और संवेदनाएं मर गईं

 

लोकल ट्रेन से उतरने के बाद वह भीड़ से अपने-आप को बचाता हुआ निकलने लगा। भीड़ थी कि खिसकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसे लगा चींटियों की एक लम्बी लाइन चली जा रही है और वह भी उसका हिस्सा है। चींटी की चाल से चलने की कहावत शायद किसी ने ऐसी ही परिस्थिति में गढ़ी होगी।

उसे अपने आगे चलने वाले पर खीज होने लगी। वह चल क्यों नहीं रहा। लगता है, अपनी जगह रुक सा गया है। उसके बगल में चलने वाले भी उसके साथ रेंग रहे थे। साथ चलने वालों में से किसी का हाथ तो किसी का कंधा उसके शरीर से रगड़ता तो वह और भी खीझ उठता। बड़ी मुश्किल से वह उस भीड़ के जंजाल से निकल पाया।

उसके माथे से पसीने की बूंदें चू पड़ीं। जेब से रूमाल निकाल कर पसीना पौंछते हुए उसे लगा कि वह इस माहौल में घुट रहा है। पर, इस सबसे निजात पाने का कोई रास्ता नहीं है उसके पास।

शाम को जब वह ऑफिस से निकला तो लोकल ट्रेन में सफर करने की कल्पना से ही उसका मुंह कड़वा हो आया था। फिर वही भीड़, एक-दूसरे से सट कर खड़े होने को मजबूर लोग। धक्कम-धक्के के साथ दूसरों के पसीने को अपने शरीर और कपड़ों पर झेलने को अभिशप्त लोग। उसने तय किया कि वह अपने उस एक कमरे के छोटे से फ्लैट में जाने से पूर्व कुछ देर मैरीन ड्राइव पर समुद्र के किनारे बैठ कर खुली हवा में सांस लेगा। तब तक ट्रेन की भीड़ भी कुछ कम हो जाएगी। फिर घर में है ही कौन जो उसका इंतजार कर रहा हो। इस भरे हुए शहर का खालीपन उसे अंदर तक कचोटने लगा।

जब वह पहली बार इस महानगर में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने आया था तो उसे लगा था जैसे वह स्वप्नलोक में आ गया है। अपना वह छोटा सा शहर याद करके उसमें हीन-भावना भरने लगी थी। कहां पड़ा था वह उस कस्बेनुमा शहर में या शहरनुमा कस्बे में। उसने सोचा कि इस महानगर में रहने वाले लोग कितने भाग्यवान है। अपने पूर्व जन्म के पुण्यों का फल पा रहे हैं। वह जरूर अपने किन्हीं पापों का फल भोग रहा है जो उस छोटे से शहर में गंदे नाले के कीड़े की तरह पड़ा है। काश, इस नौकरी के लिए उसका चयन हो जाए और वह भी इस जगमगाते शहर का हिस्सा बन जाए।

ईश्वर ने उसकी प्रार्थना कबूल कर ली थी। सच्चे मन से निकली प्रार्थनाएं कितनी असरदार होती हैं, यह उसने पहली बार जाना और समझा था। उसे लगा था उसकी मंजिल मिल गई है, उसकी सारी मुरादें पूरी हो गई हैं और ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं बची है। कंपनी ने  उसे फ्लैट दे दिया था। चार मंजिली उस इमारत की तीसरी मंजिल पर फ्लैट पाकर उसकी खुशी दुगुनी हो गई थी।

शुरू में उसे न लोकल ट्रेन परेशान करती थी न भीड़। वह हमेशा सम्मोहित सा रहता। इस महानगर की सारी दर्शनीय जगहें उसने देख डाली थीं। शाम को समुद्र के किनारे और रात को सड़कों पर भटकना उसे बहुत अच्छा लगता। हर छुट्टी के दिन वह नई-नई जगह देखने निकल पड़ता। किसी रेस्त्रां में खाना खाता और रात गए अपने फ्लैट में आकर सो जाता।

दिन गुजरने के साथ-साथ उसका उत्साह ठंडा पड़ता गया। छुट्टियां उसे काटने को दौड़तीं। समय काटने के लिए उसने घर में खाना बनाना शुरू किया। पर, समय जैसे ठहर सा जाता था।

उसके फ्लोर पर चार फ्लैट थे। उसने सोचा अपने पड़ोसियों से मेलजोल बढ़ाया जाए। शहर घूमने के उत्साह में वह अपने पड़ोसियों से अब तक संपर्क नहीं कर पाया था। उसे स्वयं पर ही शर्म आई, पड़ोसी क्या सोचते होंगे। इतने दिन हो गए और वह उनसे औपचारिक मुलाकात भी नहीं कर पाया था। लेकिन, कभी किसी पड़ोसी ने भी तो उससे परिचय पाने की कोशिश नहीं की थी। उसने कभी किसी पड़ोसी का दरवाजा खुला नहीं देखा था। उसने तय किया कि वह छुट्टी के दिनों मे अपने फ्लैट का दरवाजा खोल कर रखेगा। उसके बाद वह कई बार अपने फ्लैट का दरवाजा खोल कर इस इंतजार में खड़ा रहा था कि कोई पड़ोसी आता-जाता नजर आ जाए या अपने फ्लैट का दरवाजा खोले तो वह उससे बात कर ले। पर दरवाजे मुफलिस के भाग्य जैसे हमेशा बंद ही नजर आए। तब उसने स्वयं ही अपने पड़ोसियों की बेल बजानी शुरू की। हर दरवाजे पर लगभग एकसी ही कहानी दोहराई गई। आई-होल में से कोई उसे देखता। एक अजनबी को खड़ा पाकर चेन लगा दरवाजा खुलता और उससे पूछा जाता – “क्या मांगता है?” वह कहता – “बस यूं ही सोचा आपसे परिचय प्राप्त कर लूं, मैं आपका पड़ोसी हूं।“

“अच्छा-अच्छा, 303 नंबर में आप ही आए हैं। बड़ी अच्छी बात है जी।“ और फिर दरवाजा बंद करते-करते कहते – “कभी आइए।“

जहां बड़े अपने घरों में बंद रहते वहीं बच्चे बिल्डिंग के गार्डन में खेलते रहते। वह सोचता काश वह भी बच्चा होता और उनके साथ खेल-कूद कर अपना खाली समय बिता सकता। कभी-कभी कोई पड़ोसी बिल्डिंग के कंपाउंड में या सीढ़ियां चढ़ते-उतरते टकरा जाता तो चेहरे पर लाई जबरन मुस्कान के साथ बगल से कतरा कर निकल जाता।

ऐसे समय उसे अपना शहर याद आता। वह पड़ोस और वह मोहल्लेदारी जहां सब एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते-पहचानते थे और पूरा मोहल्ला अपना घर लगता था। लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख में ऐसे शामिल होते जैसे वे खुशी और गम उनके ही हों। एक-दूसरे घरों के बीच बस छोटी-छोटी दीवारें। घरों के दरवाजे अकसर खुले ही रहते। घर की औरतें अपने वाले दालान में बैठी अपना काम निपटाती रहतीं और दूसरे घरों में काम करती औरतों से बतियाती भी जातीं। पड़ोसियों से राम-राम शाम-शाम तो होती ही रहती। छुट्टी वाले दिन सभी अपने-अपने घरों से निकल आते और बहुत देर तक इधर-उधर की बातें चलती रहतीं। एक यह महानगर है, जहां किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है। कैसे रहते हैं यहां के लोग। वह एक नि:श्वास लेकर रह जाता। जब भी वह इस संबंध में अपने ऑफिस के साथियों से बात करता तो वे इसे महानगर की दौड़ती-भागती जिंदगी का एक सामान्य हिस्सा बताते और फिर यहां के वाशिंदों की मजबूरियों का जिक्र छिड़ जाता। वह सोचता, ऐसी भी क्या मजबूरी कि आदमी आदमी से कोई ताल्लुक ही न रखे और चारों ओर से कटा दड़बों में बंद संवेदनहीन जिंदगी जीता रहे। नहीं, वह इतना संवेदनहीन कभी नहीं हो सकेगा, चाहे पूरी जिंदगी ही इस महानगर में बिता दे।

उस दिन शनिवार था। वह ऑफिस जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि दरवाजे की घंटी बजी। उसके दरवाजे की घंटी दिन में सिर्फ दो बार बजती थी। एक बार दूध वाला और दूसरी बार अखबार वाला ही घंटी बजाता था। ये दोनों घंटियां बज चुकी थीं। इस तीसरी घंटी पर आश्चर्य करते हुए उसने दरवाजा खोला तो अधेड़ उम्र के एक सरदार जी को खड़े पाया। दरवाजा खोलते ही सरदार जी अंदर आने लगे। उसने उन्हें रोकते हुए पूछा – “कहिए, क्या काम है?” सरदार जी ने कुछ अजीब सी  आंखों से उसे घूरा , फिर ठिठक कर रुकते हुए कहा – “अरे ये तो तीसरी मंजिल है। मैं चौथी पर रहता हूं, ठीक आपके ऊपर वाले फ्लैट में। माफ करें, मैंने गलती से आपके घर की घंटी बजा दी।“ यह कह कर वे मुड़े और सीढ़ियां चढ़ने लगे। उसे लगा, वे ठीक तरह से चल नहीं पा रहे हैं, शायद बहुत कमजोरी की वजह से। उसने भाग कर उन्हें सहारा दिया। वे उसका सहारा लेकर ऊपर चढ़े। उनके फ्लैट की घंटी बजाई तो उनकी पत्नी ने दरवाजा खोला और यह कहते हुए उनके दोनों कंधे पकड़ कर उन्हें थाम लिया कि कुछ दिनों से सरदार जी की तबीयत ठीक नहीं चल रही, मना करने पर भी अकेले दवाखाने चले गए। करीब ही एक पन्द्रह-सोलह साल का लड़का खड़ा था। उन दोनों ने सरदार जी को संभाल लिया और उसे शुक्रिया कह कर दरवाजा बंद कर लिया। वह बंद दरवाजे को कुछ क्षण घूरता रहा और फिर सीढ़ियां उतर कर अपने फ्लैट में आ गया।

शनिवार होने के कारण आधे दिन की छुट्टी थी। ऑफिस से निकल कर वह बहुत देर तक यूं ही सड़कों पर भटकता रहा। शाम को छह बजे जब वह अपनी बिल्डिंग में पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी बिल्डिंग के ठीक नीचे कंपाउंड में पांच-छह सरदार खड़े थे। उनके निकट पहुंचते ही उसने देखा कि वे किसी की अर्थी सजा रहे थे। उत्सुकतावश उसने मरने वाले का चेहरा देखा तो देखता ही रह गया, सुबह उसने जिन सरदार जी को सहारा देकर उनके घर तक पहुंचाया, वही चिरनिंद्रा में लीन पड़े थे।

उसे धक्का सा लगा। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह उन सरदार जी की लाश देख रहा था, बल्कि इसलिए भी कि इतनी बड़ी सोसायटी से ही नहीं, उसकी बिल्डिंग से भी कोई आदमी वहां मौजूद नहीं था। सरदार जी के कुछ निकट संबंधी ही उनकी अंतिम यात्रा का प्रबंध कर रहे थे। उसने संस्कारवश यह तय किया कि वह उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होगा।

लौटने में बहुत देर हो गई थी। शवयात्रा में वह अलग-थलग चलता रहा था। किसी से कोई परिचय नहीं था उसका। अंतिम संस्कार के बाद लोग वहीं से अपने घरों को लौट गए थे। सरदार जी के लड़के को घर पहुंचाने दो लोग ही साथ आए थे। वह कुछ देर बिल्डिंग के गार्डन में बैठा रहा और फिर मरे मन से अपने फ्लैट में जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने लगा। सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते उसने देखा कि पहली मंजिल के एक फ्लैट का दरवाजा खुला था जिसमें जोर-जोर से बजती फिल्मी धुनों पर कई लोग जोड़े बना कर नाच रहे थे। डाइनिंग टेबिल पर रखे बड़े आकार के केक और उस पर सजी मोमबत्तियों से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता कि लोग किसी के जन्मदिन पार्टी की खुशियां मना रहे थे। दूसरी मंजिल के एक फ्लैट का दरवाजा भी इत्तफाक से खुला था। परिवार के लोग अपने मेहमानों के साथ कोई कॉमेडी फिल्म देख रहे थे और रह-रह कर उनके ठहाके गूंज रहे थे। तीसरी मंजिल पर हमेशा की तरह सभी दरवाजे बंद थे। वह अपने फ्लैट में पहुंच कर कटे वृक्ष की तरह पलंग पर पड़ गया। ठीक उसके ऊपर वाले फ्लैट में आज ही मौत हुई थी। उसका मन अजीब-अजीब सा हो रहा था। न उसका खाना बनाने का मन किया न खाने का।

उसने सोने की बहुत कोशिश की, पर आंखों से नींद जैसे उड़ गई थी। उसी बिल्डिंग में एक मौत हुई थी, पर सबकुछ कितना सामान्य बना हुआ था। पड़ोसी नाच-गा रहे थे और ठहाके लगा रहे थे। उसका मन भटकता हुआ फिर अपने शहर पहुंच गया। जब उसके पिताजी का देहांत हुआ था तो पूरे मोहल्ले में शोक छा गया था। सभी पड़ोसी जमा हो गए थे और उसके परिवार वालों को सांत्वना देते रहे थे। पूरे मोहल्ले में सप्ताह भर तक किसी के घर में न रेडियों चला था न टीवी। कई दिनों तक बिना कहे पड़ोसी उनके घर खाना पहुंचा जाते थे। यहां के लोग क्या पत्थर के बने हुए हैं? क्या संवेदनाएं मर गई हैं? वह जितना ही सोचता रहा, उतना ही परेशान होता रहा। पता नहीं रात में कब उसकी आंख लगी होगी। सपने में वह कभी अपने पिताजी की तो कभी सरदार जी की शवयात्रा में शामिल होता रहा।

उसे सामान्य होने मे काफी समय लगा। धीरे-धीरे ज़िंदगी अपने ढ़र्रे पर चलने लगी। देखते-देखते दो वर्ष निकल गए। महानगर उसे अपना सा लगने लगा था।

उस दिन ऑफिस से निकलने के बाद उसे बहुत तेज भूख लगने लगी थी। लोकल से अपने स्टेशन पर उतरने के बाद रोजाना की तरह वह स्टेशन से पैदल घर की ओर चल पड़ा। भूख बढ़ने के साथ-साथ उसके कदम और तेज होने लगे थे। वह रास्ते भर सोचता रहा कि कुछ जल्दी से बन जाने वाली चीज बनाएगा      और गरम-गरम खाएगा। कई चीजों के स्वाद उसके मुंह में पानी भरते रहे। एक बार उसने सोचा कि किसी रेस्त्रां में बैठकर कुछ खा-पी ले, पर यह सोच कर रुक गया कि फिर घर जाकर समय कैसे कटेगा। समय काटने और बाजार के गरिष्ठ खाने से बचने के लिए ही तो उसने अपने हाथों से घर में खाना बनाना शुरू किया था।

अपने फ्लैट तक पहुंचने के लिए वह तेजी से सीढ़ियां चढ़ने लगा। दूसरी मंजिल तक पहुंचा ही था कि उसके कदम अपने-आप रुक गए। वहां एक फलैट का दरवाजा खुला था। दरवाजे से अंदर का दृश्य साफ नजर आ रहा था। कमरे के बीचोंबीच किसी का मृत शरीर रखा था। उसके सिरहाने दीया जल रहा था। दो आदमी और एक औरत दरवाजे की ओर पीठ किए उसके पास बैठे थे।

 

वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा। इसी फ्लैट के ठीक ऊपर वाला फ्लैट उसका था। उसने देखा दरवाजे की ओर पीठ किए बैठे लोगों में से किसी की भी नजर उस पर नहीं पड़ी थी। वह बिना आवाज किए पंजों के बल सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने फ्लैट में जा पहुंचा।

उसे बड़ा अजीब सा लग रहा था। वह जिस जमीन पर बैठा था ठीक उसके नीचे किसी पड़ोसी की मृत देह पड़ी थी। उसने दिमाग पर बहुत जोर डाला कि शायद उसने आते-जाते कभी उस व्यक्ति को देखा हो, पर उसके जेहन में कोई सूरत नहीं उभरी। वह अनगिनत बार उन सीढ़ियों से चढ़ा-उतरा था, पर शायद ही वह फ्लैट खुला पाया हो। उस फ्लैट में कौन लोग रहते थे, वह यह भी नहीं जानता था। यह सब सोचते-सोचते उसकी भूख फिर से खुलने लगी थी। वह उठा कपड़े बदल कर किचन में जा पहुंचा। उसने खूब असली घी और मेवे डाल कर हलुआ बनाया। गर्म-गर्म हलुआ उसे बहुत अच्छा लगा। पेट भरने के बाद वह मुंह तक चादर ओढ़ कर लेट गया और जल्दी ही नींद के आगोश में समा गया।

इस बार सपने में वह किसी की भी शवयात्रा में शामिल नहीं हुआ। हां, उसे एक आदमकद आईना दिखाई दिया जिसमें से उसका अक्स उससे पूछ रहा था – “यू टू ब्रूटस?”

 

डा रमाकांत शर्मा का परिचय

मेरा जन्म 10 मई 1950 को भरतपुर, राजस्थान में हुआ था. लेकिन, पिताजी की सर्विस के कारण बचपन अलवर में गुजरा. घर में पढ़ने पढ़ाने का महौल था. मेरी दादी को पढ़ने का इतना शौक था कि वे दिन में दो-दो किताबें/पत्रिकाएं खत्म कर देती थीं. इस शौक के कारण उन्हें इतनी कहानियां याद थीं कि वे हर बार हमें नई कहानियां सुनातीं. उन्हीं से मुझे पढ़ने का चस्का लगा. बहुत छोटी उम्र में ही मैंने प्रेमचंद, शरत चंद्र आदि का साहित्य पढ़ डाला था. पिताजी भी सरकारी नौकरी की व्यस्तता में से समय निकाल कर कहानी, कविता, गज़ल, आदि लिखते रहते थे.

ग्यारह वर्ष की उम्र में मैंने पहली कहानी घर का अखबार  लिखी जो उस समय की बच्चों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका पराग  में छपी. इसने मुझे मेरे अंदर के लेखक से परिचय कराया. बहुत समय तक मैं बच्चों के लिए लिखता और छपता रहा. लेकिन, कुछ घटनाओं और बातों ने अंदर तक इस प्रकार छुआ कि मैं बड़ों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों  जैसा कुछ लिखने लगा. पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं और कुछ पुरस्कार भी मिले तो लिखने का उत्साह बना रहा. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का भी पुरस्कार मिला. कहानियां लिखने का यह सिलसिला जारी है. अब तक दो कहानी संग्रह – नया लिहाफा और अचानक कुछ नहीं होता  प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरा संग्रह भीतर दबा सच  प्रकाशनाधीन है. कहानियां लिखने के अलावा व्यंग्य लेख और कविताएं भी लिखता रहता हूं.

हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने मन की बात करता है, अपने अनुभवों, अपने सुख-दु:ख को बांटता है. कहानी इसके लिए सशक्त माध्यम है. रोजमर्रा की कोई भी बात जो दिल को छू जाती है, कहानी बन जाती है. मेरा यह मानना है कि जब तक कोई कहानी आपके दिल को नहीं छूती और मानवीय संवेदनाएं नहीं जगा पाती, उसका आकार लेना निरर्थक हो जाता है. जब कोई मेरी कहानी पढ़कर मुझे सिर्फ यह बताने के लिए फोन करता है या अपना कीमती समय निकाल कर ढ़ूंढ़ता हुआ मिलने चला आता है कि कहानी ने उसे भीतर तक छुआ है तो मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती है. यही बात मुझे और लिखने के लिए प्रेरणा देती है और आगे भी देती रहेगी.

नौकरी के नौ वर्ष जयपुर में और 31 वर्ष मुंबई में निकले. भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय कार्यालय, मुंबई से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद अब मैं पूरी तरह से लेखन के प्रति समर्पित हूं.

डा. रमाकांत शर्मा, 402-श्रीराम निवास, टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी, पेस्तम सागर रोड नं.3, चेम्बूर, मुंबई – 400089

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