जंगल का नया क़ानून

"नानी नानी, मेरी प्यारी नानी, आज सुनाता हूँ मैं तुम्हे कहानी|"

"अरे वाह रे मेरे बच्चे, आज तू मुझे ही कहानी सुनाएगा| अपनी नानी को कहानी सुनाएगा| फिर तो तू इतिहास बनाएगा| यहाँ तो हमेशा से कहानियाँ सुनाने का परमानेंट ठेका नानी-दादी को ही मिला हुआ है| चल फिर शुरू कर|"

"जी मेरी अच्छी नानी, पर आज मैं तुम्हे सुनाऊंगा बिलकुल नयी कहानी| तो तुम सुनने को तैयार हो न मेरी नानी|"

"चल सुना दे बेटा, ज़माना नया है, उल्टा-पुल्टा भी है, नाती-पोता सुनाएँ और नानी-दादी सुनें| चलो सुनाओ, मगर जैसा कि तुमने कहा, कहानी एकदम नयी होनी चाहिए जो मैंने कभी भी न सुनी हो|"

"ऐसा ही होगा नानी, तुम सुनोगी आज एकदम नयी कहानी| पक्की प्रॉमिस|"

नन्हे दीपू ने अपने गले के बीचो-बीच स्थित उभार को अपने अंगूठे और तर्जनी ऊँगली की सहायता से धीरे से दबाते हुए ये पक्की प्रॉमिस की थी|

 

दीपू ने कहानी शुरू की –

"सुनो नानी एक बार की बात है एक बहुत बड़ा सा जंगल था उसमे तरह तरह के जीव-जंतु रहा करते थे| जंगल के एक ओर बड़े-बड़े से अनेकों खेत भी थे जिसमे बहुत से किसान मेहनत से खेती किया करते थे| किसान जंगल और उसके जीवों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते थे| और जंगल के जीव भी किसान और उसके परिवार को नुक्सान नहीं पहुंचाते थे|

"जंगल से बहुत दूर जहां पर खेतों की सीमा समाप्त होती थी, वहां से किसानों के घर शुरू होते थे| इस प्रकार जानवर और इंसान अपनी अपनी हद में रहकर खुश रहा करते थे| हाँ ऐसा अक्सर होता था कि जब किसान खेतों में लगातार काम करता था तो उसका परिवार उसके लिए खेतों पर ही रोटियाँ लेकर आया करता था| किसान वहीँ पर खाता था और अक्सर रोटी के टुकड़े या बची हुई रोटियाँ चिड़िया, कौवा, गिलहरी इत्यादि के लिए छोड़ देता था| कई बार तो वह रोटी के टुकड़ों को हाथों में लेकर चिड़िया-कौवों को पुकारता था और वे आकर उनके और उनके बच्चों के हाथों से रोटियाँ लेकर उड़ जाया करते थे| इस प्रकार किसान और उनके परिवार भी खुश और पशु-पक्षी भी खुश रहा करते थे| कुछ समझी मेरी नानी|"

 

"हाँ मेरे लाल, मेरे दीपू कहानी अच्छी है, आगे सुनाते जाओ|"

"वाह मेरी नानी लो अब आगे की सुनो कहानी| जैसा कि मैंने बताया किसान अक्सर बची रोटियों को छोड़कर चले भी जाते थे यह सोचकर कि कोई भूखा जानवर आकर, उन्हें खाकर, अपनी भूख मिटाएगा|"

"वाह बेटा वाह, आगे सुनाओ|"

"वाह मेरी नानी| लो सुनती जाओ| एक शाम की बात है, किसान का पेट भर चुका था, एक रोटी अभी भी बाकी थी, उसे उसने वहीँ जंगल के किनारे अपने खेत में जानवरों के लिए छोड़ दी| इधर शाम को किसान अपने घर पहुंचा और उधर जंगल से दो जंगली बिल्लियाँ, एक काली और एक सफ़ेद उस रोटी पर एक साथ झपटी, शायद दोनों की नज़र एक दूसरे पर पहले नहीं पड़ी पर रोटी पर दोनों की नज़रें एक साथ पड़ी थी|"

"फिर क्या हुआ|"

"होना क्या था नानी| रोटी छोड़, नूरां-कुश्ती चालू| एक दूसरे पर पंजे से लेकर नोचा-नोची चालू| इस लड़ाई में दोनों थकने लगी थी, पर हार मानना दोनों को मंज़ूर नहीं था, आखिर पापी पेट का सवाल जो था| हार मानने का मतलब भूखा रह जाना भी था| तभी कहीं से अचानक एक बन्दर वहाँ आ पहुंचा| उसने बिल्लियों से पूछा क्या बात है? इस जंगल के पास ये दंगल क्यों हो रहा है?"

"फिर क्या हुआ मेरे राजा बेटे?"

"होना क्या था मेरी प्यारी नानी| बिल्लियों ने सारी घटना विस्तार से बन्दर को बता दी| बन्दर ने कहा – "बेवकूफ बिल्लियों, मेरी मौसियों यूँ लड़ने, कटने, मरने से अच्छा है, रोटी को दोनों बराबर बराबर बाँट लो| दोनों बिल्लियाँ जोर से चिल्लाई, एक तो मुझे इस बिल्ली पर भरोसा नहीं, दूसरे हमें पूरी रोटी चाहिए|"

"बन्दर ने कहा – "मेरी बात मानो पूरी के लिए मत मरो, और रही बात रोटी के बराबर-बराबर बंटवारे की, इसे तो मैं अच्छे से तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँट दूँगा|" "बिल्लियों को ये आइडिया पसंद नहीं आया, मगर थकान के कारण उन्होंने, थोड़ा सुस्ता लेना उचित समझा|"

"फिर क्या हुआ बेटा|"

"बताता हूँ नानी, तनिक साँस तो लेने दो, बच्चा हूँ, नानी नहीं हूँ|"

यह कहते हुए दीपू मुस्कुरा दिया था| नानी भी मुस्कुराई – "ले लो साँस, चाहो तो झपकी भी ले लो और चाहो तो नीद भी ले लो|"

 

"न, न, नानी, कहानी तो मैं तुम्हे, पूरी सुना कर ही दम लूँगा| मेरी यह कहानी अखंड रहेगी| लो सुनो – बन्दर ने जंगल में कहीं से चुराया हुआ एक तराजू छुपा कर रखा था| वह उसे लेकर आया और बोला – "देखो सफ़ेद मौसी और काली मौसी, मेरे पास ये मशीन है - 'मशीने-तराजू' जिससे मैं रोटी को तुम दोनों में बराबर बराबर बाँट सकता हूँ|"

"नानी बोली, वाह दीपू बेटा वाह, भला ये कौन सी नयी कहानी है, यह तो वही पुरानी कहानी शुरू हो गयी, जो मैंने तुम्हे पिछले हफ्ते सुनायी थी, यह कब से नयी कहानी हो गयी, यह तो बहुत पुरानी कहानी है, जो मैंने अपनी दादी से बचपन में सुनी थी, और उन्होंने मुझे बताया था कि इस कहानी को उन्होंने अपनी नानी से सुनी थी| पर मान गयी मैं तुम्हे! अब तक तुमने जो इतनी देर तक मुझे बांधे रखा तो मैं समझी थी कि ज़रूर कोई नयी कहानी सुना रहे हो पर यह तो ........."

 

"क्या नानी, तुम भी बहुत बोलने लगी हो, पूरी कहानी सुने बगैर कह दिया वही पुरानी कहानी है| अरे पहले सुन तो लो पूरी|"

 

"नहीं मुझे अब न सुनना| मेरी सुनायी कहानी, मुझे ही सुना भी रहे हो और नयी बता कर उल्लू भी बना रहे हो|" 

"नहीं-नहीं नानी, मेरी प्यारी नानी, तुम नहीं हो उल्लुओं की रानी, तुम हो मेरी मम्मी की मम्मी, पर अब थोडा चुप हो जाओ, सुन लो मेरी नयी कहानी|"

 

"न मेरे दीपू बेटे अब तो, तू फिर से सुन ले, मुझसे आगे की कहानी|"

"नहीं-नहीं, नानी तुमको ही सुननी होगा मेरी नयी कहानी|"

"नहीं नहीं, बिलकुल नहीं दीपू, अब तू मुझसे आगे की सुन|"

 

"ठीक है मेरी जिद्दी नानी, तुम हो मेरी मम्मी की मम्मी, अपनी धुन की पूरी पक्की, लो अपनी इच्छा पूरी कर लो, अपनी कहानी भी पूरी कर लो| मैं चुप होकर सुनता हूँ अब| थोड़ा सर भी धुनता हूँ अब|"

 

और नानी को मौका मिल गया था सो नानी शुरू हो गयी – "बन्दर ने रोटी उठाई, उसके दो टुकड़े किये, और एक-एक टुकड़े को तराजू के दोनों टुकडो पर रख कर तोला तो एक पलड़ा थोड़ा भारी प्रतीत हुआ| बन्दर बोला, इधर भार कुछ ज्यादा है, थोड़ा सा कम करना होगा यह कहते हुए उसने उस पलड़े पर रखे रोटी के टुकड़े का एक छोटा सा हिस्सा खा लिया और उसे फिर से पलड़े पर रखा| पर यह क्या, अब दूसरा पलड़ा थोड़ा भारी प्रतीत हो रहा था, सो बन्दर ने इस बार उस पलड़े पर रखी रोटी का टुकड़ा उठाया और उसका भार कम करने के लिए उसका एक छोटा सा हिस्सा खा कर पुनः पलड़े पर रखा| मगर फिर से इस बार पहले वाले पलड़े का भार ज्यादा प्रतीत हुआ| उसने फिर से भार बराबर करने के लिए छोटा सा हिस्सा खाया| और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा| अंततः पूरी की पूरी रोटी बन्दर के पेट में जा चुकी थी और बिल्लियाँ एक दूसरे का मुंह देखते हुए अपनी अक्ल को मन ही मन कोस रही थी| बन्दर मुस्कुरा कर कहने लगा| अब तो हो गया न बंटवारा| अब तुम दोनों अपने अपने घर को जाओ| मैं भी अब बहुत थक गया हूँ, यह बंटवारा करते करते| मैं भी अब चलता हूँ|"

 

"आगे क्या हुआ नानी| मेरी प्यारी नानी|"

"हैं अब आगे भला क्या होता| बिल्लियाँ भूखी रह गयी और उनकी अक्ल ठिकाने आ गयी| खेल ख़तम पैसा हज़म|"

 

"बस हो गयी न खत्म, नानी तुम्हारी ये बरसों पुरानी सड़ी-गली हुई कहानी| अब तो तुम सुन लो मुझसे आगे की नयी कहानी|"

 

"हैं, ये क्या कह रहा रह तू? तू क्या मुझे कुछ और सुनाने वाला था?"

"और नहीं तो क्या, पर मेरी मम्मी की माँ, तुम कहाँ थी सुनने वाली, तुम तो हमेशा अपनी ही चलाती रहती हो| बच्चा हूँ न, मेरी भला कोई सुनता है कभी? सभी सुनाते हैं अपनी अपनी|"

 

"न बेटा न, ऐसा मत बोल, चल मुझे माफ़ कर दे| अपनी कहानी पूरी कर ले|"

"न, नानी न, अब मैं नहीं सुनाने वाला| अब जल्दी से सो जा तू, और मुझे भी सोने दे अब|"

 

"न मेरे राजा बेटे, मेरे नन्हे से दीपक, तू सुना मुझे, मैं सुनूंगी तेरी नयी कहानी| अब तुझे मैं न रोकूंगी|"

 

"कहा न मैंने, अब मैं नहीं सुनाने वाला, अब तू सो ही जा, मुझको तंग करना बंद कर दे मेरी प्यारी नानी|"

 

"बेटा फिर तो तू भी जिद्दी ही है, बिल्कुल अपनी माँ की माफ़िक और अपनी माँ की माँ की माफ़िक|"

 

"नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं| मैं अपने पापा पर गया हूँ, ऐसा मेरी माँ भी कहती है| मैं इतना भी जिद्दी नहीं हूँ| लो नानी तुम भी क्या याद करोगी, सुन लो अब आगे की कहानी – बन्दर की बात सुनकर सफ़ेद बिल्ली बोली – "देखो बन्दर चाचा, अब मैं सुस्ता चुकी हूँ| अब मेरी अक्ल वापस आ गयी| मैं काली बिल्ली से लड़कर खुद फैसला कर लूँगी की रोटी किसकी है और किसको मिलनी चाहिए|  हमारे मसले में गैर बिरादरी वालों का आखिर क्या काम? यह सुनकर काली बिल्ली भी बोल पड़ी – हाँ बन्दर चाचा, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, और बिल्लियों के मसले में बन्दर का आना ठीक नहीं जान पड़ता| आप जाओ यहाँ से हम निपट लेंगे|"

 

"बन्दर बोला – "अजी वाह जी वाह, बहुत खूब मेरी मौसियों, अगर तुम लड़ना मरना ही चाहती हो तो फिर ठीक है| मगर मैं इसकी इजाज़त कैसे दे सकता हूँ| मुझे कोई ऐरा-गैरा बन्दर समझ रखा है क्या? मैं इस जंगल का क़ाज़ी हूँ| जहाँ भी न्याय अथवा क़ानून व्यवस्था का प्रश्न खड़ा होगा, वहां उसकी  व्याख्या करने का अधिकार भी मुझे होगा और फैसला करने का अधिकार भी मुझे ही होगा| यह मामला तो मेरे डाइरेक्ट संज्ञान में है| मैं चुपचाप खड़ा कैसे देख सकता हूँ| तुम्हे शायद मालूम नहीं है कि इस नये ज़माने में इस जंगल में नया कानून चलता है| इसमें अनावश्यक हिंसा का कोई स्थान नहीं है| यहाँ एक दूसरे के प्रति अकारण हिंसा की इजाज़त नहीं दी जा सकती| यहाँ एक जानवर दूसरे जानवर पर केवल उसी दशा में हिंसा कर सकता है, जब दूसरा जानवर उसका भोजन हो, और यह भी तभी क़ानून-सम्मत होगा जब हिंसा करने वाला भूखा हो| वैसे यदि यह मान भी लिया जाय कि यहाँ तुम दोनों ही भूखी हो तो भी तुम दोनों एक दूसरे का नैसर्गिक भोजन नहीं हो, इसलिए तुम्हे एक रोटी के लिए तो आपसी हिंसा की इजाज़त कदापि नहीं दी जा सकती| समझ गयी न पूज्यनीय मौसी जी| और यहाँ बिरादरी और गैर बिरादरीवाद बिल्कुल, न फैलाओ तुम, जंगल के नए कानून के हिसाब से यह गैरकानूनी कृत्य है, और दंडनीय भी है|"

 

"वाह बेटा दीपू वाह, क्या कहानी है, उत्सुकता बढ़ आ रही है, आगे सुनाओ|"

 

"वाह नानी अब आया न मज़ा, तो फिर लो अब आगे सुनो - "बन्दर की बात सुनकर बिल्लियों का गुस्सा सातवें आसमान पर था| काली बिल्ली बोली – तो यह बताओ बन्दर चाचा तुम्हे क़ाज़ी किसने बना दिया, कब से बना दिया|" बन्दर बोला – "अरे क़ाज़ी को आखिर इस जंगल में राजा के सिवा और कौन नियुक्त कर सकता है| राजा शेर सिंह ने मुझको क़ाज़ी नियुक्त कर रखा है| यह देखो यह हिज़ हाइनेस द ग्रेट महाराजा ऑफ़ द जंगल – 'शेर सिंह' की दी हुई आधिकारिक मुहर| लो देखो और ठीक से परखो, समझो, और पढ़ लो| देख लो इस पर एक तरफ न्याय के देवता की तस्वीर छपी है, जिसकी दोनों आँख फूटी है तथा दोनों कान बंद हैं और उसके ठीक दूसरी तरफ मेरी तस्वीर के साथ मेरा नाम बन्दर क़ाज़ी भी छपा है| अब अगर ज्यादा चूं-चपड़ की तो समझो खैर नहीं| अभी जोर की आवाज़ निकालकर जंगल पुलिस को बुला लूंगा और तुम दोनों को हिंसा करने के जुर्म में जंगल के नए कानून के मुताबिक़ कम से कम तीन महीने के लिए कारावास में भेज दूँगा|"

 

"बिल्लियाँ सहम गयीं| काटो तो खून नहीं| उन्होंने मुहर को साफ़ साफ़ देख लिया था| बन्दर सच कह रहा था| काली बिल्ली बोली - क़ाज़ी चाचा आप हमें माफ़ करें| हमें जंगल के नए कानून की जानकारी नहीं थी| हम इस बात से भी अनजान थे कि आप जंगल के क़ाज़ी हो| आज हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ पर उससे ज्यादा हर्ष हुआ कि हमारे जंगल ने भी काफी तरक्की कर ली है| हम ज्यादा सभ्य और सुसंस्कृत गएँ हैं| हमारे पास अपनी एक अच्छी न्याय व्यवस्था भी है| अब आप न्याय करें|"

 

अब बोलने की बारी सफ़ेद बिल्ली की थी – " हाँ क़ाज़ी चाचा| आप न्याय करें| आप जो भी फैसला देंगे हमें मंज़ूर होगा|"

 

"आगे क्या हुआ, मेरे दीपू बेटा|"

"तनिक साँस ले लेने दिया करो नानी, लगता है तुम्हे अब जम रही है कहानी, तो लो सुनो – होना क्या था?"  सफ़ेद बिल्ली बोली – "बन्दर चाचा आप क़ाज़ी हो, कानून के जानकार भी हो तो फिर रोटी का हम दोनों में बराबर-बराबर बंटवारा करने पर क्यों तुले हो? अरे हम दोनों के मामलों को समझो, दलीलों को सुनो, और फिर फैसला दो कि इस रोटी पर किसका हक़ है| जिसका भी हक़ बनता हो उसे ही पूरी की पूरी रोटी दे दो| यह बराबर-बराबर बांटने का आइडिया ठीक नहीं लगता, यह तो तुष्टिकरण की नीति मानी जायेगी|"

 

नानी का सिर चकराया –"दीपू यह क्या कहा तूने? दुष्टिकरण की नीति, यह क्या चीज़ है भला|"

"दुष्टिकरण नहीं नानी 'तुष्टिकरण'| तुम नहीं समझोगी नानी| ये माडर्न बातें हैं| दुनिया चाँद पर पहुँच गयी है, मगर अभी भी इस दुनिया में बहुत से लोग चटाई पर रह कर या तो कूद रहे हैं या सो रहे हैं| किसी को कोई खबर नहीं हैं| खैर तुम मेरी नानी हो, जिद्दी हो पर दिमाग वाली हो, मेरी मम्मी भी दिमागवाली है, और पापा भी| किसी दिन मैं तुम्हे विस्तार से समझाउंगा ये 'तुष्टिकरण' क्या होता है| अभी तो तुम चुपचाप कहानी का आनंद लो|" नानी छोटे से दीपू को सुन कर हैरान थी| क्या बच्चा था!

 

नानी बोली – "ठीक है बेटा तू सुना अपनी ये नयी कहानी| मैं अक्सर भूल जाती हूँ की तू इस नए ज़माने का समझदार प्राणी है|"

 

"और नहीं तो क्या? लो नानी अब सुनो आगे –"बन्दर क़ाज़ी का सिर चकराया वह सोचने लगा – "हे भगवान इन बिल्लियों के पास भी इतना दिमाग है| क्या पता, अगर राजा शेर सिंह ने इनकी ये बातें सुन ली होती तो हो सकता था कि मेरी नौकरी पर बन आती| संभव था वे मुझसे मेरी क़ाज़ी वाली मुहर लेकर इस सफ़ेद बिल्ली को दे देते|" वह फ़ौरन कड़कदार आवाज़ में बोल पड़ा – "खामोश अब अगर तुम दोनों ऐसा ही चाहती हो तो ऐसा ही होगा| मैं तुम्हारे मामले की सुनवाई करूंगा और किसी एक के हक में फैसला करूंगा|"

 

सुनवाई शुरू हुई, और फिर चलती ही रही| सारी रात बीत गयी| सुबह हो गयी| सुबह के समय कई और जानवर उधर से गुज़रे और वह भी कारवाई देखने सुनने लगे और धीरे-धीरे वे उसमे शामिल भी होने लगे| कोई काली बिल्ली के पक्ष में खड़ा हो गया और कोई सफ़ेद बिल्ली के पक्ष में| जाने कहाँ से कुछ और जानवर भी आ गए जो खुद को घटना का चश्मदीद गवाह कहने लगे| कोई कह रहा था – "मैंने पास के एक पेड़ की डाल पर बैठ कर घटना देखी|" ऐसा कहने वाले गवाहों में नागनाथ और सांपनाथ सर्वप्रमुख थे| कुछ दूसरे गवाह भी थे जो अपने बिल से घटना देखने का दावा कर रहे थे| कई पक्षी घटना को आसमान से देखने का दावा कर रहे थे| कुछ छोटे-छोटे मेंढक खेतों के बीच बने छोटे-छोटे गड्ढों, जिसमे बारिश का पानी भरा गया था| वहां से घटना देखने का दावा कर रहे थे| एक मगरमच्छ तो गाँव से बहुत दूर बहती नदी से चलकर आ चुका था और क़ाज़ी से मिन्नत कर रहा था कि उसका नाम भी गवाहों की लिस्ट में जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि उसने नदी में स्नान करते हुए उस घटना को साफ़ साफ़ देखा था|

 

"फिर क्या हुआ दीपू बेटे|"

"होना क्या था नानी, सुनवाई चलती रही तो चलती ही रही| दोनों ही बिल्लियों का बुरा हाल था, वह तो भूख से मरी जा रही थी|"

 

नानी बोल पड़ी – "बिल्लियाँ ही क्यों इतनी देर में तो और जानवर भी भूख से तड़पने लगे होंगे?"

 

"नहीं मेरी भोली नानी, मेरी अच्छी और प्यारी नानी, सब जानवर जब तक चाहते, दलीलें सुनते गवाही देते, जब चाहते वहां से घर चले जाते, कुछ खा पी कर वापस भी आज जाते और सुनवाई चलती रहती|"

 

"मगर मेरे भोले दीपू, बन्दर क़ाज़ी भी तो भूख से बेहाल हो चुके होंगे, वह तो नॉन-स्टॉप सुनवाई कर रहे थे|" नानी को लगा था इस बार तो दीपू फंस गया, वह भला क्या जवाब देगा|

 

"न नानी न, वे तो ड्यूटी पर थे, जंगल पुलिस और जंगल के न्याय विभाग को खबर पहुँच चुकी थी, वे उनकी सेवा में हाज़िर हो चुके थे| जंगल की पुलिस न्याय विभाग द्वारा स्वीकृत भत्ते की राशि से बन्दर क़ाज़ी के लिए भोजन पानी ले आती| बन्दर क़ाज़ी खाते-पीते मामला सुनते रहते| लगातार सुन रहे थे या नहीं भी कोई नहीं जानता| पर वह सुन ज़रूर रहे थे यह सब मान रहे थे| सुनवाई हफ़्तों चलती रही|"

 

"फिर तो बिल्लियाँ कुछ दिन के अन्दर ही मर गयीं होंगी|" नानी फिर बोल पड़ी थी|

 

"न नानी न, हर दो दिन के बाद बिल्लियों को नौ घंटे का विश्राम दिया जाता|"

 

"मगर दीपू बन्दर क़ाज़ी तो फ़ालतू में ही फंस गए थे| उन्हें भी तो अब हर दो दिन में केवल नौ घंटे का विश्राम ही मिल पाता होगा|"

 

"अरे नहीं, मेरी भोली नानी, वे क़ाज़ी थे, उनके काज अपने आप होते थे| मामले की गंभीरता और उसकी प्राथमिकता को देखते हुए, उनके साथ न्याय विभाग के दो आला अफसर चम्पू लोमड़, और गप्पू सियार भी लगा दिए गए थे| ये दोनों सारी कारवाई का विवरण दनादन दर्ज किये जा रहे थे| यही नहीं ये सारा दस्तावेज़ और सभी प्रकार के हिसाब-किताब भी देखते थे| बन्दर क़ाज़ी सुनवाई के दौरान ही बीच-बीच में ऊँघ लिया करते थे| यही नहीं उनका जब भी जी चाहता वे वहां से उठकर जंगल चले जाते थे और किसी पेड़ पर विश्राम किया करते थे| वे बंदरिया और बच्चों के साथ पिकनिक भी मना आते थे| उनकी गैर हाजिरी में सुनवाई चम्पू लोमड़, और गप्पू सियार के समक्ष चलती रहती| केवल यही नहीं नानी, चम्पू लोमड़, और गप्पू सियार की ड्यूटी भी हर आठ घंटे में बदल जाती थी, उनके स्थान पर लक्कू लकड़बग्घा और चिंकी लोमड़ी ड्यूटी पर पहुँच जाती थी|

 

नानी बोली – "बेचारी बिल्लियाँ, दो दिन में केवल नौ घंटे विश्राम|"

 

"विश्राम कहाँ नानी| पापी पेट का सवाल जो ठहरा| उसी नौ घटे में भोजन की तलाश या शिकार भी करना था| सोना भी था, सोचना भी था| अक्सर थकान और नींद के कारण उन्हें कोई शिकार ही नहीं मिलता था| ऐसा होने पर वह साहूकार बागड़-बिल्ला के पास पहुँचती थी, उससे भोजन के टुकड़े उधारी में लेती थी|  साहूकार बागड़-बिल्ला भोजन पर भी ब्याज लेता था, वह भी उत्कृष्ट भोजन के रूप में|"

 

"बाप रे बड़ी बवालिया कहानी है यह तो, दीपू अब तू रहने दे| मुझे नहीं सुनना| अब तू भी सो जा|"

 

"माडर्न कहानियाँ बवालिया ही होती हैं नानी, माडर्न ज़माने में इंसान और जानवर दोनों का जीवन क्लिष्ट हो जाता है| व्यवस्था उसे क्लिष्ट बनाती चली जाती है| ऐसी दशा में व्यवस्था दरअसल व्यवस्था नहीं अ-व्यवस्था फैलाना शुरू कर देती है| क्योंकि व्यवस्था अपने लिए जीना शुरू कर देती है|" और अभी तो कहानी कुछ आगे बढ़नी शुरू हुई है और तू कहती है तुझे नहीं सुनना और अब मै सो जाऊं| अगर अब मैं सो गया तो तू नहीं सो पाएगी मेरी भोली नानी, ये अधूरी कहानी तुझे चैन से सोने नही देगी और मैं तुझे बेचैन छोड़कर सो नहीं सकता|"

 

"वाह रे मेरे छोटे से सयाने से नाती, कहाँ से पाया तूने इतना ज्ञान?" "नानी मैं छोटा ज़रूर हूँ, पर ज़माने में ठोकर खाते हुए लोगों को देखता हूँ, उनका दुःख-दर्द टटोलता हूँ| उन्हें अपने मन पर छापता हूँ, फिर उसकी पीड़ा भी झेलता हूँ| पर सयाना हूँ या बेवकूफ कह नहीं सकता| शायद ऐसा नहीं कर पाता तब सयाना अवश्य ही कहलाया जाता|" नानी निरुत्तर थी|

 

दीपू आगे बोला – "नानी सुनो, माडर्न ज़माने की कहानियाँ पुरातन कहानी की तरह, सीधी और सिंपल, आई मीन 'सरल' नहीं होती और न ही इनका अंत अक्सर सुखद ही होता है| माडर्न कहानियाँ राजा, रानी, राजकुमारों, परियों, फूलों, तितलियों, गुड़ियों इत्यादि की कोमल कहानियाँ नहीं होती| यह ऐसी कहानियाँ होती है जिसमे ज़िन्दगी की वास्तविकता मुंह बाए खड़ी होती है| जिसमे कष्ट अधिक तो होते ही है, ये कष्ट अंतहीन भी होते हैं| इन कहानियों की 'हेप्पी एंडिंग" अर्थात सुखद अंत प्रायः नहीं होता|"

 

"मेरे सयाने दीपू, तुम मुझे ये बताओ की आजकल क्या तुम्हारी उम्र के सभी बच्चे तुम्हारी तरह ही कहानी कहते सुनते और सुनाते हैं?" "न नानी न, वे सब तो एक अलग दुनिया में व्यस्त रहते हैं, उनके पास समय कहाँ है, वे तो दिन भर कार्टून की तिलिस्मी दुनिया में जीते हैं, उसी में अपने आँख-दीदे फोड़ते हैं| उससे बचे तो, क्रिकेट या फुटबाल मैच देखते या फिर हैप्पी-बर्थडे इत्यादि मनाने में  व्यस्त रहते हैं| यही आजकल की माडर्न दुनिया के बाज़ीगर चाहते भी है|"

 

"तो दीपू बेटे, इसमें क्या बुराई है, बच्चों का इन सब भयावह सच्चाइयों से दूर रहना ही अच्छा है| उन्हें खुश रहकर खेलना-खाना चाहिए|"

 

"आप ठीक कहती हो नानी, मगर यह भी तो सोचो ये बच्चे बड़े भी तो होंगे कभी? फिर क्या अचानक ऐसी स्थिति का सामना का पायेंगे, ये बेचारे तो जीते जी मर जायेंगे| वैसे भी ऐसा लगता है कि आजकल पर्यावरण प्रदूषण के कारण ही इन्हें बड़े होने से पहले ही मरना पडेगा"

 

"हाय दईया, शुभ-शुभ बोल बेटा, बच्चों के मुंह से मरने की बातें अच्छी नहीं लगती|"

 

"नानी तू भी क्या मसला छेड़ बैठी, तू तो कहानी सुन, कहानी| अच्छी-खासी कहानी चल रही थी, कहाँ बहक गया मैं भी| अब तो तू चुपचाप होकर सुन मेरी भोली नानी|"

 

"चल सुना डाल जल्दी से ये तेरी नयी कहानी| फिर क्या हुआ? आगे बताओ|"

 

"हुआ यह की दोनों काली और सफ़ेद बिल्लियाँ इन सब से ऊब चुकी थी उनका उस सुनवाई से मोहभंग हो चुका था| वह एक दूसरे के काफी क़रीब आ गयी थी, वैसे भी उन दोनों में पहले से कोई खानदानी दुश्मनी तो थी नहीं, ये तो केवल पापी पेट का सवाल था कि दोनों रोटी के लिए उलझ पड़ी थी| आज दोनों की स्थिति और पीड़ा एक समान थी| दोनों यह भी जान चुकी थी कि वह जिस नर्म ताज़ी रोटी के लिए लड़ रही थी वह भी अब बासी और सूख कर कड़ी और कठोर हो चुकी थी|"

 

"आज पच्चीस दिनों की सुनवाई पूरी होने के बाद काली बिल्ली बोल पड़ी – क़ाज़ी चाचा फैसला जल्दी करो|"

 

क़ाज़ी बन्दर चाचा बोले – "मौसी तुम दोनों चुप करो| कानून का मसला है| क़ानून को अपना काम करने दो, क़ानून तो अपने हिसाब से काम करेगा| कानून किसी की बपौती नही है| सब कुछ नए कानून के मुताबिक ही होगा| पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाएगा|"

 

इस पर सफ़ेद बिल्ली बोल पड़ी, ठीक है क़ाज़ी चाचा, हम दोनों अपनी अर्जी में सुधार की अनुमति चाहती हैं| आपसे गुज़ारिश है, कि आप उस रोटी का, हम दोनों में बराबर-बराबर बंटवारा ही करवा दीजिये| अपना तराज़ू निकालिए, न्याय कीजिये|"

 

बन्दर क़ाज़ी बोले – "मौसी, तुम लोगों ने क्या सारी कानूनी प्रक्रिया को तमाशा समझ रखा है, जो जब चाहो अपनी मर्ज़ी से अपनी अर्जी बदल लो| मैं इसकी इजाज़त बिल्कुल भी नही दूँगा|" और इस प्रकार मामला चलता रहा घिसटता रहा| गवाह आते रहे, दलील देने वाले भी आते रहे, तफ़रीह और टाइम-पास करने वाले भी आते रहे और मामला सरकता रहा, धीरे-धीरे और धीरे| 

 

मामला कई माह तक चला पर अंजाम तक नहीं पहुंचा| अंततः क़ाज़ी चाचा ने अपने अफसर चम्पू लोमड़, गप्पू सियार, लक्कू लकड़बग्घा और चिंकी लोमड़ी के साथ विशेष बैठक की| उसके पश्चात वापस सुनवाई शुरू करते हुए बोले – "मैंने अब तक की पूरी सुनवाई में गवाहों के बयान, दस्तावेजों का अवलोकन व परिशीलन करने और अपने अफसरों से विस्तृत बातचीत करने के बाद यह फैसला किया है कि काली बिल्ली और सफ़ेद बिल्ली मौसियों को उनकी अर्जी में परिवर्तन करने के उनके अनुरोध को स्वीकार करने में कोई दोष नहीं है| अतः उनका अनुरोध स्वीकार करते हुए मैं कल इसी वक़्त इस तराजू मशीन का उपयोग करते हुए, रोटी को दो बराबर हिस्सों में बाटूंगा और दोनों को एक एक हिस्सा दे कर न्याय करूंगा| और इस प्रकार इस मामले का सदा के लिए निपटारा हो जाएगा|"

 

बिल्लियों की जान में जान आयी कि चलो मामला तो समाप्त हुआ| मगर जैसा कि यह बात सर्व-विदित है कि - 'कल तो कभी आता ही नहीं' सो यहाँ भी वही हुआ'|

 

"अगले दिन क्या हुआ जानती हो नानी?" "अरे दीपू बेटा अब होना क्या था, रोटी बट गयी होगी बराबर-बराबर और कहानी ख़तम, या फिर बन्दर चाचा ने कोई तरकीब लगाकर रोटी का अधिकांश हिस्सा खुद ही हज़म कर लिया होगा|"

 

"न मेरी भोली और प्यारी नानी| इस कहानी का बन्दर धूर्त नहीं था| वह भूखा भी नहीं था और लालची भी नहीं था| वह खाते-पीते घर से ताल्लुक रखता था| वह उच्च आदर्शों वाला न्यायिक व्यक्ति था| जंगल के नये कानून पर उसे पूरी आस्था और विश्वास था| उसके मन में कोई खोट न थी, वह क़ानून का सम्मान करता था और उसके प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध था|

 

"तब फिर क्या हुआ मेरे बच्चे, तू ही बता दे, यूँ पहेलियाँ न बुझा|"

 

"हुआ यह नानी, कि अगले दिन कि कारवाई से ठीक पहले न्याय विभाग का एक और अफसर वहाँ जा पहुँचता है और बन्दर क़ाज़ी को सीनियर काज़ी अर्थात लंगूर क़ाज़ी का आदेश थमा देता था|"

 

बन्दर क़ाज़ी उस आदेश को बड़े ध्यान से पढ़ता है और फिर आदेश पारित करता है – "जंगल के नए कानून के मुताबिक सीनियर क़ाज़ी के आदेश का पालन करना मेरा कर्त्तव्य है| और यह न्याय व्यवस्था के लिए आवश्यक भी| अतः सीनियर क़ाज़ी अर्थात लंगूर क़ाज़ी के आदेशानुसार मैं इस मामले के सभी कागज़ात सीनियर क़ाज़ी के यहाँ स्थानांतरित करने का निर्देश देता हूँ| अब इस मामले पर आगे सुनवाई लंगूर क़ाज़ी ही करेंगे और उसके पश्चात वे ही फैसला देंगे|"

 

बिल्लियों ने कहा – "क़ाज़ी चाचा, हमें आप पर भरोसा है| आप यहीं इसी वक़्त रोटी का बंटवारा हम दोनों के बीच कर दीजिये और मामले को यहीं ख़त्म कर दीजिये कीजिये| हमें आपका फैसला मंज़ूर होगा|"

 

क़ाज़ी चाचा ने कहा – "नहीं अब मैं कुछ नहीं कर सकता| कानूनी मसला है| व्यवस्था की बात है| हमें आदेश का पालन करना ही होगा|"

 

बिल्लियों ने कहा कि वे यह मामला वापस लेना चाहती हैं पर बन्दर क़ाज़ी ने कहा कि यह अब संभव नहीं है, ऐसा करने की अनुमति देना अब बन्दर क़ाज़ी के आदेश की अवहेलना होगी| अब आप दोनों मौसी, अपनी यह दरख्वास्त लंगूर क़ाज़ी के सामने ही रखना, यहाँ रखने से अब कोई लाभ नही है|

 

"और फिर आगे क्या हुआ दीपू बेटे|"

 

"होना क्या था नानी? अब मामला जंगल के दुसरे कोने पर, लंगूर क़ाज़ी के यहाँ चलने लगा| लंगूर क़ाज़ी मामला अकेले नहीं सुनते थे| उनके साथ कुल आठ सीनियर बंदर और भी होते थे|  सुनवाई के पहले ही दिन दोनों बिल्लियों ने रोटी को उन दोनों के बीच बराबर-बराबर बांटने और मामले को तुरंत खत्म करने की प्रार्थना की| मगर लंगूर क़ाज़ी ने कहा कि - “ हम मामले को पहले नए सिरे से सुनेंगे, जानेंगे, पढेंगे, समझेंगे और फिर सोचेंगे| उसके पश्चात ही कोई क़ानून-सम्मत आदेश दे सकेंगे|” 

 

 इस पर दोनों बिल्लियों ने अपने मामले को वापस लेने की इच्छा जताई और साथ ही यह अनुरोध भी किया कि उस एक विवादित रोटी को किसी अपंग और लाचार जानवर को भेंट कर दिया जाए जिससे उसका पेट कम से कम एक वक्त तो आसानी से भर सके|"

 

 सीनियर क़ाज़ी अर्थात लंगूर काजी ने कहा कि जो उचित फैसला होगा हम जरूर करेंगे मगर मामला फिर से सुनने और जांचने के बाद ही ऐसा कुछ किया जा सकता है| बिना सुने हुए हम मामले को वापस भी नहीं लेने दे सकते हैं, यह जंगल के नए कानून के खिलाफ होगा|

 

"और नानी मेरी भोली नानी, वह मामला से फिर एक बार सीनियर काज़ी के यहां चलता रहा| इस दौरान कई अहम गवाहों की भी मृत्यु हो चुकी थी|  कुछ गवाहों ने तो अपने बयान भी बदल दिए थे|  यहाँ भी मामला सात माह और चला और अंततः अपने अंजाम तक पहुंचा चुका था|"

 

"आज बन्दर क़ाज़ी के यहाँ पर बहुत भीड़ थी| बहुत सारे जानवर इकट्ठा हुए थे|  यहां बिच्छू और कनखजूरे से लेकर गिद्ध तक लगभग सभी मौजूद थे| आज बिल्लियों के बीच रोटी विवाद का अंतिम फैसला जो आना था| वैसे भी  इतने दिलचस्प मामले का फैसला सुनने के लिए आखिर कौन बेताब न होगा|

 

सीनियर काज़ी ने फैसला पढ़ना शुरू किया - “ तमाम गवाहों, उपलब्ध कागजातों, सबूतों और जंगल के नए कानून और नियमों के तहत विचार करते हुए हम लोग इस नतीजे पर पहुंचें है कि उस विवादित रोटी को पूरा का पूरा सफेद बिल्ली को दे दिया जाए|  ऐसा इसलिए जरूरी है कि इस जंगल में सफेद बिल्लियों की संख्या वैसे भी काफी ज्यादा है|  दूसरी बात यह भी है कि सफेद बिल्ली काली बिल्ली से बहुत अधिक ताकतवर और खूंखार होते हुए भी बहुत शरीफ और शर्मीले स्वभाव की होती हैं|  रोटी को दो टुकड़ों में बराबर-बराबर बाँटना कदापि उचित नहीं है| पूरी की पूरी रोटी किसी एक को ही मिलनी चाहिए| परंतु यह भी बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है कि काली बिल्ली ने भी इस रोटी को प्राप्त करने में अपने बल और कौशल का पूरी तरह उपयोग किया| अतः ऐसी स्थिति में काली बिल्ली को कुछ भी न मिलना उसके श्रम का अपमान होगा| अतः ऐसी स्थितियों में मैं इस जंगल के राजा शेर सिंह को यह निर्देश देता हूं कि वे आज से दो माह के भीतर इस एक रोटी का पाँच गुना अर्थात पूरी पांच रोटी काली बिल्ली को देना सुनिश्चित कराएं| इस से सफेद और काली बिल्ली दोनों में आपसी प्रेम और सद्भाव भी बना रहेगा|"

 

 "यह फैसला सुनकर वहां उपस्थित सभी जानवर खुशी से नाच उठे, वाह-वाह कर उठे| सभी ने इस फैसले को एतिहासिक और अभूतपूर्व तथा अमन-चैन लाने वाला फैसला बताया|  दोनों बिल्लियां भी काफी खुश थी कि चलो देर सही पर अंधेर नहीं हुई|  पूरे जंगल में जिस किसी ने भी सुना, वह गदगद हो गया| सीनियर काज़ी और उनके साथ बैठने वाले आठ अन्य बंदर काज़ी की चारों तरफ जय जयकार हो रही थी| पत्रकार घीसू हाथी ने भी फ़ौरन इस खबर पर विस्तृत रिपोर्ट लिखी और फैसला देने वाले लंगूर क़ाज़ी और उनकी टीम का चित्र बना कर अपने संपादक को दिया जिन्होंने अपने अखबार 'जंगल टाइम्स' में इस खबर को प्रमुखता के साथ चित्रों सहित छापा|"

 

"इधर जंगल के  महाराजा शेर सिंह का दिमाग काम नहीं कर रहा था|  वह सोच रहा था कि आखिर वह पूरी पांच रोटी अब कहां से ले आएगा?  वह तो वैसे ही मांस भक्षी था|  रोटी ना  तो वह खाता था,  ना लाता था और ना मांगता था और न ही किसी को बांटता था|  अतः उसने अपने मंत्रियों से मशविरा किया और फिर फरमान जारी किया - “सभी रोटी को खाने वाले और खा सकने वाले जानवर ध्यान दें -  जंगल के उत्तर पूर्वी छोर पर स्थित इकलौते कदम्ब के पेड़ की शाखा पर एक थोड़ा गहरा और बड़ा सा पात्र बनाया जाएगा|  इसे बनाने की जिम्मेदारी जंगल में रहने वाली बया प्रजाति की चिड़िया को दी जाती है|  जंगल में निवास करने वाले सभी जीव जंतु जो भी रोटी अथवा अन्न खाते हैं अथवा खा सकते हैं, उन सभी को यह आदेश दिया जाता है कि वे कदम्ब के पेड़ पर बने पात्र में, अपने द्वारा एकत्रित, अन्न के दाने अथवा रोटी या फिर रोटी के टुकड़े डालेंगे|  यह मेरा आदेश है और जंगल के निवासी होने के कारण सभी अन्न खाने वाले जानवरों का मूल कर्तव्य  भी|  हर हफ्ते शाम पाँच बजे जंगल पुलिस के अफसरों द्वारा इस पात्र को चेक किया जाएगा| पाँच रोटियों  के वजन के बराबर अर्थात पाँच सौ ग्राम रोटी अथवा अन्न एकत्र हो जाने पर इसे लंगूर क़ाज़ी के फैसले के अनुसार काली बिल्ली को सौंप दिया जाएगा और फिर इसके साथ ही मेरा यह आदेश भी स्वयं ही समाप्त हो जाएगा|  इस आदेश का कड़ाई से पालन कराने की जिम्मेदारी  तामील विभाग के अफसर को दी जाती है|”

 

 फिर क्या हुआ मेरे लाल, मेरे बच्चे दीपू -

 

 “होना क्या था नानी|  बया का पूरा परिवार और खानदान लग गया पूरे जी और जान से कदम्ब के पेड़ पर पात्र बनाने में| रोटी-रोटी  खेला जाने लगा|  चिड़िया से लेकर कौवा तथा अन्य सभी जानवर जुट गए, उस कदम्ब के वृक्ष पर बने हुए पात्र को भरने|  सबसे ज्यादा परेशानी चीटियों को हुई|  वे मुश्किल से अपने द्वारा एकत्र किए एक एक दाने को वापस अपने बिल से उठाकर कदम्ब के पेड़ पर बने पात्र में ले जाकर डालती रही| अन्य सभी अन्न खाने वाले जानवर भी ऐसा ही करते रहे| पर घोंसला चार महीने बाद भी  पाँच रोटी के वज़न अर्थात पाँच सौ  ग्राम रोटी अथवा अनाज से भर न सका था|"

 

 

“वह क्यों?”  नानी बोल पड़ी  थी|“ इसके अनेकों कारण थे नानी जैसे -  कुत्ते पेड़ पर चढ़ नहीं सकते थे,  इसलिए वे  रोटी के टुकड़े को कदम्ब के पेड़ के नीचे रख कर चले आते थे, और कुछ अन्य जानवर पहुँच कर चालाकी के साथ उन्हें खा लेते थे|  कुछ जानवर तो इतने चालाक और धूर्त थे कि वे पात्र  में  एक-आधा टुकड़ा डालते थे पर उसके बदले में पात्र में अन्य जानवरों के द्वारा पहले से डाले गए पाँच-सात टुकड़े गटक लिया करते थे|  तामील विभाग के अफसर भी कुछ कम ना थे|  वे भी उसमें से कुछ ना कुछ अक्सर निकाल कर हज़म कर लिया करते थे| 

 

 समय बीतता गया,  एक साल गुजर गया,  पात्र से निकालकर रोटी और  अनाज को तौला गया,  वजन अभी भी केवल दो रोटी के बराबर ही निकला|

 

जंगल के राजा शेर सिंह ने लंगूर क़ाज़ी के साथ विचार-विमर्श किया और फिर लंगूर काज़ी ने अपने पूर्व आदेश पर पुनः विचार किया और कहा - “बदलती परिस्थितियों और हालात के मद्देनजर न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यह आवश्यक हो चला है कि मैं अपने पूर्व आदेश में कुछ संशोधन  करूं|  संशोधित आदेश इस प्रकार है-

 

"चूँकि अभी तक विवादित एक रोटी के पाँच गुने के बराबर अर्थात पाँच सौ ग्राम रोटी अथवा अन्न इकट्ठा नहीं हो पाया है अतः सभी अन्न खाने और खा सकने वाले जानवर, रोटी और अन्न के टुकड़े, कदम्ब के पेड़ पर बने पात्र में आगे भी नियमित रूप से डालते रहेंगे| यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी जब तक कि कुल पाँच रोटी के वज़न के बराबर अर्थात पाँच सौ ग्राम रोटी अथवा अन्न के टुकड़े इकट्ठे न हो जाएँ| जिस किसी दिन ऐसा संभव हो जाएगा, उस दिन इस व्यवस्था को समाप्त किये जाने का निर्देश दिया जा सकता है| और जहाँ तक काली बिल्ली को दिये जाने वाले हिस्से का प्रश्न है, तो इस सम्बन्ध में, मैं और मेरे मित्र क़ाज़ी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि न्याय के उद्देश्य पूर्ति के लिए काली बिल्ली को विवादित एक रोटी के तीन-गुना अर्थात तीन रोटी के वजन के बराबर रोटी और अन्न दिए जाने से भी न्याय का उद्देश्य पूर्ण किया जा सकता है इसके लिए पाँच रोटी के वजन के बराबर रोटी अथवा अन्न दिया जाना कदापि ज़रूरी नहीं है| अतः आज हम यह संशोधित आदेश देते हैं कि जैसे ही कुल तीन रोटी के वज़न के बराबर अर्थात तीन सौ ग्राम रोटी और अन्न एकत्र हो जाता है, उसे काली बिल्ली को सौंप दिया जाय| और उसके बाद भविष्य में एकत्र किये जाने वाली शेष तीन रोटियाँ या अन्न के निस्तारण के बारे में कोई भी फैसला हमारे द्वारा बाद में पुनः कभी भी दिया जा सकता है|"

 

सभी उपस्थित जानवरों ने इस बुद्धिमत्तापूर्ण फैसले का जोर-शोर से स्वागत किया| इसे एक साफ़ सुथरा और एतेहासिक फैसला बताया| लंगूर और उनके मित्र काजियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाने लगी| यह भी कहा गया कि यह दूरदर्शी फैसला एक नए युग का सूत्रपात करेगा और एक बेहतर न्यायिक व्यवस्था कायम करेगा|

 

पत्रकार घीसू हाथी को पुनः नया मौका मिला उसने इस बार फिर एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी और उसके साथ फैसला देने वाले लंगूर क़ाज़ी और उनकी टीम का चित्र भी 'जंगल टाइम्स' के संपादक को दिया जिन्होंने अपने अखबार में इसको प्रमुखता के साथ चित्रों सहित छापा|"

 

काली बिल्ली ने भी मुस्कुरा कर इस संशोधित फैसले को स्वीकार किया|  किसी को भी यह समझ नहीं आया कि काली बिल्ली ख़ुश होकर मुस्कुरा रही थी या फिर वह न्याय व्यवस्था की हालत और सर्वत्र फैले भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करते हुए मुस्कुरा रही थी| 

 

और फिर उसके बाद पुनः पात्र भरा जाने लगा | लगभग आठ माह और बीत जाने के बाद कहीं जाकर, एकत्रित रोटी और अन्न का कुल वज़न  विवादित एक रोटी के तीन-गुना अर्थात तीन रोटी के वजन के बराबर हो पाया| फिर क्या था? काली बिल्ली को बुलवाया गया| पर यह क्या? वह तो कहीं मिली ही नहीं|  तमाम खोज खबर करने के बाद भी उसका पता ना लगा|  खोया पाया विभाग ने भी अंततः अपने हाथ खड़े कर दिए और फाइनल रिपोर्ट लगा दी|  काली बिल्ली कहां गई, उसका क्या हुआ यह कोई नहीं जानता| आज इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी यह एक रहस्य बना हुआ है|"

 

"नानी, मेरी प्यारी नानी, तो अब तो सुन ली ना तुमने मेरी कहानी? आखिर कैसी लगी ये कहानी?"

 

"बताओ नानी, बोलो नानी, कैसी लगी तुम्हे मेरी कहानी? लगता है नानी सो गयी| हाँ यह तो सचमुच ही सो गयी| चलो मैं भी अब सो जाता हूँ| आज के इस युग में शायद सोते रहना ही श्रेयस्कर है|

 

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