महामारी के दिनों में ... एक सकारात्मक कहानी ... "मजदूर का बेटा"

 

 

 

धूल-भरे रास्ते उस पर जेठ की तिलमिलाती गर्मी को सहते, मजदूरों का कारवां बढ़ा जा रहा है, अपने गंतव्य की ओर। मजदूरों का ये कारवां अंत में चलते-चलते रुक जाता है, एक हरे-भरे बरगद के नीचे, जिसकी लाल-गुलाबी नवल किसलय मन को मोह रही थी। उसकी गहरे हरे पत्तों की घनी छाँव और आकर्षित करती लम्बी-लम्बी जटायें मानो कोई सिद्ध पुरुष लंबा-चौडा शरीर लिए समाधि में बैठ सबको अपनी शरण में बैठा सुख-शांति का पाठ पढ़ा रहा हो। सभी मजदूर अपना सामान एक तरफ रख वहीं बैठ जाते हैं। 

राहत भरी लंबी साँस खींचता हुआ गोविन्द कहता है, “कितनी सुहावनी मनमोहक है ये छाँव और यहाँ की ताज़ा हवा, जैसे रास्ते की सारी थकान ही उतार देगी आज। कितना आनन्ददायक है यहाँ पर ठहरना। कुछ देर ठहर कर जलपान कर फिर अपना बसेरा तैयार करेंगे।”

अन्य मजदूरों ने गोविन्द की हाँ में हाँ मिलाते, एक स्वर में कहा, “हाँ गोविन्द भैया सही कहा तुमने।” 

जलपान कर ठंडी छाँव का आनन्द ले सभी मजदूर नव निर्माण स्थल पर हर्षपूर्वक घूमते हुए यहाँ की हरियाली को निहारते है। आँख मूंदते हुए लंबी साँस लेते गोविन्द कहता है, “कितना सुंदर है यहाँ का नज़ारा कितनी हरियाली है यहाँ और उस पर ये शांत माहौल, मानो जीवन का आनन्द बस यहीं बस जाने में है।” 

चारों और देखते हुए मजदूरों ने कहा, “चलो यहीं इस खाली पड़ी ज़मीन पर अपना बसेरा तैयार करें।” 

 

गोविन्द एक हाथ में करनी पकड़ उस पर कच्चा मसाला लेता तो दूसरे हाथ से ईंट लगाता, अपना घर बनाते हुए कहता है, “आज अपना कच्चा बसेरा बना लें, फिर कल से हमें दूसरों की भव्य इमारत के निर्माण में जुट जाना है। जिसे बनाने में हमें 4-5 साल का समय तो लगेगा ही, आखिर भव्य जो बनना है।” 

तेजी से हाथ चलाते दीवार बनाते सोच रहा है, हमारा जीवन भी कैसा है? दूसरों के सपनों को पूरा करने में ही जीवन भर मेहनत मजदूरी करते हैं, और अपने लिए दो वक्त की रोटी ही मुश्किल से जुटा पाते हैं।” 

घर बनने की ख़ुशी में मुसकराते हुए, “लो ये अपना घर तो हो गया तैयार।”

अन्य मजदूर सीमेंट मसाले से सने हाथ धोते हुए मुख पर ख़ुशी लिए कहते, “हमारा भी घर बन गया। रात हो चली है चारों और अँधेरा पसरा हुआ है।”

खाना-पीना कर अब कुछ मजदूर थके-हारे अपने छोटे-से आराम गाह में सोने के लिए जाते हैं तो कुछ गर्मी से मुक्ति दिलाती शीतल रात में खुले आसमान के नीचे अपने सोने की तैयारी कर रहें है। स्वच्छ आकाश तारों से टिमटिमाता हुआ पूरा का पूरा भरा हुआ है, तारों से जैसे किसी थाल में हीरे-मोती सजा कर रखे हो मानों, ईश्वर ने सभी के आनन्द के लिए ही ऐसा किया हो।  इस मनोहारी आकाश को देखते ही देखते धीरे- धीरे सभी सो जाते हैं। 

 

सुबह सवेरे गोविन्द अपने बेटे राजू ,पत्नी पार्वती और अन्य सभी मजदूरों के साथ, हाथ में साजो सामान तसला, फावड़ा, सोल, करनी, आदि ले रोज़ निकल पड़ते हैं, निर्माण स्थल की ओर, किसी के सपनों की इमारत को भव्य रूप देने के लिये। ये सभी दिन-रात एक करते नींव खोदते ईंट, कंक्रीट भरते वहीं रम बस गए, उस वीराने में जहाँ चारों ओर जंगल और प्लॉट ही प्लॉट जो सभी छोटी-छोटी दीवारों से विभाजित खाली पड़ें है। किसी के बसने का इंतज़ार करते। 

वहीं राजू अपने माता-पिता के साथ पांच वर्ष की छोटी-सी आयु में काम में हाथ बटाता, समय मिलते ही खेलने चला जाता है। वहीं खाली पड़ें रास्तों पर नज़दीक के एम आई जी फ्लेट्स में रहने वाले कुछ बच्चे भी खेलने आए हैं, अपने अवकाश के क्षणों का आनंद लेने। राजू उन बच्चों के साथ खेलते-खेलते धीरे-धीरे उनमें घुलमिल गया। श्याम से उसकी घनिष्ठ मित्रता हो जाती है। राजू रेत पर घर बनाते मुसकराता हुआ श्याम से कहता है- “मुझे रेत के ढेर में घर बनाना अच्छा लगता है।“ राजू रेत पर अपना पैर रख ऊपर से रेत ढकता, रेत को दबाता हुआ धीरे से पैर रेत से बाहर निकाल खुश होता हुआ कहता है- “देखो कितना अच्छा है ये मेरा रेत का घर।“ 

वह अपने भोले-भाले मुख से प्रश्न करता हुआ श्याम से कहता है-“ मेरे साथ खेलने के लिए रोज़ यहाँ आया करो। मुझे बहुत अच्छा लगेगा, हम खूब खेलेंगे, बहुत मजा आएगा।“ 

श्याम आश्चर्य भरे शब्दों में कहता है - 

“रोज़ ! 

हम रोज़ स्कूल जाते हैं। केवल छुट्टी के दिन ही यहां खेलने आते है। वैसे मुझे भी तुम्हारे साथ खेलना अच्छा लगता है, रेत का घर, तुम्हारा वो लकड़ी का एक खिलौना। कितना अच्छा लगता है उससे खेलना। 

आहा !” 

राजू ख़ुशी से पैर उठाता और पार्क के फुटपाथ पर साइकिल चलाते लड़कों की तरफ इशारा करते हुए कहता – “ये सब जो यहां साइकिल चला कर खुश हो रहे है, क्या तुम्हारे साथ ही रहते है ?” 

श्याम हंसते हुए -“ हाँ ये सभी वहीं रहते है, हमारे साथ। हम सब यहाँ सन्डे इंजॉय करने आते हैं।“ 

राजू ठोड़ी पर तर्जनी उँगली रख सोचते हुए बोला –“सन्डे इंजॉय, मतलब खेलने !” 

 

राजू इन बच्चों की जीवन शैली से धीरे-धीरे प्रभावित हो रहा है। उनके स्कूल जाने की आदत भी उसके मन को प्रभावित किये बिना नहीं रही। ईंट टिन से बनी झोंपड़ी में रहने वाला राजू आलिशान घरों में रहने वाले बच्चों को स्कूल जाते देख उत्साहित होता हुआ, इसी उथल-पुथल में मन में विचार कर कहने लगा –“ क्या मैं भी स्कूल जा सकूँगा ?” 

और वह एक दिन खेलते-खेलते जिज्ञासा वश श्याम से कहने लगा –“ तुम्हारा स्कूल कहाँ है ?” 

श्याम आश्चर्यचकित होकर कहता है – “घर से कुछ ही दूर स्कूल है। वहाँ हम खूब मन लगाकर पढ़ते हैं।“ 

राजू भावविभोर हो कहता है- 

“पढ़ने जाते है ?” 

पढ़ने क्यों जाते है ?” 

श्याम मुसकराते हुए कहता है- “मेरे पापा मुझसे कहते है कि पढ़ लिख कर तुम्हें ऑफिसर बनना है।“ 

राजू चहलकदमी करते-करते कहता है- “मैं भी तुम्हारे साथ स्कूल जाऊंगा।“ 

श्याम विस्मय में पड़ते हुए कहता है- “राजू। स्कूल जाने के लिए वहाँ एडमिशन करवाना होगा।“ 

राजू चिंतित भाव से – “एडमिशन मतलब।“ 

श्याम अपने  सिर पर हाथ फेरते हुए कहता है-“ एडमिशन मतलब, कुछ कागज़ स्कूल में जमा होंगे और वहाँ तुम्हारा नाम लिख जायेगा, फिर तुम वहाँ पढ़ सकते हो।“ 

राजू दौड़ते-हाँफते लम्बी-लम्बी साँस लेते मन में एक बड़ा स्वप्न लिए, अपने पिता के पास जाकर कहता है- 

“पापा मेरे दोस्त स्कूल जाते हैं, पढ़ने के लिए अब मेरा भी मन करता है कि- 

 

मन में इच्छा होती मेरे, 

मैं भी जाऊँगा स्कूल। 

जैसे वो पढ़ते हैं, बैग लेकर, 

मैं भी जाऊँगा स्कूल। 

पढ़ने का मन मेरा करता , 

मैं भी जाऊँगा स्कूल। 

खूब पढूँगा, खूब लिखूँगा, 

मैं भी जाऊँगा स्कूल। 

एक दिन आएगा जब, टीचर बन, 

मैं भी जाऊँगा स्कूल। 

हमारा भी घर होगा, इस मंज़िल में, 

मैं भी जाऊँगा स्कूल।“ 

 

राजू की सहज प्रार्थना से द्रवित हो गोविन्द कहता है-“बेटा हम भी चाहते है कि तुम पढ़ो-लिखो, लेकिन यहाँ आसपास कोई स्कूल नहीं है, हमें जहाँ-तहाँ काम के लिए अपना बसेरा बदलना पड़ता है, जिससे दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाए। फिर ऐसे में तू कैसे पढ़ सकेगा ? हम मजदूरी करते है और आखिर तुझे भी तो बड़े होकर मजदूरी ही करनी है। आजकल वैसे भी पढ़-लिख कर लोग बेकार ही तो घूम रहे हैं, इससे तो अच्छा है कि तुम भी हमारी तरह मजदूरी करना ही सीखते रहो, कम से कम आज के जमाने में भूखे तो न मरोगे।“ 

राजू अपना-सा मुंह लेकर सिसकता हुआ अपनी माँ की गोद में जा बैठता है। मानो काली अंधेरी रात की तरह उसकी जिंदगी भी अंधेरे से भर गयी हो और आशा की एक नव-किरण का भी अंत हो गया हो। 

 

राजू की मनोदशा से परेशान गोविन्द सुबह-सुबह ठेकेदार से मिलकर राजू के दाखिले की बात करता हुआ कहता है- 

“ठेकेदार साहब। 

हमारा राजू स्कूल जाने की जिद् कर रहा है, यहाँ आसपास कोई स्कूल भी नहीं है। तुम्हारी बहुत जान- पहचान है, बड़े अफसरों से, किसी स्कूल में दाखिला करवा दो राजू का।“ 

ठेकेदार आँखे फेरते हुए कहता है- “तुम्हारे बच्चें हैं, तुम ही जानो ! मैं तुम्हारे बच्चों का दाखिला ही करवाता रहूँगा। बहुत काम है मुझे यहाँ। जाओ अपना काम देखो।” 

वह चलते-चलते झुंझलाते हुए कहता है -“तुम मजदूरों के बच्चें पढ़ेंगे तो मजदूरी कौन करेगा !” 

 

दूर जाते बुदबुदाता हुआ – “पढ़-लिख कर मुझसे ही हिसाब मांगेंगे आर टी आई लगाकर पूछेंगे -किस जगह क्या लगाया है? 

बात करते है।“ 

 

उधर श्याम अपने पिता से राजू के बारे में बात करता हुआ कहता है- 

“पापा मेरा फ्रेंड राजू स्कूल जाना चाहता है, उसके पापा गरीब हैं, वे मजदूरी करते है। सारा दिन वह इधर-उधर खेलता रहता है। कल उसने मुझसे कहा कि वह स्कूल जाना चाहता है।“ 

श्याम का आग्रह सुन पिता का हृदय भी गरीब बालक की सहायता के लिए द्रवित हो उठा। 

महेश ने श्याम के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। “मेरे बेटे को मित्र की कितनी चिंता है ! 

श्याम हम कल चलेंगे। कम से कम एक भला कार्य ही हो जायेगा इस बहाने।“ 

 

अगले दिन सुबह-सुबह श्याम के पिता महेश गोविन्द से मिलने जा पहुँचे और गोविन्द को समझाते हुए कहा - 

“तुम्हारा बेटा राजू पढ़ना चाहता है, फिर उसे पढ़ाते क्यों नहीं हो ? 

गोविन्द दुखी भाव से हाथ जोड़े कहता है –“साहब पढ़ाना तो हम भी चाहतें है। ठेकेदार से बात भी की पर कोई सहायता न मिली।“ 

महेश ने आश्चर्यचकित हो कहा –“कोई सहायता न मिली मतलब। 

ये कुछ कागज़ ले लो और चलो मेरे साथ हम आज ही राजू का स्कूल में एडमिशन करवाते हैं।“ 

 

महेश और गोविन्द राजू को साथ ले स्कूल पहुँचते है। संयोग से वहाँ ई डब्लयू एस श्रैणी में राजू को एडमिशन मिल जाता है। 

 

घर पहुँच प्रसन्न मुद्रा में आनन्द से गर्दन हिलाते हुए आँखों में ख़ुशी लिए राजू श्याम से कहता है - “आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। अब मैं भी तुम्हारी तरह स्कूल जाऊंगा एडमिशन जो हो गया है मेरा !” 

 

कुछ दिन बाद, गोविन्द के घर ख़ुशीभरा माहौल है। वे राजू के स्कूल जाने को लेकर उत्साहित है। पार्वती ने जैसे-तैसे इधर-उधर से सूजी, बेसन, गोभी आदि तलाश कर पकवान बनाने की तैयारी कर ली। बाहर गोविन्द, राजू को साबुन लगाकर नहलाते हुए सुंदर बनाने की चाह में उसे बार-बार रगड़ता और पानी डालता हुआ कहता है -“ घर के अंदर से गोभी के पकौडों की सुगंध से मुंह में पानी ही आ गया है, अरे ! सुन कुछ अपने लिए भी बना लेना; फिर न जाने कब ऐसा अवसर मिले।“ 

राजू के स्कूल जाने की तैयारी ऐसे मानो उसे दूल्हा ही बनाया जा रहा हो। नयी पेंट-शर्ट, टाई-बेल्ट, जूते-जुराब। राजू के चेहरे पर अद्भुत चमक। राजू खुश होते कहता “पापा आप मेरे लिए ये नए कपड़े दुकान से खरीद कर लाये हो।“ गोविन्द मन ही मन विचार कर रहा है “पैसा तो बहुत खर्च हुआ है इन्हें खरीदने में पर राजू की ख़ुशी से ज्यादा नहीं।“ 

कपड़े पहनाते हुए गोविंद, पार्वती से मुसकराते हुए कहता है- “अरे हमारा राजू तो जेंटलमैन ही बन गया ! देखो।“ 

पार्वती राजू को देखते, राजू को काला टीका लगाते हुए कहती है - “कहीं नज़र न लग जाये हमारे राजू को।“ 

राजू का टिफिन किताब बैग में रखते हुए स्नेह भरा स्पर्श करती हुई। 

 

गोविन्द अपनी पुरानी रखी साइकिल को कपड़े से साफ करते हुए राजू से कहता है- “राजू आ साइकिल पर बैठ तेरे लिए कल ही बच्चों वाली गद्दी लगवाई है इसमें।“ 

राजू गोविन्द का हाथ पकड़ते हुए – “चलो पापा स्कूल चलें हम।“ 

प्रातः काल सूर्य की लालिमा जैसे राजू का स्वागत करने के लिए ही बनी हो। चारों ओर पीला-गुलाबी आकाश जैसे राजू के चेहरे की ख़ुशी को ही प्रकट कर रहा हो। पक्षियों की मधुर आवाज़, ताजा हवा की सनसनाहट राजू के साथ सुर मिलाते, मानो उसके साथ तारतम्य मिला रहे हों। इसी सुनहरे पल में बाप-बेटे परस्पर संवाद करते चल दिए है, स्कूल की ओर इसी बीच जिज्ञासा वश राजू के प्रश्नों की कतार शुरू हो जाती है। 

राजू खेत की ओर देख हाथ से इशारा करते हुए कहता है –“ पापा ये सब्जी कैसे उगती है ?“ 

गोविन्द समझाते हुए कहता है- “राजू। खेत में बीज बोए जाते है और ये उग जाती है, इस खेत को रोज आते-जाते देखना तुम्हें स्वयं यह मालूम हो जायेगा, कि ये कैसे उगती है ?“ 

उधर पार्वती अपने बेटे को लेकर चिंतित हो सोच रही है - “मेरा बेटा आज पहली बार हमसे अलग हो, स्कूल में है। वह अकेला है, उसे कुछ हो न जाये। कभी अपने से एक पल भी तो अलग नहीं किया। मजदूरी करते भी उसी पर ध्यान रहता है। उसका ख्याल कौन रखेगा वहाँ।“ 

इधर राजू और गोविन्द रास्ते व साइकिल का आनन्द लेते स्कूल के गेट पर पहुँच जाते है, जहाँ टीचर्स इन नवागन्तुक विद्यार्थियों का स्नेह भरे स्पर्श से स्वागत कर रहे हैं। पहले दिन के इस स्पर्श ने इन बच्चों को अपना ही बना लिया है। कुछ बच्चे आंसू पोंछते अपनों की तरफ देख रहे है कहीं ये हमेशा के लिए तो छोड़ कर नहीं जा रहे हो ? 

राजू स्कूल के अंदर पहुँचते ही दीवारों पर सुंदर दृश्यों को देख दंग रह जाता है, वहाँ की साज-सज्जा और चित्रकारी ने उसे अपनी ओर खींच लिया है। वह वशीभूत हो कक्षा के प्रत्येक कोने से स्वयं का नाता जोड़ता हुआ अपने ओंठो को खोल मधुर आवाज में कहता है - 

“आहा ! मेरा स्कूल, कितना सुंदर है ये।“ 

तभी स्कूल का ड्रम ढम्-ढम्-ढम् करता बजने लगता है, और सभी बच्चे पंक्तिबद्ध हो धीरे-धीरे चल दिए है, ईश्वर का मनन करने के लिए। 

एक स्थान अनेक सीधी पंक्तियों में खड़े बच्चे सावधान-विश्राम के आदेश पर, एक साथ पैर ऊपर उठाते और धम से नीचे गिराते जैसे गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हो कदम-ताल करते देश की शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हो। अनुशासन की ये सभी भाव-भंगिमाएँ इन सभी को जैसे एक सूत्र में पिरोये हुए हों। 

छोटे से कद का राजू पंक्ति में सबसे आगे खड़ा प्रार्थना 

इतनी शक्ति हमें दे....................। 

की प्रत्येक पंक्ति से अपना एकाकार करता हुआ। वह भावविभोर हो एक-एक शब्द को अपने अंदर उतारने का प्रयास कर रहा है। 

अब सभी बच्चे इठलाते, मुसकराते धीरे-धीरे कक्षा की ओर बढ़ते अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए। 

मैडम ने सभी बच्चों से एक-एक कर परिचय की शुरुआत की। राजू का भी क्रम आ ही गया। 

राजू की ओर इशारा करते हुए मैडम ने मुसकरा कर, स्नेह भरा स्पर्श करते हुए कहा - 

“तुम्हारा नाम क्या है ?” 

राजू ने हँसते खिलखिलाते हुए कहा -“ मेरा नाम राजू है।“ 

मैडम – “तुम्हारे पिता क्या करते है ?” 

राजू – “मजदूरी।“ 

मैडम –“ तुम्हें यहाँ कैसा लग रहा है?” 

राजू ने मुसकराते हुए कहा – “मुझे यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है।“ 

धीरे-धीरे सभी का परिचय हो गया। 

इसी बीच रेसिस की घण्टी बज गयी। 

पहले दिन रेसिस ब्रेक की ख़ुशी, उस पर माँ के हाथ से बने गोभी के पकौड़े और सूजी के हलवे का स्वाद चखते हुए राजू आँखे मूंद कर आनन्द से उछलते हुए कहता है - आज तो मजा ही आ गया, कितना स्वाद है इसमें ! हूं........। 

रेसिस के बाद पहले दिन अ, आ, इ से परिचय हुआ और छुट्टी से हर्षाते बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी स्कूल से बाहर निकलते हुए, सभी की नज़रें अपनों की तलाश में। 

राजू की घूमती नज़र अपने पिता पर पड़ी और दौड़कर अपने पिता की बाहों में सिमट गया। गोविन्द ने भी उसे अपनी गोदी में उठा कर साइकिल की छोटी-सी नई गद्दी पर बैठा लिया। 

 

दोपहर हो चली है। बाप-बेटे साइकिल पर सवार हो चल दिये है घर की ओर; राजू का खुशनुमा चेहरा, मन में आनन्द ही आनन्द। 

फिर परस्पर संवाद वही जिज्ञासा और फिर पुनः प्रश्नों की कतार शुरू हो जाती है। 

राजू हाथ से पसीना पोंछते हुए – “पापा गर्मी लग रही है।“ 

गोविन्द राजू का प्रश्न सुन मुस्कराते हुआ कहता है – “हाँ, खिली धूप निकली है, गर्मी तो लगेगी ही। 

राजू  चकित हो दोनों आँख दाँई ओर करते हुए कहता है - ये धूप कहाँ से आई ? 

गोविन्द सूरज की ओर इशारा करते हुआ कहता है - वो देखो सूरज दिख रहा है, वहीं से आयी है ये धूप। 

आश्चर्यचकित हो सूरज की ओर देखते हुए राजू ने कहा-“ पापा सुबह जब हम स्कूल जा रहे थे, तब ये सूरज नीचे था, अब ये ऊपर कैसे पहुँच गया ?” 

राजू को समझाते हुए गोविन्द कहता है – “बेटा। सूरज सुबह निकलता है, दोपहर को ठीक हमारे ऊपर होता है, रात होते ही यह छिप जाता है। ये रोज ऐसे ही आता-जाता रहता है।“ 

 

रास्ते भर राजू के बाल-सहज प्रश्नों की बौछार चलती रही और गोविन्द कभी-कभी निरुत्तर हो मौन, राजू की जिज्ञासा से चकित हो मुसकराते हुए राजू को लिए अपने घर पहुँच जाता है। 

राजू की जिज्ञासाओं का क्रम इसी प्रकार एक नई खोज में मग्न निरन्तर आगे बढ़ रहा है, ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर कभी-कभी स्कूल से भी न मिलता। तो अनपढ़ पिता के पास कैसे मिलता ? 

धीरे-धीरे समय बीतता गया। राजू मन लगाकर पढ़ता, स्कूल के कार्य को ठीक-ठीक और समय से पूरा करने के लिए उसे स्टार व स्नेह भरा स्पर्श मिलने लगा। वह स्कूल के सभी कार्यक्रमों में भाग लेने लगा। स्वयं द्वारा किये गए शेर वाले रोल को याद कर वह खुश होता। ये सभी गतिविधियां उसे बल प्रदान करती। अब वह स्कूल में प्रथम स्थान भी प्राप्त करने लगा। स्कूल में एक दिन कक्षा में बैठे हुए रंग का मिलान करते हुये सफेद रंग चाँद से,  लाल रंग सूरज से, हरा रंग बरगद के पेड़ से, पीला रंग सरसों के फूल से, नीला आकाश से और काला अँधेरी रात से मिलाते हुए कहता “मैडम ये सूरज और चाँद गोल क्यों होते है ?” 

मैडम आश्चर्यचकित हो कहतीं है -तुम्हारी मम्मी जब रोटी बनाती है, तो घूमते-घूमते रोटी गोल हो जाती है, ठीक उसी तरह सूरज और चंदा भी घूमते रहते है और गोल हो गए है। 

राजू जिज्ञासा वश पूछता है-“बरगद के पेड़ का रंग हरा क्यों होता है ?” 

ये सवाल बड़ी क्लास में पढ़ोगे तब जान जाओगे की सूरज की रौशनी से ये खाना बना हरे रंग के हो जाते है और हमें साँस लेने के लिए शुद्ध हवा भी देते है। 

राजू “अच्छा इसलिये ही हमने अपने स्कूल में पेड़ लगाये थे।“ 

मैडम “चलो अब तुम्हारा गिनती का टेस्ट है। दस तक गिनती सुनाओ।“ 

राजू ने ख़ुशी से सर हिलाते हुए कहा “मैडम 1, आज हम जब स्कूल आ रहे थे, तो एक भिखारी मिला, उसे मेरे पापा ने एक रुपया दिया। मेरे सर पर हाथ रखकर वो बोला सबका मालिक एक, सबका मालिक, एक सबका मालिक एक। 

2 आकाश में दिखते एक सूरज तो दूसरा चंदा लगते बहुत ही प्यारे है। 

3 -पापा कहते हम सब पूजा करते ब्रह्मा विष्णु महेश की।(जल, थल, वायु) (कागज की नाव, माचिस की रेल, कागज का हवाई जहाज) आदि। 

4 -चारों और चार दिशाएं आते-जाते दिखती है। 

5 -पापा ने बताया पाँच पांडव थे। 

6 -उनके साथ छटे कृष्ण जी उनकी सहायता करते थे। 

7 -सातों दिन हम खूब खेलते, खूब है पढ़ते और खूब मौज मनाते है। 

8 -लोग ढूंढते लेकर जाते आठ लड़कियों को खाना खिलाते, पूजा करते उनकी।(आठ पहर)। 

9 -आठ लड़कियों के साथ 9वां मैं भी हो लेता साथ।(नौ ग्रह)

10 -मेले में देखा एक पुतला काले कपड़े, बड़ी-बड़ी मूँछे और दस सिर थे उसके। सब ने बताया ये रावण है।“ 

मैडम ने आश्चर्यचकित होकर कहा “अरे वाह! ये कहाँ से सीखा तुमने ?” 

राजू खिलखिलाते हुए कहता है “मैडम पापा के साथ स्कूल आता हूँ, तब साइकिल पर बैठ आते-जाते ये सब पूछता हूँ।“ 

अब एक दिन पी टी ए की मीटिंग में राजू अपने पापा के साथ मैडम से बात करने स्कूल आता है। 

मैडम राजू और उसके पापा की और देखते हुए कहतीं है – आओ राजू बैठो यहाँ। गोविन्द आपका ये राजू तो बड़ा जिज्ञासू है कभी कुछ पूछता है तो कभी कुछ, पूरे दिन इसके प्रश्नों की झड़ी चलती रहती है। और सारी किताबें बैग से बहार निकाल उन्हें डेस्क पर फैलाकर उनमें कुछ न कुछ ढूंढ़ता ही रहता है। वाकई बहुत जिज्ञासू है ये। बोलता भी बहुत है।“ 

गोविन्द हाथ जोड़े दीन भाव से कहता हुआ –“ मैडम जी ये मुझे भी आते-जाते यूं ही प्रश्न-उत्तर में घेरे रहता है। 

मैडम जी हमने सुना है गुरु का दरजा तो भगवान से भी बड़ा है। हम ठहरे गरीब मजदूर बस आपसे हाथ जोड़कर यही प्रार्थना करते है कि राजू का सब बच्चों की तरह ही ध्यान रखना। हमारा राजू पढ़ाई में बहुत ध्यान लगाता है।“ 

मैडम गोविन्द को समझाते हुए कहती हैं –“ गोविन्द हमारे लिए सब बच्चे बराबर हैं और राजू जैसे बच्चे ही अपने स्कूल, टीचर ,और अपने माता पिता का नाम रोशन करतें हैं। मुझे ख़ुशी है की राजू मेरी क्लास में पढ़ता है।इसे देख कर मुझे उन बच्चों की याद आ जाती है, जो किसी कारण वश स्कूल नहीं जा पाते, ये सोच कर मेरा हृदय बहुत दुःखी होता है।“ हम सभी को सब पढ़ें इसके लिए प्रयास करने की जरुरत है।“ 

गोविन्द मैडम की बात सुन कर उत्साहित है और मन ही मन सोच रहा है कि “ अब मुझे अपने बेटे की पढ़ाई की चिंता नहीं करनी चाहिए , वह सही हाथों में है जहाँ उसके जीवन को सही आकर मिलेगा।“ इसी बीच राजू की सफलता अन्य बच्चों के लिए डांट का कारण भी बनने लगी उनके माँ-बाप कहते तुम्हारे लिए इतना पैसा खर्च करते है हम और फर्स्ट आता है वो मजदूर का बेटा। अब बच्चों से माँ बाप का ये व्यवहार न सहा  जाता। इस दुनिया में सब इस भागम-भाग में है कि उसका बेटा-बेटी ही क्लास में आगे रहे, एक अनार सो बीमार जैसी स्थिति  बन गई है। मानो विकृत मानसिकता से एक अच्छे परिणाम को प्राप्त करना चाहते हुए अपने बच्चों को रटने-रटाने की ओर धकेल उनका बचपन छीन उनको मौलिकता से भी दूर कर देतें है। जिस कारण कुछ बच्चे राजू से द्वेष करने लगे और राजू को परेशान करने के लिए उसे चिढ़ाने के तरह-तरह के प्रयास करते हुए कहते -“तुम्हारे मम्मी-पापा ने तुम्हें रिमोट से चलने वाली कार दी है ? क्या तुम्हारे पास एयरोप्लेन वाला खिलौना है ?” 

राजू अपना भोला-सा मुख और लल्चाई-सी आँखों से देखता हुआ, एकदम सजग हुआ कहता है- 

“मेरे पास ऐसे खिलौने है, जिनसे खेलने पर मुझे बहुत ख़ुशी मिलती है, क्योंकि वे खिलौने मैंने स्वयं बनाये है, उनमें रेत का घर, लकड़ी का पहिया, माचिस की रेल और भी बहुत सारे। देखोगे ! कभी आओ खेलो मेरे साथ।“ 

राजू की बातें बच्चों को धीरे-धीरे अपनी ओर खींच लेती है। अब सभी बच्चे राजू के साथ घुलने-मिलने लगते है। एक दूसरे के खिलौने से खेल-खेल कर खेल का आनन्द लेते, और इस तरह कितने सहज तरीके से; राजू वैभव और वंचना की खाई को पाटकर जीवन को मौलिकता से जीये जा रहा है। अब सभी एक दूसरे की सहायता करते साथ मिलकर पढ़ते, खेलते और एक दूसरे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते, मानो उनमें कोई भेद ही न रह गया हो। 

यों ही समय चलता रहा और एकाएक स्कूल में वार्षिक दिवस के आयोजन की तैयारी होने लगी सभी बच्चों के माता-पिता को बुलाया गया और देखते ही देखते यह दिन भी आ ही गया। 

चारों ओर सुगंधित हवा की खनखनाहट से मौसम ने ख़ुशी का रंग बिखेरा हुआ है, हर डाल पर फूल मुसकरा रहे हैं, फूलों की भीनी-भीनी सुगंध ने मानो वशीकरण ही कर दिया है। इस बसंत ने धरा को चारों ओर से अपने ही रंग में रंग दिया है। 

चारों और मनमोहक दृश्य दिखाई दे रहे हैं, आनंद ही आनंद है, जैसे देव कृपा से संपूर्ण प्रकृति सौंदर्य की छटा बिखेरने में लगी हो। इसी आनंदमय मुहूर्त में खुशी का संदेश देते हुए विद्यालय के वार्षिक महोत्सव का आयोजन हो रहा है। 

रंगारंग कार्यक्रम को देख सभी आनंद ले रहे हैं। सभी ताली बजा-बजा कर कार्यक्रम का आनन्द ले रहें है। 

इसी बीच प्राचार्या महोदया विद्यालय के हौनहार विद्यार्थी के लिए नाम उद्घोषित करते हुए राजू को मंच पर बुला कर कहती हैं – राजू तुम्हारी मेहनत और सभी के साथ सद्भावपूर्ण व्यवहार के लिए आज तुम्हें, यह सम्मान, यह मेडल, यह प्रमाण पत्र,  बच्चों की छोटी साइकिल, रिमोटवाली कार और एयरोप्लेनवाला खिलौना मिल रहा है। तुम सबके चहेते बन गए हो, कल ही मुझे यह जानकारी मिली कि राजू का आज जन्मदिन भी है। विद्यालय तुम पर गर्व करता है।“ मुझे और भी अच्छा लगा की राजू के जन्मदिन पर आज उसे यह सम्मान देने का अवसर मुझे मिला। मैं विद्यालय परिवार की ओर से राजू को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामना देती हूँ और ईश्वर से कामना करती हूँ कि राजू दीर्घायु हो अपने जीवन में ऊँचाइयों को छुए और सदा सुखी रहे।“ यह सुन बच्चों की करतल ध्वनि ने चारों और तालियों की गड़गड़ाहट से राजू की ख़ुशी चौगुनी कर दी। 

सम्मान ग्रहण करते हुए राजू कहता है - 

“मैं ऐसा ही हूं” मुसकराते हुए। 

मेडल मिलते ही गोविंद और पार्वती राजू को गोद में उठाकर, एक-दूसरे से संवाद करते हुए कहते हैं - “पार्वती - हमें पढ़ने का मौका नहीं मिला, लेकिन हमारा बेटा खूब मन लगाकर पढ़ता है।“ खुशी से आंखें भर आई दोनों की। 

गोविंद – “हमारे पास राजू को देने के लिए गरीबी के अलावा कुछ नहीं था। यह तो भला हो श्याम के पापा महेश जी का जो उन्होंने राजू का दाखिला करवाया।“ 

पार्वती भावुक होते हुए कहती है - “कितनी मेहनत करता है, इसलिए ही इसे यह मेडल साफिटिकेट (सर्टिफिकेट) और ढेर सारे खिलौने मिलें है। ऐसा जन्म दिन तो हम कभी न मना पाते राजू का, जैसा आज स्कूल की ओर से मनाया गया है।“ 

गोविंद ख़ुशी से राजू को गोद में उठाए कहता है - “इसे स्कूल नहीं भेजते तो यह भी हमारी तरह ही मजदूरी करने की तैयारी कर रहा होता, दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में। अब एक दिन यह अपनी मेहनत से जरूर बड़ा अफसर बनेगा और अपना सपना पूरा करेगा,  वो दिन हमारी जिंदगी का बहुत बड़ा दिन होगा, आज ही की तरह। 

दोनों चलते-चलते राजू के सिर पर स्नेह भरा स्पर्श करते हुए , 

हमारा राजू…….। 

जितेंद्र कुमार

 प्रवक्ता (हिंदी) 

राजकीय सर्वोदय बा. विद्यालय सी सी कॉलोनी दिल्ली 110007

एम ए; बी एड; 

ई टी ई; 

यू जी सी नेट- जे आर एफ।

jitendrakmr750@gmail.com

 

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