... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

अथ श्री रिंगटोन महात्म्य

वे गुजरे तो युगों से बनी एक और परंपरा को तोड़ते गुजरे। अच्छा तो खैर उन्होंने किसीका सपने में भी नहीं किया था, पर अपना सब बुरा किया भी यहीं छोड़ गए पर साथ में मरते हुए बीवी का गिफ्ट दिया मोबाइल जरूर साथ ले गए ताकि बीवी का डर मरने के बाद भी उनमें बना रहे, कम से कम सात जन्म तक । इस उम्मीद के साथ कि तीन तलाक पर सोचने वाली सरकार कभी न कभी तो सात जन्म के बंधन के बारे भी सोचेगी।

 कइयों ने उनके जाने पर खुशी मनाई तो कइयों ने उनके जाने पर अपना सिर धुना। जिन्होंने उनके जाने पर खुशी मनाई वे इस परम सत्य को जान गए थे कि बंदे को दिया उधार वे तो क्या, यमराज भी वापस नहीं ले सकते। उन्हें उधार देने का मतलब है शेर के मुंह में मांस डालना। अब उनके लारों में आकर वे और न ठगे जाएं, इससे बेहतर तो यही है कि उनका दिया उधार आए या न आए, पर अब ये बंदा ही उठ ही जाए तो इसी में उनकी भलाई है।

 उनकी बीवी ने उनके जाने पर स्यापा किया हो या नहीं, पर जिन जिन नासमझों से उन्होंने उधार लिया था उन्होंने उनके जाने पर जमकर स्यापा किया। वे जिंदा थे, उधार लिया नहीं देते थे, पर उनको उधार देने वाले कुछ उल्लुओं को यह उम्मीद तो थी कि वे जिंदा हैं। भले ही उनसे उधार लेकर जिंदा हैं। हो सकता है कल को उनका मन पसीज जाए और वे उनसे लिया उधार लौटा ही दें? हो सकता है एक दिन वे मरने के बाद की उधार न चुकाने की सजाओं से डर जाएं और उनसे लिया उधार जाने से पहले लौटा दें। इसलिए वे जब भी उनसे अपना दिया उधार मांगने जाते तो उनके घर की दीवार पर करनी भरनी की एक और तस्वीर जरूर टांग आते।

 पर उन्होंने तो पैदा होते ही जैसे किसीसे लिया उधार न देने की शपथ खा रखी थी। उनकी सबसे बड़ी खूबी यही कि उन्होंने अपनी इस शपथ का अक्षरशः दृढ़ नियमपूर्वक नित्य पालन किया। वे उन नेताओं की तरह नहीं थे जो जीत जाने के बाद देशहित की बड़ी बड़ी शपथें खाते हैं पर शपथ खाने के बाद शेष तो छोड़िए, शपथ को भी खाने लग जाते हैं, दीमक की तरह।

वे गए तो उनकी धर्म अधर्म की बीवी ने उनके सिरहाने रोते रोते अंतिम गिफ्ट के रूप में मोबाइल रख दिया ताकि मौके बेमौके वह अपने शौहर से बतिया सके, उन्हें मरने के बाद भी महिला सशक्तिकरण के बहाने डरा सके। 

.....और वे अपने कर्मों को मृत्युलोक में छोड़ समोबाइल यमराज के पास जा पहुंचे। मोबाइल में लाइफ लाइफ टाइम तो सिम की वैलेडिटी थी ही। आउट गोइंग न सही तो इनकमिंग ही सही। 

वे डरते मरते यमराज के सामने पेश हुए। पर वे डरते मरते भी डरे नहीं। असल में जिसने एकबार भी प्रिय बीवी का सामना कर लिया हो वह किसीसे भी नहीं डरता। डरे तो मान लो वह विवाहित पति नहीं, बुज़दिल है। उसका वास्ता विशुद्ध बीवी से नहीं पड़ा है। उसकी बीवी बीवी नहीं, मिट्टी की माधो है। पति को वैज्ञानिक युग में भी पति परमेश्वर मानने वाली है।

वे यमराज के सामने ज्यों ही हाजिर हुए कि अचानक उनके दिल की जगह रखे मोबाइल की घंटी बजी। उन्होंने उसे ऑफ करना चाहा पर कॉल बीवी की थी सो मरने के बाद भी उसे कट नहीं कर सकते थे। उसे काटने का सीधा सा मतलब था मरने के बाद भी अपने को कटवाना। पति परायण बीवी का डर होता ही ऐसा है भाई साहब के मरने के बाद भी ज्यों का त्यों बना रहता है। वह चाहे आपसे कितना ही प्रेम क्यों न करती हो। बीवी का प्रेम हर तरफ से डराता ही है। वह प्रेम करे तो भी डर। न करे तो भी डर।

‘मेरे दरबार में पहली बार ये क्या बोला?’ यमराज ने पहली बार मोबाइल की घंटी सुनी थी सो गुस्साए। इधर उधर खोजी आंखें कान दौड़ाए तो यमराज का गुस्सा देख उन्हें कुछ डर सा लगा। पर उन्होंने देखा कि यमराज को गुस्सा उनकी बीवी के गुस्से से आधा भी नहीं था सो, मंद मंद डरते मुस्कुराते रहे। सोचते रहे- काहे का यमराज? इससे खतरनाक तो मेरी बीवी है।

‘सर!  एक्सक्यूज मी, मेरा मोबाइल बजा था।’

‘ये मोबाइल क्या होता है जीव?’

‘सर मन न करते हुए भी अनलिमिडिट बात करने सुनने का यंत्र?’

‘बात सुनने करने के लिए क्या कान ज़ुबान नहीं रहे अब तुम लोगों के पास जो...’

 ‘नहीं सर! ऐसा नहीं। बात रेंज में न होने पर भी रेंज में लाने के लिए,’ उन्होंने बात स्पष्ट की तो यमराज चौंके।

‘दूर होने पर भी संवाद करने के लिए?’

‘असंवाद सा संवाद जी सर!’

‘तो तुम इसे यहां लेकर आए कैसे? बक बक कर, सुन सुन कर अभी भी जी नहीं भरा क्या तुम्हारा? यहां तो केवल जीव की नेकी बदी ही उसके साथ आती है।’

‘सॉरी सर! आप नहीं जानते आज की तारीख में आदमी के लिए ये मोबाइल कितना जरूरी है? वह आत्मा के बिन जी सकता है, पर मोबाइल के बिना नहीं। वह हवा के बिन सांस ले सकता है पर मोबाइल के बिना नहीं। वह पांव के नीचे जमीन न होने के बाद भी चल सकता है पर मोबाइल के बिना नहीं। वह पानी के बिना रह सकता है पर मोबाइल के बिना नहीं। वह.....पृथ्वी वायु अग्नि जल आकाश, सब हाथ जोड़े मोबाइल के पास! देखा नहीं आपने, वे लोकसभा में देश के मुद्दों पर चर्चा कर रहे होते हैं तो वे मोबाइल पर अति के व्यस्त रहते हैं। इसलिए कि स्वहित परहित से पहले मोबाइल है सर।’

‘मतलब?’ यमराज मोबाइल की महिमा उनके मुखारविंद से सुन चौंके तो वे सपने में भी किसीका खाकर न देने वाले सूतजी हुए.

‘मतलब सर ये कि गरीब से गरीब आदमी को खाने को रोटी मिले या न पर उसके पास मोबाइल जरूर मिलेगा, बात करने को नहीं तो गाने सुनने को ही सही। अब जीव की आत्मा उसके शरीर में नहीं मोबाइल में बसती है। आदमी की आत्मा को मजे से शरीर से अलग किया जा सकता है पर मोबाइल से नहीं।’

‘मतलब?’

‘इसके बिना आत्मा अधूरी है।’

‘मतलब?’

‘सर ये वो करता है जो भगवान भी नहीं कर सकता। सच पूछो तो आज की तारीख में यही आदमी का जीवन दाता है।’

‘मतलब?’

और अगले ही पल उनसे मोबाइल की अपरंपार महिमा सुन यमराज के आग्रह पर उन्होंने फ्लिपकार्ट से ऑनल लाइन अपनी कमीशन रख उन्हें अपने पते पर आई फोन का आर्डर दे डाला। यह जानते हुए भी कि उनका फोन विवाहित की प्रेमिका की तरह सुनेगा कौन?

 

 

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,

 नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र

 

 

ashokgautam001@gmail.com

 

 

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