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वो मीठा दर्द

 

बलदेव भाई के घर कई  बार आना-जाना होता था। हम दोनों की नौकरी एक साथ और दोस्ती भी उम्दा। इस कारण मस्ती भी ख़ूब करते। हम जिन  जगहों पर मिलते उन  सभी जगहों का मूड अलग रहता | उन दिनों  मुझे उनके घर बारबार जाना होता था। शाम को भोजन के बाद हम लोग आँगन में खटिया लगाकर बैठते। कुछ ही देर में उनके बर्तन साफ करने वाली बाई रत्ना आती। वो बर्तन मांझते समय मेरी  तरफ़ देखा करती। एक-दो दिन तो मुझे पता न चला। ज्योति बहन के साथ रत्ना की बातें और मस्ती चलती रहती। वो बोलने में बेबाक थी मगर साफ़दिल। जैसा लगे वैसा स्पष्ट मुँह पर ही बोल देती। चाहे कितना भी बड़ा आदमी हो, किसी की भी शर्म नहीं। पूरी सोसायटी में उससे सारे लोग डरते।

उम्र तो ज्यादा नहीं होगी। होगी बत्तीस-पैंतीस साल की। दो-तीन बार हम लोग बलदेव भाई के घर ही मिले थे। अचानक उसने ज्योति बहन से  पूछा; “हे भाभी ! ये जो अंदर बैठा है वो वांढा है?”

इस प्रश्न को मैं भी अंदर बैठे बैठे सुन रहा था, फिर कान खड़े न हों तो ही आश्चर्य !

ज्योति बहन ने जवाब दिया; “उनकी शादी हो गई है और बेटा भी है। तुम्हें सारे गाँव की फ़िकर। अपना काम करो चुपचाप।”

ऐसे शब्द सुनकर रत्ना से रहा न गया। वो तुरंत कमरे में दौड़ आई। एक हाथ में राख़ लगाई हुई पतीली थी और दूसरा हाथ मेरी ओर करते हुए बोली; “मैंने आपके बारे में पूछा तो कोई एतराज़ तो नहीं?”

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ मगर उसका  व्यवहार भी अभद्र लगा। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। तो रत्ना फिर बोली; “आप कंवारे हैं  वो तो समझ गई मगर बात तो कर सकती हूँ न?”

ज्योति बहन को लगा कि बात  बिगड़ेगी। वो दौड़ती हुई आईं और बोलीं; “तुम अपना काम करो। मेहमान के साथ ज्यादा बोलना ठीक नहीं, चल जा यहाँ से...”

मैं तो आश्चर्यचकित हो गया था। पतला सा शरीर और गोल चेहरा। मांग में सिंदूर भरा हुआ था तो पक्का हो गया कि वो शादीशुदा थी। ज्योति बहन ने ऊंची आवाज़ में  बाहर जाने को कहा तो रत्ना आँगन में जाते जाते बोली; “वो कंवारा हो या शादीशुदा ! मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे पसंद आया तो पूछ लिया और अब तो रोज पूछूंगी।” इतना कहकर वो बर्तन मांजकर जल्दी से चली गई।

रत्ना तो चली गई मगर उसकी वाणी-व्यवहार ने मुझे झकझोर दिया। मुझे लगा कि इस  औरत की शादी हो चुकी है, मैं भी शादीशुदा हूँ। हम दोनों के  अपने-अपने बच्चें है। वो तो यहाँ  घर में सिर्फ झाडू-पोंछा और बर्तन साफ़ करने के लिए ही आती है। फिर भी किसी पराये पुरुष के लिए खुलेपन से बोलना कि –“मुझे वो पसंद है...” ऐसी स्थिति में फँसा कोई पुरुष क्या बोल पाएगा?

इस घटना के बाद मैंने बलदेव भाई के घर ही जाना बंद कर दिया। मगर  मेरे ख़ास मित्र होने के कारण कभी  उनके पास जाना भी पड़ता। ऐसे में कभी रास्ते में ही रत्ना मिल जाती तो वहीं की वहीं खड़ी रह जाती। मेरी  तरफ़ देखती, मुस्कुराती  और मैं गुज़र जाऊं तब तक देखती रहती। हालांकि कुछ बोलती नहीं। उसकी ऐसी हरकतों को मैं कैसे रोक पाता? फिर भी मुझे कई बार विचार आता कि रत्ना के ऐसे व्यवहार के पीछे कोई  ख़ास कारण ही होगा। जिसके कारण मानसिक पीड़ा का अनुभव वो कर रही है। इंसान की आतंरिक पीड़ा का कोई  विकल्प नहीं होता। मगर कोई  ऐसी जगह मिले, जहाँ दिल का बोझ हल्का कर सके, शायद ऐसा वो चाहती होगी। रत्ना  के विषय में यही सोच सकता था मैं।

एक दिन मुझे जानकारी मिली कि उसकी  युवा बेटी को अपनी ही गली के एक लड़के  से प्यार हो गया था। पूरे इलाके में इसी की चर्चा हो रही थी। मगर रत्ना के मुँह पर कौन कह पाता? वो तो बाघिन थी। सभी कहते कि पाप अपने आप बोलेगा और हुआ भी वैसा ही। अपनी बेटी का बढ़ता पेट देखकर ही रत्ना समझ गई। पूरी बात जानने के बाद बेटी की ख़ूब पिटाई की। फिर ख़ुद एक कोने में बैठकर बहुत रोई। गली में से किसी ने आकर उसे  आश्वासन भी नहीं दिया। क्योंकि उसका  मिज़ाज लोग समझते थे। बड़ी मेहनत से कुछ रुपये बचाए थे वो भी हॉस्पिटल में ख़र्च हो गए। मानों अपनी आबरू को दफ़न करने के लिए ही वो पैसे बचाए थे। यह आघात बेटी से ज्यादा रत्ना के शरीर पर गहरा असर छोड़ गया। उसका  स्वभाव भी बदल गया। पहले वो अपनों के बीच ख़ूब  हँसमुख थी। रत्ना अब वाकई गंभीर हो गई। ख़ुद  का स्वभाव सख्त होने के कारण वो भी किसी से अपने निजी प्रश्नों की बात करके मन का बोझ  हल्का नहीं कर पाई।

फिर तो अच्छा घर देखकर बेटी की शादी भी कर दी गई। सात-आठ घरों में काम करके उन पैसों से अपना घर चलाती थी। रत्ना का पति अति आलसी था। कुछ भी काम नहीं करता था। फिर भी बोझ  बने पति को भी अच्छे से संभालती और सामाजिक संबंधो में पूरी तरह से तैयार रहती। उसका आर्थिक व्यवहार भी बहुत अच्छा था। किसी के पास से रुपये उधार लाती तो तय तारीख़ पर अचूक लौटा देती। उसके  लिए वचन की क़ीमत थी। उसके इस व्यवहार के कारण लोग उसे पाँच-दस हजार रुपये किसी भी समय उधार देते थे। इस बात को जानने के बाद मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। रत्ना ने मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया? वो जब भी मुझे देखती तब धीरे से बोलती भी; “कैसे हो वांढा (कंवारा)?”

मैं प्रत्युत्तर देने के बदले हंसता। मेरी हंसी उसके  पाँव में जोश भर देती। वो मानों एक घर से दूसरे घर हवा में उड़ती हुई जाती। हमारे बीच कोई  लेनदेन न होने के बावजूद उस के मन में  मेरे लिए अंदर से प्यार का दरिया उमड़ता। बलदेव भाई कई बार मुझसे  कहते भी; “इस बाई के सामने अगर कोई बुरी  नज़र से देखें तो उनकी आँखें ही निकाल दे, इतनी ख़तरनाक है।”

गली के लोगों को रत्ना से डरते हुए देखकर लगता कि बलदेव भाई की बात बिलकुल सही है। रत्ना कितना चाहती है और कैसे वो तो मुझे मालूम न था। मगर उसकी चाहत में मुरझाये हुए फूल को पुन: ताज़गी बख्शने  की ताक़त मुझे महसूस हुई। उसकी इस ताक़त को समझने के बाद सावधानी भी रखनी चाहिए।

बढ़ता हुआ परिचय उसके चारित्र्य को सोने की तरह चमका रहा था। निस्पृहता से देखें तो उसका व्यक्तित्व  हिमालय जैसा लगता था। चारित्र्य की बात हो या विश्वास की, क्या कहें? उसके  भरोसे पर पूरा घर खुला छोड़कर जाएं तो एक तीली भी इधर-उधर न हों। उसकी पवित्रता और वफ़ादारी समझना मुश्किल जरूर मगर एकबार समझ में आ जाए तो सारा बोझ उतर जाए। दुःख से घिरी हुई रत्ना को मुँहफाड़ बोलने का ज़बरदस्त शौक। किसी और तरीके से वो जीवन का आनंद नहीं ले पाती थी। उसके मन में जो भी विचार आता, बिलकुल वैसा ही बेबाक बोल देती। सार-असार का विचार कभी न करती। वो कहती; “बात को पेट में  दबाकर रखें तो दर्द ही उठेगा।”

रत्ना की मानसिकता बिलकुल अलग ही थी। मैं जब भी उससे मिलता तो उसके व्यक्तित्व के हर पहलू की जांच करता। एक बार वो खुद मुझसे कह रही थी, “मेरी बेटी रुपली है न? उसे एक लडके से मनमेल हो गया था| लोग  चुपके  से  आपस  में बात करते। मुझे जब पता चला तो तुरंत उसकी शादी कर दी।”  

यूं ही उसकी बातें चलती रहतीं। रूपा ससुराल में बहुत समृद्ध थी। मगर विचारों की संकुचितता कुछ ज्यादा ही थी। उन्हें पहली संतान बेटा ही अपेक्षित था। मगर बेटी का जन्म हुआ| उसके ससुरालवालों को गुस्सा आया| रूपा को मायके में वापस भेजने के लिए आए। कहाकि – बेटी हुई है, इसे आप ही रखिए। रत्ना बेचारी क्या करती? इकलौती बेटी ऐसे कारण  से ससुराल से वापस आए तो कौन सी माँ होगी जिसे दुःख न होगा! रत्ना को डर सिर्फ इस बात का था कि रूपा को अगर  यहीं रहना पड़ा और उसका पुराना प्रेम संबंध पुन: जुड़ गया तो? फिर तो मेरे हाथ में कुछ नहीं रहेगा। रत्ना ने बहुत शीघ्र ही यह सब सोच लिया और अपने दामाद को अपने असली मिज़ाज से डांट दिया। झगड़ा करने के बाद रूपा  को दामाद के घर ही वापस भेज दिया। दामाद को खुश रखने के लिए उसने तुरंत कलर टी.वी., नए कपड़े और घर के  जरुरी सामान के साथ रूपा को भी चांदी के घुँघरू दिलवाए।

रूपा को दूसरी बार में उसकी माँ रत्ना ने सलाह दी थी कि डॉक्टरी जाँच करवा लेना। रूपल के ससुराल में भी यह दबाव था कि अब की बार तो बेटा ही होना चाहिए। रत्ना को अब की बार रूपल वापस आए वो मंज़ूर न था। इसलिए उसने ही बेटी को धमकी दी थी कि अब की बार तो तुम्हें ही ध्यान रखना होगा नहीं तो जान से मार दूँगी। दामाद भी कम बुद्धिमान था। उसने भी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ा और दूसरी भी बेटी हुई। रूपली तो बिलकुल डर गई थी। अपने ससुराल में दुःख था और मायके  में माँ की धमकी। घबराई हुई रूपली ने ज़हरीली दवाई पी ली। पड़ोसियों ने उसे  अस्पताल पहुँचा दिया और समय पर इलाज होने के कारण   वह बच गई।

पारिवारिक झगड़े का निवारण करने हेतु रत्ना ने ही  अपने जमाई को फुसलाकर समझाया। आख़िर बेटी-दामाद अपने परिवार से अलग रहने चले गए। अब रूपा को भी दूसरों के घरों में काम करने की नौबत आ गई। ऐसे में सुख की खोज कहाँ करें?

रत्ना ने जब मुझे यह सारी बातें बताई तब मुझे भी बहुत दुःख हुआ था। मगर मैं किसी भी तरह की सहानुभूति दिखाना नहीं चाहता था। मेरे इरादे को रत्ना भांप गई। एक दिन रत्ना ने मुझे कहा; “एय वांढा! मैं तो आपको जानती हूँ और आप भी मुझे ! एक बात कहूं?”

मैंने कोई  जवाब न दिया। सिर्फ आतुरता से उसकी  तरफ़ देखता रहा।

तब रत्ना फिर से बोली; “मैं तो आपको वांढा ही मानती हूँ और मानूँगी भी। आप मुझे बहुत पसंद हैं। आपकी तरफ़ कभी नहीं देखूंगी, खुश?”

तब मेरे मुँह से शब्द निकल गए; “मेरी तरफ़   देखने की मनाही तो मैंने नहीं की... “

“आपने भले ही ना नहीं कहा! मगर मुझे जो कहना था वो कह दिया, आपने मुझे सुनकर मेरे मन का बोझ उतार  दिया। अब अपने घर भी जाओ...”  कहते हुए वो हंसती हुई चली गई।  

उस वक्त मुझे लगा कि जाने-अनजाने में भी रत्ना ने मेरे मन में स्थान ले लिया है। फिर यकायक उसके चले जाने के  बाद मेरे अंदर तक गहरा घाव होने का अहसास महसूस हुआ। अंदर का खालीपन और उसका मीठा दर्द भी बारबार कुरेदने का मन होता है मुझे। चाहता हूँ, वो घाव कभी न भरे और उसकी पीड़ा की अनुभूति मैं हमेशा करता रहूँ...!

 

 

 

 

पंकज त्रिवेदी

संपादक-विश्वगाथा (त्रैमासिक पत्रिका)

गोकुलपार्क, 80 फूट रोड, सुरेंद्रनगर- 363002 (गुजरात)

Mobile – 096625 14007

पंकज त्रिवेदी का परिचय

जन्म- 11 मार्च 1963

अभ्यास :-  बी.ए. (हिन्दी साहित्य), बी.एड., जर्नलिज्म एंड मॉस कम्यूनिकेशन (हिन्दी), माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय – भोपाल  

अखबार स्तम्भ : अखंड राष्ट्र (लखनऊ और मुम्बई)

साहित्य क्षेत्र-

संपादक : विश्वगाथा (हिन्दी साहित्य की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक मुद्रित पत्रिका) साढ़े छह वर्षों से

लेखन- कविता, कहानी, लघुकथा, निबंध, रेखाचित्र, उपन्यास ।

पत्रकारिता- राजस्थान पत्रिका ।

अभिरुचि- पठन, फोटोग्राफी, प्रवास, साहित्यिक-शिक्षा और सामाजिक कार्य ।

प्रकाशित पुस्तकों की सूचि -

1982- संप्राप्तकथा (लघुकथा-संपादन)-गुजराती

1996- भीष्म साहनी की श्रेष्ठ कहानियाँ- का- हिंदी से गुजराती अनुवाद

1998- अगनपथ (लघुउपन्यास)-हिंदी

1998- आगिया (जुगनू) (रेखाचित्र संग्रह)-गुजराती

2002- दस्तख़त (सूक्तियाँ)-गुजराती

2004- माछलीघरमां मानवी (कहानी संग्रह)-गुजराती

2005- झाकळना बूँद (ओस के बूँद) (लघुकथा संपादन)-गुजराती

2007- अगनपथ (हिंदी लघुउपन्यास) हिंदी से गुजराती अनुवाद

2007- सामीप्य (स्वातंत्र्य सेना के लिए आज़ादी की लड़ाई में सूचना देनेवाली उषा मेहता, अमेरिकन साहित्यकार नोर्मन मेईलर और हिन्दी साहित्यकार भीष्म साहनी  की मुलाक़ातों पर आधारित संग्रह) तथा मर्मवेध (निबंध संग्रह) - आदि रचनाएँ गुजराती में।

2008- मर्मवेध (निबंध संग्रह)-गुजराती

2010- झरोखा (निबंध संग्रह)-हिन्दी

2012- घूघू, बुलबुल और हम (હોલો, બુલબુલ અને આપણે) (निबंध संग्रह)-गुजराती

2013- मत्स्यकन्या और मैं (हिन्दी कहानी संग्रह)

2014- हाँ! तुम जरूर आओगी (कविता संग्रह)

2017- मन कितना वीतरागी (चिन्तनात्मक निबंध संग्रह)

 

प्रसारण- आकाशावाणी में 1982 से निरंतर गुजराती-हिन्दी में प्रसारण ।

दस्तावेजी फिल्म : 1994 गुजराती के जानेमाने कविश्री मीनपियासी के जीवन-कवन पर फ़िल्माई गई दस्तावेज़ी फ़िल्म का लेखन।
निर्माण- दूरदर्शन केंद्र- राजकोट

प्रसारण- राजकोट, अहमदाबाद और दिल्ली दूरदर्शन से कई बार प्रसारण।

स्तम्भ - लेखन- टाइम्स ऑफ इंडिया, जयहिंद, जनसत्ता, गुजरात टुडे, गुजरातमित्र,

फूलछाब, गुजरातमित्र

विश्वगाथा (प्रकाशन संस्थान) : गुजराती-हिन्दी पुस्तक प्रकाशन में 35 से ज्यादा किताबें प्रकाशित

सम्मान –

(1) हिन्दी निबंध संग्रह – ‘झरोखा’ को हिन्दी साहित्य अकादमी (गुजरात) के द्वारा 2010 का

      पुरस्कार

(2) सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मेलन में तत्कालीन विज्ञान-टेक्नोलॉजी मंत्री श्री बच्ची सिंह राऊत के

      द्वारा सम्मान।

(3) त्रिसुगंधि साहित्य कला एवं संस्कृति संस्थान (पाली) राजस्थान के द्वारा 'साहित्य रत्न सम्मान'  

      –2015

(4) कवि कुलगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर सम्मान-2016, भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता 

(5) “साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान-2017” शब्द प्रवाह साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामजिक

       मंच, उज्जैन 

(6)  ‘साहित्य चेतना सम्मान’, अभिमंच संस्था, नई दिल्ली -2018

(7)  ‘मन कितना वीतरागी’ निबंध संग्रह को ‘अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा

          पुरस्कार’ -2019

 

 

संपर्क

पंकज त्रिवेदी, "ॐ",  गोकुलपार्क सोसायटी, 80 फ़ीट रोड, सुरेन्द्र नगर, गुजरात - 363002
मोबाईल :  096625-14007             vishwagatha@gmail.com

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