ई-कल्पना जनवरी 2020 कहानी प्रतियोगिता के परिणाम ...

जुलाई 2019 की कहानी कौन्टैस्ट के बाद इस दूसरे कौन्टैस्ट में फिर बहुत सारी बढ़िया कहानियाँ आईं ... दिल्ली विश्वविद्यालय के दो प्रख्यात हस्तियों - डॉ सुकृता पॉल कुमार और डॉ हरीश नवल - और सेतु लिटरैरी पत्रिका के श्री अनुराग शर्मा ने शोर्टलिस्ट कहानियां पढ़ीं और श्रेणीबद्ध कीं. उनके हम बेहद आभारी हैं.

 

25 कहानियाँ शौर्टलिस्ट हुईं थीं. पिछली बार की तरह इस बार भी लेखकों के नाम हटा कर कहानियों को पढ़ा गया. इन 25 कहानियों में 12 कहानियाँ श्रेणीबद्ध की गईं.

 

हमें इस एक बात से बेहद निराशा हुई कि नियमानुसार सभी लेखकों से यह घोषणा लेने के बावजूद कि कहानियाँ पूर्व-प्रकाशित नहीं हैं, 12 में से 5 कहानियां वैब में प्रकाशित पाई गईं. कई लेखक जिनका हम बहुत आदर करते थे, उन्होंने भी इस सहज नियम का उल्लंघन किया. ये बात सच में बहुत निराशाजनक है. इस प्रकार कई अच्छी कहानियों को हमें डिस्क्वालिफाई करना पड़ा.

 

लेकिन हमें यकीन है कि हमारी सम्मानित कहानियां पढ़कर पाठक वो संतुष्ठि महसूस करेंगे जिसकी उम्मीद हम एक अच्छी कहानी से रखते हैं.

अंत में 8 कहानियां सम्मानित की गईं हैं. इनमें दो प्रथम स्थान पर हैं, दो द्वितीय, दो तीसरे और दो चौथे स्थान पर हैं. इन्हें हम दो अंकों में प्रस्तुत करेंगे. इसके अलावा 10 कहानियां औलसो-रैन में हैं, जो बेहतरीन होने के बावजूद, आखिरी दौर तक नहीं पहुंच पाई.

 

21वें अंक में

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अंधेरे की परछाइयां ... मनीष कुमार सिंह (प्रथम पुरस्कृत)

छड़ी - डॉ. दामोदर खड़से (द्वितीय पुरस्कृत)

घर है कहाँ - अर्चना सिंह 'जया' (तीसरी पुरस्कृत)

उसका सच - अलका प्रमोद (सम्मानित)

आशा - अनुराग शर्मा (निर्णायक लघु कथा)

"कविता, शब्दों में चुप्पी ढूँढने का नाम है..." - साक्षात्कार डॉ सुकृता कुमार पॉल (निर्णायक)

 

 

22वें अंक में -

 

अपने अपने कब्रिस्तान - रत्न चंद 'रत्नेश' (प्रथम पुरस्कृत)

निरीह - डॉ. दिनेश पाठक 'शशि' (द्वितीय पुरस्कृत)

लंगड़ू - महेश चंद्र द्विवेदी (तीसरी पुरस्कृत)

रिक्शेवाले - धीरज कुमार श्रीवास्तव (सम्मानित)

विक्रमार्क, बुढ़िया और सराय रोहिल्ला - डॉ हरीश नवल (निर्णायक कहानी)

 

 

सभी सम्मानित लेखकों को बधाई!

 

आने वाले दिनों में "बालों-बाल" की श्रेणी में कुछ अलग सी कहानियाँ भी घोषित करेंगे. इन कहानियों से हमारी टीम बहुत प्रभावित हुई, मगर अंतिम राऊंड आने से बाल बाल रह गए में रह गईं ...

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