... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

मिस्टर इंडिया

‘सर मैं कोई आतंकवादी नहीं हूं और कोई अपराधी भी नहीं हूं।’ यह कहकर रतनलाल ने सिर उठाया और चारों तरफ देखा। इतनी ज्यादा खाकी वर्दी एकदम नजदीक से पहली बार देखी थी उसने। सामने बड़ी सी टेबल के उस ओर एसएचओ बैठा था। बगल में एक एसआई दो एएसआई बैठे थे। कई कांस्टेबल आसपास खड़े थे। कमरे के बाहर भी भीड़ लगी थी। बहुत से लोग जमा थे, जिनमें कुछ ने कैमरे लटका रखे थे। एक ओबी वैन भी खड़ी थी। मतलब चैनल वाले भी आ पहुंते थे।

रतनलाल के जवाब से एसएचओ के चेहरे पर थोड़ी हैरानी झलकी। शायद वह ऐसे जवाब के लिए तैयार नहीं था। उसने थोड़ा झुंझलाकर कहा, ‘क्या कहा तूने?’

‘सर आप लोग जो बात कर रहे हैं कि मैं कोई आतंकवादी हूं, यह गलत है। मैं कोई चोर भी नहीं हूं।’

‘तो सीएम हाउस में घुसा क्यों?’ एसएचओ डपटा। 

‘चोरी करने।’

‘एक तरफ कह रहा है कि तू चोर नहीं है। फिर चोरी करने क्यों घुसा?’

‘जनता के हित में।’ रतनलाल के इस जवाब पर ठहाका लगा।

‘जनता के हित में।’ एसएचओ के बगल में बैठे एसआई ने व्यंग्य में यह वाक्य दोहराया। उसके बगल में बैठे एएसआई ने कहा, ‘पढ़ा-लिखा लगता है।’

‘कहां तक पढ़े हो?’ एसएचओ ने पूछा।

‘बीए हूं।’ दिनेश के ऐसा कहने पर एसएचओ के चेहरे पर असमंजस का भाव दिखा। उसने फिर पूछा, ‘करते क्या हो?’

‘अभी तो बेरोजगार चल रहा हूं।’

तभी एसएचओ का मोबाइल बज उठा। उसने कई बार ‘हां जी सर, यस सर, यस सर’ कहा। फिर फोन रखकर उसने पास बैठे पुलिसवालों से कहा, ‘एसपी साहब एक घंटा बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हैं।  प्रेस वालों को बताएंगे इसके बारे में। एक घंटा में हमें अपना काम करना है। जल्दी बताओ यार। क्या करने गया था सीएम हाउस…?’ एसएचओ ने चिल्लाकर कहा। फिर उसने अपनी जेब से पान मसाले की पुड़िया निकाली और ढेर सारा सुगंधित पदार्थ मुंह में डालकर चुभलाने लगा।

रतनलाल ने कहा, ‘सर मैं चोरी करने गया था। लेकिन रुपये-पैसे नहीं, कपड़े-लत्ते भी नहीं….मैं एक फाइल चुराने गया था।’

अचानक सन्नाटा छा गया। कुछ देर सारे पुलिस‌वालों ने एक-दूसरे को देखा।   

‘किसने कहा था फाइल चुराने के लिए?’ एक एसआई ने जो रजिस्टर में कुछ लिख रहा था, पूछा।

‘तुम किसी पार्टी से जुड़े हो?’ एसएचओ के स्वर में थोड़ी नरमी थी और उत्सुकता का भाव भी।

‘नहीं सर मैं किसी पार्टी से नहीं जुड़ा हुआ हूं।’

‘तुम्हें पैसे दिए थे किसी ने फाइल चुराने के लिए?’

‘नहीं सर। यह तो मेरा निजी फैसला था। फाइल चुराकर मैं हजारों लोगों का उद्धार करना चाहता था।’ रतनलाल ने जवाब दिया।

‘बड़े-बड़ों की सीएम हाउस जाने में फटती है, तेरी हिम्मत कैसे हुई जाने की? तू देख रहा था कि चारों तरफ सिक्युरिटी थी। तुझे जरा भी डर नहीं लगा?’ एसएचओ ने मसाला चबाते हुए कहा।

रतनलाल ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘यही तो बात है जनाब। अगर बताऊंगा तो आपलोग विश्वास नहीं करेंगे।’

‘बात घुमाओ मत। सीधा-सीधा बता।’ एसएचओ ने कहा।

‘क्या बताऊं सर। आज मेरे साथ कुछ अजीब सा हुआ। समझिए एक जादू सा। एक वरदान मिला लेकिन आधा-अधूरा। या फिर मेरी किसी चूक से उसका फल नहीं मिला।’

पास बैठे एसआई ने हंसकर एसएचओ से कहा, ‘ये पागल है सर। कहां हमलोग इस पर टाइम खराब कर रहे हैं।’

एचएचओ ने पहले रतनलाल को घूरा फिर एसआई से कहा, ‘ये कोई साधारण मामला नहीं है। यह मुख्यमंत्री की सुरक्षा के उल्लंघन का मामला है।’

एसआई ने उसी तरह हंसते हुए कहा, ‘उल्लंघन हुआ कहां सर। यह तो पकड़ा ही गया तुरंत।’

‘लगता है तुमने टीवी नहीं देखा।’  यह कहकर एसएचओ अंदर गया फिर थूक फेंककर वापस आया। कुर्सी पर बैठते हुए उसने एसआई से कहा,‘ टीवी पर नेता विपक्ष का बयान आ गया है कि जब सीएम की सुरक्षा में सेंध लग सकती है तो आम आदमी की क्या बिसात।’

‘ये चैनल वाले जीने नहीं देंगे हमलोगों को।’  रतनलाल का बयान दर्ज कर रहे एएसआई ने कलम से कान खुजाते हुए कहा।

एसएचओ ने अचानक भड़क कर रतनलाल से कहा, ‘तुम साले पारा मत चढ़ाओ मेरा। सही-सही बताओ नहीं तो…।’

रतनलाल ने कहा, ‘आप लोगों ने वह फिल्म देखी है मिस्टर इंडिया, जो, 1987 में आई थी। अनिल कपूर और श्रीदेवी वाली वह फिल्म जिसमें मोगाम्बो था...।’

‘फिर बात घुमा रहा है।’ एसएचओ ने कहा, ‘तू हमें बेवकूफ समझ रहा है क्या?’

रतनलाल ने हाथ जोड़कर कहा, ‘सर मेरी बात सुनी जाए प्लीज। इस फिल्म से आज की घटना का बहुत गहरा संबंध है। ….पहले बताइए कि आपने वह फिल्म देखी है या नहीं?’

‘हां देखी है।’ एसएचओ ने खीझकर कहा।

रतनलाल कहने लगा, ‘आपको याद होगा कि कैसे अनिल कपूर को एक वैज्ञानिक की घड़ी मिल जाती है जिसे लगाते ही वह अदृश्य हो जाता है। गायब होकर वह एक से एक कारनामे करता है। मिलावटखोरों को सजा देता है। बदमाशों से लड़ता है...।’

कमरे में बैठे सारे लोग रतनलाल को गौर से देखने लगे थे। रतनलाल ने उन सबके भीतर अपने किस्से में दिलचस्पी पैदा कर दी थी। वह कह रहा था, ‘पता है मेरे साथ वैसा ही हुआ अनिल कपूर की तरह। …मुझे कोई घड़ी-वड़ी नहीं मिली। लेकिन मुझे महसूस हुआ कि मैं गायब होने लगा हूं। मैं हवा हो गया हूं। मुझे कोई इंसान देख नहीं पा रहा है। लेकिन पता नहीं अचानक क्या हो गया कि मुख्यमंत्री के सिक्युरिटी गार्डों ने मुझे देख लिया। ….ओह यह क्या हो गया? ऐसा क्यों हुआ? या फिर यह सब मेरा मुगालता तो नहीं था। मेरा भ्रम तो नहीं था...।’

यह कहकर रतनलाल थोड़ी देर के लिए चुप हुआ। वह बेहद परेशान, भूखा और बीमार लग रहा था।

 कुछ देर चुप रहने के बाद वह कहने लगा, ‘एक समय मेरी बहुत खुशहाल जिंदगी थी। मैं एक प्राइवेट कंपनी में अच्छी-खासी नौकरी करता था। अच्छी सी बीवी थी, प्यारी सी बिटिया। थी क्या...हैं। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। आमदनी बहुत ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं थी। हां, विचारों में थोड़ा अंतर था। वह तो रहता ही है। दरअसल मै अपने विचारों को लेकर पक्का हूं। मेरे कुछ आदर्श हैं जिनसे मैं हिलता नहीं।’

‘भाषण मत दो यार। ’ एसआई चीखा।

‘उसे बोलने दो।’ एसएचओ ने एसआई की ओर देखकर कहा।

रतनलाल कहने लगा, ‘मेरी पत्नी चाहती थी कि खूब घूमे-फिरे। नए-नए कपड़े पहने, जेवर पहने। औरतें यह सब चाहती ही हैं। इसमें कुछ गलत नहीं है। हालांकि मैं इन चीजों के खिलाफ रहा हूं। मैं तो सादा जीवन उच्च विचार का समर्थक रहा हूं। फिर भी मैंने अपनी पत्नी की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की। प्राय: हर रविवार को हम कोई न कोई सिनेमा जरूर देखते। फिर होटल में खाते। कुछ खरीदारी वगैरह भी करते। बिटिया के लिए भी हम खूब कपड़े खरीदते। लेकिन वक्त की मार भी क्या चीज होती है सर। चीजें एकदम से उलट जाती हैं। जिंदगी एकदम बदल जाती है। हुआ यह कि मेरी कंपनी घाटे में रहने लगी। मंदी का असर था।  पहले हमारी तनख्वाह कम कर दी गई। फिर कुछ स्टाफ की छंटनी हुई। और एक दिन कंपनी बंद हो गई। मैं सड़क पर आ गया। मैं जिस उम्र में पहुंच गया था, उसमें नई नौकरी मिलना आसान नहीं था, फिर भी मैंने जीतोड़ कोशिश की। लेकिन कुछ हुआ नहीं। तभी मेरी पत्नी ने एक दिन मुझे बताया कि उसे नौकरी मिल गई है। दरअसल वह मुझे बताए बगैर नौकरी खोजने में लगी थी। मुझे यह जानकर उस पर गर्व हुआ। लेकिन यह जानकर कि वह एक जूता फैक्ट्री में कपड़े चिपकाने का काम करेगी, मैं हताश हो गया। फिर सोचा कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। इस तरह हमारी गृहस्थी की अटकी हुई गाड़ी किसी तरह चल पड़ी।  इस बीच हमें अपनी बिटिया को प्राइवेट स्कूल से हटाकर सरकारी स्कूल में डालना पड़ा। हमें अपना मकान भी बदलना पड़ा।  हम एक सस्ते मोहल्ले में आ गए।’

रतनलाल रुककर अपना गला साफ करने लग। एसएचओ के इशारे पर एक कांस्टेबल ने उसकी तरफ पानी की एक बोतल बढ़ाई। रतनलाल ने बोतल खाली कर दी फिर कहने लगा, ‘हमारी एक नई जिंदगी शुरू हो गई। अब मैंने खुद ही घर का काम संभाल लिया। सुबह उठकर पत्नी के लिए चाय बनाता, फिर नाश्ता तैयार करता। फिर बेटी को तैयार करता।  उन्हें भेजने के बाद मैं घर में रहता। जब मन नहीं लगता तो मोहल्ले के बाहर के एक मैदान में जाकर बैठ जाता। वह एक बड़ा सा खाली मैदान था, जिसमें एक ओर बच्चे खेलते रहते तो दूसरी ओर महिलाएं और बुजुर्ग धूप सेंक रहे होते। उसमें तरह-तरह के खोमचे वाले आकर खड़े हो जाते और चाट पकौड़ी, बुढ़िया के बाल और दूसरी मिठाइयां बेचते। कई बार कुछ खेल तमाशा दिखाने वाले भी आते। कभी वे भेड़ों को लड़ाते तो कभी सांप-नेवले की लड़ाई दिखाने का दावा करते। हालांकि लड़ाई कभी होती नहीं, और खेल खत्म हो जाता। कई बार मर्दाना कमजोरी दूर करने वाली दवाएं बेचने वाले भी आते। नट आते और रस्सियों पर चलने का खेल दिखाते। रिक्शे वालों, पास के दुकानों में काम काम करने वाले नौकरों और मजदूरों का यह आश्रय स्थल था। वे यहां रात में खुले में आकर सो जाते। आवारा घूमती गायें और कुत्ते भी यहां आराम फरमाते। कई बार तो आसपास से आकर मुर्गियां इसमें दौड़ लगातीं। इस मैदान का नाम पता नहीं क्यों चक्कर मैदान पड़ गया था। इसके बारे में कहा जाता था कि यह सरकारी जमीन है, जिसे लेकर सरकार यह तय नहीं कर पा रही है कि यहां क्या बनाए। कभी कहा जाता था कि यहां अस्पताल बनाने की योजना है तो कभी कहा जाता था कि यहां कोई डिग्री कॉलेज बनेगा। लेकिन राज्य में जब से नई सरकार आई थी, कहा जा रहा था कि इसे बिल्डरों को बेच देने का फैसला हुआ है। यानी यहां भी बड़े–बड़े अपार्टमेंट्स बन जाएंगे। जो थोड़ी-बहुत जगह खुलकर सांस लेने की बची है, वह भी चली जाएगी। गरीबों का आश्रय छिन जाएगा। उस मैदान को बचाने के लिए आसपास के लोगों ने चक्कर बचाओ समिति का गठन किया था। वे कई बार धरना, जुलूस और प्रदर्शन कर चुके थे। आश्चर्य तो यह था कि चक्कर बचाओ आंदोलन को किसी विपक्षी दल ने समर्थन नहीं दिया। कहा जाता था कि बिल्डरों की लॉबी ने सरकार के लोगों के अलावा विपक्षी नेताओं की भी जेब गर्म कर दी थी। अब इसके बारे में आखिरी फैसला मुख्यमंत्री को ही करना था।... मैं घर के सारे कामधाम निपटा कर कुछ किताबें और पत्रिकाएं लेकर चक्कर मैदान पहुंच जाता था। वहां दिन भर घास पर लेटा रहता और पढ़ता। फिर जब बेटी के आने का समय होता तो लौट आता। पत्नी के आते-आते आठ बज जाते थे। उसके आते ही चाय और नाश्ता तैयार रखता। सोते वक्त उसके हाथ-पैर दबाता। किसी तरह हमारा काम चल जा रहा था। पत्नी ने भी जीवन के इस रूप को स्वीकार कर लिया था। बाहर जाकर काम करने से उसके भीतर एक नया आत्मविश्वास आ रहा था, जो मुझे अच्छा लग रहा था। इस बीच एक दिन मेरे सास-ससुर आए। उन्होंने इस बात पर दुख प्रकट किया कि उनकी फूल सी बेटी को काम करना पड़ रहा है। इसके लिए वे मुझे दोषी ठहरा रहे थे। मेरे ससुर ने मुझसे पूछा कि मर्द होकर मुझे इस तरह घर में बैठना कैसे अच्छा लग रहा है। मैंनै उन्हें समझाया कि जमाना बदल गया है। अब वह बात पुरानी हो गई कि पुरुष काम करे और स्त्री घर में बैठी रहे। घर का काम केवल औरत का है, यह धारणा भी पुरानी हो गई है। मैंने उन्हें समझाया कि अब तो इंग्लैंड जैसे देश में पुरुष स्वेच्छा से हाउस हसबैंड बन रहे हैं। लेकिन मैं उन्हें शायद समझा नहीं पाया। उनके जाने के बाद मैंने अपनी पत्नी के व्यवहार में थोड़ा फर्क देखा। वह कहने लगी कि मुझे कोई न कोई काम ढूंढ लेना चाहिए। उसका कहना था जब लोग उससे पूछते हैं कि आपके पति क्या करते हैं तो वह शरमा जाती है। मोहल्ले के लोग भी हमलोगों के बारे में न जाने क्या-क्या राय रखते हैं। मैंने उसे समझाया कि इन चीजों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। लोगों के कहने के अनुसार चलेंगे तो जीना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन वह इस बात पर जोर देती रही कि मुझे कोई काम ढूंढना चाहिए। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं कौन सा काम ढूंढू। ...

तभी एक दिन मोहल्ले के कुछ लड़के मेरे घर पहुंचे। मैं सारा कामकाज निपटा कर चक्कर पर जाने की तैयारी में था। मैंने उनसे पूछा, ‘कहिए क्या बात है?’

एक लड़के ने कहा, ‘चंदा दीजिए।’

मैंने पूछा, ‘किस बात का?’

उसने कहा, ‘भगवती जागरण का। हर साल होता है। हर घर से 101 लेते हैं।’  

मुझे ध्यान आया कि मेरे पास सिर्फ बीस रुपये बचे हैं और रात के लिए सब्जी भी लानी है। मैंने सोचा इन्हें सब कुछ साफ-साफ बता दूं। मैंने कहा, ‘भइया, मेरे पास अभी केवल बीस रुपये हैं और रात की सब्जी भी उसी में से लानी है। अब कहां से दूं।’ इस पर सारे लड़के हंस पड़े। उनमें से एक ने कहा, ‘नहीं देना है तो मत दो, बहाना क्यों बना रहे हो।’

मैंने कहा, ‘देखो हमलोग अभी बहुत तकलीफ में हैं। किसी तरह खर्चा चला रहे हैं। अभी चंदा देना संभव नहीं है।’

इस बार लड़कों ने नाराजगी से देखा और चले गए। रात में जब पत्नी लौटी तो अजीब तरीके से मुंह फुलाए हुई थी। मैंने कारण पूछा तो उसने कहा कि मैंने उसकी नाक कटा दी। 

दरअसल चंदा मांगने आए लड़कों में से एक उस ठेकेदार का लड़का था, जो इस इलाके का एक दबंग व्यक्ति था। इस मोहल्ले में उसकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता था। हमारा मकान मालिक उसका दोस्त था। ठेकेदार ने मेरे मकान मालिक को चंदा वाली बात बता दी। मकान मालिक ने मेरी पत्नी को दफ्तर में फोन कर यह बात बताई। उसका कहना था कि कहीं से भी जुगाड़कर चंदा देना चाहिए। नहीं 101 तो कम से 51 भी। मेरी पत्नी इस बात से नाराज थी कि मैंने यह क्यों कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैंने पत्नी को समझाया कि जो सच है वह बता देने में क्या हर्ज है।

पत्नी ने कहा कि कल वह कहीं से इंतजाम कर के चंदा दे देगी। मैंने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं अभी ठेकेदार से बात करके आता हूं। पत्नी ने रोकने की कोशिश की लेकिन मैं उसके घर पहुंच गया। संयोग से वह मुझे घर के बाहर ही मिल गया। वह गाड़ी में बैठने ही वाला था कि मैंने उसे पकड़ लिया। मैंने कहा, ‘सरजी, आपसे बस एक मिनट का समय चाहिए। कुछ सवाल पूछने हैं आपसे।’

उसने मुझे ऊपर से नीचे घूरते हुए कहा, ‘क्या है?’

‘आप इतना पूजा-पाठ क्यों करते हो?’

उसे समझ में नहीं आया कि वह क्या कहे। मैंने ही उसकी ओर से कहा, ‘आप सुख शांति के लिए, तरक्की के लिए खुशी के लिए ही पूजा करते हैं न। अगर आपकी पूजा से किसी को दुख पहुंचे तो क्या आपको अच्छा लगेगा?’

ठेकेदार ने कहा, ‘नहीं।’

मैंने कहा देखिए, ‘मैं मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता। मेरा मानना है कि ईश्वर तो दिल में है। भजन-कीर्तन, व्रत-उपवास तीर्थयात्रा से उसकी उपासना नहीं की जा सकती। लेकिन मैं अपनी राय आप पर थोपना नहीं चाहता। आपकी अपनी श्रद्धा है, मेरी अपनी। आप मुझे मजबूर करेंगे तो मैं चंदा दे दूंगा, लेकिन उसमें मेरी श्रद्धा नहीं होगी।’

 ठेकेदार ने कहा, ‘ठीक है ठीक है। मत दो यार। यह कहकर वह गाड़ी में बैठ गया। मैं जाने के लिए ज्यों ही मुड़ा, उसकी आवाज सुनाई पड़ी ‘साला, कहां से ये नमूना आ गया।’

 मैं लौट आया। भगवती जागरण का आयोजन मोहल्ले के बीचोंबीच था। सड़क को घेरकर पंडाल बनाया गया था। कई लाउडस्पीकर लगाए गए थे, जिनमें से एक का मुंह ठीक मेरी खिड़की की तरफ था। जिस दिन जागरण था, उसके अगले दिन मेरी बेटी की परीक्षा थी। मैंने सोचा था कि उसे पढ़ाऊंगा, लेकिन शाम से ही जोर-जोर से भजन बजाया जा रहा था। मेरी बेटी परेशान थी। कभी इस कोने में जाती, कभी उस कोने में।

मैंने अपने बगल के पड़ोसी से पूछा कि इस जागरण से उन्हें परेशानी नहीं हो रही है तो उसने कहा कि नहीं। बल्कि उसने खुश होकर कहा कि आज भंडारा  खाने को मिलेगा। मैंने कहा कि लाउडस्पीकर की वजह से मेरी बेटी की पढ़ाई में बाधा आ रही है तो उसने कहा कि एक दिन नहीं पढ़ेगी तो क्या हो जाएगा। फिर मैंने कहा कि परीक्षा है तो उसे कोई जबाव नहीं सूझा।

मैं मन मसोसकर रह गया। रात ग्यारह बजे तक मैंने किसी तरह बर्दाश्त किया। फिर मैं नीचे पहुंचा। वहां मुझे वह लड़का दिख गया, जो चंदा मांगने वाले दल में शामिल था। मैंने उससे  कहा कि लाउ़डस्पीकर का वॉल्यूम थोड़ा कम कर दो। मेरी बेटी की परीक्षा है। वैसे भी रात ग्यारह बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाना मना है।

लड़के ने हंसकर कहा कि किस साले की हिम्मत है कि यहां आकर लाउडस्पीकर बंद करवा दे। यहां तो सारे पुलिस वाले खुद बैठे हैं। मैंने उससे मिन्नत की कि थोड़ा वॉल्यूम कम करवा देते। उसने कहा, जब तक ठेकेदार साहब नहीं कहेंगे, तब तक नहीं होगा। तभी मेरी नजर ऊपर की ओर पड़ी। मैंने देखा कि एक बड़ा सा तार इलेक्ट्रिक पोल के पास जोड़ा गया है। मतलब कटिया डालकर बिजली चुराई जा रही थी और उसी से जागरण का कार्यक्रम चल रहा था। मैंने देखते ही जोर से कहा, ‘चोरी करके तुमलोग भक्ति कर रहे हो। कैसे भक्त हो तुमलोग।’

तभी कई लड़के पीछे से दौड़ते हुए आए। उनमें से कुछ के हाथ में हॉकी स्टिक थी। सबने पूछा,‘क्या हुआ? क्या हुआ?’

मैंने कटिया का तार दिखाते हुए कहा, सरकारी बिजली चुराकर तुम लोग पूजा-पाठ कर रहे हो। भगवती सब कुछ देख रही है।

तभी एक ने मेरा कॉलर पकड़ते हुए कहा, ‘तेरे बाप का क्या जाता है बे?’

थोड़े ही देर में ठेकेदार कुछ लोगों के साथ आया, जिनमें मेरा मकान मालिक भी था।

ठेकेदार ने पूछा, ‘इसने फिर कुछ लफड़ा किया क्या?’

लड़कों ने कहा, ‘यह हमलोगों को चोर बता रहा है।’

‘यह आदमी है कौन? कोई हिंदू इस तरह जागरण में विघ्न डाल ही नहीं सकता। यह जरूर मुसलमान है। क्या नाम है तुम्हारा?’

‘रतनलाल।’ मेरे मुंह से किसी तरह आवाज निकली।

ठेकेदार ने मेरे मकान मालिक से कहा, ‘आपने ठीक से पता किया है इसके बारे में? इसका आधार कार्ड वगैरह चेक किया था?’

‘हां, हां।’ मकान मालिक ने कहा। 

‘भाई साहब आजकल मियां लोग हिंदू नाम से नकली कार्ड भी बनवा लेता है।’

ठेकेदार ने मुझे धमकाते हुए, ‘अभी चुपचाप निकल ले। जागरण चल रहा है। तेरा कल हिसाब करूंगा।’ यह कहकर सारे लोग चले गए। मैं भारी कदमों से घर लौटा। मेरी पत्नी दरवाजे पर मेरा इंतजार कर रही थी। उसकी आंखों से अंगारे निकल रहे थे। उसने गुस्से में कांपते हुए कहा, ‘जरूरत क्या थी यह सब नाटक करने की? चैन से रहने दोगे या नहीं?’

मैंने उसका यह रूप कभी नहीं देखा था। चुपचाप सिर झुकाकर उसकी बातें सुनता रहा। मुझे डांटने के बाद उसने बेटी को थप्पड़ लगाते हुए कहा, ‘सब कुछ इसी की वजह से हुआ है। बंद कर पढ़ाई-लिखाई।’ मुझे लगा कि अगले दिन कोई तूफान सा टूट पड़ेगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हालांकि तूफान आया पर दो दिन बाद। उस दिन रविवार था। सुबह-सुबह मेरा मकान मालिक मेरे घर आ पहुंचा। मुझे देखते ही शुरू हो गया, ‘आपको मैंने शरीफ आदमी समझकर मकान दिया था।’

‘तो क्या मैं शरीफ आदमी नहीं हूं?’ मैंने पूछा।

‘आपने जो किया, वैसा क्या शरीफ आदमी करता है?’

‘क्या किया मैंने?’

‘आपने जागरण में एक तो चंदा नहीं दिया, ऊपर से पूजा-पाठ के पवित्र माहौल में झगड़ा-झंझट किया। क्या ये शराफत है?’

‘और क्या रोड का ट्रैफिक रोककर, सरकारी बिजली चुराकर जागरण करना शराफत का काम है? रात 11 बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाने पर रोक है। लेकिन क्या यह नियम तोड़ना शराफत का काम है। मैं तो सिर्फ यह कहने गया था कि मेरी बेटी की परीक्षा है। लाउडस्पीकर बजाकर बच्चों को पढ़ने से रोकना शराफत का काम है?’ मैंने जोर से चिल्लाकर कहा तो वह सहम गया। फिर कुछ देर चुप रहने के बाद उसने कहा, ‘मेरा मकान खाली कर दीजिए।’

‘क्यों?’

‘बस ऐसे ही।’

‘ऐसे ही क्यों?’

‘आपकी शिकायत हो रही है मोहल्ले में।’

‘लेकिन आपने एक साल के लिए कहा है। उससे पहले क्यों छोड़ें।’

‘छोड़ेंगे कैसे नहीं।’

तभी मेरी पत्नी बाहर निकली। उसने मुझे जोर से डांटा, ‘तुम फिर बकवास करने लगे। जाओ अंदर।’

मैं सकपका कर अंदर चला गया। मुझे अपनी पत्नी के रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज आ रही थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह उस दो टके के आदमी के सामने इतना क्यों झुक रही है। फिर थोड़ी देर बाद वह अंदर आई और उसने कहा कि बड़ी मु्श्किल से मकान मलिक हमें रहने देने के लिए राजी हुआ है। फिर उसने  अजीब सा फरमान जारी किया, आज के बाद तुम इस मोहल्ले  के किसी आदमी से कोई बात नहीं करोगे। बस अपने काम से काम रखोगे। नहीं तो जल्दी से कोई नौकरी ढूंढ लो। फिर उसने यह भी कहा कि अब अगर मेरी वजह से कोई पंगा हुआ तो वह बेटी को लेकर मायके चली जाएगी और वहीं रहेगी।

मैं समझ गया कि शांतिपूर्ण जिंदगी चलाते रहने का बस एक ही रास्ता है कि मैं आंख कान और मुंह बंद करके रहूं। मेरे पास और कोई विकल्प भी नहीं था। मेरी पत्नी बड़ी मुश्किल से जिंदगी की गाड़ी खींच रही थी। अब अगर यह गाड़ी थोड़ा भी लड़खड़ाती है तो मेरी बेटी का भविष्य चौपट हो जाएगा।

मैंने अपने को मना लिया। अब मैं घर का काम करता और दिन में थोड़ी देर के लिए चक्कर पर जाकर बैठ जाता। शाम होने से पहले ही मैं लौट आता। मोहल्ले में मैं सिर झुकाए चलता। कुछ लोग मुझे अजीब नजरों से देखते तो कुछ देखते ही मुंह फेर लेते। मैं चक्कर पर एक पेड़ की छांव में बैठता। जहां रोज ही एक लड़का और एक लड़की मिलने आते। वे दोनों अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे क्योंकि उनके यूनीफॉर्म अलग थे। वे अलग-अलग दिशाओं से आते और अलग-अलग दिशा में चले जाते। उनके आने का वक्त वही था, जो मेरा था। वे आते और एक-दूसरे से बातें करते। कभी उनकी नजरें मुझसे मिल जातीं तो वे थोड़ा झेंप जाते। कई बार लड़का पहले आ जाता तो मुझे देखकर मुस्करा देता। जब लड़की आ जाती, तो मैं दूसरी तरफ देखने लग जाता। ठीक उसी वक्त एक बैलून बेचने वाला बूढ़ा आता। उसे देखकर मेरे मन में सवाल उठता था कि क्या कोई उसका बैलून खरीदता भी है? वह पेड़ के नीचे खाने के लिए आता था। वह कंधे में टंगे झोले से एक बोतल, एक प्लेट और एक छोटी सी थेली निकालता था। फिर थैली से सत्तू निकालकर प्लेट में रखता और उसमें पानी मिलाकर उसे गूंथ लेता। फिर एक पुड़िया से नमक और कुछ मसाले निकालकर उसमें मिलाता। खुद खाने से पहले वह आंखों ही आंखों में मुझे सत्तू ऑफर करता। मैं सिर हिलाकर मना कर देता। इस पर वह मुस्कराता और खाने लगता। ऐसा रोज होता। वह बिना मुझसे आग्रह किए बगैर खाता ही नहीं था । मैं यह सोचकर अभिभूत हो जाता था कि उस गरीब का दिल कितना बड़ा है। वह बड़ी मुश्किल से अर्जित भोजन में से भी किसी और को देने का जज्बा रखता है। जबकि अपने सभ्य और सुसंस्कृत कहने वाले तो दूसरों का निवाला छीनने पर आमादा रहते हैं। ठीक उसी समय कुछ छोटे बच्चे भी आते थे। वे प्लास्टिक की बैट बॉल से खेलते थे। कई बार वे मेरे ठीक सामने खेलते तो मैं उन्हें दूर जाकर खेलने को कहता तो वे चले जाते थे। अक्सर जब उनकी गेंद हमारे पास चली आती तो वे अंकल अकंल चिल्लाते और मुझसे बॉल मांगते। उन सबसे कोई बातचीत नहीं होती थी, पर वही मेरे दोस्त बन गए थे। पत्नी से अब ज्यादा बात नहीं हो पाती थी। बेचारी थकी-मांदी आती और सो जाती। फिर सुबह निकलने की हड़बड़ी होती। छुट्टी के दिन वह दिन भर सोयी रहती। कहती पूरे बदन में दर्द हो रहा है। फिर किसी सहेली के घर चली जाती। अब वह मेरे साथ कहीं निकलने से बचने लगी। बेटी भी अब मुझसे कम ही बात करती थी। मोहल्ले के बच्चों के साथ उसका खेलना मना ही था। बस खिड़की से उन्हें खेलते देखती रहती ती। 

 

एक मिनट, एक मिनट, एसएचओ ने टोका, ‘आप ने जो कहा था वो मिस्टर इंडिया वाली बात...।’

‘हां, हां, मैं उसी पर आ रहा हूं। यह कहकर रतनलाल ने गला खखारा और सिर उठाकर ऊपर देखने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वह अंधेरे में कुछ टटोल रहा है। वह कुछ याद करते हुए कहने लगा, ‘आज पहली बार सुबह बिस्तर से उठने की इच्छा नहीं हुई थी। मैं बुखार में तप रहा था। लग रहा था कि किसी ने मेरे हाथ-पैर बांध दिए हों। मैंने सोचा, अपनी पत्नी को नहीं पता चलने दूंगा कि मेरी तबीयत खराब है वरना वह परेशान हो जाएगी। मैं किसी तरह कांपता हुआ उठा और पत्नी के लिए चाय-नाश्ता बनाने लगा। मैं चाहता था कि किसी तरह मेरी पत्नी चली जाए। उसे मेरी दशा का पता न चल पाए। मैं धीरे-धीरे सारा काम करता रहा। पत्नी और बेटी के जाने के बाद बिछावन पर लुढ़क गया। करीब दो घंटे बाद नींद खुली। मैंने चाय बनाई और उसमें डुबोकर दो ब्रेड खाई। थोड़ी देर बाद लगा जैसे मेरी जान लौटी हो। अब बुखार थोड़ा कम लग रहा था। मैंने ताखे पर टटोला कि शायद घर में क्रोसीन हो, पर दवा मिली नहीं। मेरे घर से थोड़ी ही दूप पर दवा की एक दुकान थी। मैंने सोचा, उससे दवा ले ले लूं और फिर चक्कर पर जाकर लेट जाऊंगा।

मैं जब दवा की दुकान पर पहुंचा तो देखा एक-दो ग्राहक खड़े हैं। मैंने उनके जाने का इंतजार किया। फिर मैंने दवा वाले से कहा, भइया जरा क्रोसीन दे देना।

लगा जैसे उसने मेरी आवाज नहीं सुनी। मैंने जोर से अपनी बात दोहराई। उसने मेरी तरफ देखा और फिर दूसरी तरफ घूम गया। मुझे लगा कि अब वह दवा निकालने जा रहा है। लेकिन वह आराम से बैठ गया और मोबाइल में इयरफोन लगाकर कुछ सुनने लगा। मैंने फिर इशारा किया मगर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। तभी एक और ग्राहक आ गया और उसे देखते ही उसने कान से इयरफोन निकाला और उसे दवा देने लगा। मुझे बड़ा अजीब लगा। मैंने सोचा किसी और दुकान से दवा ले लूंगा। और मैं आगे बढ़ गया। धीरे-धीरे चलता हुआ मैं चक्कर तक आ गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि दुकान वाले ने ऐसी हरकत क्यों की?

चक्कर पर पहुंचकर मैं उसी पेड़ की छांव में बैठ गया। उस वक्त मैदान का एक हिस्सा बिल्कुल खाली था। दूसरे छोर पर कुछ लोग बैठे दिखाई दे रहे थे। हवा एकदम शांत थी। उमस के मारे पसीना चल रहा था और मुझे लग रहा था जैसे मैं गुनगुने पानी वाली झील में तैर रहा हूं। तभी मैंने देखा कि वह लड़की आई। मुझे देखकर उसके चेहरे की रंगत बदल जाती थी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ ही देर बाद लड़का भी आ गया। मैंने सोचा अब वे मुझसे थोड़ी दूर हटकर बैठ जाएंगे। लेकिन वे एक-दूसरे से लिपट गए। लड़की की पीठ मेरी तरफ थी, और लड़के का चेहरा मेरी तरफ। मैंने लड़के की आंखों में झांका, लेकिन ऐसा लगा ही नहीं कि उसने मुझे देखा हो। वह कहीं और देख रहा था। मैंने जोर से गला खखारा, पर कोई असर नहीं हुआ। मुझे यकीन नहीं हुआ कि ये दिनदहाड़े मेरे सामने क्या हो रहा है। मैंने सोचा कि मैं दूसरी ओर चला जाता हूं। शायद लड़की मुझे देखे और झेंप जाए। मैं दूसरी तरफ आया, लेकिन लड़की के चेहरे के भाव में कोई अंतर नहीं आया। अगले ही पल उन्होंने एक-दूसरे के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। मैं उन्हें एकटक देखे जा रहा था, लेकिन उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ रहा था। वे मुझे एक मूर्ति की तरह नजर आने लगे। फिर बड़े आराम से वे एक-दूसरे से अलग हुए और हाथ हिलाकर विदा हो गए। जाते समय भी ऐसा नहीं लगा कि उन्हें मेरी उपस्थिति का जरा भी अहसास हो। तभी पहली बार मुझे संदेह हुआ कि शायद उन्होंने मुझे देखा ही नहीं। तभी मुझे लगा कि संभवत: इसीलिए दवा वाले ने मुझे दवा नहीं दी।

इस अनुमान ने मुझे डरा दिया। आखिर इसे परखा कैसे जाए। मैंने देखा कि एक कुत्ता चला आ रहा है। मैंने डपटते हुए उसे दौड़ाया। वह भागा। यानी उसने मुझे देखा। लेकिन सवाल मनुष्य का था। हो सकता है, जानवर मुझे देख पा रहे हों, पर इंसान नहीं। तभी मैंने बैलून वाले बूढ़े को आते देखा। मेरी खुशी की ठिकाना न रहा। मैंने सोचा, वह थोड़ी देर में ही खाना खाएगा और मुझसे भी खाने का आग्रह करेगा। मैं अपनी जगह पर चुपचाप बैठ गया।

बैलून वाले ने डंडा नीचे रख दिया। फिर पोटली से प्लेट, बोतल वगैरह निकाली और सत्तू तैयार करने लगा। मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था कि वह खाने से पहले आंख से इशारा कर मुझसे भी खाने के लिए पूछेगा। पर यह क्या....उसने मेरी ओर देखे बगैर खाना शुरू कर दिया। मैंने गला खखारा, जोर-जोर से खांसी की, पर बूढ़े पर कोई असर नहीं पड़ा। मैं समझ गया, उसने भी मुझे नहीं देखा। मेरी रुलाई छूट गई।

मैं किसी को नहीं दिख रहा, मतलब मैं इस संसार होकर भी नहीं हूं। एक तरह से मैं मर चुका हूं। अब मेरी पत्नी और मेरी बेटी मुझे नहीं देख पाएंगी। उन्हें लगेगा, मैं उन्हें छोड़कर भाग गया। मैं उन्हें देखता रहूंगा, पर उनके लिए कुछ नहीं कर पाऊंगा। क्या मृत्यु के बाद ऐसा ही होता है? आत्माएं अपने परिजनों को बेबस देखती रहती हैं?

मैं कुछ देर तक रोता रहा। एक-एक कर पुराने सुखद दिन याद आने लगे। उन्हें याद कर एक अजीब टीस सी उठ रही थी। फिर मैं मैदान से उठकर सड़क पर आ गया। एक ख्याल आया कि क्यों न मैं किसी स्कूटर या मोटरसाइकिल वाले के सामने खड़ा हो जाऊं। अगर मैं उसे नहीं दिखूंगा, तो वह मुझे मार ही देगा। ऐसे भी तो मैं मरा ही हुआ हूं। ...लेकिन तभी सोचा कि मैं भले ही अदृश्य हूं लेकिन शरीर तो मेरे पास है। अगर मैं मरा नहीं और घायल होकर रह गया तो और आफत आएगी। वह कष्ट झेलना और मुश्किल हो जाएगा। मेरा तो कोई इलाज ही नहीं करेगा। अभी तो मैं कम से कम चल-फिर ले रहा हूं।

तभी मैंने देखा कि बिना हेल्मेट पहने एक मोटरसाइकिल वाला गुजरा। उसके पीछे एक ट्रैफिक पुलिस वाला भागा। पुलिस वाले ने उसे रोककर कुछ पैसे लिए और फिर उसे जाने दिया। वह सिपाही जब मेरे सामने से गुजरा तो मैंने जोर से कहा, क्या गुरु कितनी रि‌श्वत ली? सिपाही अपनी रौ में चलता गया। अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया कि मैं अदृश्य हो चुका हूं। अब मेरी एक नई जिंदगी शुरू होगी। तभी सड़क पार करते हुए मेरी नजर एक होर्डिंग पर पड़ी। उसमें किसी फिल्म के आने की सूचना दी गई थी। उसमें कई नए पुराने हीरो थे। मैंने अनिल कपूर को पहचान लिया। अनिल कपूर को पहचानते ही सबसे पहले मेरे जेहन में फिल्म मिस्टर इंडिया का एक दृश्य कौंध गया। अदृश्य मिस्टर इंडिया तस्करों मिलावटखोरों को मजे चखा रहा है। मेरे भीतर रोमांच की एक लहर सी दौड़ने लगी। अरे मैं तो मिस्टर इंडिया हो गया हूं। मैं सबको देख सकता हूं लेकिन मुझे कोई नहीं देख सकता। यह सोचते ही मेरा सारा अवसाद जाता रहा।

मेरे जेहन में एक के बाद योजनाएं चमकने लगीं। क्या करूं मैं? सबसे पहले अपने मकान मलिक की बैंड बजाऊं या ठेकेदार की खाट खड़ी करूं। नहीं.. मैं अपनी इस ताकत का प्रयोग अपने निजी बदले के लिए नहीं करूंगा। मैं ऐसा काम करूंगा जिसमें बहुत सारे लोगों का भला हो खासकर गरीब और जरूरतमंद लोगों का। अचानक एक रोशनी सी दिखाई दी मुझे। लगा कि क्यों न मैं चक्कर मैदान को बचाने का काम करूं। मैंने सुना था कि अब मुख्यमंत्री के साइन करते ही यह मैदान बिल्डरों को सौंप दिया जाएगा। यहां बहुमंजिली इमारते बनेंगी, जिनमें रहने के लिए बड़े-बड़े लोग आएंगे। इसमें खेलने वाले बच्चें, इसमें आराम फरमाने वाले गरीब मजदूर सब निराश हो जाएंगे। मैंने अखबार में पढ़ा था कि सीएम साहब जरूरी फाइलें अपने घर ले आते हैं और वहीं उसे निपटाते हैं। मैंने सोचा मैं उनके घर में घुसकर वह फाइल किसी तरह से खोज लूं। और उसे लेकर भाग जाऊं। फिर यह मामला ही खत्म हो जाएगा या फिर लंबे समय के लिए टल जाएगा। यही सोचकर मैं चल पड़ा। मैं इतने जोश मे आ गया था कि पैदल ही चल पड़ा। मुझे सीएम क्वार्टर पता था क्योकि मैं उस रोड से ही होकर अपनी कंपनी जाया करता था।

मैंने देखा। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस है। लेकिन मैंने सोचा, मुझे क्या डरना , मैं तो हवा हूं। मुझे कौन देखेगा भला। मैं आराम से दो सिक्युरिटी वालों के बीच से निकल रहा था कि एक ने मुझे पकड़ लिया। अचानक लगा जैसे मुझे किसी ने पहाड़ से पटक दिया। मेरा सपना टूट गया।’  

 

रतनलाल के ऐसा कहते ही जोर का ठहाका लगा। सारे पुलिस वाले हंसे, पर एसएचओ के चेहरे पर तनिक भी मुस्कान नहीं थी। वह रतनलाल को देखता हुआ कुछ सोच रहा था। तभी कुछ कांस्टेबल उठकर बाहर चले गए। सिर्फ एसएचओ, एसआई और वह एएसआई बचा रह गया जो सब कुछ लिख रहा था।

एसएचओ ने बड़ी विनम्रता से रतनलाल से पूछा, ‘चाय लेंगे क्या?’

रतनलाल ने कुछ इस अंदाज में एसएचओ को देखा, जैसे उसे इस सवाल की उम्मीद न हो।

एसएचओ ने एएसआई से कहा, ‘जाओ, सबके लिए चाय मंगवाओ।’ एएसआई उठकर चला गया।

रतनलाल टुकुर-टुकर सबको देखे जा रहा था। कुछ देर बाद लगा जैसे उसमें कोई उबाल सा आ गया हो। उसने अचानक टेबल पर जोर से मुक्का मारा और कहा, ‘मिस्टर इंडिया मैं नहीं बन पाया तो क्या हुआ, मैं अपना मिशन नहीं छोड़ूंगा। मिस्टर इंडिया एक झूठ था, फरेब था, लोगों को बहलाने के लिए। मुझे कोई जादू नहीं चाहिए किसी चमत्कार का सहारा नहीं चाहिए। मैं अब रतनलाल के रूप में जाऊंगा मुख्यमंत्री के आवास पर। धरना दूंगा, आमरण आमशन कर दूंगा। चक्कर मैदान गरीबों का है। चक्कर मैदान हमारा है। चक्कर मैदान जिंदाबाद।’

यह कहकर वह दोनों हाथ ऊपर लहराने लगा।                 

        ......

लेखक संजय कुंदन - परिचय

 

लिखने का संबंध कहीं न कहीं मेरे मिसफिट होने से है। मुझे बचपन में ही अहसास हो गया था कि मैं परिवार, समाज में मिसफिट हूं। मैं औरों से अलग हूं। मैं अकेला हूं। तो अकेलेपन से लड़ने के क्रम में लिखना शुरू कर दिया। घर में साहित्यिक माहौल था, शायद इसीलिए साहित्य को अपनाया। अगर ऐसा माहौल न होता तो मैं क्या करता, कहना मुश्किल है। समय के साथ यह मिसफिट होना और बढ़ता गया।

मैं ऐसे शहर में रहता हूं जहां मैं नहीं रहना चाहता। मैं ज्यादातर ऐसे लोगों के बीच रहता हूं जिन्हें मैं पसंद नहीं करता। मैं जिस तरह की नौकरी करना चाहता था, वो मुझे मिली नहीं। और नौकरी में भी काम के अलावा मुझसे जो अपेक्षाएं की जाती हैं, वो मैं कर नहीं सकता। मैं जैसे जीवन और समाज की चाह रखता हूं, वो मेरे आसपास नहीं है। मेरे चारों ओर शोरगुल और प्रलाप से भरा एक कृत्रिम समाज है, जिसे मैं सख्त नापसंद करता हूं। यानी अकेलापन गहराता जा रहा है। ऐसे में लेखन मुझे जीवन के गहरे तनावों और दबावों से मुक्त होने का अवसर देता है। वह एक शैडो लाइफ है जहां मैं अपना गुस्सा, अपनी खीझ उतार सकता हूं। मैं ठठाकर हंस सकता हूं उन सब पर, जिन पर वास्तविक जीवन में नहीं हंस पाता, या खुद अपने आप पर। दरअसल यथार्थ जीवन से इतनी ज्यादा विरक्ति है कि मैं उसमेँ उपस्थित होकर भी हमेशा लेखन के एक प्रति संसार में जीना चाहता हूं।

मेरे भीतर बहुत ज्यादा नफरत है बहुत ज्यादा गुस्सा है। उन सबको लेखन में ही उतारता रहता हूं। अगर ऐसा न करूं तो मेरे भीतर की घृणा मुझे नष्ट कर डालेगी। इसलिए मैं हमेशा रचनारत रहना चाहता हूं। ईमानदार और सहज लोगों के प्रति मेरे मन में गहरा लगाव है। मैं वैसे चरित्रों की रचना कर, उनके संघर्ष की कथा कहकर एक संतोष पाता हूं। दरअसल इस तरह मैं अपनी जिंदगी को ही फिर से रचता हूं। यह पुनर्रचना मुझे एक संतोष देती है।

 

परिचय

 

जन्म: 7 दिसंबर, 1969, पटना में

पटना विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए।

संप्रति: हिंदी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’, नई दिल्ली में सहायक संपादक

प्रकाशित कृतियां:

कागज के प्रदेश में (कविता संग्रह)

चुप्पी का शोर (कविता संग्रह)

योजनाओं का शहर (कविता संग्रह)

बॉस की पार्टी (कहानी संग्रह)

श्यामलाल का अकेलापन (कहानी संग्रह)

टूटने के बाद (उपन्यास)

 तीन ताल (उपन्यास)

पुरस्कार/सम्मान:

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार

हेमंत स्मृति सम्मान

विद्यापति पुरस्कार

संपर्क: सी-301, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012(उप्र)

मोबाइल: 09910257915

sanjaykundan2@gmail.com

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