चलता फिरता अस्पताल

 

गाँव के समीप नाले की पटरी के ठीक किनारे एक खंडहर धर्मशाला थी, जिसे कभी शंकर नाम के ब्राह्मण ने बनवाया था। इस लिए उसे शंकर वाली धर्मशाला भी कहते थे। खँडहर मे सिर्फ एक  कोठरी ही बची थी जिसके ऊपर अभी छत थी। यह कोठरी मुश्किल से 10 फुट लंबी और 10 फुट चौड़ी होगी इसी मे रहते थे सन्यासी बाबा बृक्तानंद।

इस कोठरी को अब लोग बृक्तानंद जी की कुटिया के रूप में भी जानते थे।

कुटिया में एक तरफ बाबा का बिस्तर लगा रहता था दूसरी तरफ एक कनस्तर जिसमें आटा दो तीन डिब्बे जिनमें नमक, मिर्च और एक तेल की शीशी बिस्तर के ऊपर एक टूटी-फूटी सी अलमारी थी जिसमें सिर्फ एक ही पत्थर सही सलामत रह गया था। उस  पर  मरहम, फाए, पट्टियाँ, कुछ दवा की गोलियां, खाना बनाने का चूल्हा खुले आसमान के नीचे रहता था। बरसात के दिनों में भोजन बनाने में विशेष परेशानी रहती थी किंतु मजबूरी थी कुटिया के अंदर तो जगह ही नहीं थी।

प्रात काल बाबा बस्ती में निकलते थे। लगभग छै फुट लम्बा इकहरा बदन  पीले रंग की हल्की सी पटलीदार पर्दनी, पीला टोपा जो हर मौसम  में उनके सिर का सुरक्षा प्रहरी था, टोपा से झाँकते हुए सफेद बाल जो  झुकते समय बालों की झुर्रियों पर डिजाइन सी बनाते थे। कभी नंगे पैर तो कभी कभी  हल्की सी चप्पलें एक हाथ में शोटा, दूसरे हाथ में थैला वो भी पीला  जिसमें चलते -फिरते अस्पताल की सामिग्री रहती थी।

वृक्ता नंद जी का कुटिया से गाँव की तरफ निकलने का समय लगभग निर्धारित ही था दस-पाँच मिनट का समय ही इधर-उधर होता था। उस समय पर उनके मरीज घरों से निकल कर अपने-अपने दरवाजों पर इंतजार किया करते थे। कहीं बाबा आगे न निकल जाएं।

बाबा को देख कर एक बच्चा चिल्लाया, "मैया आइजा पीरे बारौ बाबा आइगयौ, मल्लम पट्टी बारौ बाबा आइ गयौ।"

मैया निकल कर आई, "बाबा नेंक रूकियो।"

- हाँ-हाँ बोल क्या हुआ। 

- अरे बाबा मेरे या छोटे से बालकै बड़ौ फोरा भयौ ए।राति भरि नाँय सोयौ।

- तो फिर कुटिया पै लेआती। दिखाइ। 

बाबा ने बड़े गौर से देखा  उसे छूते हुए उंगली भी फिराई, "अरे हाँ,  ये तौ कई दिन में पकैगा। दबाई दूंगा सब ठीक हो जाएगा।"

बाबा नें थैला से कई  शीशियाँ निकालीं सब पर सरसरी नजर डालते हुए उनमें से एक शीशी को खोला, "हाँ ये काम करेगी।"

फोड़े को हल्का सा दबाया मरहम लगाया बालक कुनकुनाने लगा।

- बस-बस हो गया क्यों रोता है जब तक बाबा है कोई चिंता की बात नहीं है। ठीक है एक दिन छोड़ के फिर दिखाना।

सन्यासी आगे बढ़े। एक दिन में पूरा गांव तो घूम नहीं सकते क्योंकि गांव बहुत बड़ा है।

... सामने चौपाल से आवाज आई, "आइजा बाबा-बाबा आइजा आजु तौ एक कविता सुनाइ जा।"

बाबा चौपाल की सीढ़ियों पर चढ़ने लगे।

जी हाँ, चोंकिए मत। मेरी समझ में खुद नहीं आरहा है कि मैं बाबा को चलता-फिरता अस्पताल कहूँ या चलता-फिरता काव्य मंच। बाबा वृक्तानंद बहुत गजब के कवि हैं।कवित्त, सवैया, दोहा, कुंण्डली, जिकड़ी भजन उनके रचे हुए नाना प्रकार के छंदों के लोग दिवाने हैं। ग्राम्य स्तर से लेकर राष्ट्र स्तर तक जो भी राजनैतिक-अराजनैतिक घटनाएं घटित होतीं हैं, उनकी विषय वस्तु कविता के रूप में तुरंत गांव में जहाँ-तहाँ बैठे लोगों तक पहुंच जाती है। वृक्तानंद जी लोगों के आग्रह पर उनके बीच में चौपाल पर जा कर बैठ गए। सब बड़ी आतुरता के साथ उनकी ओर देखने लगे।

"हाँ बाबा हाँ सुनाऔ"

होली लगभग आने वाली है। बाबा ने अवसर को ध्यान में रखते हुए एक हास्य कविता पढ़ी। आप तो नव-रस राज हैं।

"कल हुए न राजी रुपयों पै"......

बाबा ने वातावरण को हास्य रस से सराबोर कर दिया। श्रोताओं के चेहरे खिल उठे।मूढ़ा पर बैठा नौजवान बोला, "बाबा और...."

- श्याम चरन अब मुझे चलने दो, जिनकी तीसरे दिन पट्टी होंनी है, वे मरीज मेरा बेसबरी से इंतजार कर रहे  होंगे। भैया सेवा ही मेरे जीवन का प्रमुख लक्ष है।

फिर किसी दिन सही ...

- अच्छा बाबा।

चौपाल से उतरते ही आस-पास के कुछ मरीजों ने  बाबा को घेर लिया उन्होने अपना थैला खोल रखा है। किसी को जुकाम की गोली, किसी को बुखार की गोली, तो किसी को फाया, किसी को मरहम, किसी को पट्टी देते हुए तेजी से आगे बढ़े क्योंकि चौपाल पर काफी समय चला गया। अभी तो भोजन-प्रसाद की भी तैयारी करनी है। वैसे तो वे भोजन एक ही समय लेते फिर भी घड़ी की सुइयाँ तो आगे बढ़ ही रहीं  हैं।

अपना निर्धारित क्षेत्र घूमते हुए बाबा कुटिया की ओर बढ़े। कुटिया पर पहले से ही बैठी हुई है जिकड़ी भजन मंडली बाबा को देखते ही लोगों ने उनके चरण स्पर्श किए। और उन्हें बताया कि बाबा कल सांय छै बजे से भजनों का कार्यक्रम वृंदावन में है और खिच्चो आटे वाले से सामना करना है क्योंकि बाबा उनके लिए भजन जो लिखते हैं।

यह एक तरह की गायन प्रतियोगिता है। सामने वाले के भजन का अपनी बारी आने पर तुरंत जवाब देना पड़ता है। उसके लिए जरूरत पड़ती है आशु कविता की, जबकि आशु कविता  बाबा के सबसे प्रिय खेलों में से एक है। वैसे तो श्रद्धेय वृक्तानंदजी कलाओं के भंडार हैं, बात-बात पर चुटकुले पढ़ना, लोगों को हंसना-हंसाना, हाथ की सफाई से जादू के करिश्मा  से चकित करना। उनकी की उत्कृष्ट आसू  कविता के कारण यह भजन मंडल हमेशा विजई घोषित होता रहा है।

बाबा वृक्तानंदजी ने कुटिया पर बैठे उन सब  लोगों पर सरसरी नजर डाली और बोले, "हां-हां, कल ही तो चलना है। मुझे समय से लेने आ जाना," कहते हुए कुटिया में प्रवेश कर गए। क्योंकि उन्हें तो अभी बहुत से काम करने हैं।

बाबा के रहन -सहन और उनके व्यक्तित्व की सरलता सामने वाले को सहज ही उनके प्रति श्रद्धा से भर देती है। बातचीत के अंदाज से अनूठा आत्मविश्वास झलकता है।

सन  1973-1974 में मैं मथुरा जनपद के गोबर्द्धन कस्वे में स्थित शिक्षक प्रशिक्षक विद्यालय के छात्रावास में रह रहा था। एक दिन अचानक छात्रावास के निकट ही गोवर्धन परिक्रमा मार्ग  में मुझे बाबा दिखाई दिए। श्री गिरिराज जी की परिक्रमा कर रहे थे। मेरी प्रसन्नाता का कोई ठिकाना नहीं रहा क्यों कि बाबा मेरे काव्य गुरू भी थे।  मैंनें उनके चरण स्पर्श किए और अनुनय-विनय कर थोड़ी देर को  विश्राम का वास्ता देते हुए, छात्रावास में लेआया। उन्हें देख कर मेरे सभी साथी एकत्रित हो गए। उस दिन हम लोगों के बीच बैठकर उन्होंने जो चर्चा की वह मुझे अभी तक याद है। थोड़ा सा जल ग्रहण किया और बोले,  "इस प्रांणि जगत में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। परम पिता परमात्मा ने उसे श्रेष्ठ बुध्दि सामर्थ्य से उपकृत किया है। मनुष्य को ईश्वर के इस उपकार के प्रति जरूरतमंदो, निरीह और असहाय प्रणियों की सेवा के साथ आभार नत होना चाहिए। सेवा संसार के सभी धर्मों का सर्वोपरि शाश्वत सत्य है। सेवा का संकल्प ईश्वरीय व्यवस्था में हाथ बटा कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

"प्रकृति के इस मूक संदेश को जानवर भी समझते हैं जिस कुत्ते को आपने टुकड़ा डाला है।वह आपके अप्रत्याशित सबसे बड़ा जिला दरबाजे पर बैठ कर आपकी सुरक्षा करता है।अगर मनुष्य जान कर भी अनजान बने तो यह उसका दुर्भाग्य ही है।"

ऐसा कहते-कहते अपने गंतव्य की ओर इशारा करते हुए बाबा दरवाजे से बाहर होने लगे। सब मूक शांत एक टक उनकी ओर देख रहे थे। उन्हें परिक्रमा मार्ग तक विदा करते हुए मेरा मन कुछ भीगा-सा अहसास कर रहा था। किंतु वापिस क्षात्रावास आना मेरी मजबूरी ही थी।

कभी-कभी कुछ बातें कुछ घटनाएं समझ में नहीं आतीं हैं। उन्हें हम बुध्दि से परे मानने के लिए मजबूर होते हैं। दो हफ्ते बाद जब मैं गांव में वापस आया, गांव में घुसते ही पता लगा कि चलता फिरता अस्पताल हमेशा के लिए चला गया है। क्योंकि उस समय  ग्रामीण अंचल में फोन जैसी कोई सुविधा नहीं थी। यह अप्रत्याशित सा समाचार सुनकर मैं विवेक शून्य सा खड़ा रह गया। इसके बाद तमाम विचार मेरी चेतना को घेरने लगे। परिक्रमा मार्ग में उनका दर्शन होना, छात्रावास मे सत्संग का संयोग बनना यह सब क्या था। क्योंकि  परिक्रमा  से लौटने के तीसरे दिन ही उनका पार्थिव शरीर पंच-तत्व में विलीन हो गया था। बाबा वृक्तानंद तो आज हमारे साथ में नहीं  है लेकिन छात्रावास में उनका दिया सेवा का संदेश आज भी मेरे साथ है।

                                    देवी प्रसाद गौड़

                                     मोती कुंज एक्सटेंशन

                                     निकट धौलीप्याऊ

               .                        मथुरा 281001

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