... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

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ईयरफोन

अपनी पीठ वो जब भी दीवार से टिकाकर खड़ी होती थी, उसके दाएं पैर का घुटना भी मुड़ जाता था, इस तरह वो एक पैर मोड़कर दीवार के सहारे एक पैर पर खड़ी होती थी। उस दिन भी जब आराध्या की पीठ दीवार की ओर गयी, उसका एक पैर खुद ब खुद मुड़कर दीवार की ओर जा ही रहा था कि अचानक वो पीठ दीवार से हटाकर बिल्कुल चैतन्य सी अवस्था में खड़ी हो गयी। शायद वो इस स्थिति में बहुत दिनों बाद आई थी, या फिर पुनर्वसु को देखकर वो ये भी भूल गयी थी कि वो अब साड़ी पहनने लगी है, जो अचानक उसे मुड़ते पैर में फंस गई साड़ी की जकड़न से महसूस हुआ और वो यकायक चैतन्य सी हुई। पुनर्वसु से हुई यह भेंट आराध्या के लिए अप्रत्याशित थी। ऐसा लग रहा था कि बहुत कम समय में बहुत सी बातें बताना चाह रही हो और तय नहीं कर पा रही हो किस बात को पहले बताया जाए।

 

बरहाल व्यवस्थित शॉपिंग करना उसे अभी भी नहीं आया था। उसके कैरी बैग में बेतरतीब तरह से भरी गयी सारी चीजें इस बात को और पुष्ट कर रही थी। पुनर्वसु ने उस कैरी बैग को कैरी करने योग्य बनाने के लिए कहा दिखाइए क्या-क्या लिया आपने? सामानों में सबसे ऊपर  रखे कुछ बाउल हटाने पर कुछ कपड़े दिखे, जिन्हें देखकर पुनर्वसु से कहा ये टॉप तो आपको आएंगे नहीं 'L' साइज़ के हैं आपको तो 'M' लगता है, जरूर आपके बगल कोई दूसरी युवती 'L'  साइज़ की ली होगी तो आपको भी उससे कमतर दिखना पसंद नहीं होगा तो आपने भी वही के लिया होगा। आराध्या कुछ हँसने लगी। फिर कपड़ों के बीच में एक बटर का पैकेट और सबसे नीचे एक आइस ट्रे रखी थी। पुनर्वसु ने समझाया ये बटर अभी पिघल जाएगा और आपके सारे सामान खराब हो जाएंगे। आराध्या ने कहा क्या करें आजकल तो पॉलीथिन बैन हो गयी है, तो ऐसे ही रखना पड़ता है। पुनर्वसु ने बटर को बाउल में रख दिया और आइस ट्रे को बीच में रखकर कैरी बैग को दो भागों में बांट दिया और एक तरफ बाउल दूसरी तरफ कपड़े और अन्य सामान कर दिए। ये देखकर आराध्या ने वॉव आपने कितने अच्छे से बैग सेट कर दिया। पुनर्वसु ने कहा हां ये स्कूल का बैग सेट करते समय सीखा था।

 

मॉल के गलियारे में बनी ग्रेनाइट की उस बेंच से उठकर आरध्या ने कहा आइये टॉप फ्लोर पर चलते हैं वहाँ एक नया फ़ूड प्लाज़ा बना है, जहाँ आपकी साउथ इंडियन डिश भी उपलब्ध हैं. ओह्ह सॉरी आपकी भाषा में दक्षिण भारतीय व्यंजन।

 

फिर दोनों नए रेस्टोरेंट में जाकर बैठ गए। उस सेल्फ सर्विस वाले रेस्टोरेंट में पुनर्वसु ने आराध्या से बोला आप बैठी रहिए हम लेकर आते हैं। आराध्या ने कहा अरे पहले सुन तो लीजिए लाना क्या है? पुनर्वसु जवाब दिया पूछना क्या, पता तो है। आराध्या बोली नहीं, अब हम अंजीर शेक नहीं पीते हैं, मेरे टॉन्सिल्स बढ़ गए हैं, आप वेज सूप ले आइएगा। पुनर्वसु ने कहा जैसा आपका मन, मैं तो अभी भी चाय ही पीता हूँ, मेरे टॉन्सिल्स भी सही हैं। पुनर्वसु सूप और चाय लेकर आया फिर दोनो बातों में मशगूल हो गए।

 

आराध्या की तरह पुर्नवसु से हुई उसकी पहली मुलाकात भी बेहद दिलचस्प थी। जब पुनर्वसु एक असाइंमेंट से जुड़ी शार्ट फ़िल्म बनाने में तल्लीनता के साथ लगा हुआ था और आराध्या एक पेड़ से टिककर ईयर फोन लगाकर अपनी ही धुन में मगन थी। पुनर्वसु की निर्माणाधीन फ़िल्म के फ्रेम में पेड़ तो था लेकिन आराध्या नहीं, इसलिए वो कुछ देर से आराध्या के हटने का इंतजार कर रहा था, एक दो बार दूर से इशारे भी किया, लेकिन आराध्या तो बस अपनी ही दुनिया में खोई थी। तब पुनर्वसु आराध्या के करीब जाकर उसे बोला सुनिए आप कुछ देर के लिए पेड़ से हट जाइए, हम फ़िल्म बना रहे हैं। जब शॉट पूरा हो जाए आप फिर यहीं आ जाइएगा, लेकिन आराध्या ने हटने से साफ मना कर दिया। आराध्या ने कहा मैं तो नहीं हटूंगी आप फ़िल्म बाद में बना लेना। पुनर्वसु ने कहा जी नहीं उतना समय नहीं है हमारे पास पेड़ के दो शॉट हैं एक अभी का और एक शाम का दोनों आज ही शूट करने हैं, तो प्लीज़ समझिए आप। आराध्या ने कहा नहीं मैं तो नहीं हटूंगी। पुनर्वसु ने बोला जी जैसी आपकी मर्जी आप फ्रेम में आजाएंगी, आपको कोई ऐतराज तो नहीं होगा? आराध्या कही नहीं होगा।

 

शूट पूरा होने के बाद पुनर्वसु ने आराध्या से बोला आप फ्रेम में आ गईं हैं, अब अगर शाम वाले शॉट में नहीं रहेंगी तो फ़िल्म में समस्या आ जाएगी, इसलिए क्या आप शाम को भी आ सकती हैं?  आराध्या बोली हाँ बिल्कुल आ सकते हैं, लेकिन फ़िल्म बनने के बाद हमें दिखाना पड़ेगा। पुनर्वसु बोला जी बिल्कुल लेकिन शाम को भी यही कपड़े पहन कर आइएगा नहीं तो स्टोरी की ड्रेस कंटीन्यूटी ब्रेक हो जाएगी। आराध्या बोली ठीक है।

 

शाम को अपने तय समय पर आराध्या आ गई। शूट पूरा हो जाने पर आराध्या ने बोला 'वैसे मैं  बिना स्टोरी पढ़े फ़िल्म साइन नहीं करतीं हूँ, पर आपके लिए कर दी, अब बताइये क्या भुकतान करेंगे इसका ?  पुनर्वसु ने हंसते हुए कहा कि मेरी पूरी फिल्म जन सहभागिता से बन रही है, इसका दूर-दूर तक पैसे से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी बताइए आप क्या भुकतान चाहतीं हैं? आराध्या ने कहा इसमें मेरा नाम लिख दीजिएगा, पुनर्वसु ने कहा जी बिल्कुल। क्या नाम है आपका। तब आराध्या ने बताया कि मेरा नाम आराध्या है। पुनर्वसु ने कहा मतलब आपकी पूजा करनी चाहिए? आराध्या ने कहा क्या मतलब?  पुनर्वसु ने कहा आपके नाम का यही अर्थ है। आराध्या हंसने लगी बोली हां पता है। ये नाम मेरी दादी ने रखा था। पुनर्वसु ने कहा अच्छी बात है। आराध्या बोली कि ये मेरा नम्बर है अपनी फिल्म की प्रोग्रेस रिपोर्ट देते रहिएगा। अब मैं चलती हूँ  स्कूटी पार्किंग में लगाकर नहीं आईं हूँ, ट्रैफिक पुलिस वाले ले गए तो दिक्कत हो जाएगी। यह कहते हुए आराध्या चली गई।

 

उसके बाद से आराध्या और पुनर्वसु का अक्सर मिलना हुआ करता था। आराध्या को उस पेड़ के नीचे समय बिताने में बहुत सुकून का अनुभव होता है। वो पुनर्वसु को मिलने के लिए भी ज्यादातर वहीं बुलाती थी। एक दिन पुनर्वसु जब आराध्या से मिलने उसी पेड़ के नीचे आया तो आराध्या हमेशा की तरह ईयर फोन लगाए किसी धुन में खोई हुई थी। पुनर्वसु ने कहा लाइए हम भी सुने आपके पसंदीदा नग़मे और ईयर फोन का एक फोन अपने कान में लगा लिया, लेकिन उसमें कोई भी आवाज़ नहीं आ रही थी। पुनर्वसु को बड़ा आश्चर्य हुआ यह देखकर, उसने पूछा कि अरे आराध्या जी इसमें तो कुछ भी ध्वनि नहीं है, फिर आप क्या सुनती हैं इतनी तल्लीनता के साथ? आराध्या ने अपने दूसरे कान से ईयर फोन हटाते हुए कहा कि मैं दरअसल किसी को सुनना नहीं चाहती हूँ, इसीलिए मैं अपने कान इस ईयर फोन से बंद करके सिर्फ और सिर्फ खुद को सुनती हूँ। खुद को सुनना बहुत अच्छा होता है, हमें लोगों की बातें सुनना पसंद नहीं हैं। सच बताऊं तो मुझे बहुत अजीब सी नफ़रत है, उन सब चीजों से जो भी अगल-बगल हो रहा है। फिर अचानक आराध्या के भाव बदल गए, और बोली अरे मैं आपको ये सब बोलकर बोर तो नहीं कर रहीं हूँ। पुनर्वसु ने कहा आप रुक क्यों गयीं बोलती रहिए। आराध्या ने कहा आईए कैफे में चलते हैं। कैफे में पुनर्वसु हमेशा की तरह चाय और आराध्या ने अंजीर शेक से वार्तालाप शुरू किया। पुनर्वसु ने आराध्या से अपनी बातें जारी रखने का आग्रह किया। आराध्या ने कहा हाँ मैं बोल रहीं थीं कि मुझे बहुत नफरत है, जो भी लोग हैं, जो भी हो रहा है सबसे, बहुत ज्यादा, बहुत ही ज्यादा। मेरा मन करता है मैं हमेशा अपने कान बंद करके उसी पेड़ के नीचे रहा करूं, सिर्फ खुद को सुनु। मैं क्या चाहती हूँ ये सोचना भी कभी-कभी बहुत अच्छा लगता है।

 

आप जानते हो उस दिन जब आपने मुझसे उस पेड़ के नीचे से हटने को बोला मुझे बहुत गुस्सा आई थी आप पर इसीलिए मैंने मना कर दिया। पुनर्वसु कहा अच्छा जी क्षमा कर दीजिए उस दिन के लिए। आराध्या ने कहा अरे कोई बात नहीं। मैं भी सॉरी बोलती हूँ मैंने जबदस्ती आपके फ्रेम में आकर आपकी फ़िल्म को प्रभावित किया। पुर्नवसु जी उसकी कोई जरूरत नहीं है। मुझे तो आपको थैंक्स बोलना चाहिए, उस वजह से फ़िल्म और भी बेहतर हो गयी। पुनर्वसु कहा अब चलना चाहिए, नहीं तो जिन लोगों से आपको सख़्त नफरत है, आपको परेशान करने लगेंगे। आराध्या हँसने लगी और चली गई।

इस तरह कई बातों और मुलाकातों के सफर में कब समय निकल गया और आराध्या की एजुकेशन पूरी हो गई पता ही नहीं चला।

 

वो आखिरी दिन था जब दोनों ने साथ समय बिताया था। आराध्या कह रही थी कि अब मुझे इस शहर से बाहर जाना होगा । पुनर्वसु ने पूछा कहाँ ? आराध्या बोली उन सब के पास, उन सब चीजों का हिस्सा बनने, उस वातावरण में जिससे हम बहुत दूर जाना चाहते हैं। पुनर्वसु ने कहा मैं भी शहर से जा रहा हूँ, लेकिन ऐसी किसी भी जगह नहीं जहाँ हम जाना नहीं चाहते। फिर चाय और अंजीर शेक के बीच हुए उस शिखर सम्मेलन यह प्रस्ताव पारित हुआ कि दोनों पक्षों के बीच इस सौहार्दपूर्ण रिश्ते को इसी बिंदु पर छोड़कर अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़ा जाए।

 

दोनों एक दूसरे से जुड़ी कई स्मृतियों को समेटे हुए अपने-अपने क्षेत्रों में तल्लीन हो गए। कई सालों बाद आज फिर एक साथ बैठे थे।

 

आराध्या ने पूछा और बताइए आप अभी भी फ़िल्म बनाते हैं। पुनर्वसु ने कहा हाँ कोशिश करते हैं, पर उतना समय नहीं मिल पाता। पुनर्वसु ने पूछा और आप अभी भी ईयर फोन लगाकर खुद को सुनती हैं? आराध्या ने बोला कोशिश करते हैं पर अब नहीं हो पाता। आराध्या ने पूछा आप यहाँ कैसे आप तो बाहर थे ना? पुनर्वसु ने कहा हां कुछ काम से आए हैं कुछ दिनों के लिए। पुनर्वसु ने पूछा और आप भी तो बाहर थीं। आराध्या ने बताया मैं धार्मिक आयोजनों के चलते कुछ महीनों से यहीं पर हूँ अभी और कुछ दिनों रहना है। फिर आराध्या ने पूछा आप कब तक हैं यहां पर? पुनर्वसु ने कहा हम नहीं बताएंगे। आराध्या हँसने लगी। कोई बात नहीं जैसा आपका मन। ध्यान रखा कीजिए अपना।

 

बातों-बातों में दोपहर से शाम होने लगी। आराध्या ने पुनर्वसु से कहा आइये आपको ड्रॉप कर देते हैं। कहाँ जाएंगे आप? पुनर्वसु ने कहा नहीं जी धन्यवाद। अभी हम कुछ समय यहीं हैं, आप जा सकती हैं। आराध्या ने कहा पार्किंग तक नहीं छोड़ेंगे हमें? पुनर्वसु ने कहा आइये । पुनर्वसु चलते-चलते उस शॉपिंग मॉल के दूसरे तल में बने एक शॉप में रुक गया और आराध्या से बोला। एक मिनट यहीं खड़ी रहिए आते हैं। और शॉप से एक जल्दी में सादे सफेद कागज से पैक एक गिफ्ट आराध्या को दिया। आराध्या ने पूछा इसमें क्या है? पुनर्वसु ने कहा बाद में जाकर देख लीजिएगा। आराध्या ने कहा जी बिल्कुल, धन्यवाद। पुनर्वसु ने आराध्या को पार्किंग तक छोड़ा और फिर मॉल में चला गया।

 

आराध्या ने अपनी कार स्टार्ट होने कुछ मिनट बाद ही सफेद कागज से लिपटे उस उपहार को खोला तो कुछ देर देखती रही। उसमें एक ईयर फोन था। आराध्या ने अपनी कार का रास्ता बदला फिर बहुत सालों बाद पुराने वाले कैफे में गई और टॉन्सिल बढ़ा होने के बावजूद अकेले बैठकर अंजीर शेक पिया। और फिर उसी पेड़ के नीचे जाकर गिफ्ट में मिले ईयर फोन को कान पर लगाकर खुद को सुनने में मशगूल हो गयी।

 

सक्षम द्विवेदी का परिचय

 

मेरा जन्म इलाहाबाद में हुआ इसलिए हिन्दी जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है. साहित्य में मेरी रुचि शुरू से रही तथा इंटर मे मैने अध्ययन हेतु भाषाओं का ही चयन किया व हिन्दी, इंग्लिश और संस्कृत को विषय के रूप मे चुना. स्नातक व स्नातकोत्तर में जन संचार व पत्रकारिता विषय से करने के कारण लोगों तक अपनी बात को संप्रेषित करने हेतु कहानी, लेख, संस्मरण आदि लिखना प्रारंभ किया. डायसपोरिक सिनेमा मे रिसर्च के बाद इस संदर्भ मे भी लेखन किया. इसी दौरान डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, अमृत प्रभात हिन्दी दैनिक इलाहाबाद मे पत्रकार के रूप में कार्य किया व सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मे एक डिजिटल वालेंटियर के रूप मे 6 माह कार्य किया. 

लेखन में मानवीय भावनाओं और दैनिक जीवन के संघर्षों को दर्शना मेरा पसन्दीदा बिंदु है और मुझे लगता है इसे लोगों के सामने लाना जरूरी भी है. इन बिंदुओं को सहजता के साथ दर्शा पाने की सबसे उपयुक्त विधा मुझे कहानी लगती है, इसलिए कहानी लेखन को तवज्जो देता हूँ. मैने अब तक सात कहानियाँ लिखी हैं जिसमे कहानी 'रुश्दी' ज्ञानपीठ प्रकाशन की साहित्यिक मासिक पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई व कहानी 'समृद्धि की स्कूटी' शब्दांकन में प्रकशित हुई. मैं जीवन व भावों को बेहतर ढंग से निरूपित कर पाऊँ यही मेरा प्रयास है जो की अनवरत जारी है.  

 

 

 

 

 

 

रिसर्च ऑन इंडियन डायस्पोरा,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा,महाराष्ट्र।
20 दिलकुशा न्यू कटरा,इलाहाबाद,उ0प्र0
मो0नं07588107164

saksham_dwivedi@rediffmail.com

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