... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं

 

 

आए हम जिस दिन से 

मृत्यु तो तय है ही, 

फिर करें न तैयारी,

जब चले ही जाएंगे.

कोशिश करें ,

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं.

 

छोड़ जाएं अपनी आँखें 

किसी और की रोशनी के लिए,

समय रहते कर लें प्रण 

देहदान अंगदान का भी 

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं.

 

लिवर, चर्म,किडनी 

मिले किसी को जिन्दगी.

हम तो जाएंगे ही 

अच्छा हो किसी के काम आ जाएं

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं .

 

पहली बारिश के बाद बची रही

सौंधी सुगन्ध की तरह ,

मानव का मानव के प्रति 

स्नेह समर्पण के लिए, 

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं.

 

परिजन महसूस करेंगे 

हमारे होने का एहसास, 

जाने के बाद कोई आस्तित्व नहीं 

थोड़ा-थोड़ा दूसरों में बस जाएं, 

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं.

 

सोच लें ,वाकई हम चले जाएंगे.

किसी  की ज्योति में, 

किसी की धड़कन में, 

किसी के जीवन स्पंदन मेें 

हमारा भी अंश होगा.

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं.

 

थोड़ा-सा यहीं रह जाएं.

 

 

मंजुला भूतड़ा, अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ

लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता

manjulabhootra@gmail.com

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