... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

जीना इसी का नाम है ...

हौंसले बुलंद हों तो ...

 

 "अगर हार नहीं मानोगे तो हार पहनोगे ..."

 शारीरिक अक्षमता के बावजूद यदि मन में कुछ करने की आकांक्षा है तो शारीरिक अक्षमता भी अक्षम हो जाती है उस व्यक्ति को कामयाबी पाने से रोकने में। ऐसा व्यक्तित्व समाज में अनुकरणीय एवं प्रेरक हो जाता है। वही समाज में चर्चा का विषय बन जाता है तथा लोग उसको सम्मान प्रदान करने लगते

हैं जो पूर्व में उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं।

 

इन पंक्तियों को अक्षरांश सत्य प्रमाणित करने वाले व्यक्ति पीयूष कुमारद्विवेदी 'पूतू' हैं जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद के अंतर्गतटीसी ग्राम में हुआ जो इनका ननिहाल है।इनकी जन्मतिथि प्रमाण पत्रानुसारतीन जुलाई 1991 है। इनके पिता स्वर्गीय रमेश चंद्र द्विवेदी एवं माताश्रीमती लल्ली देवी हैं। जन्म के 14 माह बाद तेज बुखार आया तथा डायरिया होगया,उसी दिन द्विवेदी जी की सबसे बड़ी मौसी का देहांत हो गया था जिसके कारण घर के सभी लोग दाहसंस्कार में लगे थे इसलिए पड़ोसियों ने नन्हे बालक को एक प्राइवेट डॉक्टर के पास ले गए ताकि इलाज हो सके। उस दिन क्लीनिक में डॉक्टर की जगह उसकी बेटी थी जो अभी डॉक्टरी सीख रही थी। उसने बालक को इंजेक्शन लगा दिया जो रिएक्ट(प्रतिक्रिया)कर गया। उसके कारण शरीर विकलांगता ग्रस्त हो गया। विकलांगता इस प्रकार कि केवल बायाँ हाथ अल्प मात्रा में ही काम करता है बाकी अंग कंपन के कारण सुचारु काम

नहीं करते हैं।

विकलांगता का पता चलने के बाद ननिहाल पक्ष ने दवा और दुआ दोनों करना प्रारंभ किया,जो भी जहाँ के लिए बताता कि वहाँ अमुक डॉक्टर है या अमुक साधु,संत या फकीर है जो ठीक कर देता है वहीं नाना श्री रामशंकर द्विवेदी एवं सबसे छोटी मौसी श्रीमती सविता देवी पहुँच जाती थीं लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं प्राप्त हुआ।

पीयूष जी की विकलांगता ने माँ के लिए मुसीबत खड़ी कर दी क्योंकि ददियाल पक्ष के लोगों ने यह कहकर घर से निकाल दिया कि विकलांग बच्चा घर में तो गंदगी फैलाएगा हमारे घर में बड़े-बड़े लोग आते हैं इससे हमारा स्टेटस डाउन होगा। उन लोगों का दूसरा आरोप यह भी था कि जब पूतू विकलांग ननिहाल में हुआ है तो वही रहे। इसी वजह से माँ को ससुराली जन शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे। यह भी नहीं कि फैमली अशिक्षित या गरीब थी बल्कि दादा (बाबा) और चाचा वगैरह आर्मी ऑफिसर हैं।

इस घटना के बाद पीयूष अपनी माँ के साथ ननिहाल में रहने लगा, इनके नाना श्री रामशंकर द्विवेदी और मामा श्री वामदेव द्विवेदी जी ने बालक के पालन-पोषण का दायित्व अपने कंधों पर ले लिया। पीयूष जी कहते हैं - "अगर मेरा ईश्वर के बाद दुनिया में कोई श्रद्धेय है तो वह मेरे मामा जी हैं, जिन्होंने मेरे जीवन को सँवारने के लिए अपना जीवन तबाह कर दिया। अपने अरमानों की बलि चढ़ा दी।"

 "देखें मत विकलांगता, सिर्फ देखिए ज्ञान ..."

 धीरे-धीरे बालक बड़ा होने लगा लेकिन चलने एवं खड़े होने में असमर्थ था। हाथों और घुटनों के बल घिसटकर चलता था। बालक की याददास्त बहुत अच्छी थी इसलिए घर पर ही रहकर उसने अपनी छोटी मौसी श्रीमती सविता देवी से सुन-सुनकर गिनती,पहाड़ा आदि याद कर लिए थे।जिस उम्र

में अन्य बच्चे खेल में मस्त रहते हैं उस आयु में इस बालक ने सामान्य अंग्रेजी पढ़ने एवं बोलने लगा था। घर एवं गाँव यह बालक कौतुहल का विषय बन गया जो भी घर में मेहमान आता इस बालक से जरूर कुछ न कुछ पूछता और सही एवं शीर्घ उत्तर पाकर आश्चर्यचकित हो जाता था। बालक में पढ़ने की ललक इतनी ज़बरदस्त थी कि मौसी से मिले कार्य को समय से पूर्व निपटा लेता अर्थात् याद कर लेता था और मुहल्ले के बच्चों के खेलता भी था पढ़ने और बढ़ाने वाला ही खेल होता था। बालक पूरे ननिहाल पक्ष के आँखों का तारा था,खासकर अपनी नानी श्रीमती बृजरानी देवी जी का।

 "मैंने हिंदी साहित्य के अध्ययन एवं अध्यापन के दौरान पाया कि हिंदी साहित्य में स्त्रियों, बालकों, दलितों और आदिवासियों को लेकर विमर्श किया गया परंतु विकलांगों पर विमर्श की बात नहीं की गई ..."

पीयूष जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय से हुई। शिक्षा प्रारंभ की भी रोचक एवं संघर्षमयी कहानी है, जब इनकी छोटी मौसी विद्यालय गईं इनको लेकर प्रवेश के लिए तो गाँव के ही एक अध्यापक ने यह कहकर हतोत्साहित किया कि जब यह ठीक से बैठ नहीं पा रहा है,अपनी दैनिक क्रिया स्वयं से नहीं कर पा रहा है तो कैसे पढ़ेगा?यह पढ़कर कौन-सा अफसर बन

जाएगा?अच्छे-अच्छे तो पढ़-लिखकर मारे-मारे फिर रहे हैं फिर तो यह लंगड़ा है। इनकी मौसी दुःखी जरूर हुईं लेकिन हार नहीं मानी और प्रधानाध्यापक से अनुरोध करके प्रवेश दिला दिया।किंतु उन्होंने भी यही प्रश्न किया कि बच्चे को नित्य क्रिया कौन करवाएगा क्योंकि हमारे यहाँ ऐसी व्यवस्था नहीं

है,तब मौसी ने पूरी जिम्मेदारी ली कि अगर ऐसा कुछ भी हो तो आप किसी से भी संदेश भेज दीजिएगा मैं तुरंत आ जाऊंगी लेकिन पढ़ने दीजिए।इसी बीच एक नई अध्यापिका की नियुक्ति हुई जो मौसी जी की सहेली थीं,उनका नाम लालसा देवी था। उन्हें जब पता चला तो उन्होंने पीयूष का विशेष ध्यान रखने लगीं। पीयूष लिखने में धीमे थे तथा कंपन के कारण राइटिँग ठीक नहीं बनती वो अपना लिखा

हुआ स्वयं पढ़ पाते इसलिए उनकी अध्यापिका स्वयं इनका कोर्स पूरा करके देती थीं तथा पीयूष पढ़ने में मेधावी एवं किसी बात को बहुत जल्दी याद कर लेते थे जबकि आम धारणा यह है कि विकलांग बच्चा सीखने में सामान्य बच्चे की अपेक्षा अधिक समय लेता है।पीयूष अपनी असाधारण अधिगम क्षमता का कारण जल्दी शुरू की गई पढ़ाई को मानते हैं।अमूमन होता यह है कि विकलांग बच्चे

की पढ़ाई देर शुरू की जाती है जिससे उसकी अधिगम क्षमता प्रभावित हो जाती है।

 "हिंदी साहित्य में विकलांगता को अभिशाप या ईश्वरीय कोप के रूप में परिभाषित किया जाता है ..."

कक्षा पाँच इनकी मौसी, नाना या मामा पीठ पर लादकर सुबह विद्यालय छोड़ने जाते और फिर शाम को घर ले आते थे। पीयूष अपनी पढ़ाई के प्रारंभिक दिनों के बारे में बताते हैं - "मैं सुबह घर से कम खाना खाकर जाता और कम पानी पीता ताकि टॉलेट न जाने पड़े, इसी डर से विद्यालय में अन्न-जल बिल्कुल नहीं ग्रहण करते क्योंकि तब विद्यालय में विकलांग के लिए छोड़िए सामान्य बच्चों के लिए शौचालय नहीं था जिसके कारण निवृत्ति हेतु तालाब किनारे जाना पड़ता था जो विद्यालय के पीछे था। मुझे मेरी अध्यापिका अपनी टिफिन से खाना खाने के लिए देती थीं पर इसी डर के मारे मैं नहीं खाता था, उन्हें लगा कि मैं ब्राह्मण होने के कारण उनकी टिफिन का भोजन नहीं खा रहा हूँ क्योंकि मैडम पिछड़ी जाति की थीं। एक दिन वो मेरे लिए अलग टिफिन लेकर आईं और बहुत खाने के लिए जोर दीं लेकिन मैंने नहीं खाया। तब इतनी समझ नहीं थी तथा डर भी बहुत लगता था।"

 "मेरा सपना है कि मैं हिंदी साहित्य के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं तथा विश्व पटल में विकलांग विमर्श को स्थापित कर सकूँ जिससे विकलांगता के सकारात्मक पक्ष को समाज में प्रस्तुत किया जा सके ..."

पीयूष की पढ़ाई में कोई बाधा न आए इसलिए उनके मामा ने पीयूष की छोटी बहन स्नेहलता का नाम कानपुर से कटवाकर गाँव के विद्यालय में पीयूष की कक्षा में करवा दिया जिससे पीयूष के लिखने वाली समस्या हल हो गई क्योंकि बहन लिखती और पीयूष केवल उसे रट लेते थे।

कक्षा पाँच में इन्हें ट्राईसाइकिल मिली जिससे विद्यालय आना-जाना आसान हो गया क्योंकि इनके मित्र घर से ले जाते थे और फिर छोड़ जाते थे।आठवीं तक पढ़ाई गाँव के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों से हुई।गाँव की पढ़ाई में इनकी मदद इनके मित्र विवेक द्विवेदी,राजीव सविता,प्रदीप कुमार,धर्मेंद्र कुमार,राजतिलक आदि ने बहुत की।उसके बाद इंटर तक पढ़ाई गाँव से लगभग पाँच किलो मीटर दूर एक इंटर कॉलेज से हुई जिसमें इन्हें लाने-ले जाने का कार्य विवेक द्विवेदी करते थे जो इनके बचपन का मित्र एवं पड़ोसी भी हैं।

 "मैं जब विद्यालय जाता था तो लोग मुझे अपशकुन मानकर तरह-तरह की बातें करते थे ..."

इंटर के बाद इनको इनके मामा ने बी.ए. की पढ़ाई हेतु चित्रकूट स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाया।जहाँ के कुछ अध्यापक और अधिकांश विद्यार्थी इनकी विकलांगता को देखकर मानते थे कि हॉस्टल में रह नहीं पाएँगे तथा पढ़ कैसे पाएँगे जब ठीक से बैठ नहीं पाते और न ठीक से बोल पाते हैं।इनकी सेवा कौन करेगा हॉस्टल में? तब मामा जी ने आश्वस्त किया कि आप केवल पढ़ने दीजिए बाकी जिम्मेदारी मेरी है।मैं हमेशा साथ रहूँगा,आप इसके ज्ञान की परीक्षा करके देख लीजिए। जब अध्यापकों पीयूष ने प्रश्न किए तो सटीक एवं विस्तृत उत्तर पाकर आश्चर्यचकित हो गए और मासिक टेस्ट में दस में दस अंक प्राप्त कर उन अध्यापक का मुँह बंद कर दिया जो कह रहे थे कि नहीं पढ़ पाएगा। अंततः बी.ए.तथा एम.ए.(हिंदी) में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर 'स्वर्गीय गंगानारायण त्रिपाठी स्वर्ण पदक' हासिल किया।इसके अतिरिक्त दिसम्बर 2012से लगातार पाँच बार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यू.जी.सी) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा(नेट)क्वालीफाई किया जो महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में असिस्टेँट प्रोफेसर बनने के लिए अनिवार्य अर्हता है। अपनी विश्वविद्यालयी शिक्षा के विषय में पीयूष कहते हैं-"मैंने जब विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तो मामा जी मेरे साथ हॉस्टल में दो वर्ष

रहे।उसके बाद जब मेरी मित्रता अनिल मंडल से हुई जो मेधावी तथा ब्लाइंड पर्सन थे तो उन्होंने मामा जी से कहा आप घर जाइए हम लोग एक-दूसरे की सहायता कर लेंगे।इनके अतिरिक्त निजाम मोहम्मद,इफ्तेखार अहमद,मिथिलेश कुमार,सुरेन्द्र कुमार,कंचन पोद्दार,कृष्णा,अजय,विकास आदि ने भरपूर सहयोग दिया जिनकी सहायता के बिना शायद विश्वविद्यालय में रहकर पढ़ाई करना मुश्किल था।"

"शारीरिक अक्षमता के बावजूद यदि मन में कुछ करने की आकांक्षा है तो शारीरिक अक्षमता भी अक्षम हो जाती है उस व्यक्ति को कामयाबी पाने से रोकने में ..."

2013 में हिंदी में परास्नातक की उपाधि स्वर्ण पदक सहित हासिल करने के बाद अंग्रेजी से भी  एम.ए.की डिग्री लेनी चाहिए पर 2014 में जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेँट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति होने के कारण पूर्ण न कर पाए। नियुक्ति के

लिए पीयूष को कम पापड़ नहीं बेलने पड़े।उन्होंने चार महीने तक आवैतनिक अध्यापन करना पड़ा क्योंकि विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति को इनकी योग्यता पर संदेह था, इसका कारण इनकी विकलांगता थी। पीयूष सेरेबल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात) से ग्रस्त हैं। इस विकलांगता से ग्रस्त

व्यक्ति अपने अंगों पर समुचित नियंत्रण नहीं कर पाता जिसकी वजह से आवाज में स्पष्टता कम होती है। कुलपति ने इसीलिए कई बार अध्यापन की रिपोर्ट माँगी लेकिन सकारात्मक होने पर भी उन्हें संतुष्टि नहीं हुई तब पीयूष छोड़ने का मन बना लिए थे। जब इस बात का पता विद्यार्थियों को चला तो उन्होंने इनके समर्थन में आंदोलन कर दिया कि इनका पढ़ाया हुआ हमें समझ में आ रहा है और सर प्रत्येक तथ्य को बहुत ही सहज ढंग से बताते हैं। अंततः कुलाधिपति के आशीर्वाद एवं विद्यार्थियों की माँग पर इन्हें नियुक्ति पत्र प्रदान किया किया।

 "पीयूष के विचार से मेरे प्रति समाज का नजरिया नौकरी से दया वाला था परंतु अब लोग सम्मान की दृष्टि से देखने लगे हैं ..."

पीयूष बताते हैं कि मुझे इस मुकाम को हासिल करने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा।वो कहते हैं - "मैं जब विद्यालय जाता था तो लोग मुझे अपशकुन मानकर तरह-तरह की बातें करते थे। हमारे पड़ोस में एक महिला थी जो मेरी ट्राईसाइकिल देखकर अक्सर कहती थी लंगडवा का विमान आ रहा है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिनमें मुझे अपमान तथा मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। ऐसी अवस्था में मुझे मामा जी का एक ही वाक्य सहारा देता, वो कहते अगर हार नहीं मानोगे तो हार पहनोगे।"

इस समय पीयूष अध्यापन के साथ-साथ पी.एच.डी.भी कर रहे हैं। उन्होंने अपने शोध का विषय "हिंदी साहित्य में विकलांग विमर्श" को बनाया है। इस संदर्भ में उनका कहना है - "मैंने हिंदी साहित्य के अध्ययन एवं अध्यापन के दौरान पाया कि हिंदी साहित्य में स्त्रियों,बालकों,दलितों और आदिवासियों को

लेकर विमर्श किया गया परंतु विकलांगों पर विमर्श की बात नहीं की गई। हिंदी साहित्य में विकलांगता को अभिशाप या ईश्वरीय कोप के रूप में परिभाषित किया गया। मेरा सपना है कि मैं हिंदी साहित्य के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं तथा विश्व पटल में विकलांग विमर्श को स्थापित कर सकूँ। जिससे

विकलांगता के सकारात्मक पक्ष को समाज के प्रस्तुत किया जा सके।"

 पीयूष शतप्रतिशत विकलांग हैं तथा सहलेखक के माध्यम सभी परीक्षाएँ उत्तीर्ण की हैं  ... इस समय अध्यापन के साथ-साथ पी.एच.डी. कर रहे हैं

पीयूष से जब पूछा कि आपको अपनी विकलांगता पर कब गर्व का अनुभव हुआ? तो उन्होंने बताया - "मुझे विकलांगता पर हमेशा गर्व होता है। इसीलिए मैं विशिष्ट पहचान के रूप में विकलांगता को परिचय में उल्लेखित करता हूँ। परंतु जब मुझे एम.ए.में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के हाथों मैं पूरे गाँव में पहला व्यक्ति हूँ जो यह कारनामा कर पाया,जब मामा जी फोटो और पदक  दिखाते हुए प्रशंसा करते हैं तो गर्व का अनुभव होता है।"

 

पीयूष समकालीन साहित्यकारों में अपनी पहचान बना चुके हैं। उन्होंने साहित्य की गद्य एवं पद्य दोनों लेखन किया है। उनके गीत,ग़ज़ल,छंद,कहानियाँ,लघुकथाएँ,मोवार्ताएँ आदि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने विश्वसाहित्य में प्रकाशित प्रथम उपन्यास में लेखक के रूप में स्थान प्राप्त किया है  जिसके 66 लेखक हैं जो कनाडा की एक साहित्यिक संस्था द्वारा प्रकाशित किया गया। पीयूष ने स्वाध्याय से उर्दू,संस्कृत,अंग्रेजी,पंजाबी का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। हिंदी के तो विशेषज्ञ हैं। साहित्य लेखन की बारीकियाँ सीखने में उनकी मदद करने वालों में श्री चक्रधर  शुक्ल,डॉ.शैलेष गुप्त 'वीर',श्री गाफिल स्वामी,डॉ.कुँवर बेचैन,श्री महेश पाठक आदि विद्वान

प्रमुख हैं।

अपने काव्य सफर को याद करते हुए पीयूष कहते हैं - "मैंने कक्षा पाँच से कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था लेकिन कागजोँ में लिखकर फाड़कर फेंक देता था।एक दिन मेरी इस हरकत को मामा जी ने देख लिया और वह कागज मेरे हाथ से लेकर पढ़ने लगे,मुझे लगा अब बहुत डाँटेगेँ लेकिन उसे पढ़कर मामा जी ने पूछा कि इसे तुमने लिखा है?जब मैंने हाँ में सिर हिलाया तो वो बहुत खुश हुए और ऐसे ही लिखते रहो तुम एक दिन कवि बन जाओगे।उन्होंने मुझे एक डायरी लाकर दिया और कहा अब से जितनी कविताएँ लिखना इसी में लिखना। मुझे अब भी याद है वह कविता गुलाब पर थी।

 "मुझे विकलांगता पर हमेशा गर्व होता है ... परंतु जब मुझे एम.ए.में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के हाथों मैं पूरे गाँव में पहला व्यक्ति हूँ जो यह कारनामा कर पाया,जब मामा जी फोटो और पदक  दिखाते हुए प्रशंसा करते हैं तो गर्व का अनुभव होता है ..."

 

मेरी पहली प्रकाशित होने वाली रचना कलकत्ता की एक पत्रिका में थी। मैं अभी तक देश के लगभग पाँच राज्यों में कवि सम्मेलन कर चुका हूँ। कवि सम्मेलनों में आने-जाने में मेरी मदद मामा जी और मेरी सबसे छोटी बहन गायत्री देवी करती है।घर में मेरा लेखन कार्य मेरी सबसे छोटी बहन ही करती है, मेरी दोनों बहनें मुझे बहुत मदद करती हैं;भाइयों की कमी को महसूस नहीं होने देती हैं।"

 

पीयूष की पढ़ाई में उनके बड़े मौसा,बड़ी मौसी,छोटे मौसा,छोटी मौसी तथा मौसेरे भाई ने काफी मदद की है। पीयूष शतप्रतिशत विकलांग हैं तथा सहलेखक के माध्यम सभी परीक्षाएँ उत्तीर्ण की हैं लेकिन 2015 में होने वाली उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित लेक्चर की परीक्षा में उन्हें सहलेखक नहीं दिया गया तब इन्हें अपनी विकलांगता थोड़ी-सी अखरी थी। पीयूष के विचार से मेरे प्रति समाज का नजरिया नौकरी से दया वाला था परंतु अब लोग सम्मान की दृष्टि से देखने लगे हैं।

ऑडियो-कहानी : "पापा का इंतज़ार"

 

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