मुखौटा

उसके गए आधा घंटा हो चुका था। मेरे अंदर का शोर, सैलाब बनकर उमड़ रहा था। दिल दुखों का समंदर बन चुका था। ऊबड़-खाबड़ ख्यालों से सिर भारी हो गया। मुहब्बत की जिल्द-दर-जिल्द रिसने लगी थी। उसकी ठोस मर्दानी आवाज पूरे घर में गूंज रही थी – “सुनैना ! बेबसी से मुहब्बत का दामन आबाद नहीं हुआ करता। मजबूरी मुहब्बत को खोखला कर देती है। तबाह कर देती है।“

“पर हमारे पास क्या मजबूरी है, जैवीर ?”

“सुनैना हम तो मजबूरियों का खजाना हैं। गौर से देखो मजबूरी के अलावा है क्या हमारे पास?”

“हमारे पास बहुत कुछ है। हमारे पास चाहत है। एक दूसरे के लिए आदर है।“

मेरी आवाज को अनसुना कर वह बोलने लगा था – “मेरे दादा जी बहुत मर्मज्ञ व्यक्ति थे। संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। वे कहा करते थे, जिंदगी को खुद आजमा लेना चाहिए, वरना जिंदगी आजमाने लगती है। आदमी को मृत्यु के पहले सारा दुख-सुख प्रेम-नफ़रत और चाहत, सब कुछ आजमा लेना चाहिए, वरना आदमी मरकर भी नहीं मरता। उसे इस चक्र को पूरा करने के लिए जिंदगी फिर अपने पास बुला लेती है।“

उसकी ऊलजुलूल बातों से मेरा सिर घूमने लगा था। मैंने खीझते हुए कहा था – “और तुम, जो वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर हो, यह सब मानते हो।“

“हाँ सुनैना, मैं सब कुछ मानता हूँ। मैं जो था, फिर से वहीं होना चाहता हूँ। मेरे संस्कार मुझे बुला रहे हैं। मैं लौटना चाहता हूँ। मैं जहाँ था, वहाँ श्रेष्ठ था और पवित्र था। तुम्हारे साथ आकर अपवित्र हो गया हूँ।“

“ओह तो तुम्हें मैंने अपवित्र बना दिया। मतलब मैं अपवित्र हूँ? मेरे शरीर के रेशे-रेशे की लज्जत लेते समय तुम्हारी पवित्रता कहाँ चली गई थी?”

मेरी आवाज तेज हो गई थी।

हो, हो, हो - अट्ठाहास से कमरा गूंज उठा। “लज्जत!! क्या बात करती हो सुनैना तुम भी? क्या मैं ही अकेले कसूरवार हूँ और तुमने कुछ किया ही नहीं।“

उसका चेहरा और भी विद्रुप हो गया। उससे डर लगने लगा था। उसका कहना ठीक था। मैं भी उसमें उतना डूबी थी, जितना वह। बल्कि उससे कहीं ज्यादा टूट कर चाहा था उसे। उसके लिए अपना सब कुछ भूल गई थी। मेरे सर्वस्व को वह मात्र लज्जत लेना समझ रहा था।

उसको लगभग अनसुना करते हुए मैं फिर मैदान में डटना चाह रही थी। “जैवीर शरीर का जर्रा-जर्रा तुमको सौंप दिया, फिर भी तुम ऐसा कह रहे हो।“

“शरीर, शरीर और शरीर! तुम शरीर हो मगर घिनौना। सुनना चाहती हो तो सुनो, सुनैना।“

वह भी दहकने लगा था।

“तुम औरत नहीं कूड़ा हो। बत्तीस साल में शरीर झूल गया है। न रस न गंध। न स्पर्श सुख। होंठ सूख कर लत्ता हो गए हैं। शरीर फूल कर थुलथुल हो गया है। इतना भारी-भरकम शरीर और छोटे-छोटे टिकोरे से स्तन! बरगद का पेड़ जगह खूब छेंकता है, मगर फल आम के टिकोरों से भी गए बीते! तुम बरगद की तरह मेरी वजूद को छेक रही हो, मगर इस छेका-छेकी का हासिल कुछ भी नहीं। दिन में ऑफिस की किचकिच रात में औरत की छोटी सी छाती। किस्मत में पलीता लग गया है। बहत्तर छेद वाली फूटी किस्मत लेकर कहाँ जाऊं, क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता। हटाओ यह चाय नाश्ता। दूर हो जाओ, तुमको देखना कुंठा को देखना है। सड़े भूसे सी बस्साती देह से उल्टी आने लगती है। पुस्तों की गंध फेंकती रहती हो।“

“ऐसे मत कहो जैवीर। तुम्हारे सिवा कौन है?”  

मैं पिघल गई थी। मेरे अंदर की लाचार औरत जिंदा होकर गिड़गिड़ाने लगी थी। मैंने हाथ जोड़ लिये थे।

“सब तो हैं। ससुरा पूरा छोटकान आगे–पीछे लगा रहता है। भाड़े के चाचा-चाची, भाई-भौजाई, मामा-मामी सब तो हैं। गंधाता पूरा कुनबा खड़ा है। प्रेम विवाह में पाना तेरे हिस्सा गया। खोना मेरे हिस्से आया। माँ-बाप, भाई-बहन, दोस्त-यार और रिश्तेदार सब दूर हो गए। साला इन बिल्लौरी आंखों में ऐसा डूबा कि डूब ही गया। दलित लड़की से प्रेम ने हर तरह दरिद्दर बना डाला। जैवीर सिंह का खाली जैवीर बचा। सिंह कटा जैवीर किसी काम का न हुआ। न अपने अपने हुए, न पराए अपना पाए। प्रगतिशीलता और आँखों के भंवर में फंस कर साली किस्मत का पलीता निकल गया। तुम्हारे शरीर से तुम्हारे पूर्वजों की बास फूटती रहती है। और बार-बार बच्चा करने की ठानती हो। बच्चा हो भी गया, तो किस जात का माना जाएगा? गंध फेंकती हो। मत पड़ना मेरे सामने।“ इतना कह वह दनदनाते हुए ऑफिस के लिए निकल गया था।

मैं कबाड़ सा किस्मत लिए धम्म से सोफे पर ढह गई। सूखी आँखों में सूनापन उतर आया। कलकल बहती नदी के पानी की जगह रेत ने ले लिया। तूफान ने बचे-खुचे पानी को भी गंदला बना दिया। मन टूट गया। नियति कैसा खेल खेल रही थी। इतना अच्छा ओहदेदार पोजीशन पाने के बाद हलाहल पवित्र पानी में इतनी रेत कहां से आ गई! सुनैना गौतम देश की उभरती इतिहासकार के साथ इतिहास कौन सा खेल खेलने वाला था?

टूटे मन ने विभाग जाने से इंकार कर दिया।

प्रेम में जाति कब घुस गया। क्या सुंदर शरीर भी छोटी जात की होने से असुंदर हो जाता है? क्या प्रेम जाति और नस्ल के हिसाब से पूरा गणित जमा कर किया जाता है? फिर मान भी लिया कि शरीर सुंदर नहीं, तो शरीर के असुंदर होने का जाति से क्या वास्ता?  

कई प्रश्न थे, जो अजगर बनकर मन को जकड़ रहे थे। मैंने विभाग फोन कर दिया, “अग्रहरी जी आज नहीं आ सकूंगी। सीएल कल आकर भर दूंगी।“

विभाग न जाने की बात ने और अकेला कर दिया। और भी ज्यादा खालीपन उतर आया। खुद से डर लगने लगा। दो-तीन बार बालकनी से झाँक कर देखा भी, फिर मन ने कहा, “नहीं, नहीं यह कदम ठीक नहीं। कुछ और सोचना चाहिए।“

कदम खुदबखुद बेडरूम की ओर बढ़ गए और आदमकद शीशे के सामने जाकर ठहर गए। शीशे के सामने खुद को खड़ा कर, छिलके की तरह एक-एक वस्त्र नीचे गिरने लगे, जैसे पराजित शत्रु कदम पर लोटने लगते हैं। शरीर दर्पण में समा गया। मेरे, यानी, सुनैना के सामने, सुनैना खड़ी हो गई। खुद का सामना खुद से होने जा रहा था।

जिंदगी में पहली बार शीशे में उतर आई मैं। खुद को देखने। खुद से आंख मिलाने, बेहद दर्द भरा था। खुद को देखना, खुद में उतरना कितना कष्टदायक होता है, आज जाना। मैं खुद के सामने खुद, यक्ष प्रश्न की तरह खड़ी थी।     

दर्पण में मैं थी। बाहर भी मैं थी। दर्पण की सुनैना और बाहर की सुनैना को गहरी नजर से एक दूसरे को देखा। बाहर की सुनैना ने दर्पण की सुनैना के एक-एक अंग को निहारा। ठहरे पानी का रंग जैसे काई बन कर पत्थरों के कड़कपन को सोख लेता है, उसी तरह काया में कालिमा उतर आई थी। समय ने बड़ी चालाकी से शरीर की रंगत सोख लिया था। जैसे चमकते सूरज को बादल की छाहीं घेर लेती है, वैसे ही अंगों पर काली छाहीं पसरी हुई थी। शरीर की तेज कमजोर पड़ गई थी। निश्चित ही जैवीर को शरीर के बहाने नहीं बाँधा जा सकता है। वह भी, जब उसके मन पर जाति का बज्र पड़ चुका हो।

मैंने बुदबुदाते हुए शरीर को चादर से ढंक दिया। दर्पण में झिलमिलाती काया ओझल हो गई। शरीर को जैवीर, नौकरी और घर में घिसना सही नहीं था। अपना वक्त यूं ही बरबाद करना ठीक नहीं था। मजदूर के लिए शरीर ही पूंजी होती है। औरत के लिए भी शरीर पूंजी ही तो है। छोटी पूंजी के फेर में बड़ी पूंजी का अवमूल्यन कर दिया।

मन की बात पकड़ते दर्पण वाली सुनैना बोल उठी, “पति को छोटी पूंजी बोलती हो। कितनी नासमझ हो। प्रोफेसर होकर ऐसी बात सोचती हो। दिमाग है कि गोबर।“

दर्पण की सुनैना को तेज नजर से घूरती बाहर वाली सुनैना बोली, “छाया हो, छाया ही बनी रहो। नकल असल नही हो सकती। बकचोदी मत करो।“

इतने दिन बाद इतने देशज शब्द के उच्चारण से दोनों सुनैना हंस पड़ीं। हंसती औरतों को देख दुख दुम दबाकर भाग चुका था। मैंने मन में प्रण लिया, काया की माया के रचाव के लिए काया पर काम करना होगा। नौकरी, पति और घर में पिसते तन को संभालना होगा। मतलब अपनी जिंदगी जीने का जुगाड़ जमाना होगा। मैं निर्णय पर पहुंच गई।

दूध वाला दूध दे गया था। स्ट्रॉन्ग कॉफी का मग लेकर पोर्च में आ गई। गमले में लगे गुलाब मुस्करा रहे थे, मानों पूछ रहे हों, कैसी हो सुनैना, आज मौका मिला, हमसे मिलने का?

पति के जाने के बाद मासूम फूलों के बीच बैठना बहुत अच्छा लग रहा था। फिर कमरे घर का अहसास देने लगे थे। सुबह की उगी बोझिलता बहुत हद तक जा चुकी थी। फूल मिट कर भी खूशी बाँटते हैं। बरबस ही होठ लरज उठे, “आई लव यू रेड रोज!” इतना कह कर सीना ताने खड़े खिले गुलाब को आहिस्ते से छू लिया। गुनगुनी धूप में क्यारियाँ दमक रही थीं। कॉफी की चुस्की लेते-लेते निर्णय लिया जा चुका था कि आज विभाग नहीं जाना, सो कुछ ढंग का काम किया जाए। डायरी या कविता? नहीं इससे भी बेहतर कुछ!

रजनीगंधा फूल चुकी थी उसकी सुगंध पूरे कमरे में तैर रही थी। कॉफी खत्म कर कदम खुद-ब-खुद कमरे की ओर बढ़ चले। कमरा वैसा ही था, जैसा छोड़ा गया था। आधे घंटे पहले का गुस्सा अभी भी तकियों और बेड शीट की सलवटें बयाँ कर रही थीं। सड़े भूसे सी बस्साती देह से उल्टी आने लगती है। सड़े भूसे सी बस्साती देह ... सड़े भूसे सी....

नह्हीं ... खामोश दीवारें मेरी चीख से लापरवाह खड़ी थीं।

दीवारें भी पराई जान पड़ीं।

कुछ लम्हों तक सब कुछ सुन्न सा रहा। धीरे–धीरे चेतना लौटी। हिलते-डूलते पर्दे बुलाते से लगे। बड़े चाव से उन तक पहुंची। लड़ते वक्त जैवीर पर्दा खींच दिया करता था। खींचे पर्दों को मैंने ऊपर मोड़ दिया। ताजी हवा के साथ रोज की तरह साफ धूप कमरे में दाखिल हो गई। धूप के कुछ टुकड़े मुझे सहलाने लगे, मानों सूरज, बेटी को भरोसा दे रहा हो। हवाएं रह-रह कर नाच रही थीं। अवसाद धीरे–धीरे घुलता गया।

जलते वर्तमान से मन धीरे-धीरे अतीत के बियावान की टोह लेने लगा। अपनी ही जिंदगी सिनेमा की पुरानी रील की तरह चलने लगी। इस खेल में मैं किरदार और दर्शक दोनों थी।    

सुख ने सुख को खोज लिया। हराभरा पानी सा लहराता अतीत हिलोर लेने लगा।

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“बिटिया रिजल्ट कैसा बना?” अम्माँ ने भैंस की नाद में भूसा डालते पूछा।

“फस्स किलास में पास हुई हूँ अम्मा।“ कहते हुए मैंने माँ और भैंस दोनों को चूम लिया। माँ ने आशीश दिया और भैंस ने पूंछ उठाकर दुम पर बैठी मक्खियों को उड़ा दिया और जुगाली करती हुई दोनों को मोटी–मोटी आँखों से देखने लगी, मानों पूछ रही हो कि क्या हुआ। क्यों आसमान सिर पर उठाए फिर रही दोनों, माँ-बेटी। पागल कहीं की, ठीक से खाने भी नहीं देती। फिर पता नहीं क्या सोच कर मेरी बाँहें अपनी खुरदुरी जीभ से चाटने लगी।

पास होने की खबर आग की तरह फैल गई।

“नखड़ू की धिया फस्स किलास पास भई है। नखडू की धिया फस्स किलास ...।“ चमरान टोला में खुशी की बरसात हो गई थी।

“बड़ भागन बेटी जनी है सरोजा। देखो कैसे फस्स किलास पास हुई। शिक्खा का जोत जला दिया सुनैना ने। पूरा घर अजोर करेगी।“ जोखन बो अपनी देवरान से कह रही थी।

“बात तो ठीक बाँची हो दीदी। मगर ...!” देवरान ने बात अधूरा रहने दिया।

“मगर क्या, पूरी बात बोला कर। अधूरी बात पेट में गुड़गुड़ करे है।“ जामवंती ने देवरान से निहोरा किया।

“मगर जे बात हो रखी है दीदी कि बिन बाप की बेटी आगे पढ़ेगी कैसे?” कैसे शब्द पर देवरान की आँख गोल–गोल घूम गई। फिर हाथ नचाते बोली, “महतारी ने कुटाई-पिसाई और मेहनत मजूरी करके ईहाँ तक पहुंचा दिया। आगे का पयान कठिन होवे है।“ देवरान मगर को बिस्तार दे चुकी थी।

“संवरू की धीया बात तो ठीक बोली हो। मेरी बात भी कान में धर लो, मुहल्ले की बेटी है। मुहल्ले वाले देखेंगे। चार की लाठी एक की बोझ होवे है।“

जोखन बो के चेहरे पर भरोसा, प्यार और करुणा तीनों का मिला-जुला निखार तैर गया। फिर बोल उठी, “मैं तो अपनी कजरी और उसमें कोई भेद न माने हूँ।“

जामवंती की आँखे तर होते–होते बचीं।

“जे बात निमन है दीदी।“ देवरान ने भी हामी भर दिया। “उसे देख के मेरी छाती भी नरम-गरम होने लगती है।“

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बारह साल पहले चौदह अप्रैल को छोटकान टोले के छोटा गोला में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा लगा दी गई थी। ग्राम समाज की यह जमीन भूमिहीन योजना अंतर्गत मेरे पिता नखड़ू के हिस्से आई थी। तीन बिसवा में फैला यह प्रांगण छोटकान टोला का क्रियाकलाप केंद्र हो गया था। शादी विवाह के साथ-साथ अंबेडकर जयंती पर गाना–बजाना भी होने लगा। मूर्ति लगाने के एक साल बाद लारी में बोल्डर लादते बखत बोल्डर सरककर बाबा के मुड़ पर आ गिरा। बाबा वहीं ढेर हो गया। मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ टूटा,  मगर धीरज न डोला। मूर्ति के हाथ वाली किताब मुझे ढाढस देती रहती।

बाबा भी कितना प्यार–दुलार करता था। वह अक्सर उसे प्रतिमा के पास ले जाता और सवाल करता – “बेटिया बाबा साहेब के हाथ में क्या है?”

“किताब।“

“किताब क्या करती है?”

“ज्ञान देती है। नौकरी देती है। भरोसा देती है।“

मैं रटी-रटाई बातें बोलकर ताली बजाने लगती। खुश होकर नाचने लगती।

बाबा मेरी बात सुनकर निहाल हो जाता। एक निरक्षर बाप ने अक्षर की तड़प बेटी के दिल में रोप दी थी। वह न होकर भी था।

बाबा की याद जेहन में उतरते ही, जी कितना कमजोर हो जाता है। मेरा बाबा था भी कितना सादा, कितना मेहनती। जाने के पहले ही बाबा साहेब की मूर्ति लगा गया था। बाबा साहेब के कर्मों से जोड़ गया था। अनपढ़ बाबा कितना सयाना था। वह दिन आज भी उतना ही चटख है -

साँझ होते-होते अहाते में छोटकान टोला उतर आया था। परेमूबो, रामहरखबो, जामवंती, रगड़ूबो काकी, परमानंदबो काकी, बटोहीबो काकी, और बल्लीबो भौजी के साथ छोटकान टोला के तमाम नर-नारी और बाल–बच्चे खुशी का इजहार करने आ चुके थे। छोटा गोला में आ चुके थे।

“औरतें एक तरफ और मरद एक तरफ भले मानुषजात की तरह बैठो। अरे, ओ अवधूवा के पूत, बाबा साहेब के पीछे नहीं, आगे बैठ। बेटा छोटई पंचलैट जला दे रौशनी का टैम हो गया।“ कहते हुए किशोरीदादा बाबा साहेब के बगल में बीछी खटिया पर बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठ गए।

छोटई ने पैंचलैट में मिंटल बाँध दिया। टंकी में हवा भरने लगा। रौशनी धीरे–धीरे मिंटल में इकट्ठा होने लगी। थोड़ी ही देर में मिंटल जल उठा। छोटई ने पंचलैट को बाँस के थुन्नी में लटका दिया। छोटी सी जमीन पर छोटा सा चाँद चमकने लगा। सबके चेहरे रौशनी से रंग गए। किशोरी दादा खड़े हो गए। और आखर छेड़ दिए –

“बोलो, महातमा कबीर की –“

समवेत स्वर – ज्जै....।

“बोलो, महातमा फुले की”

समवेत स्वर – ज्ज्जै।

“खाए-पिए मनई की तरह जयकारा लगना चाहिए।“ सोखई काका ने टोहक्का मारा।

किशोरी दादा फिर दहा़ड़े -

“बोल्लो, बाबा रैदास की...”

समवेत स्वर – ज्ज्ज्जै.....

“बोलो – बाबा साहेब अंबेडकर की....”

समवेत स्वर – ज्ज्ज्जै...

“बोलो संविधान की….”

समवते स्वर – ज्ज्ज्ज्जजै.....

तीन बिसवा (छोटा गोला) में उत्साह की लहर दौड़ गई। आकाश सहित चाँद–तारों ने छोटकान में पहली बार इतना उत्साह, इतनी उमंग देखा।

“छोटकान टोला के सभी लोगों को बताते बखत बड़ी खुशी हो रही है कि नखड़ू और सरोजा की बेटी सुनैनियाँ साइंस में फस्स किलास में पास हुई है।“

“सुनैनिया नहीं, सुनैना कहो दादा।“ छोटई ने किशोरी दादा को टोका।

“भाई हमारे लिए वह, सुनैनिया ही है। पढ़-लिख कर बड़ा हाकिम बनने के बाद भी सुनैनिया ही रहेगी। हमारा परेम रंच मात्र बायल नहीं होगा। आज छाती तर दी है। बूढ़ी हड्डियाँ में अगर ताकत बचा होता, तो मैं उसके लिए शरीर गला कर उसे उसके सपनों तक पहुंचा देता।“ कहते हुए किशोरी दादा हंसने लगे, हो हो हो।

“बाकी बात जे रही कि बिटिया आगे कैसे पढ़ेगी, ई बात जरूरी है। हमें इसी पर बिचारना है। बैठकी बतकही इसीलिए बुलाई गई है।“

सभी लोग गुनने लगे। शोर मचाते बच्चे ठमक गए। रोते-बिलखते दूध-मुहें बच्चों के मुंह में माताओं ने स्तन ठूंस दिया। मेरी और माँ की आखें बाबा साहेब पर टिकी हुई थीं। रौशनी लपर–लपर बरस रही थी।

थोड़ी देर तक सब थम गया सिवा सांसों के। कुछ देर बाद -

“दादा हम एक बात कहें,” जामवंती ने हाथ जोड़ दिया।

“कहो, बहू।“ बड़े-बुजुर्गों ने एक साथ कहा। हाथ पर हाथ धरे बच्चे तक जामवंती को निरखने लगे।

“सरोजा ने सुनैना को कोख से जन्मा है, मगर हमने उसे आँख से जन्मा है। वह छोटकान के सामने बढ़े और आगे बढ़े। छोटकान टोला की बेटी होने के नाते उसमें हमारा भी अंश है। इस धरती का अंश है। औरत धरती होती है। इसका बाप सदा सबके दुख-सुख में खड़ा होता था। मेरा सबसे प्यारा देवर था वह। आज वह नहीं है, तो क्या हुआ हम हैं, पूरा टोला है। इसके लिए हमें सोचना होगा। पढ़ेगी, तभी बढ़ेगी। हम अनपढ़ों में कहाँ ऐसी बेटियाँ पैदा होती हैं। अब हुई है, तो हमें सोचना चाहिए। बगिया में फूल का बिरवा उग आया है, तो संभालना हमें ही होगा। पढ़ाई–लिखाई का जिम्मा पूरे छोटकान की होनी चाहिए। उसे बेटी कहते हैं, तो बेटी की तरह बरतें। क्या पता, सुनैना छोटकान टोला को बड़कान टोला से भी बड़कान बना दे। मेरे लिए तो जैसे कजरी और सुनैना।“

छोटा गोला तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। 

किशोरी दादा खड़े हो गए। “जगतराम की बहू भी जगतराम जैसी। लूटाने के लिए दोनों परानी हमेशा तैयार रहते हैं। जिस समाज में ऐसी बहुएं हों, उस समाज को आगे बढ़ने से साक्षात विधाता भी नहीं रोक सकते। श्रमिक जातियाँ ऐसी ही होती है। बिटिया यह बूढ़ा तुम्हें दिल से आशीशता है कि कभी भी बल-विवेक न घटे।“

जामवंती ने हाथ जोड़ दिये और सुनैना को अंकवार में लेती बोली, “आज से सुनैना को एक माँ और मिल गई।“

“एक माँ नहीं कई माताएं मिल गईं।“ कई कंठ पुकार उठे।

“खाली माताएं ही नहीं, बाप-काका, दादा, भाई – भौजाई सब सुनैना के लिए खड़े हैं।“ कई स्त्री-पुरुष एक साथ बोल उठे।

किशोरी दादा बोलने लगे, “हम सब मजूर आदमी हैं। तंदरुस्त पौधे को देखकर हमारी आंखों की चमक बढ़ ही जाती है। सुनैना को अपना मानने के मतलब उसकी जिम्मेदारी को अपनाना हुआ। मड़ई से लेकर ढोर तक हम साथ-साथ उठाते हैं। सुख में साथी तो अमीरों की निशानी होती है। हम गुरबत में दुख के साथ बनकर अपनी किस्मत को धार देंगे। आप लोगों को मंजूर है!!”

“मंजूर है, मंजूर है।“ पूरा छोटकान बोल पड़ा।

“तब ठीक, आज से बिटिया की पढ़ाई-लिखाई और खाना-खोराक की जिम्मेवारी छोटकान टोला के मत्थे। और छोटकान टोला की उम्मीद सुनैनिया के मत्थे। मंजूर है?”

“मंजूर है।“ सब बोल पड़े।

सतनरायन और सतनरायन की जोरू खाँची सिर पर लादे आते दिखाई पड़े। लोगबाग पानी और पत्तल की व्यवस्था में लग गए। रोटी और झन्नाटेदार प्याज-मिर्चा वाले चोखे ने रंग चोखा कर दिया। सब सतनरायन और उसकी मेहरारू को सराहने लगे। सबकी आँखों में तृप्ति उतर आई थी। आधी रात जा चुकी थी। चाँद-तारों की शामियाना तना हुआ था। ठंडी हवा धीरे–धीरे बह रही थी।

एक पहर रात बातचीत और खानपान में जुदा हो गई। विशाल रोटी की तरह चाँद आकाश में उगा हुआ था। “अब गवनई का बखत है,” कहते हुए किशोरी दादा की बाँछें खिल गईं।

मंडली ढोल-मजीरा ठीक-ठाक करने लगी।        

भोला, देवलासी और कैलाशी बुआ खड़ी हो गईं। गायक मंडली तैयार हो गया।

छेक्कन, रमई, जोखू और अवधू ने ढोलक, झाँझ, ताशा और डफली संभाल लिया।

गायकों ने राग छेड़ दिया -  

मोरे भईया, मोर बहिनी

करम के लेखा जाई धूल

खिलावा जगत में

शिक्षा  के फूल।

मेहनत मजूरी और ईमानदारी

सच्चाई और खुद्दारी

यही वंचितों के बाटे आधार

पसीने बहै तो बहै

शरीर पीराय तो पीराह

कबहूँ होईहा मत निराश

रात चाहे गहन रहे

सबेरा के मत छोड़िहैं आश।

परकिरती के किरती

बाकी सब झोल

सब मिलके रइहा

मत बोलिहा बोल कुबोल।

डिमक-डिम, डिम, डमक, डम, डम।

छोटा गोला झूम रहा था। धीरे-धीरे गवनई थमा, भोर की आहट होने लगी।

“तो पंचों अब से सुनैनिया की जिम्मेवारी छोटकान टोला की। भोर की किरन फूट रही है। काम–धाम पर लगना चाहिए।“

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“का हो, जगदंबा कल छोटकान टोला में बहुत रौनक थी।“ पुष्पेंद्र चौबे ने अपने चचेरे भाई जगदंबा से सवाल किया।

“हाँ, भईया थी। नखड़ूआ के बिटिया दस पास की है। उसी खुशी में उतिराए थे ससुरे।“ सुर्ती मलते जगदंबा ने जवाब दिया।

हो हो....। दोनों जन हंसने लगे।

“छोटी नदी थोड़े से पानी में उफनने लगती है। और जेठ में नंगी होकर पसर जाती है।“  “सही कह रहे हो पुष्पेंद्र। मगर याद रखना, छोटी नदी हर साल भेंट लेती है। दो-एक हर साल काल के गाल में समा जाते हैं। नदी के पाट वाली मिट्टी में न जाने कितनों की मिट्टी मिली हुई है। अरे बावलों इतनी कमनसीबी में भी फर्स्ट आई है। और बड़कान टोला के लौंडे चारों खाने चित्त हो गए हैं। खाली भैरो पांडे का भतीजा थर्ड डिविजन में पास भया है। नदी का पानी सीमा तोड़े उसके पहले कुछ सोच लो। आग की बाढ़ बढने से पहले बुझाना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। उसकी आँखों में सपने भरे हुए हैं। दस पास होना सपनों की पहली सीढ़ी है। आगे बढ़ने के पहले रोक लो। मैं तो कहता हूँ उसकी माँ के साथ उसे भी काम पर रख लेना चाहिए। कॉलेज गई तो छोटकान टोला हाथ से फिसला समझो। कहते हुए गजाननजी हाँफने लगे।

पुष्पेंद्र फिस्स से हंस दिए। “गजानन दादा बुढौती के साथ दिमाग भी बौरा गया है। कहाँ हम अऊर ऊ राई। सैकड़ों पीढ़ी पीछे हैं, वे सब।“

बिना विचलित हुए गजानन बोले, “हंस लो, हंस लो। छोटा गोला में खड़ी मूर्ति देखो हो?”

अब की जगदंबा बोला, “हाँ देखा है, अंबेडकर की है।“

“इतने ही ज्ञान पर उतिरा रहे हो। उसी ने संविधान बनाया। उसी के रास्ते पर अगर छोटकान की यह कन्या चल पड़ी तो! अब सोचो और हंसो।“ गजानन दादा मौज लेते बोले।

दोनों सोच में पड़ चुके थे। दम साध कर और साँसों पर काबू पाते ही गजानन फिर समझाने लगे –

“आपकी परधानी भी जा सकती है। पढ़ेगी तो छोटकान टोला को समझाएगी। बिन हर्रे-फिटकरी वाला वोट बैंक गया तो समझो सब गया। पढ़ने से उसे गुलामी का ज्ञान हो जाएगा। ज्ञान छूत की तरह फैलता है। गुलाम कौमों का ज्ञानवान होना ठीक नहीं। सुधार लो।“

गजानन दादा का मुंह फिर गजुआ गया था।

“हूँ। बात तो ठीक बाँचे हो दादा। ससुरी छोट जात को कुंकरौछी होती रहती है। राँड का पोंछ काटना होगा। न अपनी तो दुम सहलाएगी और हमारी नाक में दम करेगी। दुम का इंतजाम करना होगा।“ फिर जगदंबा को हाँक लगाते पुष्पेंद्र बोले, “जगदंबा, साँझ को नखड़ू की लुगाई को बुलाना तो जरा। याद रहे, नरमी से बातचीत करना। मोहकड़ में फंसी गर्दन घी के बुते ही निकलती है।“

“अरे पुष्पेंद्र बाबू, उभुर-चुभुर मत करो। आज शाम को मानस पाठ रखो। सारे बड़कान के बीच बात भी रख दी जाएगी। सबकी मर्जी से कदम उठाओ। आखिर छोटकान टोला छटका तो सबको हर्ज होगा, अकेले तुम्हारे ही गरज की बात थोड़े ही है। बड़कान का भी ओट चाहिए कि नही?”

गजाननजी ने आंख को गोल-गोल करते बोले।  

“सही कहे हो दद्दा। जगदंबा ऐसा करो आज बड़के हनुमानजी के मंदिर में सुंदरकांड के पाठ का इंतजाम करो। सबको संदेश दे दो। धर्म-करम और समाज काज की बात, दोनों महावीरजी ही सुलझाएंगे अब।“

अंधिरौटा हो चुका था। आकाश में तारे आग के बुरादों की तरह लहक रहे थे। चंदा के उगने की आहट हो गई थी। धीरे–धीरे अग्नि कुंड सा चाँद आकाश में दहकने लगा।

गलभग दस बिगहा में फैले हनुमान मंदिर प्रांगण में अमरूद, नीबू, नीम, आम और बड़ी सी बागवानी जिसमें गुलाम, रातरानी, अढ़ौल, बेला और तुलसी की क्यारियों से लकदक थीं। अत्यंत पुराने और विशाल मंदिर के बगल में मुख्य पुजारी छविनाथ शास्त्री का आवास था। मुख्य पुजारी के सामने लगभग बिगहे भर की दूरी पर पश्चिम दिशा में सहायक पुजारियों के साथ–साथ मंदिर के सेवकों के लिए छोटे–छोटे कमरे कतार से खड़े थे। मंदिर के बाएं बड़े से जगत से घिरा बड़ा सा कुंआ था। यही कुंआ मंदिर, पुजारियों, बागवानी और प्रांगण की खेती के लिए पानी की आपूर्ति करता था।

मंदिर के ऐन सामने बड़े से बरामदे में बड़कान टोला के लोग आ चुके थे। औरतें भोजन पानी की व्यवस्था में लगी हुई थीं। बच्चे खेल-कूद रहे थे। उधम मचा रहे थे। पाँच-सात पेट्रोमैक्स जला दिये गये थे। पूरे प्रांगण में रौशनी दमक रही थी।

मुख्य पुजारी ने हनुमानजी की आरती करना शुरू कर दिया था। रामायण मंडली बाज-साज में लग गए। एक लाउडस्पीकर नीम के पेड़ पर टांग दिया गया।

व्यासजी - हर हर महादेव...

समवेत स्वर – हर हर महादेव...

व्यासजी - बोल अंजनी नंदन हनुमान क्की....

समवेत स्वर – ज्जजै....

लाउडस्पीकर ने आवाज को आकाश तक पहुंचा दिया।

व्यासजी – बंधुओं आज के इस कार्यक्रम का विशेष प्रयोजन है। हम प्रयोजन की बात बाद में करेंगे पहले भक्तराज और कलयुग के महादेवता हनुमान को प्रसन्न करने के लिए सुंदरकांड का पाठ होगा। पहले केशरीनंदन खुश हों फिर प्रयोजन की बात होगी। बोलो केशरीनंदन की.....।

समवेत स्वर – ज्ज्जै....।  

व्यासजी ने राग छेड़ दिया,

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहाँ विश्राम।

कीर्तनियों ने दोहे को कई बार दोहराया। उसके बाद व्यासजी बड़कान को संबोधित करते हुए दोहे का प्रसंग सहित अर्थ खोलने लगे – “देवताओं ने पवनसुत हनुमानजी को जाते हुए देखा। उनको विशेष बल-बुद्धि जानने के लिए उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को उनकी परीक्षा लेने के लिए भेजा। भक्त जनों रामकाज को पूरा करने वाले महावीर जैसे सुरसा की परीक्षा में पास हुए वैसे वे हमारा भी कल्याण करेंगे। हमारे सामने उत्पन्न बाधा को दूर करेंगे।“

दूसरे दोहे के शुरू करने के पहले व्यासजजी समझाने लगे- भगवान श्रीराम कृपानिधान हैं। वे शरणागत सभी छोटे-बड़ों का यथोचित कल्याण करते हैं। उसके लिए बस दुष्टकारी शक्ति से कृपाकांक्षी को अगल होने होता है और प्रभु काज में सहयोगी होना होता है, जैसे विभीषण ने किया –

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।

व्यासजी समझाने लगे अर्थात, शरणागत विभीषणजी का स्वागत करते हुए प्रभु श्रीराम कहते भए, जो , सगुण भगवान के उपासक हैं और परहित में लगे होते हैं, नीति और नियमों का पालन करते हैं, जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम दिखता है, वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान प्रिय होते हैं।

बड़कान टोला में भक्ति का अमृत रस बह रहा था। लोगों का हृदय भगवानमय हो रहा था। मगर पुष्पेंद्र की कचोट बढ़ती जा रही थी। वे मन में बुदबुदा उठे, “ससुरी सरोजा विभिषण थोड़े ही, जो इतनी आसानी से बात मान जाए। अगर छोटकान टोला सुधर जाए, तो अबकी उनको मंदिर में प्रवेश करा दिया जाएगा। हाँ, थोड़ी दूर से, मूर्ति को छूने नहीं दिया जाएगा। भगवान को साझा करने से अगर बात बन जाए तो हरज ही क्या है।“

फिर एक मन संदेह करने लगा, “ससुरों ने पोथी वाली मूर्ति लगाकर धरम-करम का नाश करना शुरू कर दिया है। अब हनुमानजी ही नैया पार लगाएंगे।“

उनके अशांत मस्तिष्क में व्यासजी के शब्द धीरे – धीरे पड़ने लगे –

सुनत बिभुषनु प्रभु कै बानी। नाहीं अघात श्रवनामृत जानी।

पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।

अर्थात विभिषण प्रभु वाणी सुनकर गदगद हो गए। प्रभु की वाणी अमृत के समान विभिषण की कलुषता हरने लगी। वे बार-बार प्रभु का चरण गहने लगे।  उनका हृदय अपार प्रेम से भर चुका था।

किर्तनियों ने खूब प्रेम से राग और साज का साथ दिया। पूरा मंदिर प्रांगण भक्ति रस का सरोबार हो रहा था। सुंदरकांड का समापन करने के बाद  व्यासजी बोले – “हाँ पुष्पेंद्रजी अब कहिए क्या बात है। अब महावीरजी भी सहायक होंगे।“

पुष्पेंद्र और गजानन दादा दोनों माइक पास आकर हाथ जोड़कर बैठ गए। दोनों दादा के चेहरों पर युगों की इकट्ठी विषाद उतर आई थी। पुष्पेंद्रजी बोलने लगे – “मरजाद चरक रही है। ढोर-गवाँर, जनम-जनम के गुलाम पोथी बाँचने के लिए मरे जा रहे हैं। नया मामला सामने आया है। सरोजवा की बेटी सुनैना दसवीं में फस्स किलास आई है।“

“शिव, शिव घोर कलयुग।“ व्यासजी का चेहरा बेरंग हो गया।

“अब, जब दरिद्दर जाति वाले पढ़ेंगे लिखेंगे तो हमारे हिस्से क्या बचेगा? बड़कान की सहूलियतों में पहला पलीता लग चुका है। भाईयों विचारो कुछ। कुछ ऐसा सोचो कि सरोजा की बिटिया की पढ़ाई छूट जाए और उन्हें भान तक न हो।“

“ई का अंट-शंट सोचते रहते हो तुम लोग। पढ़ ऊ रही है और मरोड़ तुम लोगों के पेट में उठ रही है। अरे ऊ पढ़ेगी तो तुम्हारी नाक कैसे कटेगी? अछूत ही सही, है तो गाँव की बेटी। पढ़ेगी और आगे बढ़ेगी तो ग़ॉव जवॉर का ही नाम होगा। मैं कहता हूँ। हनुमानजी का नाम लेकर उसको कुछ इनाम-वकराम दो। पूरा छोटकान मुरीद हो जाएगा।“ धर्मेंद्र तिवारी गरजते-लरजते बोले।

“तिवारी जी बकलोलई में पूरी पीएचडी कर लिए हो। अपनी जात बिरादरी और मरजाद की बात करते बखत तुम्हारे जीभ में दही जम जाती है। मगर छोट जातियन बदे करेजा काट कर रख दोगे। तुम्हारे जैसे विभिषणों से कुल का नाम गंदा होता है।“ व्यासजी का ब्रहमाण्ड सुलगने लगा।

गजानन दादा ने कमान संभाला, “हम मानव में श्रेष्ठ हैं। यह पदवी भगवान ने दी है। भगवान की बात टारना मनुष्य योनि की बात ना है। हमें सरोजा और उसकी बेटी दोनों को ठीक ठाक मजूरी पर रख लेना चाहिए। कमासुत जात के लोग मजूरी की बात झट से समझ जाएंगे। थोड़ा नरमी व्यवहार करने पर वह अपने जात बिरादर की भी न सुनेगी। कल जगदबा को भेजकर दोनों माँ बेटी को बुलाकर काम दे दिया जाए। नहीं तो सोचिए हमारे बच्चे जहाँ दूध घी और कोचिंग करके भी पास नहीं हुए, उहां ऊ छोट जतिया लड़की रूखी–सूखी और बिना कोचिंग के फस्स किलास में पास भई। संपोली का फन समय रहते न कुचला गया तो अनर्थ हो जाएगा।“

धर्मेंद्र तिवारी बोले भी, “हमारे गाँव–घर की बेटी है। छोट-बड़ा मत मानों किसी को। कभी देखा है, कैसी पवित्र सपनीली आंखे हैं उसकी। मेरी मानों इतना अनर्थ मत करो। इंसानियत में भेद मत पैदा करो।“

धर्मेंद्र तिवारी, शिवाजी और मलखान सिंह कसमसाते रहे, मगर उनकी एक न चली। गजानन दादा की बात पक्की मान ली गई।

                                          -----   

गाँव के सरपंच के द्वार पर दोनों माँ बेटी बैठी थीं। सरपंच पुष्पेंद्र जी खाट पर बैठे थे। बड़कान के आठ-दस आदमी बतकही कर रहे थे। छोटकान की दस-बारह आकृतियाँ गाय-भैंस का कोयर-पानी, गोबर-गिदर का काम कर रहे थे। भरथी काकी द्वार के एक हिस्से को गोबर से लीप रही थी।

माँ और मैं, दोनों सरपंच से थोड़ी दूर पर बैठ गईं। सरपंच के दाहिना हाथ गजानन दादा हांक लगाए, “अरे ओ, नखडू बो, तनी भरथी का हाथ बटाँ दो। बेटी को भी लगा लो। जल्दी से काम निपट जाएगा। सरपंच के दरवाजे पर बिना काम काज के नहीं बैठा जाता, लगता है रीत भूल रही हो।“

सरोजा ने गजानन दादा के सामने हाथ जोड़ दिया, “परनाम दादा, परनाम सरपंच जी। दादा सरपंच जी ने सनेस दिया था!”

गजानन दादा ने परनाम का जवाब देते कहा, “अब बड़े लोग बुलाएंगे, तभी आओगे तुम लोग। सरकार और नियम कानून भरोसे मुंहजोरई ठीक बात नहीं। अरे हम एक तालाब की मछलियां हैं। हमारी समस्या है, हमें ही निपटना होगा। काम-धाम करो। नेक-जोक लो। परेम-धरम से रहो। चार दिन की जिंदगी में आखिर रखा क्या है?”

“जा बेटी आशीरबाद लेले पंडित महात्मा हैं। आशीष देंगे तो फेलेगी-फूलेगी।“

सुनैना ने हाथ जोड़ दिया।

गजानन दादा जल गए, मन में गरियाए। “ससुरी कातिक की कु....।“

मुंह पर नरमाई लाते बोले, “बड़ी लियाकतदार छोरी है। इसे भी काम-धाम पर लगाओ। सेर भर अनाज ज्यादा अनाज घर जाएगा।“

फिर दोनों के शरीर को आंखों टटोलते बोले, “ज्यादा अन्न जाएगा, तो शरीर पोढ़ हो होगा।“

“अरे नही दादा यह पढेगी। फस्स किलास आई है परीक्षा में।“ कहते हुए सरोजा का मन चौड़ा हो गया।

“अरे पढ़ाई-लिखाई से गुजर-बशर थोड़े ही होता है। कुछ काम धंधा करेगी कि नहीं। तुम भी बुढ़ा रही हो। कमाएगी-धमाएगी तो हाथ पीले करने में मदद मिलेगी।“ गजाननजी टटोलने की गरज से बोले।

“नहीं दादा, विद्या में मन रमा है। आशीरबाद दें कि पढ़-लिख कर काम काजी हो जाए।“

गजानन जी और सरपंच सहित बड़कान के सारे लोग सुलग गए।

सरपंच जी जबान को मलाईदार बनाते बोले, “अरे सरोजा भौजी। आपकी बेटी, हमारी बेटी। काम धाम भी करे, और पढ़े भी। पढ़ने से कौन रोकता है। घर का समझ कह रहे हैं। मजूरों की कमी थोड़े ना है।“

तो यही बात बास्ते सनेस दिया गया था। सरोजा सब समझ चुकी थी।

“मालिक हमसे जितना चाहे, खटा लें, मगर बेटी तो पढ़ेगी।“

“ओह नखड़ू की लुगाई, इतनी तेजी ठीक बात नहीं। सरपंच से बात करने का यही ढंग है। तुम्हारी जात लायक बता रहे हैं। पोथी देव जातियों को जंचती हो। कलजुग ने तुम लोगों का माथा खराब कर दिया है। बड़कान से बिगाड़ ठीक नहीं। जाओ ठंडे माथे से सोचना फिर बताना।“ कहते हुए सरपंच ने दोनों को भगा दिया।

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असाढ़ में छोटकान के मजूरों को देखा तक न गया। आठ ट्रैक्टर मजूर खाजगीपुर, अहरौती और डकही से लाए गए। सिवान भर टिटिहरी की तरह फैल गए। बड़कान का काम तेजी से हो रहा था। सारे मजूरों को सरपंच के खलिहान वाले अहाते में ठहरा दिया गया था। गवनई और रोपनी से पूरा सिवान खुश था। रात में अहाते में मजूर औरतें नाचतीं–गातीं। छोटकान टोला में सियापा छाया हुआ था। छोटकान के होठ पर फेफड़ी पड़ी थी। हफ़्ते भर से कई घरों में सुरन उबाल कर खाया जा रहा था। कुछ लोग बरसाती केकड़े को उबाल कर खाने लगे थे। किसी तरह छोटकान सांस ले रहा था।

सबेरे-सबेर मैं नज़र नही आ रही होऊंगी। माँ का करेजा बैठने लगा होगा। कहाँ गई बाँवरी। इधर-उधर खोजते–बीनते तीन बीसवा पार्क में वह हल गई थीं।

माँ को मेरा पीठ दिखाई पड़ा। मेरा मुंह बाबा साहेब की प्रतिमा के सामने था।      

पीठ पर कोमल स्पर्श! बेटी समझ गई माँ है। हंथेली की थरथराहट ने बता दिया कि माँ परेशान है। बिना सिर घुमाए बोली, “अब क्या होगा माँ, पढ़ पाउंगी की नहीं?”

“कैसी बात करती है। मूसल की डर से ओखल भागता नहीं। डटकर सामना करता है। फिर हम तो गरीब जात के लोग। दूब हैं हम, दूब। बिना खाद पानी के बौंसिया जाने वाला दूब, न थकता है, न रूकता है।“ माँ ने समझाना चाहा।

“माँ भूल रही हो। ओखल और मूसल की लड़ाई में धान की भूंसी निकल जाती है।“ बेटी यानि मैंने तर्क किया था।

“बेटी तूम धान नहीं इंसान हो। इंसान लड़ता है और जीतता है। लड़ो और जीतो। भागो मत, जीतो और दुनिया बदलो।“

माँ की नज़र बाबा साहेब की नज़र से टकरा कर आत्म सम्मान से लहक उठीं। माँ की फैली बाहें बेटी की राहें बन गईं।

सवेरे–सवेरे का वक्त था, मलखान सिंह आते दिखाए दिए। माँ-बेटी को देख तीन बिसवा के छोटा गोला में आ गए।

लंबे–चौड़े मलखान सिंह की आवाज गूंजने लगी, “दोनों माँ–बेटी परेशान हो। होना भी चाहिए आखिर हो तो इंसान ही। मगर ई बात गाँठ बाँध लो। गरीबी छल रही है। धीरज धरो। बड़कान के लोग हौसला तोड़ रहे हैं। मगर देखना खुद ही टूट जाएंगे। तुम सब टूटना मत। मजबूत होना। सिर है तो पगड़ी मिलेगी ही। पूरा देश बड़कान नहीं।“

इतना कहते हुए सुनैना के माथे पर हाथ फेरे और बोले, “तकदीर का तमाशा है बेटी। छंटते-छटते छट जाएगी। गाँव न सही शहर तो है। छोटकान के लोग अब शहर जाकर कमाएंगे। तुम पढ़ोगी और छोटकान बढ़ेगा। जीवनाथपुर में बिस्कुट की फैक्टरी लगी है। सैकड़ों लोग तो वहीं खप जाएंगे।“

इतना कहते हुए उन्होंने अखबार का टुकड़ा सरोजा को थमा दिया। सच में दो सौ मजदूरों की मांग की गई थी। हौसलों को पर निकल आए।

दूसरे दिन ही छोटकान टोला के कमासुत जीवनाथपुर शहर की ओर निकल गए। रोज का झीरा बंध गया। सुनैना पढ़ने लगी और टिन टप्पर और कच्चे घर पक्के होने लगे। दो साल बाद बारहवीं की परीक्षा में सुनैना ने पूरे प्रदेश में आठवाँ स्थान हासिल करके पूरे गाँव-जवाँर में गर्दा मचा दिया। पूरे ज्वार में आग लग गई। बड़कान में सियापा छा गया था।

गजानन दादा का चेहरा उतर गया। “इस खबर को सुनने के पहले महावीर जी ने उठा क्यों नहीं लिया।“

पुष्पेंद्र बहुत आहत थे। बड़ी कमजोर सी आवाज में बुदबुदाए, “गुलामों से लड़ भी लें। उस पोथीधारी अंबे़डकर से लड़े भीं तो कैसे लड़ें?”

उस दिन धर्मेंद्र तिवारी, शिवाजी और मलखान सिंह के घर को छोड़ पूरे बड़काम में चूल्हा तक न जला।

                                         ---- 

यूजी की कक्षाएं शुरू हो गईं थीं। विश्वविद्यालय का वह पहला दिन आज भी उतना ही चटख है। कितने चमकीले दिन थे वे। खिलखिलाती धूप और नाचती हवाओं का वह कोरस आज भी उतना ही ताजा है, जितना उस दिन था। सच में सफल अतीत बहुत सुंदर और लज्जतदार होता है।

पहली कक्षा का वह मंजर आंखों के सामने डोल गया। मध्यकालीन इतिहास की वह कक्षा अब तक उतनी ही ताजी थी। उपस्थिति लेते–लेते मेरे नाम के साथ उनकी नज़र क्लास में उठ गई। “हू इज सुनैना गौतम?”

“सर दीस इज मी, हियर दिस साइड।“ मुझमें न आत्मविश्वास की कमी थी, न आवाज कमजोर पड़ी।

“ओह, यू आर स्टेट टॉपर इन साइंस। सो व्हाई यू हैव इनराल्ड इन सोशल साइंस ग्रूप?” नज़ीर सर की नज़र प्रश्न वाचक बन चुकी थीं।

“सर आई वांट टू बी सोशल साइंटिस्ट।“ मैने उसी आत्मविश्वास से जवाब दिया था।

“ओह रियली। तब तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ गई,” कह कर उन्होंने उपस्थिति पूरी की और इतिहास लेखन पर बात की। पूरा का पूरा व्याख्यान आज भी याद है –

“इतिहास अतीत को देखने की कला है। मेरा मतलब एक यह प्रकार की दृष्टि है, जो निरपेक्ष तथ्यों और सूचनाओं को सापेक्ष अर्थ प्रदान करता है। इतिहासकार रेनियर ने कहा है, ऑल पास्ट इज माई पास्ट। और मैं उनमें अपनी संतुष्टि के स्थल और तथ्यों का चुनाव कर, उसे इतिहास के बोतल में उतार लेता हूँ। आप लोग सुनते आए होंगे कि इतिहास अतीत और वर्तमान के बीच सेतु है। यह काफी हद तक सच है, मगर शुरूआती इतिहासकार इस पर एक मत नहीं रखते थे। मैंडेलबाम ने कहा भी है – अतीत का अध्ययन अतीत के लिए नहीं, अपितु वर्तमान समाज की उपादेयता के लिए किया जाता है। अब आप सोचिए कि जब वर्तमान के आधार पर अतीत को देखा जाता है और दर्ज किया जाता है, तो निश्चित ही तथ्यों का कुछ हिस्सा लिया जाता होगा और बहुत कुछ छोड़ दिया जाता होगा। इस तरह इतिहास लेखन एक प्रकार का अपवित्र कर्म है। चूंकि तथ्यों का पूरा हिस्सा पवित्र रूप में कभी भी शामिल नहीं किया जाता इसलिए बार–बार इतिहास लिखा जाता है। जब तक मनुष्य, सत्ता और संस्थाएं रहेंगी, तब ऐसे ही इतिहास लिखा जाता रहेगा। मेरा मतलब इतिहास लेखन की मांग अंतिम मनुष्य के बने रहने तक होती रहेगी।“

बातों–बातों में कक्षा समाप्त हो गई, पता ही नहीं चला। नजीर सर के ज्ञान और पढ़ाने की शैली से पहले ही लेक्चर से पूरी कक्षा में छा गए। समझ में नहीं आ रहा था कि कोई इतना जानकार कैसे हो सकता है। उस दिन नींद नही आई। पूरी रात हास्टल के सामने जलते लैंपपोस्ट को देखते–देखते निकल गई। इतना बड़ा विभाग, इतना विशाल हराभरा विश्वविद्यालय परिसर पाकर मैं खुद को गौर्वान्वित और भाग्यशाली मानने लगी थी।

नजीर सर के पढ़ाने के ढंग और जानकारी को देख जमीन खिसक जाती थी। इतना अथाह ज्ञान, जैसे ज्ञान का जमीन-आसमान खुद इंसान बनकर धरती पर उतर आया हो।

एक बार पूछा भी, “सर इतना कैसे जान पाते हैं आप किसी भी विषय को?”

अपनी बड़ाई से कोसों दूर रहने वाले नजीर सर की आंखें सवाल को सुनकर सिकुड़ गईं, तुरंत ठहाका लगाते बोले, “पढ़ने का बोझ ज्ञान में तब्दिल हो गया होगा। मुर्दा किताबें मेरे जेहन में जिंदा हो गई होंगी शायद। इंसान नहीं भूत हूँ मैं, बचकर रहना तुम सब।“ अब ऐसे उत्तर पर कोई क्या कहता। बात आई गई हो गई।

विश्वविद्यालय की कक्षाएं और पुस्तकालय ने सपनों को रंगीन बना दिया था। हालांकि विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव का खेल बहुत महीन तरह से खेल रहा था। कई प्रोफेसर बाकायदे जातिगत भेदभाव करते रहे। मगर पढ़ने वाले पढ़ लेते थे। आखिर नजीर, बिजूदास, अजरा अली, रोहताश्व गौतम, और विवेक सिंह, राजाराम यादव और सुबोध सिद्धार्थ जैसे अध्यापक सामाजिक विज्ञान संकाय को संभाले हुए थे।   

देखते–देखते बीए. एम और पीएच.डी. तक यात्रा पूरी हो गई। आठ साल का समय मेरे बनने का समय था। इतने सालों में कितने मिले, कितने बिछड़े। छोटकान में कई लोग हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ गए। यहाँ तक माँ भी जुदा हो गई। माँ के न रहने की खबर आज भी दहला देती है। वह दिन कैसे भूल सकती हूँ –

माँ अपनी सारी इच्छाओं सहित चिता पर लेटी थी। लोग बता रहे थे कि वह मर गई है। हाँ मेरी माँ मेरे सफल होने की बाट जोहते-जोहते मर गई थी। वह जलने को तैयार थी। मैं जानती थी कि कुछ घंटों में प्यार करने वाले हाथ, खुशी में छलछला जाने वाली आंखें, शांति और भरोसा देने वाली गोद और सारी उम्र खटने वाला शरीर आग लपटों जल कर राख हो जाने वाला है। बापू के बाद माँ का भी गुजर जाना, यकीन नहीं हो रहा था, बर्दाश्त नहीं हो रहा था।

जिंदगी के साथ माँ इस तरह नत्थी हो गई थी कि पता ही नहीं चला कि मौत भी दबे पाँव चली आ रही है। पहले बापू और अब माँ, जिंदगी का मकसद ही खत्म हो चुका था।

‘’चिंता मत करो सुनैना।‘’ हाँ यही वह शब्द थे, जिन्हें जैवीर ने ढाढस बंधाते और और मेरे कंधे पर हल्के से टच करते कहा था। इन्हीं शब्दों पर विश्वास करने से मेरी दुर्दशा की कहानी शुरूआत हुई।

दलदल पर टिका यह रिश्ता भी उन्हीं शब्दों के भरोसे उसी दिन मिला था। माँ की धधकती चिता के सामने इतना कमजोर पड़ गई कि जैवीर के जाल में फंस गई। मां की चिता की रौशनी में इस कच्चे रिश्ते को लगभग स्वीकार कर चुकी थी मैं । कमजोर हालात  और किसी अपने की तलाश से उपजी कमजोरी ने यह बदला लिया। मेरी एक भावनात्मक कमजोरी ने पूरी जिंदगी को तबाह कर दिया। काश उस दिन जैवीर साथ–साथ गाँव न आया होता। तो मेरी जिंदगी काश बन कर न रह गई होती.......

प्यार मेरे लिए दलदल साबित होने वाला था, जिसे समय रहते नहीं भाँप पाई। उन्हीं दिनों झारखंड विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। हाँ इसी बीच वह यात्रा भी पूरी हुई, जिसे किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए था। यह हादसा अगर नहीं हुआ होता, तो छोटकान के काम आई होती। लोगों के भरोसे लायक हुई होती। मैं काठ की ऐसी लकड़ी हूँ, जो किसी के काम न आ पाई – ना माँ के, ना छोटकान के, ना अपनों के, न परायों। सब कुछ पाकर भी भींगीं काठ की तरह सुगलती ही रही।

सूरज, बीच गगन में दहक रहा था। मुझे फैसला लेना होगा। चौदह साल के नरक से बाहर आना होगा।  शरीर और आत्मा को बहुत लहूलुहान कर लिया। अब अपने और अपनों के लिए जीना होगा। माली पौधों की बाढ़ के लिए फालतू की शाखाओं को छाँट दिया करता है। अपना माली खुद बनना पड़ेगा। यह हक अब किसी को नहीं कि वह मेरे सुंदर दिमाग और शरीर को भूसा कहे और मेरे विश्वास और विचार को गाली दे।‘

मैं फिर दर्पण के सामने खड़ी हो गई। निर्णय की धूप से चेहरा दमक रहा था।

 

जनार्दन

सहायक प्राध्यापक                

हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उ.प्र. – 211002

                                                 मो.नं. 9969054221

लेखक से सम्पर्क के लिये ई-मेल - jnrdngnd@gmail.com

 

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