... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

गुलशन कौर

इसे मैं क्या नाम दूँ-कथा, आत्मकथा, स्मरण, संस्मरण या शब्दों का बुना हुआ एक नाज़ुक रिश्तो का जाल कहूँ,  जो वक्त अनुसार अपनी सुविधा से बुन लिया जाता है  या उधेड़ लिया जाता है. जब गुलशन कौर से उसकी यादों की चादर में टांके हुए इन सितारों की बात सुनी तो सोचा दुख-सुख, जुदाई-मिलम के इस संगम को ज़बान दूँ। सुनते हुए मन में यही आया, जैसे रिश्ते नाते सौदागर के सौदे हो गए हैं, बिकाऊ या खरीदे हुए. बिकाऊ-जिस का नाता खरीदार के साथ बन जाता है या यूँ कहें बंध जाता है, क्योंकि वह मालिक होता है और खरीदे हुए वजूद का हक़दार-हर मामले में उसे इस्तेमाल करने का हक़ उसे हासिल होता है-काम लेने का, अपने अरमानों को पूरे करने का, हर मनचाहे इस्तेमाल करने का....!                       

और उसी दौर में......!

   धरती की दरारों के साथ दिलों में दरारें पड़ती रहीं,  बढ़ती रहीं, चौड़ी होती रहीं. हिंदू-सिख-मुसलमान सभी एक दूसरे के दुश्मन बन गए, लूटमार का हाहाकार मचा, जिसमें स्वाहा होती रही औरत की अस्मत. खुले मैदानों में बेसहारा, बेछत लोग बैठे हुए देखे जाते। एक देश अब दो में विभाजित हुआ था. कम्युनल हारमनी के नाम पर जैसे एक दूसरे को मार-धाड़ कर अपने अपने मन की भड़ास निकाल रहे हों। ऐसे वक़्त में.....!

   ज़रीना आपा के मुंह से सुना कि मुसलमान घर की एक लड़की की शादी में नाच गाने में भंग डालते हुए कुछ सिख तलवारें लेकर टूट पड़े, यह पता ही नहीं चला कि किसका सर किधर गिरा, और किस का धड़ किधर गिरा. बस खून के रेले बह चले. ऐसे में.....!

   माएं चीख़ती, बिलखती रही और कुछ तो अपने बेटों को दूध की कसम देकर उन्हें मार डालने के लिए मजबूर करतीं, या उन्हें किसी कुएं में फेंक देने के लिए बाध्य करती. सामने यह आया कि मुसलमान भी भड़के हुए थे और उनके घात करते हुए कात नहीं जानते थे कि उनके वार के सामने कौन आया? सिख-हिंदू या उनका ही कोई मुसलमान भाई. सिख औरतों को घर से घसीटकर बालात्कार के बाद घर के बंधुओं के सामने वार से तमाम कर दिया जाता. ऐसे बेदर्द हृदय विदारक मंजर देख कर...., कोई क्या कराता, क्या चीखता ! फ़क़त दर्द को दिल में दबाकर आज नम आंखों से वही तमाशाई बंधु बताते हैं अपनी आपबीती की दास्तान... !

‘ हाँ तो गुलशन बिटिया, आंखन देखी हालात का मंज़र था, पर आंख रोना भूल गई... मुंह में आवाज़ घुट कर रह गई. उफ़! करना कयामत बन जाता था. देश की फसीलें उलांघ आना आसान, पर दिलों की बहुत ही मुश्किल हुईं थीं उन दिनों…..!’

‘ पर आपा, ऐसी हालत में आप सरहद के उस पार से इस पार कैसे आईं?’  गुलशन कौर ने अपनी बड़ी बड़ी आंखों को विस्मय से फिराते हुए पूछा.

     अब वह इतनी छोटी भी न थी, उसे कुछ कुछ याद आ जाता कि किस तरह वह उन हालातों में बच बचाकर अपनी चाची सुरजीत कौर और अन्य शरणार्थियों के साथ अमृतसर में आकर बसी और बचपन से आज तक यहीं रच बस गई है...! उनका क्या हुआ जो अपनों से बिछड़ कर पीछे रह गए। पूछने के लघु अनुपात में ज़रीना आपा की बयानबाजी ने तो कई वारदातों को जिंदा कर दिया था। फिर भी....!

     गुलशन कौर उत्सुक थी यह जानने के लिए कि यह ज़रीना आपा, है तो कौन है? और दो दिन से उनके यहाँ टिकी हुई हैं, ऐसे जैसे कोई नज़दीकी रिश्तेदार हो। पर यह संभव किसी हाल में न था। उसका पहनावा, बातचीत का रवैया अमृतसर के किसी भी आम आदमी से तालमेल नहीं खाता था। सुरजीत चाची ने  कभी कभार उनके पड़ोसी होने के नाते उड़ते में उनका ज़िक्र किया था। और यह भी ठीक से नहीं बताया कि वह कौन है और किसकी नातेदार है? सभी सवाल मन में सहमे सहमे से थे....!  

     एक बात जो प्रत्यक्ष रूप में सामने थी वह थी चाची के आंचल का प्यार दुलार, जो पाकर गुलशन एक कली से फूल की तरह खिल उठी थी। एक आधा बार लोगों को कहते सुना था -’ गुलशन कौर का सोंदर्य कुछ अलग रंग और बू लिए हुए है। किसी अमीर घराने की अमीरज़ादी का जलवा है उसके चलन में, उसकी आन में, उसकी बान में!’ नहीं समझी थी कुछ भी नहीं समझी थी वह उन बातों का अर्थ!

‘हां तो गुलशन बिटिया, तुम मुझे ‘आपा’ न कहकर ‘दादी जान’ भी कह सकती हो…’

‘ पर यह संबोधन तो….!’

     बात को बीच में ही काटते हुए ज़रीना आपा ने कहा-’ संबंधों की बात नहीं मेरी लालपरी! मेरी उम्र, और इन चाँदी जैसे बालों को देखते हुए ‘दादी’ कहना-कहलवाना जायज़ बनता है. और तुम भी तो मेरी पोती की उम्र की हो,  इसीलिए कह रही थी.’

‘अच्छा आपा,  आप अपनी उस पोती को अपने साथ क्यों नहीं ले आईं? क्या उसे वहीं गैरों के बीच रहने के लिए छोड़ आईं?  क्या नाम है उसका?’ पलभर में गुलशन ने अनगिनत सवाल ज़रीना आपा के सामने पसार दिये। ऐसे में.....!

     क्या कहती ज़रीना आपा, क्या बताती वह? कैसे अपना सीना चीर कर कहती कि ……..! एक ऐसा सच जो न उगलते बंता था न निगलते।

‘ आपा आप बताएं ना, उसका नाम क्या है? वह कहां है?  चाची ने एक दो बार आपका और उनका ज़िक्र आधे अधूरे शब्दों में ज़रीना बानो के नाम से किया है. बहुत याद करती है वह आपको. ’ कहकर गुलशन ज़रीना आपा की ओर देखने लगी।

   और जैसे नींद से जाग उठी जरीना आपा! ज़रीना बानों का ज़िक्र सुनते ही हड़बड़ाकर बोल पड़ी-‘ गुलशन. उसका नाम है गुलशन बानो…. , अरे...रे...रे... सारा बानो है!

‘सारा बानो, कितना सुंदर नाम है आपा ... कहाँ है वह?’ कहते हुए गुलशन कौर ने ज़रीना आपा की चुनरी को हल्के से यूँ लहराया कि चुनरी सर से उतर कर उसकी छाती पर आ टिक्की, जो धौंकिनी की मानिंद चल रही थी।  

‘वह अब जाने कहां खो गई है बिटिया, उसको तलाशते हुए मैं उस देश को छोड़कर इस देश में आई हूँ।‘

‘ क्या मतलब…. आपा! आपकी सारा बानो क्या सच में खो गई है?’

‘हाँ बिटिया, उसे ढूंढते ढूंढते मेरी उम्र की कमर दोहरी हो गई है….. सात साल वहां पाकिस्तान की गली गली की मिट्टी छानी, पर वह नहीं मिली….’

‘सात साल से आप उसे ढूंढ रही हैं? अब वह कितने साल की हुई होंगी आपा?’

     गुलशन कौर के आवाज में खलबली सी मची थी. सवालों का तांता बढ़ता जा रहा था.

‘ यही कोई पंद्रह सोलह साल की हुई होगी मेरी बच्ची, कुछ तुझ जैसी, तेरी उम्र की!  मां का आंचल छूटा तो मैंने गोद में समेट लिया. पर जब अल्लाह मियां के पास जाऊंगी तो क्या जवाब दूंगी उसकी माँ नूर बानो को …!’  कहते हुए ज़रीना बानो अपनी छाती पीटने लगी.

     विभाजित दौर के दर्द की लकीरें वक्त बेवक्त जब भी सालती हैं, तब वतन में भी बे-वतनी का अहसास ज़िंदा हो उठता है। जब खून पुकारने लगता है तब अपने लोग जमीन की जड़ो से उखड़ कर बेदर्द हवाओं के रुख की रौ में बहे जाते हैं, जैसे ज़रीना बानो अपनी पोती की याद की डोरी थामे अचानक अमृतसर आन पहुंची, बिना किसी सूचना के...! सुरजीत कौर उसे देख कर ज़र्द पत्ते के मानिंद सिहर उठी, जैसे बहार में ख़िज़ाँ की कोई आहट सुन ली हो। आँखों से नींद नदारद सी हो गई। एक अनजाना डर उसके मन के कोने में दुबक कर बैठ गया। वह ज़रीना बानो से आँखें चुराने लगी, कतराने लगी। अक्सर सामना न हो इसलिए ज़्यादा वक़्त गुरुद्वारे में गुज़ारती। घर में रह जाते दो प्राणी, ज़रीना बानो, व गुलशन।

इस बात का एहसास ज़रीना बानो को भी हुआ।  

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   तभी एक चरमराहट से दरवाजा आँगन के भीतर खुला और सुरजीत कौर गुरुद्वारे की सेवा से निजात पा कर घर लौटी. गुलशन कौर चाची को देख कर उठी और उसके हाथ से लंगर से लाए हुए प्रसाद के ‘ दोने’ और खाने का सामान लेकर रसोई में जाते जाते कहने लगी...

‘ चाची खाना परोस दूँ, आपा भी सुबह से भूखी बैठी हैं, सिर्फ चाय पर टिकी हुई है, और अपनी खोई हुई पोती सारा बानो के दर्द की गाथा बता बता कर उदासीन हुए जा रही हैं।’

‘ हाँ गुलशन’ बेटी,  दो तसरियों में प्रसाद बांटकर तुम दोनों खा लो. मैं वही खाकर आई हूँ।’ कहकर सुरजीत कौर वहीं खटिया पर कमर सीधी करने के लिए लेटने लगी.

   गुलशन ने खाना परोस कर लाने के पहले एक हल्की सी रजाई चाची के थके बदन पर पसार दी। चाची का मन उसे दुआएं देता हुआ नींद में गरूब होने लगा. आसादीवार के वेले गुरुद्वारे पहुंचने के बाद अब घर लौटी थी। दोपहर के दो-तीन बज रहे हैं, नींद तो आनी ही थी....!

   पर ऐसा हो कर भी न हुआ. सुरजीत कौर ने आंखे तो बंद कर ली पर बंद आंखों में जो साये तैर आए उनसे उसका बदन सिहर उठा था. यह तो भला हो गुलशन का जो उस पर रजाई की तह चढ़ा गई, पर यादों के नुकीले भेदी जो आँखों की नींद चुग रहे थे उन्हें कौन समझाये! अतीत के साये सदा बनकर आज गूंजने लगे। सात-आठ साल पुराने अक्स, सिंध से हिन्द में आने की तैयारी वाले माहौल को फिर से ज़िंदा करने लगे।    

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‘अरे सुरजीत बहन, हम सालों से पड़ोसी बन कर रहे हैं. एक दूसरे के माई-बाप ही हैं. बस अब निगोड़े वक्त ने फासले बढ़ाकर हमें पछाड़ने की ठान ली है.’

‘ हां ज़रीना बेगम यह तो है. अब के बिछड़े जाने फिर कब मिलें,  मिलेंगे भी या नहीं, कौन जाने? सरदार ने तो कल पौ–फटे ही निकलने की ठानी है. पाकिस्तान की बॉर्डर लांघकर भारत जाकर बस जाने की बात बनी है. सुबह हम दोनों ही निकल जाएंगे. तुमसे भी शायद ही मिल सकें,  इसे ही आखिरी मुलाकात समझना.’

कह कर’ सुरजीत’ कौर ज़रीना बेगम के गले लगकर अपने आंसू कमीज की बाहों से सोखने लगी।

‘ नहीं नहीं सुरजीत, यूँ न कह,  हमें मिलना है, बिछड़ना नहीं. तुम्हें मेरी एक अमानत अपने साथ लिये जानी है. इस वक्त मेरा यहां से हिलना मुहाल है-’ सरताज’ की बांदी जो हूँ. अपनी मर्जी से जा नहीं सकती, पर मेरी गुलशन बानो को तो तू अपनी बना कर साथ ले जा सकती है. उसकी तो माँ नहीं है, अब तू ही उसकी माँ बन जा और मेरे जिगर के टुकड़ा अपने घर आंगन में जाकर रौंप देना। अगर जीवन में समय और मौका दिया तो जरुर मिलेंगे. अब चलती हूँ ….!’

‘ पर ज़रीना बेगम... मैं हिंदू.. तू…….’

‘ अरे बस भी कर, कहा ना वह तेरी है।  तू जो चाहे उसका कर. अपना नाम दे या नया नामकरण कर, उसे अपने साथ ले जा, या यहां मरने के लिए छोड़ जा, यह तेरी मर्जी है,  मेरी नहीं…’  कहते हुए ज़रीना बानो हिरनी की चाल से घर के बाहर हवा की रफ़्तार से निकली...... !

   और पलक झपकते रह गई सुरजीत कौर अपने ही घर में, सूनी दीवारों के बीच, एक गुदगुदाहट महसूस करते हुए, एक लर्जिश भरा स्पंदन महसूस करते हुए. वह बेऔलाद थी, पर सीने में ममता नहीं थी, यह बात न थी। बस डर था कि जात पात की दीवारें कहीं ऊंच नीच की तराजू में न तोल बैठे। मज़हब की वेदी पर गुलशन बानो के मासूम बचपन को कहीं कोई आंच न आ जाए. माहौल ही ऐसा था कि ....!

     सिख और मुसलमान इक दूजे के कट्टर बैरी हो गए थे. बात-बात पर तलवारे चीखती और दर्द मौन सा होकर सिसकता रहता उन सने हुए खून के धब्बों को देखकर, जो एक ही रंग के थे….. लाल! सभी का खून लाल है तो क्यों किसी के दर्द से खून में उबाल नहीं आता?  क्यों दर्द को दीमक लगी है कि देख कर भी किसी का दिल नहीं पसीजता? क्यों मानवता अपने अर्थों को अनाथों की ओर धकेल रही है.

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     खाट पर लेटी सुजीत जानती थी कि रज़ाई की तह तो सिर्फ तन को ढाँप रही थी, उसका मन तो कल के फसादों के नुकीलली यादों से तार तार हुआ जा रहा था.....!

‘अरी सुरजीत कौर... तू क्यों सोई है! दिन की रोशनी को रात की कालिख समझ बैठी है क्या?  उठ, तेरे आंगन में उजाला अब भी बाकी है. सारी की सारी तारीकियाँ मैंने अपने आंचल में समेट ली हैं!’ कहते हुए उसने दर्द भरे आवाज में गुलशन कौर की ओर निहारते हुए एक आदेश दिया....!

‘ अरे बेटा गुलशन... तीन तसरियों में खाना बांट लेना. तेरी अम्मी सुरजीत भी हमारे साथ खाएगी। आज का दिन मिलन का जश्न है, धरती आसमान से मिल रही है! हाँ...हाँ,  आजा तू भी आजा. सुरजीत तू भी उठ ..!’

     अब गुलशन कौर सोच के दरिया में बहने लगी। वह हैरानी से ज़रीना आपा  के कहे लफ्जों की उधेड़बुन में उलझ गई जिसमें प्यार भी था, दुलार भी,  दर्द भी और दवा भी! सुरजीत कौर से भी न सहा गया न रहा गया, उठकर खाट पर बैठी और भीगी पलकें उठाकर ज़रीना बानो की ओर देखने लगी... गहराई तक उसकी आंखों में झाँकते हुए यह जानने की कोशिश करने लगी थी कि ज़रीना बानो क्या वाकई मिलन का जश्न मनाने की बात कर रही है या उसके बाद की जुदाई का ऐलान कर रही है. धरती अंबर के मिलन की बात वह चाह कर भी समझना नहीं चाहती थी। क्योंकि...!

     ज़रीना बानो की पोती गुलशन बानो को जब दोनों पति-पत्नी अपने साथ अमृतसर ले आए तो सरदार ने सभी से कहा कि वह उनके भाई की बेटी है, गुलशन कौर। क्योंकि सभी जानते थे कि उनकी कोई औलाद नहीं हुई और फिर गुरुद्वारे में नामकरण के ऐलान से उन के सूने से सीने में जैसे शबनम की नमी बरसने लगी. ममता का आंगन फलने-फूलने लगा, गुलशन को सींचते-सींचते उस खुशबूदार सुमन की महक उनके मन में रच-बस गई.

‘ मैं आपको ‘अम्मी’ कह कर पुकारूंगी और उन्हें बाबा कह कर’- यह ‘चाची’ शब्द मुझे अच्छा नहीं भला लगता।'  गुलशन कौर ने ज़िद की। उम्र भी तो ऐसी थी, सात-आठ साल की।

‘नहीं तुम मुझे चाची ही कहोगी। तुम्हारी आवाज़ में मुझे चाची शब्द ‘अम्मी’ जैसा ही लगता है। सरदार को भले तुम ‘बाबा’ बुलाओ’। सुरजीत ने तर्क देकर अपने ढंग से गुलशन को मना लिया. कारण था... जो दिल में डर बनकर समा गया था. डर यही था.....  !

     कभी न कभी तो हालात बदलेंगे, समय बदलेगा और खून अपना रंग दिखाएगा. अगर ऐसा हुआ तो गुलशन फिर से जरीना बानो के घर का गुलशन बनी, तो वह यक़ीनन खिज़ां के सूखे पतों की तरह चरमरा जाएगी।

          और दिन, महीने साल बीतने लगे मौसमों की तरह. तीन साल के बाद गुलशन के बाबा परलोक पधारे और सुरजीत ने गुलशन की सिसकियों को सीने में संजोया, उसे दुगना प्यार दुलार देकर वह गुरु की शरण में आन बसी। गुरुद्वारे को दूसरा घर बना लिया. दिन रात दिन की सेवा उसकी आराधना बन गई। यह देखकर पंचों ने उसे गुरुद्वारे में ही उसे एक कमरा दे दिया, जहां दोनो मुनासिब महफूज़ियत के साथ जीवन जीने लगीं. जीवन की धूप-छाँव के सायेदार पलों के बीच गुलशन भी अब बचपन से जवानी के चौखट पर आ खड़ी हुई। सोलह साल की होते ही कॉलेज में दाखिला पा ली थी. और एक दिन अचानक....!

     ज़रीना बानो का खत सुरजीत कौर के नाम गुरुद्वारे के पते पर मिला कि वह उससे मिलने कुछ सिखों के साथ उसी गुरुद्वारे में आ रही है. सुरजीत की सेवाओं की महक किसी हद की मोहताज न थी. और अक्सर उसकी चर्चा अमृतसर के उस गुरुद्वारे के साथ जुड़ी रहतीं। ज़रीना बानो का दिल गवाही देता रहा कि यही उसकी गुलशन बानो की माँ है.

     भूतकाल के गलियारों से होती हुई सुरजीत कौर की यादों की परछाइयां उसे वर्तमान में ले आईं. जरीना बानो की आवाज़ एक खुशनुमा खबर की तरह हवा की तरंग बनकर लहरा रही थी.  वह उठकर खाट पर बैठी और ज़रीना बानो की ओर  भीगी पलकों से देखती रही.

ज़रीना बनो ने एक शोख मुस्कान के साथ खाने की ओर इशारा किया तो सुरजीत को जैसे होश आया।

‘ गुलशन बेटी रोटी तो ले आई हो पर दाल भीतर ही भूल आई हो। क्या अपनी आपा को रूखी रोटी परोस दोगी?’  कहते हुए सुरजीत कौर अपनी से उठकर ज़रीना के बगल में बैठ गई।

‘अरी दइया...” कहते हुए गुलशन कौर रसोईघर की तरफ भागी।   

‘सुरजीत अब उठो, निवाले अदला-बदली करो और जश्न मुबारक को अंजाम दो.’  कहते हुए ज़रीना बानो ने पहला निवाला दाल रोटी का गुलशन कौर के मुंह में दिया और दूसरा सुरजीत कौर के मुंह में डाला. सुरजीत कौर और गुलशन ने भी वही रस्म निभाई। इस खुशी के सामने दर्द की लंबी चौड़ी फ़सीलें बौनी हो गईं!

सभी के चहरों पर मधुर मुस्कान टहलने लगी।  

‘अरी सुरजीत एक बात तो बता, जितना  सुंदर नाम गुलशन कौर तूने इसका रखा है उसके सामने तो इसका हुस्न भी फीका पड़ रहा है.’

‘ हां ज़रीना बेगम,  इस पार के गुलशन का रंग उस पार की गुलशन के हुस्न के सामने फीका ही पड़ना है। उस पार के इस गुलशन की खुशबू मेरी सांसो में कुछ यूं बसी है कि अब लगता है कि इसके बिना भी क्या कोई जीवन होगा?’ और वह अपनी कही हुई बात का रंग ज़रीना बानो की आंखों में देखना चाह रही थी।

‘ भाग्यशाली हो सुरजीत कौर, इस की परवरिश में तुमने अपने वाहगुरु की कल कल बहती गुरबाणी भी घोल दी है. हाँ गुलशन कौर सच में तेरे आंगन का फूल है, जो हर मज़हब से परे सच की पनाह में पनप रहा है.’ कहकर ज़रीना आपा ने गुलशन कौर के सर पर स्नेह से हाथ फेरा।

‘ जरीना बानो... मैं…. मैं…. ‘ कहकर सुरजीत रूआंसी हो गई

‘ अरे जश्ने मुबारक के बाद ये आँसू नहीं सुहाते पगली। यही वाहगुरु तुम्हारा मालिक है. मैं अगले हफ्ते ‘सरताज’ की पनाह में चली जाऊंगी। तुम गुलशन कौर के साथ, खुश रहो आबाद रहो।‘ कहकर ज़रीना बानो ने सुरजीत को गले लगा लिया।  

‘दादी जान... आप कुछ दिन और रुक जाएँ हमारे पास...!’ गुलशन कौर के इस कोमल सम्बोधन ने ज़रीना बानो को गदगद कर दिया। उस सम्बोधन में संबंधों की महक थी, और अपनाइयत का अहसास था, जिसे वह जीना चाहती थी, संजोना चाहती थी।

     उससे अब रहा न गया... अपनी खटिया से उठकर गुलशन कौर को गले लगा लिया कुछ ऐसे जैसे कोई लहर किनारा छूने के लिए आमद थी। गुलशन भी अपने दादी आपा के गले में बेल की मानिंद लिपट गई... पता ही न चला कि लहर किनारे से मिल रही है या किनारा लहर से...!     

‘ मैं बहुत खुश हूँ कि विभाजन देशों का हुआ है, दिलों की लकीरें अब भी जुड़ी हुई हैं…!’  कहते हुए सुरजीत कौर ने आगे बढ़ाकर दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया।  

देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), हिन्दी, सिंधी तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। 10 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी काव्य-The Journey, 2 भजन-संग्रह, 8 कहानी संग्रह, 6 हिंदी से सिंधी अनुदित कहानी संग्रह, 8 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंध की अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद.(2016), श्री नरेन्द्र मोदी के काव्य संग्रह ‘आंख ये धन्य है का सिन्धी अनुवाद (2017), चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन-2018),  NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, महाराष्ट्र अकादमी, केरल, सागर व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुसकृत।

सिन्धी से हिंदी अनुदित  80 कहानियों को अब सिन्धी कथा सागर के इस लिंक पर सुनिए.

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