दीपों की माला सजे द्वार सबके

October 26, 2019

 

रोशन करो तुम इस जग को इतना 

कोई दर तिमिर से ढका रह न पाए 

 दीपों की माला सजे द्वार सबके  

 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए 

 

स्नेह से पूरित हो जीवन की बाती 

द्वेषों की आँधी बुझाने न पाए 

सुरीली हो सरगम सुप्रीत इतनी 

वितृष्णा के स्वर इसमें मिलने न पाएं 

 

निर्मल हो यह मन नदिया के जैसे 

सागर सा ख़ारा यह होने न पाए 

सरसे सुधा रस इतना ज़मीं पर 

कि प्यासा कोई फ़िर कहीं रह न जाए 

 

कोठी, ये बँगले, बहुत हैं सजाए 

निर्धन की बस्ती भी जगमग बनाएँ 

तृप्ति से पूरित हो हर जन हमेशा 

विकल मन किसी का कहीं रह न पाए 

 

हो स्वच्छ और समृद्ध भारत हमारा 

धरती यह शोषित होने न पाए 

संचित करें जल की हर बूँद को अब 

कि प्यासा धरा पर कोई रह न जाए 

 

खुशियों की आभा बिखेरें जगत में 

कहीं ग़म की रेखा उभरने न पाए 

दीपों की माला सजे द्वार सबके  

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए 

 

कुसुम वीर

kusumvir@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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