... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

विधायक की कोठी

 गनपति चिंताग्रस्त खटिया पर लेटा था, उसके मस्तिष्क में बस यही चल रहा था कि कैसे गाँव के दबंगों से अपना खेत वापिस लिया जाये. बेचारा चौबीसों घंटे इसी चिंता में डूबा रहता है. सूखकर कांटा हो चुका है. तहसील प्रशासन के चक्कर लगा-लगाकर उसकीं टायर वाली चप्पल भी घिस गईं, पर कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं हुई. थकहार कर बेचारा गनपति अपनी झोपडी पर ही पड़ा-पड़ा रोता रहता है, लेकिन आज उसने अपने आँसू पोंछ लिए. वो खटिया से उठा और झोपड़ी के भीतर चला गया, उसने एक झोला खंगाला तो एक कार्ड निकला. कार्ड देखकर गनपति के चेहरे पर ऐसी चमक आ गई मानो उसके खेत के कागज उसे मिल गये हों. कार्ड विधायकजी का था. पिछले वर्ष चुनाव के समय वोट मांगने गाँव में आये थे, तब यह कहकर कार्ड दे गये कि तुम्हें कभी कोई तकलीफ हो तो आधी रात को भी मेरी कोठी के द्वार खुले रहेंगे. बेझिझक अपनी समस्या लेकर आ जाना.

 

कार्ड लेकर गनपति दौड पड़ा शहर की ओर... पूछते-पाछते गनपति ने विधायकजी की कोठी ढूंढ ली. गेट के अंदर घुसने की कोशिश की मगर गेटमैन ने यह कहकर रोक दिया - ‘अबे ! कहाँ घुसा चला जा रहा है... विधायकजी कोठी पर नहीं हैं, वे लखनऊ मीटिंग में गये हैं. पांच - छ: दिन बाद आयेंगे, तब आना.’

 

बेचारा गनपति वापिस मुड़कर गेट के बाहर जमीन पर बैठ गया. दस-पन्द्रह मिनट का समय ही गुजरा होगा कि विधायकजी चमचमाती गाड़ी में बैठकर कहीं चले गये. गनपति चिल्लाता रह गया और गेटमैन कुटिल हंसी हंसे जा रहा था. गनपति आँखों में आँसू लिए कोठी को एक टक देखता है फिर खुले आसमान की तरफ मुँह करके चिल्लाने लगता है और धड़ाम से वहीं ढेर हो जाता है.

- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक तारौली,
फतेहाबाद, आगरा, 283111

mukesh123idea@gmail.com

                                                                                                                                       

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags
Please reload

Follow Us
  • Facebook Basic Square
  • Twitter Basic Square
  • Google+ Basic Square