उजास और कालिमा के आर पार

डॉ शेखर के चले जाने के बाद भी वह देर तक मन्त्रबिद्ध सी बैठी थी। उनकी गहरी आँखें देर तक उसकी आँखों में ठहरी रहीं। अपने आप पर चकित थी वह। 

"ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि कोई मन पर इस कदर छा जाये कि ..." वो सोच रही थी कि भीतर से आवाज सी आयी थी -

''ऐसा कभी हुआ नहीं? या कि होने नहीं दिया तुमने?"

"हाँ  ऐसा भी कह सकते हैं  कि मैंने कभी ऐसा  होने नहीं दिया कि कोई मेरे मन तक पहुँच सके। तमाम उम्र अपने आप को साधती रही मैं। वरन उस समय उम्र भी तो वही थी जिसमें ... मगर मनोज का दिया वो घाव इतना गहरा था कि अपनी उम्र और देह को पीछे ठेलकर, आगे बहुत बढ़ गयी थी मैं। फिर मेरे कंधों पर अंकुर की  जिम्मेदारयां भी तो थीं। मैं नहीं चाहती थी कि उसे किसी तरह की असुरक्षा का बोध हो। सो जीवन भर अकेले रहने का फैसला लिया था मैनें और उसकी जिम्मेदारियों में डूबी मैं, उसी के लिये जीती चली गयी थी। सच कहूँ तो मनोज के दिये उस घाव के चलते मुझे कभी किसी की जरूरत ही महसूस नहीं हुई थी।  एक नफरत सी  तारी रहती थी मन में, जो कभी कुछ सोचने ही नहीं देती थी। मगर अब?

पढ़ने लिखने को ही अपना जीवन मान कर उसी में डूबी रहने वाली मैं एक अजीब से खालीपन से भर उठी हूँ। इधर के कुछ बरसों में मेरे जीवन में ये खालीपन क्यों उतर आया है? शायद अंकुर के दूर चले जाने से। मगर वो तो एक अरसे से मुझसे दूर ही रहा है। पहले पढ़ाई के चलते, फिर नौकरी के लिये। फिर? ऐसा क्या हुआ कि... शायद उम्र का तकाज़ा है ये। चढ़ती उम्र में जोश, उमंग और जिम्मेदारियों की रौ में अकेलेपन का अहसास ही नहीं होता है, मगर ढलती उम्र? ये तो कदम कदम पर सहारा माँगने लगती है। शायद इसीलिए डॉक्टर शेखर का साथ मुझे अच्छा लगने लगा है और आज  जब उन्होंने अपना प्रस्ताव रखा तो? तब भी तो  मेरे  भीतर से कोई  प्रतिरोध नहीं उभरा था। क्यों? और क्यों मुझे लग रहा है कि उनका प्रस्ताव  गलत  नहीं था।"

सोचते हुए उसकी आँखों में  एक बार  फिर डॉ शेखर की छवि  उभर आयी थी।

"तो क्या मुझे डॉक्टर शेखर से प्रेम  हो गया है? या ये मेरा अकेलापन  है जिसे अब  किसी साथी की दरकार है। नहीं प्रेम जैसी कोई बात नहीं है। शायद ये मेरा अकेलापन ही है कि डॉक्टर शेखर का साथ मुझे भाने लगा है और इसमें कुछ गलत भी कहाँ  है? जीवन के इस  पड़ाव पर किसी के साथ की जरूरत तो होती ही है और कुछ अधिक ही होती है। जब देह साथ छोड़ने लगती है, तो मन भी तो कमजोर हो जाता है। क्या इसीलिये  मैं ... हाँ यही सच है, इन दिनों  नितांत  अकेली रह गयी हूँ  मैं। शायद इसीलिये? और अगर यह प्रेम ही है, तो भी क्या हुआ? प्रेम कोई गुनाह तो नहीं।  मेरे इस अकेले सफर  में अगर  डॉक्टर शेखर  मेरे हमसफ़र  बन जाते हैं तो इसमें बुराई ही क्या है?"

वे अपनी इन्ही सोचों में इस कदर  घिरी हुई थी कि उन्हें समय का भी भान नहीं रहा।  जब  घड़ी ने ग्यारह  बजाये तब  उनकी  तन्द्रा टूटी थी । 

 "ओह!  कॉलेज जाने का समय हो गया और मुझे पता ही नहीं चला। आज तो जरूर देर हो जायेगी।" सोचते हुये  वह उठी, तो डॉ शेखर का दिया पैकेट नीचे गिर पड़ा था। उन्होंने उसे उठाया।  जिज्ञासा  सी हुई कि देखें भला क्या है इसमें और जब उसे खोला, तो पल भर को उनकी नजरें कठुआ सी गयीं थीं। यह क्या? यह तो ... और  उसे  देखते ही उनके अतीत के कपाट भड़भड़ा उठे  थे।  ये  वही  रंग था जिसे उन्होंने अपने  जीवन से निष्काशित  रखा था। यही  रंग तो  था जिसने उनके जीवन के सारे रंग छीन लिये थे और आज ... सोचते हुये वो लाल पाड़ वाली पीली साड़ी उनकी आँखों उतर आयी  थी और उसके साथ ही उतर आया था वो  दिन जिसकी  याद उनके कलेजे में नश्तर चुभोती है। कितनी कोशिशें  कीं  कि उस दिन को  भूल जाऊँ, मगर कहाँ भूल पाती हूँ  उसे। गाहे बगाहे  वो मेरे  सामने आ  ही  जाता है। और आज तो ... "

सोचते हुये  मनोज के कहे  वे  शब्द उनके  कानों में चुभ  उठे  थे? कितना मुश्किल है उन शब्दों  भूलना। कितने  मारक थे उसके वो शब्द कि ... यूँ तो शादी के कुछ दिन बाद ही वो अपने शब्दबाणों से मुझे बींधने  लगा  था। मुझे  तकलीफ देकर ही आनंद मिलता था उसे। तभी तो ... कई बार तो वो  बिना कुछ बोले अपनी नजरों से ही  इतना कुछ कह देता था कि मन छलनी हो उठता। शायद  शक उसका  स्थायी भाव ही हो गया था।

"कितना त्रासद  होता ये शक है, इसे भला मुझसे  बेहतर कौन जान सकता है।  शक का दीमक प्रेम ही नहीं, जीवन को  भी चाट जाता है। ये बात मैं  जानती थी। इसीलिये तो मैंने  उस  दीमक को मारने की भरपूर कोशिश  की थी। पर मेरी  हर कोशिश बेकार चली गयी थी। मैं हार गयी थी। मनोज ने अपने शक के चलते मुझे  न जाने किन किन लोगों का हमबिस्तर मान लिया  था। पुरुष  के लिये  कितना आसान होता है, किसी के भी  साथ स्त्री  की देह को जोड़ देना! इतनी आसानी से कैसे  उसकी देह को किसी और से जोड़ लेता है वो?  क्या देह का जुड़ना  इतना आसान  होता है? क्या स्त्री  की देह इतनी निस्पृह होती है कि वो किसी के भी साथ ... नहीं!  बिलकुल भी  नहीं। स्त्री  की बुनावट ही कुछ ऐसी होती है कि उसके लिये मन से परे कुछ होता ही नहीं। मगर  पुरुष कहाँ समझ पाता है उसे। उसकी नजर में तो वह  देह ही होती है। सिर्फ देह। वो तो बिरले ही होते हैं जो औरत  के मन तक पहुँच पाते हैं। मगर मनोज? वो?"

सोचती वो अतीत के पन्ने पलटने लगी थी--------

शादी के बाद कुछ समय तक  तो सब ही ठीक रहा, मगर फिर सारी हकीकत सामने आ गयी थी और  वो समझ गयी थी कि मनोज उन  बिरले पुरुषों में नहीं था ,जो स्त्री को देह से नहीं उसके मन को चीन्हते हैं। मनोज का असली रूप देखकर उसे एक  झटका  सा लगा था। उसका तो प्रेम विवाह था, सो उसे विश्वास था कि वो उसे पूरी तरह से समझता है। मगर उसका वह  विश्वास तब दरक गया  था जब शक के पहले दीमक ने उनके मर्म स्थल को लहूलुहान कर दिया था। बहुत आहत हुई थी वह। मगर  फिर भी उसे समझाने की कोशिश की थी। उसके अविश्वास को भरपूर विश्वास  दिलाया था उसने। उसे लगा भी था उसने उस दीमक को मार दिया है, मगर उसके शक का दीमक जब तब उभर ही आता था। बहुत तकलीफ होती थी उसे, मगर तब तक अंकुर का जन्म हो चुका था। सो साथ तो निभाना ही था और पत्नी धर्म भी। शक की सेज पर पत्नी धर्म निभाना कितना कष्टकर  होता है। फिर भी वह अपना पत्नी धर्म निभाने की कोशिश  कर रही थी ताकि शक की कोई गुंजाईश ही न बचे। इसीलिये तो उसने अपने आपको एक  दायरे में समेट लिया था। उस दायरे में किसी और का प्रवेश तक वर्जित कर लिया था। वह भरपूर कोशिशें करती कि ऐसी कोई नौबत ही न आये कि  ... मगर फिर भी आये दिन कुछ न कुछ  घट ही जाता था और वो उसे  लहूलुहान कर देता। कई बार उसे लगता कि ये आदमी तो साथ निभाने लायक ही नहीं है; मगर  फिर भी अंकुर  के लिये उसका साथ निभाती जा रही थी। मगर उस दिन? उस दिन तो वो अपनी सारी हदें ही पार कर गया था।"

सोचते हुये उसकी आँखों में वो दिन  उतर आया था ...

उस दिन महालक्ष्मी की पूजा थी। मनोज ने अपने दोस्त ओम को भी  बुला लिया था। मनोज के  बचपन  का दोस्त था वह। बचपन का संग साथ था; सो बचपन सी निश्छल और  बिंदास थी उसकी दोस्ती; तभी तो उसे  देखते ही बेसाख्ता बोल उठा था  "वाह यार मान गये तेरी किस्मत को। भाभी तो सचमुच हूर ..."

मगर कहते -कहते रुक गया था वह। शायद  मनोज के सख्त होते चेहरे पर उसकी नजरें  चली गई थीं और वह  समझ गया था कि उसे ये बातें अच्छी नहीं लगीं। मगर उसे आश्चर्य हुआ था, मनोज के इस रूप पर। उनके बीच तो ये सब चलता ही रहता था। अपना सब कुछ साझा करते रहे थे वे। फिर उसने ऐसा तो कुछ भी नहीं कहा था कि ... इसीलिये वह  जानना चाहता था उस कारण को  जिसके चलते मनोज ... वह पूछना चाहता था  मनोज से, मगर उसने तो जैसे  ख़ामोशी ही ओढ़ ली थी।  एक उपेक्षा भरी ख़ामोशी जिसे वह चाह कर भी बेध नहीं पाया था। फिर तो खाने की महज औपचारिकता ही निभायी थी उसने और  जल्दी ही लौट गया था। और उसके जाते ही -

"तुम अपनी आदतों से बाज नहीं आ सकती क्या?" मनोज ने कहा तो वे चकित हो कर  उसे देखने लगी थीं। 

 "अब ऐसे क्या देख रही हो जैसे तुम्हें कुछ मालूम ही नहीं है? मैं जानता हूँ सब जान बूझकर करती हो तुम। ऐसी सजी धजी रहती हो मानो  फ़ैशन परेड  में शामिल होना हो । अपनी सुंदरता दिखाने का कोई भी मौका नहीं चूकती न तुम। और ये  पारदर्शी साड़ी? कब तक नयी नवेली बनकर लोगों को रिझाती रहोगी? लोगों को रिझाने का इतना ही शौक है, तो जाओ जाकर किसी कोठे पर बैठ जाओ।" कहते हुये मनोज ने इतने जोरों से उनकी साड़ी खींची थी कि उसका खूबसूरत आँचल तार तार हो उठा था। उसने देखा आधी साड़ी मनोज के हाथों में उलझ गयी  थी और आधी उनकी कमर से खुलकर नीचे लिथड़ने  लगी  थी। उस आकस्मिक आक्रमण के लिये तैयार नहीं थी वो। सो बस आवाक सी उसे देख ही रही थी कि  "साली बज्जात! मैं तो तुझे पहली रात को  ही जान गया था कि तू 'वर्जिन' नहीं है। पता नहीं किस किस के साथ  ... फिर भी मैं तेरे साथ, तेरे जैसी औरत से  ..." कहकर उसने अपने  हाथ में लिपटे आँचल के  टुकड़े को जोर से  उछाला और बाहर निकल गया था। और  'वर्जिन' वो एक शब्द पिघले शीशे सा कानों में खदबदा उठा था। फिर तो आगे के शब्द उसी खदबदाहट में खो गए थे। और वो  कठुवायी सी देखती रह गयी  थी अपने आँचल के उस टुकड़े को जो तार तार होकर दहलीज  के बाहर जा पड़ा  था। फिर उसकी आँखों में उतरा था पहली रात का वो दृश्य, जब एकाएक  मनोज का व्यवहार बदल सा गया था।

'तो ये वज़ह थी, उसके उस व्यवहार की !' 

फिर उसकी आँखों में वो पूरी रात ही उतर आयी थी, जब समर्पण  के उन पलों के तुरंत  बाद अचानक ही उसकी आँखें बिस्तर पर  कुछ तलाशने लगी थीं। उसके पूछने पर उस समय तो  वह टाल गया था, मगर फिर उसके व्यवहार में एक ठंडापन सा उतर आया था। तब अचानक उग आये उस  ठंडेपन  का कारण समझ नहीं पायी थी वो। पर उस दिन उस एक शब्द ने  बीती सभी घटनाओं के तार जोड़ दिये थे। फिर तो  बीती सारी  घटनायें आँखों में घुमड़ उठी  थीं। ....  .....   .    

 

उसे अब याद आने  लगी  थीं उसकी वो हरकतें जो उसे आहत करने के लिये  ही करता था। फिर  तो उसे आहत करने वाले  जुमले उछालना  उसकी  आदत ही हो गयी  थी  और  फैशन परेड! ये शब्द तो जैसे  उसका तकिया कलाम ही  हो गया था।

'ऐसा कौन सा फैशन करती थी मैं? बस बिंदी और सिंदूर ही तो लगाती थी। वो भी ये सोचकर कि  बिंदी और सिंदूर तो हमारी परम्परा हैं। एक सुहागन की पहचान  हैं  ये। फिर बाद में  तो मैंने  उसे  भी छोड़ दिया था। गहरे चटख  रँगों से नाता ही तोड़ लिया था मैंने। उस दिन के बाद तो मैंने लगभग रंगहीन जीवन ही अपना लिया था, पर उसका शक क्या  दूर हो पाया? नहीं। फिर तो  उसके तानों में और भी  नये जुमले शामिल हो गये थे - 

"अच्छा तो अब कन्या कुमारी दिखना चाहती हो। इससे  शिकार करने  में आसानी जो होगी। सिंदूर देख कर शिकार तो बिदक ही जायेगा न।"

जब उसने ये कहा , तो वे कुछ कह ही नहीं पायी थीं। बस आवाक सी कुछ देर उसे देखती रहीं फिर नज़रें हटा लीं कि वो कहीं कोई नया जुमला न उछाल दे और वे फिर   ...

"और उस घटना वाले  दिन महालक्ष्मी की पूजा थी और पूजा में तो पीला या लाल रंग ही शुभ माना जाता है।  इसीलिये मैंने ... मुझे कहाँ मालूम था कि कोई आने वाला  है। मगर मनोज ... जिसके दिमाग में गलीज़ ही गलीज़ भरा हो, उसका तो कुछ हो ही नहीं सकता। तब तक मैंने केवल सुना ही  था  कि  शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है। मगर अपने जीवन में  इसे प्रत्यक्ष देख  रही थीं मैं। फिर भी मैं  उसका साथ निभाती चली जा  रही थी, शायद आगे भी निभाती रहती। मगर उस दिन उसके उस एक शब्द ने मेरा सहेजा सारा धैर्य  बिखेर दिया था! छी! इतनी गजालत?  इस सदी में भी ऐसी सोच! आज जब लड़कियाँ तरह तरह के  शारीरिक श्रम करती हैं। लम्बी कूद, ऊँची कूद जैसे  खेलों में हिस्सा लेती हैं, तब भी  सतीत्व परीक्षण के लिये वही पुरातन मानदंड! मैं भी तो खेल से जुडी हुई थी।  नेशनल खिलाडी थी  मैं।  लड़कों जैसे  ही शारीरिक क्रियाकलापों में भाग लेती थी। सो वो नाजुक सी झिल्ली कब फट गयी होगी मुझे  तो पता ही नहीं चला था। मैं  एक अच्छी खिलाडी रही हूँ। मेरे  खाते में कई मेडल और अवार्ड शामिल रहे हैं। ये बात वो भी जानता था। तो क्या वो ये नहीं जानता था कि तथाकथित कौमार्य की प्रतीक वो झल्ली इस कारण भी ... मगर  उसने उसे ही मेरे  वजूद की  कत्लगाह बना दिया? उसे लगा था  कि औरों की तरह मैं भी  लोक लाज के डर से चुप रह जाऊँगी। मिन्नते करूंगी। अपनी सफाई पेश करुँगी। कर सकती थी मैं। मेरे  पास तो पुख़्ता आधार थे। मैं उसे  जवाब दे सकती थी। बाधा दौड़,ऊँची कूद की तो चैम्पियन रही थी मैं। बड़ी आसानी से उसकी उस पुरुषवादी  सोच को ग़लत सिद्ध कर सकती थी मैं। पर  क्यों सिद्ध करती? क्यों स्पष्टीकरण देती  उसे? क्यों बताती  कि जिसे वो मेरी  चरित्रहीनता का आधार  बना रहा है वो  बिलकुल निराधार है। और फिर पहले भी तो मैंने  कोई  कम कोशिशें नहीं की थीं। पर उसका शक दूर हुआ? नहीं न। उल्टा  उसका शक और बढ़ता ही चला गया था।'

सोचती हुई उसकी आँखों में कुछ वाकिये और उभरे थे, जिस पर पहले उनका ध्यान ही नहीं गया था। सच तो ये है कि जब मन में कोई बात उठती है, तो कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है। सो उनकी सोच का सिलसिला अब और लम्बा हो चला था -

'पहले तो मुझे लगा था कि शादी बाद  मनोज बदला  है। शादी से पहले तो वो ऐसा नहीं था। तब तो  मेरे पहनावे और सलीके का कितना कायल था वो और  शादी के बाद उसे मेरी कोई बात अच्छी ही नहीं लगती।  जिस सौंदर्य का वो दीवाना था, वही सौंदर्य अब उसका दुश्मन बन बैठा है। मगर मैं गलत थी।  शादी के पहले भी तो कई ऐसी बातें हुई  थीं, जो उसकी सोच को उजागर करती थीं। मगर तब मैं प्यार की खुमारी में थी। सो कुछ समझ नहीं पायी थी। वरना  एक बार जब हम फिल्म देखने गये थे और  एक लड़के ने मुझे जान बूझकर धक्का मारा था, तब भी तो मनोज ने मुझे बनने ठनने का ताना दिया था। बस फर्क ये था कि तब वो ताना हँस कर दिया गया था।'

फिर तो  उसे  ऐसी कई घटनायें  याद आयीं जब वो इतना पजेसिव हो उठा  था कि उसे उनका  किसी और से बात करना भी गवारा नहीं हुआ  था। मगर  प्यार अपने सिवा कुछ देखने ही कहाँ देता है। सो  तब उन्हें लगता कि वे कितनी खुशनसीब हैं कि उन्हें मनोज जैसा इस कदर प्यार करने वाला मिला कि वो उसे ... मगर शादी के बाद ही  उसे पता चल गया  था  कि जिसे वो प्रेम का अतिरेक समझ रही थी, वो उसका प्रेम नहीं, शक था।  फिर तो मनोज के इस शक्की स्वभाव ने उसका जीना ही दूभर कर दिया था। बाद में उसके शक की तो कोई सीमा ही नहीं रह गयी  थी। अंतरंग क्षणों में भी घूम फिर कर वो वहीं जा पहुँचता -

'तुम इतनी सुंदर हो, तो तुम्हारे  बहुत से आशिक रहे होंगे। मुझसे पहले  कोई  तो तुम्हें अच्छा लगा होगा। फिर तुम तो गाँव से हो। वहाँ तो चोरी छुपे सब कुछ होता है। मैंने तो सुना है खेतोँ में सारी हदें पार ही हो जातीं हैं।'

सोचते हुये अब उसकी सोच बीते हुये हर एक पल को खंगालने  लगी  थी -

 'मनोज की सरकारी नौकरी थी. सो एक ही जगह जम कर रहना कभी हुआ ही नहीं। हर तीसरे साल ट्रांसफर। अलग अलग शहर ,अलग अलग लोग. ऐसा कभी हुआ ही नहीं किसी से रिश्ता बन पाता। मगर फिर भी हम जहाँ भी गये  मनोज ने मेरे आशिक ढूंढ़  निकाले  थे। दूध वाले, सब्जी वाले, किस  किसके साथ नहीं जोड़ा  मुझे  और एक बार तो हद ही हो गयी थी, जब अनुज के साथ भी ... अनुज मेरे मायके से था। पड़ोस में रहता था उसका परिवार। उसे  राखी  बांधती थीं मैं , पर उसने उसके साथ भी। नहीं !  अब और नहीं सोचकर मैंने मनोज का घर छोड़ने का फैसला कर लिया था।  मगर  माँ ने समझाया था मुझे कि ऐसी हालत में ये फैसला सही नहीं होगा। होने वाले बच्चे को माँ और बाप दोनों की जरूरत होगी। उन्होंने मनोज को भी समझाया था, वो मान भी गया था और उसने वादा भी किया था कि अब वो ऐसा नहीं करेगा। कुछ दिन तक सब ठीक भी रहा औरअंकुर  के जन्म के बाद तो मुझे भी  लगा था कि सब ठीक हो गया। मगर कुत्ते की पूँछ? सो फिर वही सब शुरू हो गया था और इस कदर कि मेरा  दम ही घुटने लगा था। मगर अपने  बच्चे के लिये मैं सब कुछ चुपचाप  सहती चली जा रही थीं। पर कब तक चुप रहती? सो प्रतिरोध करने लगी थी मैं।  मगर मेरे  प्रतिरोध का उस पर उल्टा ही असर हुआ और वो और उग्र हो उठा। उग्र होकर वो मन के साथ साथ मेरी  देह को भी छलनी करने  लगा था।  जिस अंकुर के लिये मैं ये सब सहती आ रही थी वही अंकुर अब सहमा सहमा सा रहने लगा था। हमारी लड़ाई उसमें  असुरक्षा भर रही थी। अपने  बच्चे की खातिर मैंने फिर समझौता सा कर लिया था। फिर तो  मैं फिर चुप ही  रहने लगी थीं? भरसक कोशिश करती  कि ऐसी कोई नौबत ही न आये,  इसीलिये  किसी के आने पर बाहर ही नहीं आती थी, मगर मनोज? उसके पास तो मुझे  ताड़ना देने के लिये  बहानों की कोई कमी ही नहीं थी । कहता -

"अच्छा! तो तुम लोगों को ये दिखाना चाहती हो कि मैं तुम पर इतना जुल्म करता हूँ कि तुम्हें किसी से मिलने तक नहीं देता? तुम्हारे कुकर्म तो कोई जानता है नहीं न। सो लोग तो मुझे ही इल्जाम देंगे।"

'मगर मैं  चुपचाप सुनती और सहती रही। बीतते समय के साथ तो वो  स्याही ही हो उठा था। काँटे ही काँटे उग आये थे उसकी जुबान में । फिर तो मेरे  साथ अंकुर भी लहूलुहान होने लगा था। तब भी मैंने  कई बार सोचा कि इससे तो अच्छा है कि हम   अलग ही हो जायें। पर माँ नहीं चाहती थीं कि मेरा  परिवार टूटे और  चाहती तो मैं भी नहीं थीं।  मुझे भी ये डर तो था ही कि लोग क्या कहेंगे। अपनी मध्यवर्गी सोच में जकड़ी हुई थी मैं। तब जमाना भी तो  ऐसा नहीं था। सो सहना ही मेरी  नियति  थी। मगर भीतर ही भीतर टूट रही थी मैं  ... कहने को तो जी रही थीं, पर कोई उमंग, कोई उल्लास नहीं बचा था मुझमें? और इसी बात का फायदा उठाने लगा था मनोज। उसकी अय्याशियाँ और उसकी फिजूल खर्ची भी बढ़ती चली गयी थीं और फिर उसने बच्चे की जिम्मेदारी से भी मुँह मोड़ लिया था। इसी बीच गबन के एक केस में फंसकर वो  निलंबित  भी हो गया। मैंने  तब भी कुछ नहीं कहा और चुपचाप उसकी सारी जिम्मेदारी उठा ली थी। ट्यूशन करके घर चलाने की कोशिश की। फिर भी  चौबीसो घण्टे की  किट किट और लांक्षना  ही हाथ आयी थी मगर तमाम लांछनों के बाद भी  मैं सब सहती  रही कि अंकुर उसे माँ के साथ साथ पिता की भी जरूरत है। पर  उस दिन भी अपनी तमाम पीड़ा को भूलकर मैंने  ये सोचा था  कि चलो अच्छा है कि  अंकुर यहाँ नहीं है।वरना - मगर मैं  ये सोच ही रही थीं कि  -

 "मम्मा  ये वर्जिन क्या होता है।"

उसके इस वाक्य ने मेरी तंद्रा तोड़ी और मैंने  पलट कर देखा तो मेरे  पीछे अँकुर खड़ा था और उसकी आँखों में कई सवाल लहरा रहे थे।

"बोलो न मम्मा वर्जिन क्या होता है!" कहता हुआ वो मुझे देख रह था। और मैं? काठ। उसे क्या बतातीं मैं कि वर्जिन क्या है? सो कुछ देर तो कठुआयी रही फिर  बुक्का फाड़कर रो पड़ी थी. और उस शब्द का अर्थ न समझते हुये भी उसने जान लिया था कि वो कोई गंदा शब्द ही है। और  -
"रोओ  नहीं मम्मा ! पापा बहुत  गंदे हैं। मैं बड़ा होकर उन्हें खूब मरूंगा।" कहते हुये वो  मुझसे लिपट गया था। फिर उसकी नज़र उस आँचल के फ़टे टुकड़े पर पड़ी -

"पापा ने आपकी साड़ी फाड़ दी न।" कहकर  वो दौड़कर मेरा फटा आँचल उठा लाया था। फिर  ढूँढ़-ढांढ़ कर सुई धागे का डिब्बा भी ले आया और 

"लो मम्मा इसे सिल लो। "
 और मैं उसे देखती रह गयी थीं। कैसे बतातीं उसे  कि मेरा आँचल ही नहीं फटा है,  मन भी तार तार हो गया है। इस फ़टे आँचल को सिलने के लिये तो ये सुई है बेटा, मगर मन? उसे किस सुई से सिलूँ ? और मैं और जोर से रो पड़ी थी।  मुझे जोर जोर से रोता हुआ  देखकर  घबरा गया वो। और -  
"मम्मा रोओ मत, पापा गंदे हैं। हम ऐसे पापा के साथ नहीं रहेंगे। " कहते हुये वो भी रोने लगा था और  उसके आँसू देखकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ था। मेरा रोना उसमें असुरक्षा भरने लगा था। ये देख  मेरा मन जार जार  हो उठा था और मैं अपने आँसू पोछ कर उसे पुचकारने लगी थी।

"नहीं।  रोते नहीं।  तुम तो मेरे बहादुर बेटे हो। देखो अब मम्मा भी नहीं रो रही।" कहते हुये मैने  बरबस अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश की थी, मगर वो अपमान की  पीड़ा थी, सो रह रह कर बहने लगती  थी । और फिर -

"नहीं  अब और नहीं। अब उसे अपनी अस्मिता को और  रौंदने नहीं दूँगी।' सोचकर  उसने फैसला ले लिया था और वो उस  देहरी को  फलाँग गयी  थी  जो उसे हमेशा लहुलुहान किया करती थी । 
 
अब अपने मोर्चे पर अकेली थी वो। एकदम  अकेली। मगर अब नसीहत देने वालों की बाढ़ सी आ गयी थी। तब तक  माँ  इस  दुनिया से जा चुकी थीं, मगर  उनकी जगह भाभियों ने ले ली थी। गाहे बगाहे वे सब अपनी नसीहतों की टोकरी  लेकर आ ही जातीं थीं और उन्हें मनोज के पास भेजने की कोशिशें करतीं। भाई भी उन्हीं का साथ देते। कहने को तो वे उनका भला चाह रहे थे;  मगर हकीकत क्या थी इसे वो जानती थी।  उसकी बातों से वो  आहत ही होती है ये जानकर भी वे बाज नहीं आते थे। मगर  वो अपने फैसले पर अडिग रही और फिर एक दिन  दृढ स्वर में सबके सामने अपना अंतिम फैसला रख दिया था कि अब वो  मनोज को नहीं अपनायेगी। कभी भी नहीं। तब तक  वो जान भी चुकी थी कि कहने को तो ये सब हैं मगर अपने मोर्चे पर वो बिलकुल अकेली है।  उसे अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी है। वो समझ चुकी थी कि  जब मामला औरत के स्वाभिमान का, उसके अस्तित्व का होता है, तब कौई  साथ नहीं  देता। न पिता, न  भाई , न ही और कोई। ये  सब तो  पुरुषसत्ता के ही अंग होते  हैं। और पुरुषसत्ता? वो भला कब चाहती है कि कोई औरत उसकी जकड़न से बाहर  निकले। सो पुरजोर विरोध हुआ था उसका। भाइयों ने  पहले तो समझाने का अभिनय किया, फिर जीवन भर उसका  मुँह न देखने की धमकी देकर किनारा कर लिया था। मगर अब रिश्तेदारों को और अडोसी पड़ोसी तक को उनकी फ़िक्र सताने लगी थी। सच तो ये था कि उस समय उनके उस कस्बे के लोग औरत के प्रति इतने उदार नहीं हुए थे कि उसके परित्यक्त जीवन को सहज ही स्वीकार लेते। सो  बातें बनने लगीं थी और उसके अंकुर को कोई ताना  न मारे इसीलिये वो कस्बा छोड़कर यहाँ , इस महानगर में  चली आयी थी। यहाँ और बहुत सी मुश्किलें थीं, मगर उन कस्बाई सवालों के लिये किसी के पास फुरसत नहीं थी।  

इस महानगर में आकर उसने सब  कुछ नये सिरे से  शुरू किया था। जीविका के लिये ट्यूशन किया। फिर किसी तरह  प्राथमिक स्कूल की नौकरी हासिल की तो आगे और पढ़ाई भी की। प्राइमरी स्कूल से शुरू करके प्रोफसर के इस पद तक पहुँचने में एक लम्बा सफर तय किया था उसने। इसी  बीच मनोज की ओर से डिवोर्स का प्रस्ताव आया, तो उसने तत्काल स्वीकृति दे दी थी। पर उसने अपनी दूसरी शादी नहीं की थी। उसके जीवन में अंकुर ही उनकी पहली प्रथमिकता रहा। उसी के लिये जीती रही थी वो। 

अब अँकुर इंजीनियर है और दो  साल पहले उसने उसकी पसन्द की लड़की से उसका विवाह भी कर दिया था। उस विवाह में भी तो कितनी मुश्किलें आयी थीं। लड़की के पिता राजी ही नहीं हो रहे थे। जाति के साथ साथ उसका परित्यक्ता  होना  भी उस विवाह में बाधक बना रहा  था। बहुत मुश्किल से राजी हुये थे वे। कितने अजीब और दोहरे नियम हैं हमारे समाज के जहाँ पुरुष से तो  कुछ भी नहीं पूछा जाता, मगर स्त्री! उसकी तो पूरी जनम पत्री ही बाँची जाती है । मुझसे भी  तो कितने  सवाल किये गये थे। उन सवालों से  एक बार फिर आहत हुई थी मैं । पर अँकुर की ख़ुशी के लिये सब स्वीकार लिया था मैंने। बच्चों की ख़ुशी का हवाला देकर मैंने ही राजी किया था उन्हें। अब तो अंकुर खुशहाल जीवन जी रहा है। अमेरिका  में  है वो। और मैं?

उसके अमेरिका चले जाने के बाद  बहुत अकेला  सा महसूसने  लगी हूँ मैं। अब तक मेरे  जीवन का केंद्र अँकुर ही तो था। उसके इर्द गिर्द ही घूमती रही  थी मैं ।पर अब? यह सच है कि वो अभी भी बहुत मानता है मुझे। मगर अब वो दूर देश चला गया है, फिर अब तो  उसके जीवन में कोई और भी शामिल हो चुका है। सो अब उसकी अपनी एक अलग ही दुनिया है। मैंने कोशिश की थी कि उसकी उस दुनिया में शामिल हो जाऊँ, इसीलिये  कई बार उसके पास  भी गयी। पर  वहाँ का  जीवन मुझे  रास ही नहीं आया था और फिर वो अंकुर की अपनी दुनिया थी. सो उसकी दुनिया में ज्यादा हस्तक्षेप भी तो ठीक नहीं था। इसीलिये मैंने अपने पुराने शौक को फिर अपना लिया था और अपने आपको पढ़ने लिखने में मशगूल  कर लिया था। अब एक  विशाल लेखकीय जगत मेरे  पास था। फिर भी एक अकेलापन अक्सर कचोटने  लगता था  मुझे। लगता कि कोई तो हो जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ। जो मेरे  सुख में, दुःख में भागीदार बने। ऐसे समय में डॉ.शेखरसे मुलाकात हुई थी। यूँ तो वे अँग्रेजी के प्रोफेसर थे, मगर हिंदी साहित्य की उनकी जानकारी हिंदी वालों से कहीं अधिक थी। सो कॉलेज के खाली समय में हम अक्सर साथ होते थे। एक सी सोच और रुचियाँ  होने के कारण घण्टों बातें होतीं थीं। साहित्य की गहरी समझ थी उनमें। फिर  उन्होंने मेरी  कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। पत्नी की मृत्यु के बाद  उनका जीवन भी मेरी ही तरह के अकेलेपन  से जूझ रहा था। सो उन्हें भी ये साथ अच्छा लगता था और कालेज के बाद भी लाइब्रेरी में हमारा समय बीतने लगा।  शायद ऐसे ही क्षणों में वाणी विहीन भावनायें जन्मी थीं और फिर गहराती  ही चली गयी थीं। डॉ.शेखर औरों से बहुत अलग लगे थे मुझे। औरों की तरह मेरे  बीते दिनों में झाँकने की कोई कोशिश  नहीं की थी उन्होंने। और न ही उनकी नजरों में कभी वो सब नज़र आया था जो औरों की नजरों में पहली ही मुलाकात में  उभर आया करता था।  डॉ.शेखर से मुझे भरपूर सम्मान भी मिला है। वरना लोगों की नजरों में तो मैं  हमेशा  ही एक परित्यक्ता स्त्री ही रही। परित्यक्ता स्त्री, यानि बुफे सिस्टम में रखी हुई मिठाई जिसे कोई भी अपनी प्लेट में रखने का अधिकार रखता है। लोगों की इसी सोच के कारण कितने लोगों से मेरी  दुश्मनी तक हो चुकी थी और मैंने अपना एक छोटा सा घेरा सा बना लिया था  फिर उसी में सिमटती  चली गई थीं। मगर  डॉ शेखर ऐसे नही थे। उनकी  इन्हीं बातों से तो मैं उनकी ओर खिंचती चली गयी थी।' सोचते हुये  आज सुबह की वो  बातें उसके मन में  फिर उभर आयी थीं  -

 
"वसुधा जी आप बहुत अच्छी हैं। क्या अपनी इस अच्छाई में हमें शामिल करना चाहेंगी?" उन्होंने कहा तो  सुनकर संकुचित सी हो उठी थी वो और उसके संकोच को समझकर ही  डॉ.शेखर ने अपनी बात और स्पष्ट की थी - "जिंदगी की  शाम में आप मेरी रौशनी बनेंगीं तो ये मेरा सौभाग्य होगा।" 
और वो? वो कुछ और अधिक ही सकुचा गयी थी। इतनी कि उससे कुछ बोलते ही नहीं बना था। उसे यूँ सकुचाते देख, "अच्छा अब मैं चलता हूँ । मगर आपके जवाब की प्रतीक्षा रहेगी मुझे।" कहकर वे  चले गये थे, मगर अपने पीछे छोड़ गये थे एक प्रश्न जिसने उन्हें अपने घेरे  में घेर लिया था।

'डॉ.शेखर का प्रस्ताव असंगत  तो नहीं। जीवन के इस मोड़ पर आकर एक साथी की जरूरत तो  मुझे भी है। फिर उनसे मेरे विचार, मेरी रुचियाँ भी तो मेल खाती हैं। सो बाकी  जीवन उनके साथ गुजरे, ढलती उम्र  में हम एक दूसरे का सहारा बनें, तो इसमें हर्ज ही क्या है।' वो सोच रही थी कि-


  टन्न टन्न घड़ी ने पाँच बजाये ,तो उनकी तन्द्रा टूटी थी । इन छः घण्टों में उन्होंने अपना पूरा विगत ही जी लिया था। कितना दर्द और कितना अपमान भरा था उसमें। तभी तो वो कभी भी किसी पुरुष पर विश्वास ही नहीं कर पायी थी और जीवन के सफर को अकेले ही तय करने का फैसला कर लिया था। मगर डॉ.शेखर से मिलने के बाद उसकी धारणाएं बदल सी गयी थीं । अब उसे भी लगने लगा था कि यूँ नितांत अकेले जीना मुश्किल होगा ।

'पर लोग क्या कहेंगे कि इस उम्र में?' मन के किसी  कोने से आवाज  आयी। 

"लोगों का क्या। वे तो कहते ही रहते हैं। मुझे उनकी परवाह नहीं है, मगर अंकुर की परवाह है और मुझे विश्वास है वो समझेगा मुझे। फिर  ये कोई युवावस्था  प्रेम नहीं है, जिसमें देह की उद्दामता शामिल होती है। ये तो मन की जरूरत है। भावनात्मक जुड़ाव है ये।'

वो अपनी इन्ही सोचों में  उलझी हुई थी कि - ' ठक ठक' दरवाज़े पर होती दस्तक ने उसका ध्यान खींचा था ।  

उठकर दरवाज़ा खोला तो सामने मोहन खड़ा था। डॉ शेखर का नौकर।

"ये साब ने भेजा है। " कह कर  उसने उसे एक पैकेट दिया और वो चला गया।

लाल  रंग का छोटा सा पैकेट था, जिस पर सुनहरा  रिबन कुछ यूँ  बाँधा गया था कि उसे बहुत आसानी से खोला जा सके। मगर वो उसे थामे हुये  दरवाज़े पर ही  खड़ी रही। फिर बहुत देर बाद वो  भीतर गयी और पलंग पर बैठ गयी; मगर उसने उस पैकेट को खोला नहीं था। उसने  उसे   इस अंदाज़  में थाम रखा था, मानो वह  कोई आकाश कुसुम हो और धरती से स्पर्श होते ही लुप्त हो जायेगा। उसके भीतर क्या है? इसे लेकर उसके  मन में कोई जिज्ञाशा  नहीं थी। मानो जो भीतर था, उसे वो महसूस रही हो। फिर  बहुत देर बाद  धीरे से रिबन खोला , तो मन के तार एकबारगी  झनझना उठे थे। उसकी कविताओं का संकलन था। वही जिसका डॉ.शेखर ने अनुवाद किया था। देर तक वो उसके मुखपृष्ठ को देखती रही। सहलाती रही। मानो वो कोई नन्हा सा  शिशु हो फिर 'ये मेरी कृति है । मेरे अपने  भावों की अनुकृति । डॉ.शेखर ने तो बस एक नया कलेवर ही दिया है इसे।' सोचते हुये उन्होंने धीरे से पन्ने पलटे तो निवेदन की पंक्तियों पर नजरें जा ठहरीं -
"इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं। जो कुछ है  उनका ही है। वही उन्हें लौटा रहा हूँ मैं। मन की समस्त भावनाओं सहित ये अर्पित हैं उन्हें ही, जिनकी ये कृति है।"
'नहीं ये कृति अब केवल मेरी नहीं। इस पर डॉ.शेखर का अधिकार मुझसे अधिक है। माना कि ये मेरी  आत्मा है। पर इसे एक नया रूप और आकार तो उन्होंने ही दिया है।' सोचती वो देर तक उसे देखती रही और पन्ने  पन्ने उलटती रही। तभी अचानक एक काग़ज का टुकड़ा हाथ आया । खत था वो ।चंद पंक्तियों का छोटा  सा खत ..........

वसुधा जी 
अभिलाषा तो ये थी कि यह  कृति अपने हाथों से भेट करता पर आज सुबह की घटना ने मुझसे वो शक्ति ही छीन ली कि मैं आपके सामने आकर ... हो सके तो मुझे क्षमा कर दें ।
और इस पत्र  ने उसे फिर वहीं, उसी बिंदु पर ला खड़ा किया था, जहाँ आज सुबह से खड़ी थी वो

'क्या करूँ मैं? मेरा  मन तो डॉ शेखर के साथ है। और मुझे  एक साथी की जरूरत भी है। और डॉ.शेखर से अच्छा साथी और कौन होगा भला। पर  ये समाज? क्या कहेगा वो  कि इस उम्र में? और मेरा परिवार भी कहाँ मानेगा इसे। मगर इस तथाकथित  समाज और अपने उस  परिवार की तो  कोई परवाह ही नहीं है मुझे, उसने तो मुझे कठिनाई  भरे उस समय में अकेला छोड़ दिया था। पर अंकुर? वो तो मेरे जीवन की धुरी रहा है? उसकी परवाह भी है मुझे। पर वो समझदार है। समझेगा मुझे। मैं आज ही बता दूँगीं उसे। हाँ ! यही ठीक रहेगा। आज रात वीडियो चैट के समय कह दूँगी उससे  कि मैं ...
"क्या कह दोगी? ये कि तुम डॉ.शेखर से ... कह पाओगी?"

उनके मन ने प्रश्न किया तो उन्होंने महसूस किया कि अपने बेटे से, यूँ रूबरू ये कह पाना तो मुमकिन नहीं ही होगा।'

पर कहना तो होगा ही। फिर क्या करूँ? क्या डॉ.शेखर से कहूँ  कि वे ही ... नहीं ये  सही नहीं होगा। क्या वे उससे मेरा हाथ माँगेंगे? नहीं। कहना तो मुझे  ही होगा।'

वे सोच रही थीं कि तभी डॉ.शेखर का पत्र उनके हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ा था और उसी क्षण उन्हें अपनी राह मिल गयी थी।

'हाँ! ये  तरीका ही सही रहेगा। फिर मेल  पहूँचने में  वक्त ही कितना  लगेगा।' सोच कर उसने  मेल पर पत्र टाईप किया। उसका मन तो कर रहा था कि उसे तुरन्त ही मेल कर दें। मगर  'इतना उतावलापन भी ठीक नहीं ' सोचा और दूसरे दिन  कॉलेज जाकर सारा काम निपटाने के बाद  ही  वो  पत्र मेल  किया। 
कॉलेज में भी उसका मन नहीं लग रहा था। सो छुट्टी लेकर लौट आयीं थी। घर आकर भी बहुत अनमनी सी रही। किसी काम में मन ही नहीं लग पा रहा था। बेटे के जवाब का इंतजार था उसे। इस बीच  उसने कई  बार अपना इनबॉक्स खोला। कई  मेल आये थे, मगर वो मेल वहाँ नहीं था जिसका वो इंतजार कर  रही थी।  फिर तो बहुत से  दिन और बीत गये थे। मगर अंकुर की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया था। अब उसके दिन बड़ी मुश्किल से बीत रहे थे। पर  वो अभी  भी अंकुर के मेल का इंतजार कर रही थी।और एक दिन सुबह सुबह डोरबेल बज उठी थी। दरवाज़ा खोल तो सामने अंकुर खड़ा था।

"अरे तुम आ गये!  ऐसे अचानक! बिना बताये? वैसे अच्छा ही हुआ तुम आ गये। मैं तुमसे मिलना ही चाह  रही थी! "  बड़ी सहजता से कहा था उसने। 

मगर अंकुर! उसने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया था। वो ख़मोश ही बना  रहा। कुछ देर तक तो अपलक नेत्रों से उन्हें देखता  रहा। फिर भीतर चला गया था।  और वो चकित सी खड़ी रह गयी थी। ये वही अंकुर था जो पहुँचते ही भूचाल सा   बन जाता था। मम्मा ये हुआ। मम्मा वो हुआ। कहते हुये, जब तक अपनी सारी बातें उनसे कह नहीं लेता था चुप ही नहीं होता था। मगर आज़! आज इस कदर खामोश था कि अपनी मम्मा के बारे में पूछा तक नहीं कि वे  कैसी है?'

वो सोच ही रही थी कि तभी वो बाहर आया और  ........ 

"-ममा ये आपको क्या हो गया है? अपनी नहीं, तो मेरी इज्जत का कुछ ख़याल कीजिये? इस उम्र में भी, ये सब?"

 उसका एक एक शब्द उसके मन में  नस्तर सा लगा  रहा था। मगर ये आखिरी वाक्य तो  बरछी की तरह उसके सीने में ही जा खुभा था और वो छटपटा उठी थी  -
"क्या कहा तुमने ? इस उम्र में भी? यानि तुम कहना चाह रहे हो कि  मैं  ..." कहते हुये तड़फकर  उसने अंकुर की आँखों में देखा।

"आपको  क्या लगता है कि मुझे कुछ भी याद नहीं । पापा ने आपको  यूँ ही तो नहीं छोड़ होगा न?" कहते हुये उसकी आँखों  में रंच मात्र भी शर्म नहीं थी ।
और वो कठुआयी सी  उसे बस देखे  जा  रही थी।

" इसीलिये तो मैं बार बार कह रहा था कि आप मेरे साथ चलें। पर नहीं। आपको  ये गुल जो खिलाना था। सच कहा जाता है कि औरत को कभी भी आज़ाद नहीं छोड़ना चाहिये। पर अब और नहीं। अब आपकी कोई मनमानी नहीं चलेगी। आप मेरे साथ चल रहीं हैं  बस।" कह कर वो फिर भीतर चला गया था। और वो ... 

'मेरे त्याग का ये परिणाम कि आज मेरे बेटे ने  ही मुझ पर ... नहीं ये मेरा बेटा नहीं हो सकता। बेटा होता तो यूँ , इस तरह लाँछन लगाता? ये  मेरा  अंकुर है  ही नहीं। ये तो कोई पुरुष है, जिसकी नज़र में औरत सिर्फ औरत  ही होती है। पर मैंने  तो अपने बेटे को बुलाया था। उस बेटे को जो मेरे हर  सुख दुःख का गवाही था। जो मेरी जरा सी तकलीफ पर छटपटा उठता था। वही आज मुझे अपने बाणों से ऐसे बींध गया जैसे ...  नहीं, आज मेरे  सामने मेरा  बेटा नहीं, मेरे सामने तो  फिर वही  पुरुष आ  खड़ा हुआ है, जिसने बरसों पहले इसी तरह अपने बाणों से बींध दिया था मुझे। वो पुरुष जिसकी नज़रों में मैं  सिर्फ देह थी। देह से अलहदा मेरा अपना कोई वजूद ही नहीं?'

इन्हीं सोचों के बीच न चाहते हुये भी उसे मनोज याद हो आया था। क्या ये उसी  के जिंस  का असर है कि आज  ये  यूँ? और मेरा? मेरा कोई असर नहीं हुआ इस पर? मैंने इसे अपने भीतर नौ महीने  सहेजा, पौधे से पेड़ बनाया, उसका कोई असर नहीं। मुझे तो लगा था कि ये मुझे समझेगा। साथ देगा मेरा। पर इसने तो मुझे  ऐसी लांछना दी कि ... ऐसा कैसे हुआ? मैंने तो इसे एक बेटे के रूप में  पाला था, मगर ये पुरुष! ये  कैसे उग आया इसमें और आज से पहले कहाँ छिपा था ये पुरुषत्व!'

वो अपनी इन्हीं सोचों में डूबी हुई थी कि-

"आप मेरे साथ चलने की तैयारी कर लीजिये। हम कल सुबह ही निकलेंगे। मैं तब तक ब्रोकर से मिल कर आता हूँ।" कहकर वो सपाटे से बाहर निकल गया था।


और वो! कुछ पल तो समझने की कोशिश करती रही। फिर जैसे ही सब  समझ में आया, उसके भीतर कुछ सुलग  उठा था - 'तो इस घर का सौदा करने गया है वो! ऐसे कैसे? मेरे जीवन भर के संचय को ऐसे एक पल में ....और मैं? कहाँ रहूँगी मैं? उसके साथ? जिसने मुझ पर ऐसा लांक्षन ... क्या मैं अपना  स्व खोकर  रह पाऊँगी इसके साथ ... नहीं । '

सोचकर वो उठी और अपने कमरे में चली गयी ।

गहराती रात के साये में लौटकर आया था अंकुर। उसने देखा उनके कमरे की लाईट अब तक जल रही थी। उसने दरवाज़े को ठेला, तो दरवाज़ा खुल गया। वो पलँग पर बैठी नज़र आयी तो - 

"अरे आपने अभी तक कोई तैयारी नहीं की। हमें सुबह ही निकलना है।" कहते हुये वो उसके और करीब  आया, तो पल भर को उसे लगा कि वो उनका ही अंकुर है, पहले वाला  अंकुर और उसने एक बार फिर कोशिश की कि उसे अपनी बात समझा सके। पर वो गलत थी। वो  तो कोई और ही था, जो कुछ  समझना ही नहीं  चाहता था। वो तो जैसे  फैसला करके  ही आया था। और वो फैसला एक पुरुष का फैसला था जिसे  टालना ... सो -

"तो आपने जान बूझकर अभी तक अपनी पैकिंग नहीं की? आखिर क्या चाहती हैं आप? यही कि मैं कहीं मुँह दिखाने के काबिल ही  न रहूँ?"

"अंकुर! मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि जिससे तुम्हें शर्मिंदा होना पड़े। अपने लिये एक साथी की चाह कोई अपराध तो नहीं और अगर है, तो ये अपराध तो तुम्हारे पापा ने बरसों पहले कर लिया था। तब तो तुमने ..." कहते हुये उसने सीधे उसकी आँखों में देखा था । 

"उफ़ ये आपके कुतर्क? मैं आपको कैसे समझाऊँ, ये दुनिया आपके किस्से कहानियों की दुनिया नहीं है। जहाँ औरत खुद मुख्तियार होती है। यहाँ वो सब नहीं चलता जो आप लिखती हैं ।" कहते हुये उसके  स्वर में रुखाई उतर चली थी। 
"कहानियाँ निराधार नहीं होतीं। वे भी तो इसी समाज में जन्म लेती हैं।" कहा उसने पर अंकुर ने उसे अनसुना करते हुए अपना फैसला सुनाया -
"बस! अब इस विषय में कोई बात नहीं होगी। हमें सुबह ही निकलना है। सो आप अपने कपड़े पैक कर लें। बाकी सब मैं बाद में तय करूँगा।"  आदेश देकर वो अपने कमरे में जाने ही लगा था  कि -

 "नहीं अंकुर! मैंने निर्णय लिया है कि मैं कहीं नहीं जाऊँगी।" कहती हुई उसकी आवाज़ में एक दृढ़ता सी उतर आयी थी।

उस दृढ़ता से अंकुर क्षण भर को विचलित भी हुआ था और पलांश को उसे लगा भी  कि वो गलत है, पर तत्काल पुरुषत्व के दम्भ ने उसे अपने में लपेट लिया था और - "ठीक है अगर आपका यही फैसला है तो आज से हमारे बीच सब खत्म। अब कोई रिश्ता नहीं है हमारा।" कह कर वो अपने कमरे में गया और अपना बैग लेकर  तत्काल बाहर निकल  गया मगर जाते जाते उसे ऐसी नजरों से देखा कि वो जड़  सी  खड़ी रह गयी थी।

वो  रोकना चाहती थी उसे, मगर रोक नहीं पायी थी। उसकी वाणी उस तिरस्कार से अवरुद्ध हो गयी थी जो उसकी आँखों में  उभर  आया था।

'ऐसा क्या किया है मैंने? अपने जीवन  के बचे हुये कुछ  साल अपने लिये खर्चना चाहती हूँ मैं। क्या ये  गुनाह है? क्या औरत को अपने जीवन पर भी  कोई अख्तियार नहीं? और पुरुष? उस पर कोई बन्धन नहीं? वह  जैसा चाहे वैसा जीवन जी सकता है मगर औरत! माना कि परिवार के लिये, खासकर बच्चों के लिये उसकी जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही बनती है। पर मैंने तो अपनी सारी जिम्मेदारियां निभा दी। फिर भी? क्या मेरा अपनी जिंदगी पर कोई हक नहीं?'

वो देर तक सोचती रही। इसी उधेड़बुन में  कब रात बीत गयी उसे पता ही नहीं चला।


उधर एयर पोर्ट की लॉबी में में बैठा अँकुर भी कहाँ सो पाया था। सारी रात आंखों ही आँखों में बीत गयी थी। कई बार तो उसे लगा भी था  कि 'मम्मा  गलत नहीं हैं। अपना जीवन जीने का हक उन्हें भी है। पर दूसरे ही क्षण उसका पुरुष उठ खड़ा हुआ था और  'नहीं ! ये गलत है। मैं  समाज  को क्या जवाब दूँगा? खासकर अपनी ससुराल पक्ष को? उन्हें तो मेरे विवाह से ही आपत्ति थी। कितनी मुश्किल से सब सेटिल  हो पाया है, तो अब मम्मा का ये फैसला? वो भी इस उम्र में? उन्हें जरा भी खयाल नहीं कि मुझ पर क्या बीतेगी?' सोचते सोचते पौ फट चली थी और  पूरब के आकाश में उजास उभरने लगी थी मगर उस उजास के बीच एक काली सी रेखा  उभर आयी थी। उस रेखा के उस पार वो थी और इस पार था अंकुर जो अब  पुरुषसत्ता का पैरोकार  था?

 

उर्मिला शुक्ल
 जन्म - 20 - 9 - 19 62

 शिक्षा - एम ए ,पी एच डी ,डी लिट्

लेखन - कहानी , उपन्यास ,कविता , ग़ज़ल ,समीक्षा और यात्रा संस्मरण। छत्तीसगढ़ी और हिंदी  में लेखन। 


प्रकाशन हिंदी  - कहानी संग्रह - 1 अपने अपने मोर्चे पर ,- प्रकाशक- विद्या साहित्य संस्थान इलाहबाद। 2 फूल कुँवर तुम जागती रहना - नमन प्रकाशन 2015  दिल्ली 3 मैं ,फूलमती और हिजड़े नमन प्रकाशन 2015 

साझा कहानी संग्रह -1  बीसवीं सदी की महिला कथाकारों की  कहानियाँ नामक संग्रह नमन प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित दस खंडों में प्रकाशित। नवें भाग में कहानी गोदना के फूल प्रकाशित।

2 कलमकार फाउण्डेशन दिल्ली द्वारा 2015 में अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत  कहानियाँ । इस संग्रह में कहानी -सल्फी का पेड़ नहीं औरत प्रकाशित-प्रकाशक-श्री साहित्य प्रकाशन दिल्ली।

3 हंस -सिर्फ कहानियाँ सिर्फ महिलायें अगस्त 2013 कहानी बँसवा फुलाइल मोरे अँगना प्रकाशित और चर्चित।  

4  -कथा मध्य प्रदेश 4 खंडों में प्रकाशित मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के कथाकारों के संग्रह में 4 भाग में नहीं रहना देश बिराने प्रकाशित। 

कविता संग्रह - इक्कीसवीं सदी के द्वार पर (मुहीम प्रकाशन हापुड़ 2001 ) 

 

 समीक्षा - 1 छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नारी - चेतना से विमर्श तक (वैभव प्रकाशन रायपुर ),2  हिंदी कहानी में छत्तीसगढ़ी संस्कृति  (वैभव प्रकाशन रायपुर )।3  हिंदी कहानी का बदलता स्वरूप (नमन प्रकाशन दिल्ली ),

3 हिंदी कहानियों वस्तुगत परिवर्त न

 

A -21 स्टील सिटी 

अवन्ति विहार

 रायपुर छत्तीसगढ़

9893294248

urmilashukla20@gmail.com

 सम्पादकीय नोट - पाठक की मूल्यवान प्रशंसा का बेहद आभार. जैसा कि हम कह चुके हैं ... "आपके दोशब्द किसी का दिन बदल सकते हैं ..."

लेकिन यदि हो सके तो अपने कमेंट सम्पादक की ईमेल के बजाय रचना के कमेंट बॉक्स में डालें तो हम और भी आभारी होंगे

 

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