि सम्मेलन करवाना। ओम्् नमो कविताए नमः बोल कर कवि सम्मेलन करवा लीजिए। लेखक या आयोजक को न किसी तैयारी की जरूरत, न विषय निर्धारण की माथापच्ची। न लेखकों को कुछ तैयार करना है और न आयोजकों को। कविताएं तो तैयार ही होती हैं। साथ लाने की भी जरूरत नहीं। बहुत सारे तो जुबानी ही बांचते हैं। बल्कि बार बार बांच कर कण्ठस्थ हो जाती हैं। तीस चालीस कवि भी बुला तो िंचंता नहीं। मात्र एक ही सम्मेलन में ज्यादा से ज्यादा यार दोस्तों और अनजान लोगों का ऑब्लाइज किया जा सकता है।

   उधर दबंग कवि एक ही कविता बांचते चले जाते हैं। पहले सरकारी पारिश्रमिक बहुत कम था(अब भी संतोषजनक तो नहीं है)। अतः वे कहते जब तक इस बहुमूल्य कविता की कीमत पूरी नहीं हो जाती, इसे ही बांचेंगे। यह तो कालजयी बन चुकी है, आप सरकारी बाबू इसकी कीमत चुका ही नहीं सकते। अरे! आप लोग बरसों से एक ही रामायण पढ़ते सुनते आए हैं, एक ही रामलीला देखते हैं तो कविता नई क्यूंकर चाहते हैं! बार बार बांचने पर हर बार यह नई लगती है, यही इसकी नवीनता है, यही इसकी मौलिकता है।

    तीस साल के सेवाकाल के बाद रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले कवि सम्मेलन में ‘बेताब’ जी ने वही कविता सुनाई जो तीस साल पहले सुनाई थी और जो अब एंटीक और कालजयी हो गई थी :

         छलछल करती....थलथल करती

         तर तर करती नहर सरीखी

         वह उतरी नदी सी मेरे मन में....

         छलछल....छलछल...छलछल....छलछल।

         बांह उठा उन्होंनें उंगलियों के इशारे से लहरें बनाइंर्। लगा, सब भीग गए।

      सभागार में सन्नाटा छा गया। जब तक वे लहर को तोड़ बांह नीचे लाते, एक ओर से कोई चिल्लाया :

      वाह! वाह!! वाह!!!

चहुं ओर से शोर गूंज उठा : वाह! वाह!! वाह!वाह!!

सुदर्शन वशिष्ठ

94180-85595                                     

‘‘अभिनंदन’’ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला-171009

 

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